(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

हैरानी की बात नहीं है कि एआई यानी कृत्रिम मेधा इंपैक्ट विश्व शिखर सम्मेलन में, सारी दुनिया के सामने भारत की भद्द पिटवाने को लेकर, प्रधानमंत्री मोदी समेत समूचा संघ-भाजपा ईको सिस्टम, युवा कांग्रेस के डेढ़-दो दर्जन कार्यकर्ताओं के ”शर्टलैस” प्रदर्शन पर जो इतना हमलावर है, उसका एक बड़ा मकसद इस वैश्विक आयोजन के जरिए विश्व मंच पर उजागर हुईं, मोदी राज में भारत की विफलताओं पर पर्दा डालना भी था। बेशक, सहज खुशामदी गोदी मीडिया ही नहीं, स्वतंत्र मीडिया के भी बड़े हिस्से को एआइ के वैश्विक तमाशे की चकाचौंध से चौंधियाने में और सोशल मीडिया की बची-खुची आलोचनात्मक आवाजों में से भी कई को ‘देश की प्रतिष्ठा’ के झूठे नारों से चुप कराने में, मोदी सरकार काफी कामयाब रही थी। इसके बावजूद, देश के मीडिया से बढ़कर विदेशी मीडिया के प्रमुख हिस्सों से यह छुपा नहीं रहा था कि किस तरह, इस आयोजन में साफ-साफ झलक रही मोदी राज की महत्वाकांक्षाओं पर, उसके वास्तविक प्रदर्शन समेत सच्चाईयों ने पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

इस वास्तविक प्रदर्शन में उस चौतरफा अव्यवस्था को तो एक छोटा-सा हिस्सा ही कहा जाएगा, जिसके लिए बाद में स्वयं इस आयोजन के प्रभारी मंत्री, अश्विनी वैष्णव ने विशेष रूप से देश के विभिन्न हिस्सों से ही नहीं, दूसरे अनेक देशों से भी आए आइटी और एआई के व्यवहारकर्ताओं तथा इस क्षेत्र से जुड़े युवा उद्यमियों से ”माफी” मांगी थी। यह बाकी दुनिया से छुपा नहीं रहा था कि जैसा कि मोदी राज में नियम ही बन गया है, दूसरे हरेक मंच की तरह, एआइ शिखर सम्मेलन के मंच को, सबसे बढ़कर ही नहीं, बाकी हर चीज की कीमत पर, प्रधानमंत्री मोदी की छवि चमकाने का एक और मौका बना दिया गया। इसी का नतीजा था कि अपनी जेेब से काफी पैसा खर्च कर के और काफी उम्मीदें लेकर, इस क्षेत्र में अपने काम तथा उपलब्धियों का प्रदर्शन करने आए सैकड़ों स्टॉल लगाने वालों तथा हजारों प्रदर्शकों को, उदघाटन के दिन ही इसका अहसास करा दिया गया कि उनकी भूमिका, एक शोर भरी बारात में शामिल बाराती से ज्यादा नहीं थी। इस बारात का दूल्हा तो जाहिर है कि इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन का मेजबान देश होने के नाते, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे।

नरेंद्र मोदी ही छवि चमकाने के ही प्रयास में, राजधानी के लोगों को चाहे अपेक्षाकृत छोटे पैमाने पर ही, उस भारी ताम-झाम का दोहराव झेलना पड़ा, जो ढाई साल पहले जी-20 के मौके पर उसे झेलना पड़ा था। झेलना शब्द का प्रयोग यहां जान-बूझकर किया जा रहा है। जी-20 के लिए बड़े पैमाने पर राजधानी में की गयी सजावटों के पीछे, राजधानी में रहने वालों के लिए ट्रैफिक के पूरी तरह से अस्त-व्यस्त किए जाने से लेकर, पटरी-रेहड़ी आदि से लेकर रिक्शों व मजदूरी के अन्य साधनों से रोटी कमाने वालों को अदृश्य ही किए जाने से लेकर, आंखों को न सुहाने वाली बस्तियों को पर्दों के पीछे छुपाए जाने तक, चारों ओर खुशहाली का झूठा मंजर दिखाने के खेल तक, सब कुछ इस बार भी किया गया था। इसी सब का अगला कदम था कि पहले दिन, प्रधानमंत्री के विशाल भारत मंडपम में इस आयोजन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पहुंचने की तैयारी में, प्रधानमंत्री की सुरक्षा संबंधी तैयारियों के नाम पर, उनके पहुंचने से घंटों पहले से, सभी प्रदर्शकों को घंटों के लिए हॉलों से बाहर कर दिया गया, जहां उनके लिए न बैठने के लिए कोई जगह थी, न रुकने के लिए।



बहरहाल, इस सबसे भी ज्यादा भारत की खिल्ली उड़वाई, एआई के क्षेत्र में भारत के अगुआ होने की झूठी शेखीबाजी ने, जिसका आंखें खोलने वाला उदाहरण गलगोटिया विश्वविद्यालय का प्रकरण था। इस निजी विश्वविद्यालय ने, जो मोदी राज की विशेष कृपा का पात्र ही नहीं रहा है और जो एक तरह से मोदी राज का उच्चतर शिक्षा का वह ”मॉडल” भी रहा है, जिसके उदाहरण पर देश में समूची उच्च शिक्षा को ढाला जाना है, जिस तरह चीन की एक कंपनी द्वारा निर्मित और कुछ लाख रुपये में ही खरीदे के गए तथा बाजार में अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध, एक रोबो-डॉग को जिस प्रकार, 350 करोड़ रूपये के निवेश से निर्मित अपनी एआई सामर्थ्य के साक्ष्य के रूप में और ओरियॉन का प्रभावशाली नाम देकर जोर-शोर से पेश किया, उसका किस्सा तो अब सभी जान ही चुके हैं। पर्ल्स चाइना से सोशल मीडिया हैंडल से इस रोबो-डॉग के चीनी मूल को उजागर करने के बाद, जब इसी विश्वविद्यालय द्वारा प्रदर्शित एक ड्रोन के कोरियाई मूल को भी बेनकाब किया गया, उसके बाद ही हड़बड़ी में गलगोटिया विश्वविद्यालय से, जिसे मोदी राज की कृपा से असाधारण रूप से बड़ा स्टॉल इस आयोजन में एलॉट किया गया था, यह स्टॉल खाली कराया गया और आयोजन से बाहर ही जाने के लिए कह दिया गया।

जाहिर है कि इस प्रकरण ने एआई के क्षेत्र में भारत की वास्तविक स्थिति और मोदी राज में उसके बढ़े-चढ़े दावों के बीच की चौड़ी खाई को सारी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। मोदी राज में सच्चाईयों से बहुत दूर औैर बहुत मामलों में तो सच्चाईयों से ठीक उल्टी, झूठी शेखी बघारने को, नियम ही बना दिया गया है। सच्चाईयों से ठीक उल्टी शेखी बघारने का एक सबसे ज्यादा आंखों में गड़ने वाला उदाहरण, देश में गरीबी का अनुपात बहुत तेजी से घटने का दावा है, जबकि सचाई यह है कि आहार की न्यूनतम आवश्यकताओं के पैमाने से भी, देश में गरीबी का अनुपात तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस झूठी शेखी मारने की मोदी राज की इस प्रवृत्ति का दुनिया भर में डंका बज रहे होने का इससे बढ़कर सबूत क्या होगा कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तक ने भारत के आर्थिक वृद्घि के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है, जबकि आजादी के बाद से भारत में विकसित हुई सांख्यिकीय व्यवस्था को, तीसरी दुनिया की सबसे विश्वसनीय सांख्यिकीय व्यवस्थाओं में से एक माना जाता था।



फिर भी, गलगोटिया विश्वविद्यालय प्रकरण, मोदी राज में भारत की वास्तविक स्थिति और वर्तमान शासन के बढ़े-चढ़े दावों के बीच के भारी अंतर को तो दिखाता है, लेकिन यह नहीं बताता है कि भारत की वास्तविक स्थिति वैसी ही क्यों है? क्या वजह है कि देश के सबसे महंगे निजी विश्वविद्यालयों में से एक के लिए, एआई के क्षेत्र में अपनी प्रगति के प्रदर्शन के लिए, फर्जीवाड़े का ही सहारा है? आंशिक रूप से इस सवाल का जवाब इसी दौरान, राजधानी में ही एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के साथ, जो गलगोटिया से भिन्न एक सार्वजनिक क्षेत्र का विश्वविद्यालय है, उसके साथ मोदी राज में जो कुछ किया जा रहा है, उससे मिल सकता है। हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की बात कर रहे हैं, जिसके खिलाफ मोदी राज की शुरूआत से चलाए जा रहे बर्बादी के चौतरफा अभियान के ताजातरीन कदम के रूप में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पिछले साल हुई छात्र संघ की एक आंदोलनात्मक कार्रवाई के दौरान कथित अनुशासनहीनता के आरोप में, छात्र संघ के चारों निर्वाचित पदाधिकारियों को रस्टीकेट कर के, उनके विश्वविद्यालय में प्रवेश पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया। जाहिर है कि यह एक प्रकार से इसकी सजा है कि शुरू से वामपंथ के गढ़ रहे इस विश्वविद्यालय के छात्रों ने, मोदीशाही के चहेते, आरएसएस के छात्र संगठन, एबीवीपी को एक बार फिर चुनाव में पूरी तरह हराकर, चारों निर्वाचित पदों पर वामपंथी छात्र संगठनों के उम्मीदवारों को चुना था।



विश्वविद्यालय प्रशासन की इस छात्र विरोधी मनमानी के खिलाफ और वाइस चांसलर के घोर सवर्णवादी रुख के खिलाफ भी, छात्र संघ के आह्वान पर विश्वविद्यालय के छात्रों ने जब 22 फरवरी को देर शाम एक ”समता जुलूस” निकाला गया, वाइस चांसलर और प्रशासन के इशारे पर, एबीवीपी के गुंडों ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर पथराव किया और उन पर हमला कर दिया। याद रहे कि वाइस चांसलर ने पिछले ही दिनों एक पॉडकास्ट में, जातिवादी भेदभाव के संबंध में यूजीसी की हाल की गाइडलाइनों को अनुचित ठहराते हुए, वंचित तबकों की जातिवादी भेदभाव की शिकायतों को ही ‘झूठा’ बताया था। स्वाभाविक रूप से वाइस चांसलर के इस प्रतिगामी रुख के खिलाफ विश्वविद्यालय समुदाय में भारी नाराजगी है, जिसकी अभिव्यक्ति छात्रों के प्रदर्शन में हो रही थी। और दूसरे तमाम परिसरों की तरह जेएनयू में भी आरएसएस से संबद्घ एबीवीपी, शिक्षा परिसरों में ब्राह्मणवाद की तलवार बनी हुई है।

समझने की बात यह है कि जब शासन खुद, जेएनयू जैसे सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को किसी न किसी प्रकार नष्ट करने और समूची उच्च शिक्षा को ही गलगोटियाकरण के रास्ते पर धकेलने में लगा हुआ हो, जब सत्ता के लिए असुविधाजनक होने के चलतेे शिक्षा परिसरों में आलोचनात्मक सोच को ही कुचला जा रहा हो और जब शोध के लिए सत्ताधारियों के लिए और उनकी प्रतिगामी विचारधारा के लिए भी ”अनुकूलता” को अनिवार्य शर्त बनाया जा रहा हो, हम कैसे किसी वास्तविक शोध तथा नयी खोजों की उम्मीद कर सकते हैं। ऐसे वातावरण में तो एआई समेत किसी भी क्षेत्र में वास्तविक प्रगति की जगह, झूठे दावों और फर्जीवाड़ों की ही उम्मीद की जा सकती है, जैसाकि गलगोटिया विश्वविद्यालय ने किया है।
बेशक, एआई जैसे क्षेत्रों में अग्रिम मोर्चे की प्रगति के लिए, एक चीज और अनिवार्य है और वह भी मोदी राज में लगभग उपेक्षित ही है। हमारा इशारा, विज्ञान और शोध में बड़े पैमाने पर निवेश की ओर है। अगर एक ओर आम तौर पर शिक्षा को और खासतौर पर उच्च शिक्षा को, संघ-भाजपा की प्रतिगामी विचारधारा के ढांचे में ढालने की कोशिश में, विज्ञान तथा शोध के लिए सृजनात्मक मानव बल का रास्ता बंद किया जा रहा है और वास्तव में विज्ञान व शोध के लिए प्रतिबद्घ प्रतिभाओं को देश से बाहर अवसर ढूंढने के लिए मजबूर किया जा रहा है, वहीं निजीकरण की अंधी होड़ में सार्वजनिक क्षेत्र में शोध के रास्ते ही बंद किए जा रहे हैं, जबकि भारत में इजारेदार निजी क्षेत्र ने हमेशा ही अपने बटुओं को शोध व विकास पर निवेश के लिए काफी हद तक बंद ही रखा है। नतीजा यह है कि न निजी और न सार्वजनिक, कोई उल्लेखनीय निवेश भारत में शोध के लिए आ ही नहीं रहा है। ऐसे में विश्व गुरु बनने की शेखियों से तो, शोध के अग्रणी मोर्चों पर पहुंचा नहीं जा सकता है।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

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