“नसीब वालों को मिलता है तिरंगे का कफ़न,हर किसी की किस्मत में ये सम्मान नहीं होता।जो लौटे तिरंगे में लिपटकर वतन की खातिर,उससे बड़ा कोई इंसान नहीं होता। 🇮🇳”“तिरंगे में लिपटकर जो घर लौट आते हैं,वो मरकर भी इस देश के दिलों में बस जाते हैं।सलाम है हर उस वीर को,जो वतन पर अपना सब कुछ लुटा जाते हैं। 🇮🇳” दतिया उपचुनाव पर बयान देने की होड़, लेकिन इंदौर के वीर सपूत की शहादत पर राजनीतिक दलों की खामोशी चर्चा में इंदौर। अंकुल प्रताप सिंह, बघेल|| राजनीति में बयानों की कोई कमी नहीं होती। चुनाव जीतें तो बधाइयों की बाढ़ आ जाती है, हार हो जाए तो आत्ममंथन और आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। लेकिन जब बात देश के लिए वर्दी पहनने वाले एक जवान की अंतिम विदाई की हो, तब नेताओं की संवेदनाएं भी क्या राजनीतिक गणित देखकर तय होती हैं? यह सवाल इंदौर के लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। राजस्थान के जैसलमेर स्थित थईयात सैन्य क्षेत्र में सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले इंदौर के 26 वर्षीय मेजर हमजा आरिफ का पार्थिव शरीर जब पूरे सैन्य सम्मान के साथ इंदौर पहुंचा, तब शहर ने अपने वीर सपूत को नम आंखों से विदाई दी। भारतीय सेना ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया, लेकिन इस दौरान शहर की राजनीति लगभग मौन दिखाई दी। शहर के नागरिकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि इंदौर का प्रतिनिधित्व करने वाले मंत्री, सांसद, विधायक और विभिन्न राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेता आखिर इस मौके पर क्यों नजर नहीं आए? प्रदेश की राजनीति और दतिया उपचुनाव पर लगातार प्रतिक्रियाएं देने वाले नेताओं की ओर से इस दुखद घटना पर सार्वजनिक संवेदना और उपस्थिति अपेक्षित थी। इंदौर से प्रदेश सरकार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला, गोलू शुक्ला, मालिनी गौड़, महेंद्र हार्डिया, सांसद शंकर लालवानी सहित अन्य जनप्रतिनिधि हैं। वहीं कांग्रेस के भी कई वरिष्ठ नेता शहर में सक्रिय हैं। बावजूद इसके, अंतिम विदाई के दौरान प्रमुख राजनीतिक उपस्थिति को लेकर सवाल उठे। यह भी चर्चा रही कि कई नेताओं की ओर से सार्वजनिक श्रद्धांजलि संदेश तक सामने नहीं आए। मेजर हमजा आरिफ ने लगभग नौ वर्षों तक भारतीय सेना में सेवा दी थी। उनका विवाह महज एक माह पहले हुआ था। 30 जुलाई की देर रात ड्यूटी से लौटते समय उनकी सैन्य एसयूवी सड़क पर अचानक आए ऊंट से टकरा गई। भीषण दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई, जबकि दो अन्य सैन्य अधिकारी घायल हो गए। 2 अगस्त को उनका पार्थिव शरीर इंदौर लाया गया, जहां पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। यह घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि उस सैनिक की अंतिम यात्रा थी जिसने देश की सेवा को अपना जीवन समर्पित किया। ऐसे अवसर पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सभी दलों की उपस्थिति और श्रद्धांजलि लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का संदेश दे सकती थी। हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि किसी जनप्रतिनिधि की उपस्थिति या अनुपस्थिति के संबंध में आधिकारिक सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी भी नेता ने श्रद्धांजलि नहीं दी। लेकिन जिस स्तर की सार्वजनिक भागीदारी और राजनीतिक उपस्थिति की अपेक्षा थी, उसे लेकर शहर में सवाल जरूर उठ रहे हैं। देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक किसी दल, धर्म या विचारधारा के नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के होते हैं। ऐसे वीरों के सम्मान के अवसर पर राजनीति से ऊपर उठकर एकजुटता का संदेश देना लोकतांत्रिक समाज की परिपक्वता का प्रतीक माना जाता है। यही भावना अब इंदौर के कई नागरिकों की चर्चाओं में दिखाई दे रही है। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन ग्वालियर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: DIG राजेश चंदेल समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मामले का संज्ञान आदेश रद्द अबूधाबी-इंदौर फ्लाइट से आए यात्री के पास मिला करीब एक किलो सोना, डीआरआई की बड़ी कार्रवाई