विशेष खोजी रिपोर्ट | धूलकोट (बुरहानपुर) प्रदीप चौधरी। तपती धूप, सूखी धरती, फटे हुए पहाड़ और इन सबके बीच पानी की एक-एक बूंद के लिए मौत से जंग लड़ता बचपन। यह किसी अकाल ग्रस्त पिछड़े देश की तस्वीर नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के आदिवासी बहुल धूलकोट क्षेत्र की है । यह वही बुरहानपुर जिला है जिसे सरकारी दस्तावेजों में देश का पहला शत-प्रतिशत ‘हर घर जल’ (Har Ghar Jal) प्रमाणित जिला घोषित किया जा चुका है । लेकिन धरातल पर जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह दावों की पोल खोलने के साथ-साथ रोंगटे खड़े कर देने वाली है । View this post on Instagram तस्वीर की खौफनाक हकीकत: मौत के साये में प्यास बुझाती बच्चियां सामने आई इस तस्वीर को ध्यान से देखिए। यह बुरहानपुर जिले के धूलकोट क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले भगवानिया (भगवानपुरा) पंचायत के सरबड गांव के रेखलिया झिरा फालिया की है । तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि सूखी मिट्टी और दरकते पत्थरों वाले एक बेहद गहरे, खतरनाक और ऊबड़-खाबड़ गड्ढे (जिसे स्थानीय लोग ‘मौत का कुआं’ कहते हैं) के नीचे पानी का एक छोटा सा मटमैला स्रोत है । इस गहरे गड्ढे में कोई सीढ़ी या सुरक्षा का साधन नहीं है। एक मासूम बच्ची, जिसकी पीठ पर लंबी चोटी लटक रही है, वह बेहद खतरनाक ढलान पर झुककर एक धातु के घड़े (कलश) में पानी भरने का प्रयास कर रही है। ठीक उसके ऊपर, मिट्टी की सूखी और लगभग लंबवत (vertical) दीवार पर दूसरा बच्चा बिना किसी सहारे के केवल पत्थरों के उभार को पकड़कर लटक रहा है। जरा सा पैर फिसलने का मतलब है सीधे पत्थरों पर गिरकर जान गंवाना । प्यास का डर इन बच्चों के मन से मौत के खौफ को भी खत्म कर चुका है । कागजों पर ‘हर घर जल’, जमीन पर बूंद-बूंद को तरसते लोग इस जल संकट का सबसे बड़ा विरोधाभास इसकी प्रशासनिक कहानी में छिपा है। जुलाई 2022 में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा बुरहानपुर को देश का पहला ‘हर घर जल’ प्रमाणित जिला घोषित किया गया था, जहां दावा किया गया था कि जिले के सभी 254 गांवों के हर घर में नल से शुद्ध जल पहुंचाया जा चुका है । लेकिन रेखलिया झिरा फालिया के ग्रामीणों का कहना है कि नल-जल योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित हैं । ग्रामीणों की आपबीती इस प्रकार है: बंद पड़े जल स्रोत: गांव के हैंडपंप महीनों से खराब और ठप पड़े हैं । सूख चुके कुएं और तालाब: गर्मियों की शुरुआत होते ही पारंपरिक कुएं और तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे पानी का संकट गहरा गया है । सुबह 4:00 बजे से संघर्ष की शुरुआत: गांव की महिलाएं और मासूम बच्चियां सुबह 4:00 बजे ही खाली बर्तन लेकर पानी की तलाश में निकल जाती हैं और मीलों पैदल चलने के बाद दोपहर तक लौट पाती हैं । घंटों का इंतजार: गड्ढों में रिस-रिस कर जमा होने वाले गंदे पानी को छोटे बर्तनों से छानने में घंटों का समय लग जाता है, जिसके बाद बमुश्किल एक घड़ा पानी मिल पाता है । दूषित पानी और बीमारियों का कहर गहरे गड्ढों के सबसे निचले हिस्से में जमा पानी इतना गंदा और बदबूदार है कि उसे कोई जानवर भी न पिए । लेकिन प्यास बुझाने के लिए स्थानीय लोग और बच्चे इसी दूषित पानी को पीने के लिए मजबूर हैं । इसके परिणामस्वरूप गांवों में बीमारी जैसी स्थिति बन रही है। बच्चों में पेट दर्द, तेज बुखार, उल्टी और त्वचा रोग (त्वचा संक्रमण) जैसी गंभीर बीमारियां तेजी से फैल रही हैं । गरीब परिवारों के पास न तो इलाज के पैसे हैं और न ही साफ पानी खरीदने की व्यवस्था । बुरहानपुर के अन्य क्षेत्रों में भी त्राहि-त्राहि: कालमाटी और छतरपुर की स्थिति जल संकट की यह भयावहता केवल सरबड गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे धूलकोट क्षेत्र में प्रशासनिक लापरवाही के कारण आक्रोश पनप रहा है: कालमाटी गांव का गुस्सा: कालमाटी गांव में पिछले करीब डेढ़ महीने से पेयजल संकट बना हुआ है क्योंकि वहां के सरकारी बोरवेल की मोटर टूटकर कुएं में गिर गई है । स्थानीय सरपंच और सचिव इसकी लगातार अनदेखी कर रहे हैं । ग्रामीणों में इतना आक्रोश है कि वे चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल्द ही मोटर ठीक नहीं कराई गई तो वे जनप्रतिनिधियों के खिलाफ हिंसक रुख अपनाएंगे । छतरपुर गांव की सामाजिक त्रासदी: धूलकोट के निकट छतरपुर (चैतन्यपुर) गांव में स्थिति इतनी बदतर है कि पानी के इस गंभीर संकट के कारण गांव के लगभग 75% युवाओं की शादी नहीं हो पा रही है । पानी की कमी के कारण लोग अपने बच्चों की शादी इस गांव में नहीं करना चाहते, जिससे मजबूर होकर कई परिवार पलायन कर चुके हैं । वन्यजीवों पर भी संकट: जंगलों में पानी खत्म होने के कारण वन्यजीव भी प्यासे मर रहे हैं। हाल ही में पानी की तलाश में आबादी क्षेत्र की ओर आई एक मादा तेंदुए की मौत हो गई, जो इस पारिस्थितिकीय संकट की गंभीरता को दर्शाती है । कब जागेगा जिम्मेदार प्रशासन? इस हृदयविदारक तस्वीर के सामने आने के बाद अब यह सवाल सीधे तौर पर बुरहानपुर के जिला प्रशासन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से है। क्या ‘हर घर जल’ का प्रमाण पत्र केवल पुरस्कारों और वाहवाही तक ही सीमित रहेगा? क्या इन सुदूर आदिवासी बस्तियों में इस भीषण गर्मी में टैंकरों के माध्यम से तुरंत पानी भेजने का कोई इंतजाम किया जाएगा? उम्मीद है कि इस तस्वीर को देखने के बाद जिम्मेदार अफसरों और नेताओं की संवेदनाएं जागेंगी और इन मासूम बच्चियों को पानी के इस जानलेवा दलदल से बाहर निकालने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाए जाएंगे । Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन वीबी ग्राम-जी : ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम पर दोहरा हमला पेयजल संकट पर सरकार सख्त, हर जिले में बनेगा कंट्रोल रूम