(आलेख : प्रभात पटनायक, अनुवाद : राजेन्द्र शर्मा)

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) संभवत: स्वतंत्रता के बाद बनाया गया सबसे कारगर कानून था। यह कानून रोजगार निर्माण की महज एक योजना स्थापित नहीं करता था, जैसी इससे पहले आए ‘‘काम के लिए अनाज’’ कार्यक्रमों ने की थी। यह कानून, चाहे सीमित रूप से ही सही, रोजगार के अधिकार को मान्यता देता था।

मनरेगा कानून इसका प्रावधान करता था कि हर परिवार से एक व्यक्ति को मांगने पर, 100 दिन तक का रोजगार मुहैया कराया जाएगा। तदानुसार इस कार्यक्रम ने दुनिया का सबसे बड़ा रोजगार निर्माण कार्यक्रम स्थापित किया था। यह एक ऐसा कार्यक्रम था, जो अभाव के मारे ग्रामीण परिवारों को उल्लेखनीय राहत मुहैया कराता था।

हालांकि, इस अधिकार को संवैधानिक मान्यता हासिल नहीं थी, फिर भी मनरेगा को स्थापित करने वाला कानून संसद द्वारा काफी बहस तथा चर्चा के बाद पारित किया गया था। और यह चर्चा सिर्फ संसद तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि सांसदों तथा व्यापक रूप से समाज के बीच भी हुई थी, जिसमें अकादमिक अर्थशास्त्री, सार्वजनिक बुद्धिजीवी, मजदूरों के प्रतिनिधि और सिविल सोसाइटी संगठन, सभी की हिस्सेदारी थी। और यह कानून सर्वसम्मति से पारित हुआ था, जो इसे अर्द्ध-संवैधानिक वचन का दर्जा दे देता था।

बेशक, उस समय यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाइंस (यूपीए) सरकार के अंदर भी इस पर असहमति के स्वर भी थे, फिर भी बाहर से इस सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथ के दबाव की आखिरकार जीत हुई थी और सभी पार्टियां इसका समर्थन करने के लिए तैयार हो गयी थीं, जिनमें भाजपा भी शामिल थी।

*वर्गीय दुश्मनी है भाजपा की मनरेगा के प्रति*

इस कानून के जरिए शुरू हुई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ने सिर्फ ग्रामीण गरीबों के लिए ही जीवन रेखा मुहैया नहीं करायी थी, बल्कि शहरी गरीबों को भी जीवन रेखा मुहैया करायी थी, जैसा कि कोविड की महामारी के दौरान साफतौर पर देखने में आया था, जब बड़ी संख्या में शहरी गरीब अपने गांवों को लौटने के लिए मजबूर हो गए थे और वहां इस योजना के अंतर्गत मिल रहे काम ने ही उनकी मदद की थी।

चाहे बहुत सीमित हद तक ही सही, इस कानून ने समाज में वर्गीय ताकतों के संतुलन एक तब्दीली की थी। बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी कि इसकी वजह से मजदूरी के बढ़ने का दबाव बनने की संभावना से भूस्वामी धनिक खतरा महसूस करते थे। बात गरीब मजदूरों पर सामाजिक नियंत्रण छूट जाने की भी थी, इस डर की भी थी कि गरीब अब कहीं हाथ से बाहर ही नहीं निकल जाएं। मनरेगा के प्रति यह वर्गीय विरोध, भाजपा के गिर्द संघनित हो गया, जो तब तक सत्ता में आ चुकी थी और जिसने इसके लिए काफी भरोसा अर्जित कर लिया था। वह अपने इस वर्गीय पूर्वाग्रह को उजागर करती है तब भी, इस पूर्वाग्रह को जैसा कि उसका कायदा ही है, ‘‘विकास’’ की चिंता के आवरण में छुपा सकती है। अब यह दलील दी जाने लगी कि जिन अमूल्य संसाधनों का उपयोग ‘‘विकास’’ के लिए किया जा सकता था, उन्हें इस योजना के अंतर्गत, जो कि भ्रष्टाचार से ग्रसित है, बर्बाद किया जा रहा था। भाजपा के मामले में, वर्गीय पूर्वाग्रह के चलते मनरेगा का जो उसका विरोध था, उसे यह तथ्य और पुख्ता कर रहा था कि भाजपा जैसे फासीवादी संगठन अपरिहार्य रूप से जनता को कोई अधिकार दिये जाने के खिलाफ होते हैं। उनका जोर जनता के कर्तव्यों पर होता है, न कि अधिकारों पर।

*नये कानून की आड़ में हमला*

इसी सब का नतीजा था कि मनरेगा की जगह एक नया कानून बनाया गया है। इस कानून का बनाया जाना भी एक तरह से हाथ की सफाई का मामला था। यह कानून जल्दबाजी में संसद में पेश किया गया, इस पर मुश्किल से ही संसद में कोई बहस हो पायी और उसे फटाफट ध्वनि मत से पारित करा दिया गया। और अब 1 जुलाई से यह कानून लागू भी हो जाएगा। इन नये कानून के जरिए, पहले वाले कानून से अनेक बदलाव किए गए हैं।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि जहां पहले वाली योजना के तहत खर्चा 90:10 के अनुपात में केंद्र तथा राज्यों को वहन करना होता था, अब यह खर्चा केंद्र और राज्यों द्वारा 60:40 के अनुपात में उठाया जाएगा (‘विशेष श्रेणी के राज्य’ ही इसका अपवाद होंगे)।

इस बदलाव का फैसला केंद्र सरकार ने इकतरफा तरीके से कर लिया है, जिस संबंध में राज्य सरकारों से कोई परामर्श ही नहीं किया गया है। अब वर्तमान नव-उदारवादी निजाम में राज्य सरकारें पहले ही वित्तीय संसाधनों की तंगी से जूझ रही हैं। इसका एक बड़ा कारण गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) है, जिसने उस बिक्री कर की जगह ले ली है, जो इससे पहले तक राज्य सरकारें अपने विवेक के हिसाब से लगा सकती थीं। ऐसे हालात में राज्यों को इस योजना का 40 फीसद बोझ उठाने के लिए मजबूर करने का एक ही अर्थ है कि इस योजना का गला फंड की तंगी से घोंटा जा रहा होगा और इसका दोष राज्यों के सिर पर मढ़ा जा रहा होगा।

नये कानून, वीबी ग्राम-जी से ऐसा भी लग रहा था कि मनरेगा के सार्वभौम कवरेज का त्याग किया जा रहा है और इसकी मांग-संचालित प्रकृति का भी त्याग किया जा रहा है, जो इसे रोजगार का अधिकार देने के जैसा बनाती थी। इसकी वजह यह है कि नयी योजना सिर्फ अधिसूचित ग्रामीण इलाकों में ही लागू होनी थी (हालांकि इन इलाकों में रोजगार के अधिकतम दिन, पहले की योजना के 100 से बढ़ाकर 125 किए जाने वाले थे)।

बहरहाल, केंद्र सरकार के प्रवक्ताओं ने इससे इंकार किया है। नये कानून के पारित होने के फौरन बाद उन्होंने दावा किया था कि मनरेगा की तरह सार्वभौम कवरेज बना रहेगा और योजना की मांग संचालित प्रकृति भी अक्षुण्ण रहेगी, जबकि काम के दिनों की संख्या पहले के 100 दिन से बढ़ाकर 125 कर दी जाएगी।

*पहले ही समेटा जा रहा है रोज़गार*

लेकिन, यह नया कानून क्या प्रावधान करता है और क्या प्रावधान नहीं करता है, यह इसे देखते हुए अप्रासांगिक ही हो जाता है कि पुरानी योजना को अब किस तरह से संचालित किया जा रहा है और यह इस योजना को समेटे जाने के सिवा और कुछ नहीं है। यह इस योजना के संबंध में 2025-26 पर आयी रिपोर्ट से स्वत:स्पष्ट है। यह रिपोर्ट लिबटैक इंडिया द्वारा तैयार की गयी है, जो कि अकादमिकों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक कंसोर्शियम है।

यह रिपोर्ट बताती है कि मनरेगा के अंतर्गत रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 2024-25 की तुलना में, 2025-26 में 8.9 फीसद घट गयी और इसके तहत रोजगार पाने वालों की संख्या में 9.1 फीसद की कमी हो गयी। व्यक्ति-कार्यदिवसों की संख्या और भी तेजी से घटी है, पूरे 21.5 फीसद। इसका अर्थ यह है कि मनरेगा के अंतर्गत रोजगार पाने वाले मजदूरों को मुहैया कराए गए काम के दिनों की औसत संख्या में, उल्लेखनीय गिरावट  हुई है। जहां तक समग्र परिमाण का सवाल है, जहां 2024-25 में मनरेगा के अंतर्गत 268.44 करोड़ व्यक्ति-दिवस का रोजगार उपलब्ध कराया गया था, 2025-26 में 210.73 करोड़ व्यक्ति-दिवस का ही रोजगार उपलब्ध कराया गया।

लिबटैक का अनुमान है कि अगर 2025-26 में प्रति परिवार औसत व्यक्ति-रोजगार दिनों की संख्या 2024-25 के बराबर ही रही हो, तो इसके तहत काम पाने वाले हरेक परिवार ने 2024-25 में, 2025-26 के मुकाबले 1938 रुपये ज्यादा कमाए होंगे। दूसरे शब्दों में मनरेगा के कमजोर किए जाने के चलते, मजदूरों की इतनी आय मारी गयी है।

*घटते काम के लिए झूठी दलीलें*

किसी को यह लग सकता है कि हो सकता है कि 2024-25 का साल एक असामान्य साल हो और इसलिए उसके साथ तुलना से कोई भी नतीजा नहीं निकाला जा सकता हो। इसलिए, थोड़ा और पीछे जाना उचित होगा। बहरहाल, यह बात याद रखने की है कि महामारी के आने से ठीक पहले, 1919-20 के वर्ष में, मनरेगा के अंतर्गत 265.35 करोड़ व्यक्ति-दिनों का रोजगार सृजित किया गया था। दूसरे शब्दों में 2025-26 में आयी गिरावट, सिर्फ 2024-25 की तुलना में ही उल्लेखनीय नहीं है, बल्कि महामारी से पहले के सामान्य समय की तुलना मेें भी उल्लेखनीय है।

कुछ लोगों ने 2025-26 में आयी इस गिरावट को, काम की मांग में आयी गिरावट से जोड़ने की कोशिश की है और काम की मांग में गिरावट को, भारतीय देहात में गरीबी के घटने का नतीजा बताने की कोशिश की है। लेकिन, यह पूरी तरह से बेतुकी दलील है। सिर्फ इतना ही नहीं कि ग्रामीण गरीबी में कमी इस तरह की दलील देने वालों की कल्पना की ही उपज है, बल्कि यह तथ्य भी दर्ज करने वाला है कि 2025-26 में मनरेगा के लिए रोजगार हासिल करने के लिए नाम रजिस्टर कराने वाले परिवारों की संख्या भी वास्तव में 2024-25 के मुकाबले 3.2 फीसद बढ़ी ही थी और 2024-25 के 14.98 करोड़ से बढक़र 15.46 हो गयी थी। जाहिर है कि अगर इस योजना के अंतर्गत रोजगार हासिल करने में लोगों की दिलचस्पी घट रही होती, तो वे बढ़ती संख्या में रोजगार के लिए अपने नाम दर्ज नहीं कर रहे होते।

*ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम पर दोहरा हमला*

मनरेगा के अंतर्गत रोजगार में गिरावट के कारणों में दो कारण खासतौर पर उभर कर सामने आते हैं। पहला है, मनरेगा के लिए बजटीय आबंटन में 5 फीसद की कटौती किया जाना, जिसे अगर पिछले मजदूरी के बकाया 10,000 करोड़ से जोड़ दिया जाए, जिसका सबसे पहले भुगतान करना पड़ा होगा, यह इस योजना का वित्तीय पहलू से गला दबाए जाने का मामला हो जाता है। और इसका नतीजा, कम रोजगार दिए जाने के रूप में सामने आता है। संक्षेप में इस कार्यक्रम के लिए कम फंड मुहैया कराए जाने के जरिए, जान-बूझकर इसकी अधिकार-आधारित, मांग-संचालित प्रकृति का उन्मूलन किया जा रहा था। अगर योजना के लिए आबंटित फंड अपर्याप्त होने के चलते किसी वर्ष विशेष में मजदूरी समय पर नहीं दी जाती है या फंड का इस्तेमाल मजदूरी का पिछला बकाया चुकाने में होता है, तो संबंधित वर्ष के दौरान काम की मांग पूरी हुए बिना रह जाती है या मांग ही घट भी जाती है। उस सूरत में वित्त की उपलब्धता, एक व्यावहारिक अंकुश बन जाती है, जोकि वास्तव में यह बन गयी है।

दूसरा कारण है, ‘‘भ्रष्टाचार’’ को रोकने के नाम पर, इस कार्यक्रम की प्रक्रियाओं में प्रौद्योगिकीय बदलाव किया जाना, जो व्यवहारत: बड़ी संख्या में मजदूरों का इस कार्यक्रम के दायरे से बहिष्करण बन जाता है। आधार पर आधारित भुगतान और ऑन लाइन हाजिरी की अनिवार्यता का मतलब है मजदूरों की बड़ी संख्या का बाहर किया जाना, जो ई-केवाईसी पूरा नहीं कर सकते हैं।

*अधिकार छीनने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल*

यहां हमारा सामना मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण  जैसी ही परिघटना से है, जिसने हाल में हुए पश्चिम बंगाल के चुनावों में दसियों लाख मतदाताओं को बाहर कर दिया था। जिस तरह से एसआईआर के मामले में, ‘‘घुसपैठियों’’ को मतदाता सूचियों से बाहर रखने के नाम पर, ऐसी प्रौद्योगिकी का उपयोग किया गया, जिसके चलते थोक के हिसाब से नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया, उसी प्रकार मनरेगा के मामले में भी, ‘‘भ्रष्टाचार’’ दूर करने के नाम पर प्रौद्योगिकी का ऐसा प्रयोग किया गया है, जो मेहनतकश गरीबों की विशाल संख्या को रोजगार के उनके अधिकार से वंचित कर देता है। भाजपा सरकार ने (जिसके भुजा के रूप में चुनाव आयोग काम करता आ रहा है) लोगों के अधिकार छीनने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने में महारत हासिल कर ली है, जो कि एक मास्टरस्ट्रोक है।

वीबी-ग्राम जी में वित्त के केंद्र और राज्यों के बीच वितरण के जिस पैटर्न की संकल्पना की गयी है, जिसके तहत आने वाले बोझ राज्यों के लिए वहन करना मुश्किल होगा, उसे देखते हुए और ‘‘भ्रष्टाचार’’ से लड़ने के नाम पर मेहनतकश गरीबों पर प्रौद्योगिकी के जरिए जो हमला हो रहा है, उसे देखते हुए, इस तरह के सारे विवाद अप्रासांगिक ही हो जाते हैं कि जो नया कानून बनाया गया है, वह सार्वभौम कवरेज का प्रावधान करता है या नहीं और इसमें साल में अधिकतम 100 दिन के रोजगार का प्रावधान रखा गया है या 125 दिन के रोजगार का। सीधी-सच्ची बात यह है कि मनरेगा को खत्म किया जा रहा है।

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। अनुवादक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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