दस्तावेजों के बिना, एक दिल रोता खड़ा था,रुपयों की कीमत में रिश्ता तोला जा रहा था।बैंक दरवाज़े सख़्त, नियमों की ऊँची दीवार,सवाल ‘सबूत’ का और सामने टूटा परिवार।बहन की यादों का बोझ, भाई चला अकेला,कंधों पे सिर्फ़ ‘ढांचा’ नहीं, दर्द का पूरा मेला।कासे कहे अपनी मजबूरी, किसे सुनाए हाल,यूं इंसानियत हार गई जीत गया बस सवाल।क्या? कागज़ ही सच? दिल की क़ीमत नहीं?‘रिश्ते’ साबित करना पड़ें, इंसानियत हैं कहीं?उस दिन बैंक के बाहर, ‘आईना’ भी टूट गया,इसमें समाज का चेहरा, खुद से ही रूठ गया।चलो आज यह सोचें हम, ‘नियम’ ज़रूरी सही,पर इंसानियत से बढ़कर कोई भी सबूत नहीं।सख्त नियमों में शिथिलता की वकालत करो,आवश्यक है सबूत बस थोड़ा-सा धीरज धरों।(संदर्भ – बहन का कंकाल निकाल बैंक पहुंचा भाई!)संजय एम तराणेकर(कवि, लेखक व समीक्षक)इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)मो. 98260 25986(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित) View this post on Instagram View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading... Related पोस्ट नेविगेशन इंदौर पुलिस का नशे के सौदागरों पर बड़ा प्रहार: आदतन तस्कर भरत उर्फ लंगड़ा PIT NDPS एक्ट में भोपाल जेल भेजा गया भोपाल में पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर 1 मई को महाआंदोलन, छतरपुर से रवाना होगा 25 वाहनों का काफिला