नई दिल्ली/विशेष रिपोर्ट: प्रदीप चौधरी/अंकुल प्रताप सिंह, बघेल.साल 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद से अप्रैल 2026 तक भारत की अर्थव्यवस्था में महंगाई, रोजगार और दैनिक खर्चों को लेकर व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। सरकारी और स्वतंत्र स्रोतों के आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट बताती है कि आम आदमी की जेब पर असल असर क्या रहा। महंगाई: डबल डिजिट से नियंत्रण तक यूपीए सरकार (2011-14) के अंतिम वर्षों में देश ने लगातार ऊंची महंगाई का सामना किया। इस दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) महंगाई औसतन 8-10% रही, जबकि 2013 में यह 10% से ऊपर पहुंच गई थी। 2014 के बाद स्थिति में बदलाव आया। 2017 में महंगाई घटकर 3.33% के न्यूनतम स्तर पर पहुंची 2018-19 में यह लगभग 3.7-3.9% रही कोविड काल (2020) में बढ़कर 6.62% हुई 2023-24 में फिर नियंत्रण में आई (लगभग 5%) 2025 में औसत 2.18% तक गिर गई 2026 (मार्च तक) में हल्की बढ़त के साथ 3.40% 2014 के बाद औसत महंगाई लगभग 5% रही, जो पहले की तुलना में 3-4% कम है और अधिकतर समय RBI के लक्ष्य (4% ±2%) के भीतर रही। रोजगार: सुधार के संकेत, लेकिन चुनौती बरकरार रोजगार के मोर्चे पर मिश्रित तस्वीर सामने आती है। 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1% थी 2023-24 में घटकर 3.2% हुई 2025 में यह लगभग 3.1-3.2% के आसपास रही 2026 (फरवरी) में मासिक आधार पर 4.9% विशेष बिंदु में : महिला श्रम भागीदारी में वृद्धि हुई शिक्षित और युवा बेरोजगारी अभी भी चिंता का विषय है अलग-अलग स्रोतों (PLFS, CMIE) में आंकड़ों में अंतर दिखता है ईंधन की कीमतें: जेब पर सीधा असर पेट्रोल (2014): ~₹72 प्रति लीटर 2025-26: ~₹94-105 प्रति लीटर डीजल (2014): ~₹55 अब: ~₹90+ कुल मिलाकर पेट्रोल-डीजल में 40-50% तक बढ़ोतरी दर्ज की गई।हालांकि बीच-बीच में टैक्स कटौती और वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट से राहत भी मिली। LPG सिलेंडर: सब्सिडी से DBT तक 2014 में सब्सिडी वाला सिलेंडर ~₹410-450 2026 में प्रभावी कीमत (सब्सिडी सहित) ~₹550-613 नॉन-सब्सिडी सिलेंडर ~₹913 बदलाव: उज्ज्वला योजना से गरीब परिवारों को कनेक्शन मिला DBT से सब्सिडी सीधे खाते में पहुंची लेकिन कुल खर्च में बढ़ोतरी महसूस की गई रसोई का बजट: सबसे बड़ा दबाव 2014 से 2025 के बीच आम खाद्य वस्तुओं में भारी बढ़ोतरी देखी गई: दूध: ~67% बढ़ोतरी दालें: 80-110% तक सब्जियां: 60-130% (मौसमी असर) तेल, अनाज: 13-70% हालांकि 2025-26 में कुछ महीनों में फूड इन्फ्लेशन कम या नकारात्मक रहा, लेकिन कुल रसोई खर्च पहले से काफी अधिक बना हुआ है। स्वास्थ्य और शिक्षा: तेजी से बढ़ती लागत मेडिकल महंगाई: 11-14% सालाना शिक्षा महंगाई: 8-12% सालाना हॉस्पिटल खर्च, दवाइयां और स्कूल/कॉलेज फीस में 2-3 गुना तक बढ़ोतरी ने मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त बोझ डाला है। राजनीतिक बहस: आंकड़े बनाम अनुभव सरकार का पक्ष:सरकार का दावा है कि उसने महंगाई को नियंत्रण में रखा, रोजगार बढ़ाया और उज्ज्वला, DBT व इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के जरिए आम आदमी को राहत दी। विपक्ष का आरोप:विपक्ष महंगाई को “रसोई पर हमला” बताते हुए पेट्रोल, डीजल और LPG पर टैक्स बढ़ोतरी को मुख्य कारण मानता है। स्वास्थ्य और शिक्षा की बढ़ती लागत को भी बड़ा मुद्दा बताया जा रहा है। समग्र में क्या.? 2014 के बाद भारत में महंगाई पर काफी हद तक नियंत्रण देखा गया और बेरोजगारी दर में गिरावट के संकेत मिले।लेकिन दूसरी तरफ: ईंधन और रसोई खर्च में बढ़ोतरी स्वास्थ्य और शिक्षा की तेज महंगाई युवा बेरोजगारी की चुनौती इन सबने आम आदमी की आर्थिक स्थिति को जटिल बनाए रखा। आखिरी बात:आंकड़े एक तरफ स्थिरता की कहानी बताते हैं, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में खर्च का दबाव अभी भी पूरी तरह कम नहीं हुआ है। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन जवा में महात्मा ज्योतिवाराव फुले एवं सामाजिक समानता के पुरोधा बाबा साहब अम्बेडकर जी की मनाई गयी जयंती वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला