(आलेख : राजेन्द्र शर्मा)

अगर यह संयोग था, तब भी बहुत-बहुत कुछ उजागर करने वाला संयोग था। 26 जनवरी को, जब देश एक गणतंत्र के रूप में अपने रूपांतरण के 76 साल पूरे होने का जश्न मना रहा था और सारी दुनिया के सामने एक धर्मनिरपेक्ष, जनतंत्र पर आधारित गणतंत्र के रूप में अपनी ताकत और मजबूती का प्रदर्शन करने में जुटा हुआ था, ठीक उसी समय देश के एक कोने में स्थित छोटे से पर्वतीय राज्य, उत्तराखंड से सारी दुनिया को भारत के इससे उल्टे ही रूपांतरण का संदेश दिया जा रहा था। इस हिमालयी राज्य में, सामान्यत: शांत रहने वाले कस्बे कोटद्वार की शांति एक उग्र सांप्रदायिक प्रदर्शन ने भंग कर दी। मुख्यत: कस्बे के बाहर से कई वाहनों में भरकर पहुंचे विहिप, बजरंग दल आदि, विभिन्न संघ परिवारी संगठनों के हुल्लड़बाज, ‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंक सेंटर’ नाम की एक छोटी सी दूकान पर उपद्रव कर रहे थे। कस्बे की गिनी-चुनी मुस्लिम दूकानों से एक के निशाना बनाए जाने के लिए उनका बहाना यह था कि दुकान मुसलमान की है और नाम में बाबा शब्द ; इसे अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे।

याद दिला दें कि इस छोटे से पर्वतीय राज्य में, जहां मुस्लिम अल्पसंख्यकों की आबादी बहुत ही थोड़ी है, भाजपा के डबल इंजन राज में आम तौर पर और मोदी-शाह के चुने हुए मुख्यमंत्री, धामी के राज में खासतौर पर, सांप्रदायिक कड़ाह को लगातार खदकाए रखने के एक महत्वपूर्ण उपाय के रूप में, किसी न किसी बहाने से और बहुत बार बिना किसी बहाने के भी, मुस्लिम दूकानदारों और फेरीवालों आदि को चुन-चुनकर निशाना बनाये जाने का सिलसिला लगातार जारी रहा है। इसे हिंदुत्ववादी संगठनों की ओर से जवाबी ‘आर्थिक जेहाद’ बताया जा रहा है, जिसका मकसद मुसलमानों को आर्थिक रूप से पूरी तरह से बेदखल करना है।
बहरहाल, 26 जनवरी को जो हुआ, वह संघ परिवार के डबल इंजन राज में बराबर जोर पकड़ रही इस सांप्रदायिक मुहिम की याददिहानी भर नहीं था। वह इससे कुछ बड़ा था। इससे आगे के संकेत करने वाला था। हुआ यह कि पुलिस की मौजूदगी और वास्तव में तमाशबीनी के साथ, अब आए दिन की चीज हो चुका है। यह हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक तमाशा अपने उत्कर्ष पर पहुंचता, तभी उसमें अचानक बाधा पड़ गयी। उक्त बाबा की दुकान से थोड़े ही फासले पर चल रहे एक जिम का संचालक दीपक कुमार और उसका सहयोगी विजय रावत, हुड़दंगी भीड़ के रास्ते में आ गए। उन्होंने कहा कि दूकानदार मुसलमान है, इसलिए दुकान का नाम बाबा रखने पर आपत्ति करना निहायत बेतुकी बात है। किसी को भी बाबा नाम रखने से नहीं रोका जा सकता। नाम बदलने की मांग को लेकर यह हंगामा सरासर गलत है और यह उपद्रव लीला बंद करनी होगी। कहा-सुनी के बीच दीपक ने उपद्रवियों को चुनौती देते हुए यह भी कह दिया कि उसका नाम दीपक मोहम्मद है और उसके रहते एक मुसलमान की दूकान को कोई हाथ नहीं लगा सकता है।

दीपक पहलवान रहा बताते हैं। उसके तथा उसके साथी के अड़ जाने पर, मामूली धक्का-मुक्की के बाद और पुलिस के बीच-बचाव की भूमिका संभालने के बाद, हिंदुत्ववादी उपद्रवी फिर लौटकर आने और खासतौर पर दीपक कुमार को सबक सिखाने की धमकियां और गालियां देते हुए लौट गए। बेशक, यह अब विशेषकर डबल इंजनिया शासनों में तो दुर्लभ से दुर्लभतर होता जा रहा है कि हिंदुत्ववादी टुकड़ियों के धावे को, जमीन पर परंपरागत सांप्रदायिक सद्भाव के पैरोकारों का सामना करना पड़े और उन्हें पीछे हटना पड़े। फिर भी अपवादस्वरूप ही सही, मोदी राज के 12 साल बाद भी, ऐसी इक्का-दुक्का घटनाएं तो सामने आ ही जाती हैं। इसलिए, 2026 की छब्बीस जनवरी में जो हुआ, उसमें नया इतना ही नहीं था। वास्तव में नया तो उसमें था, जो छब्बीस जनवरी के बाद हुआ।

शनिवार, 31 जनवरी को भगवा ब्रिगेड सचमुच और ताकत के साथ कोटद्वार वापस लौटी। दीपक और विजय के खिलाफ उग्र प्रदर्शन के नाम पर, उन्होंने कस्बे में जमकर हंगामा किया, दीपक के जिम पर उपद्रव किया, भड़काऊ सांप्रदायिक नारे लगाए और राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम भी किए रखा। जाहिर है कि यह सब पुलिस की मौजूदगी में किया जा रहा था। लेकिन, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक उपद्रवियों का, अपने सांप्रदायिक अभियान के रास्ते में आने वाले, सांप्रदायिक सौहार्द्र के पैरोकारों से निपटने के लिए, शासन के प्रकट-परोक्ष इशारे पर, सीधे हिंसा के साथ-साथ धरना-प्रदर्शन-सड़क जाम जैसे विरोध के सुपरिचित तरीकों का सहारा लेना भी पूरी तरह से नया नहीं है। इस सिलसिले में जम्मू-कश्मीर में कठुआ का कुख्यात आसिफा अपहरण-बलात्कार-हत्या कांड बरबस याद आ जाता है। चूंकि आठ वर्षीया बक्करवाल बच्ची के साथ दरिंदगी करने वाले खुद को हिंदू कहते थे, न सिर्फ संघ परिवार के तमाम संगठन इन अपराधियों की हिमायत में बड़े-बड़े जुलूस निकाल रहे थे, वे तिरंगा झंडा लेकर ये जुलूस निकाल रहे थे और न सिर्फ साधारण भाजपा नेता, बल्कि जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन गठजोड़ सरकार में शामिल भाजपा के मंत्री तक, इन प्रदर्शनों में शामिल हो रहे थे। इसलिए, कोटद्वार में मुसलमान दूकानदार और खासतौर पर उसके बचाव में खड़े हुए हिंदूओं के खिलाफ, भगवा बिग्रेड का यह दूसरा धावा भी एकदम नया तो नहीं ही था।

फिर भी इस प्रकरण में कुछ ऐसा था, जो जितना डराने वाला था, उतना ही नया भी था। और यह था, मोदी-शाह के विशेष विश्वासपात्र मुख्यमंत्रियों में गिने जाने वाले धामी की पुलिस का एक्शन। शनिवार की शाम धामी की पुलिस ने विहिप-बजरंग दल के दो कार्यकर्ताओं की शिकायत पर, दीपक कुमार और विजय रावत के खिलाफ दंगा करने से लेकर कानून व व्यवस्था में व्यवधान डालने तक, विभिन्न आरोपों में एक एफआईआर दर्ज कर ली। बेशक, ‘निष्पक्षता’ के दिखावे के लिए पुलिस ने इसी के साथ दो और एफआईआर दर्ज कर लीं, भगवा संगठनों के कार्यकर्ताओं के खिलाफ; एक दीपक और विजय की शिकायत पर और दूसरी, मुस्लिम दूकानदार की शिकायत पर। लेकिन, ये दोनों एफआईआर अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गयी थीं, जिनमेें एक तो पचास-साठ अज्ञात लोगों की भीड़ के खिलाफ थी। ज्ञात आरोपी, दीपक और विजय ही थे। और जहां तक धामी की पुलिस का सवाल है, हालांकि पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिस उपस्थित थी और विभिन्न प्रकरणों के वाइरल वीडियो उसके पास भी थे, उसने खुद न कुछ देखा था और सुना था। इसलिए वह, जैसा कि स्थानीय एसपी ने यूट्यूब पत्रकार अजीत अंजुम को बताया, कोरी स्लेट लेकर अब इसकी जांच कर रही है कि क्या हुआ था और किसने क्या किया था? सांप्रदायिक सौहार्द्र के पक्ष में खड़े होने के लिए एफआईआर, गणतंत्र के छिहत्तर साल की यही नयी उपलब्धि है।

लेकिन, उत्तराखंड में जो हुआ, वह तो एक मिसाल है, हालांकि आंखें खोलने वाली मिसाल है, बशर्ते आप आंखें बंद होने का नाटक नहीं कर रहे हों। उत्तर-पूर्व का द्वार माने जाने वाले असम में इसी दौरान जो हो रहा है, वह और भी भयानक है। यहां डबल इंजनिया सरकार का मुख्यमंत्री, चंद महीने में होने जा रहे विधानसभाई चुनाव के लिए सब कुछ झोंकने और स्वाहा करने की अपनी उतावली में, सीधे-सीधे मियां (बांग्लाभाषी मुसलमानों) समुदाय का उत्पीड़न करने के सार्वजनिक आह्वान तक ही पहुंच गया। यह शायद स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी सत्तासीन मुख्यमंत्री के किसी समुदाय के नरसंहार के आह्वान के निकटतम पहुंच जाने का, पहला ही उदाहरण है। और मोदी राज के 12 साल में जनतंत्र की तमाम संस्थाओं के अंतर्ध्वंस का ही कमाल है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भले ही भारत के समूहिक नरसंहार से ‘चंद मिनटों की दूरी पर’ रह जाने की चेतावनियां दे रही हों और वास्तव मेें उत्तर-पूर्व में मणिपुर में तीन साल पहले बाकायदा नरसंहारकारी हिंसा फूट चुकी हो, जिसके शोले अब भी रह-रहकर भड़क उठते हैं, और खुद असम में अस्सी के दशक में नेल्ली के नरसंहार का इतिहास मौजूद हो, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग और मुख्यधारा का मीडिया, किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है।

और खुद मोदी सरकार। न सिर्फ उसकी हिमंता बिस्वा सरमा पर विशेष कृपा है, बल्कि वह उसकी उकसावेपूर्ण बयानबाजी का शीर्ष स्तर से अनुमोदन करने में ही लगी हुई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री सरमा के आग लगाऊ प्रचार अभियान के सुर में सुर मिलाते हुए, असम के अपने दौरों मेें न सिर्फ तथाकथित घुसपैठियों के खतरे को अपने चुनाव प्रचार का केंद्रीय मुद्दा बनाने का ऐलान कर दिया, बल्कि बिना किसी आधार, गणना या तर्क के, अचानक इसका ऐलान कर दिया है कि असम में 76 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं, जिन्हें निकाल बाहर करने का भाजपा का वादा है। शाह ने तथाकथित घुसपैठियों से बेदखलियों के जरिए एक लाख एकड़ से ज्यादा जमीन ‘छुड़ाने’ के लिए सरमा की पीठ भी ठोकी, हालांकि खुद सरमा जमीनी स्तर पर इसका वादा करते भी दिखाई दिए कि अगर बेदखली के मामले में किसी के साथ ज्यादती हुई है, तो उसका पुनर्वास किया जाएगा। बांग्लादेशी घुसपैठियों का पुनर्वास!

और महामहिम प्रधानमंत्री! उन्हें भी कम से कम असम और बंगाल में तो बांग्लादेशी घुसपैठियों के खतरे के सिवा और कुछ न सुनाई दे रहा है, न दिखाई दे रहा है। उनके डबल इंजनिया राज में बाकी देश में संविधान के जैसे परखचे उड़ाए जा रहे हैं, उसे उनका कहीं मूक तो कहीं मुखर आशीर्वाद ही हासिल है, जिसने भाजपायी मुख्यमंत्रियों के बीच ज्यादा से ज्यादा नंगई से सांप्रदायिक राज स्थापित कर के दिखाने की होड़ ही छिड़वा दी है। अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन चले न चले, पर मोदी राज ने देश को अंधेरे अतीत की ओर जाने वाली बुलेट ट्रेन पर सवार कर दिया है, जो देश को 1947 से पीछे ले जाने के लिए, 2047 तक का समय हर्गिज नहीं लेगी।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

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