(आलेख : अखिलेश यादव)

16 फरवरी से मध्यप्रदेश विधानसभा का बजट सत्र शुरू होने वाला है। हालांकि इस बीच बहुत कुछ बदल गया है, अनेक चीजों ने अपने अर्थ खो दिए हैं, मगर तब भी बजट से जनता को कुछ उम्मीदें रहती ही हैं। उन्हें लगता है कि शायद इस बार बजट में ऐसा कुछ आये, जिससे उनकी घुटन कुछ कम हो, थोड़ी-बहुत राहत मिले। ऐसी ही उम्मीद में मध्यप्रदेश का किसान है। होना गलत भी नहीं है, आखिर इस प्रदेश में उसका योगदान बहुत है।  2024-25 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि क्षेत्र अभी भी मप्र की अर्थव्यवस्था की “रीढ़” बना हुआ है। राज्य की लगभग 70% आबादी अभी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। कहने की आवश्यकता नही कि इतनी बड़ी आबादी को अनदेखा करके लाया गया कोई बजट इस आबादी का तो छोड़िये, प्रदेश का भी भला नहीं कर सकता। इस हिसाब से क्या किया जाना चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जिनके लिए किया जाना है, वे किस स्थिति में हैं। इसे जानने के ज्यादा विस्तार में जाने की बजाय सिर्फ कुछ ताजी हैडलाइन्स पर नजर डालना काफी होगा।
 
*एक* – किसान आत्महत्याओं के मामले में देश के सबसे कुख्यात 4 प्रदेशों में से एक मध्यप्रदेश में अकेले नवम्बर के महीने में 9 किसानों की आत्महत्या दर्ज हुई। इनमें से चार प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह जिले उज्जैन में हुईं। लागत न निकल पाना और कर्ज का बढ़ता जाना इसकी एकमात्र वजह है। गुना का एक किसान तो 30 लाख रुपया चुकाने के बाद भी कर्ज के फंदे से बाहर नहीं निकल पाया और उसने आत्महत्या कर ली।

*दो* — केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले और संसदीय क्षेत्र सहित उनके गृह प्रदेश में खाद के लिए लाइन में लगे किसानों पर लाठी चार्ज हुए और दिन-रात खड़े रहे भूखे-प्यासे किसानों में से महिलाओं सहित कई किसानों की मौत की खबरें इतनी अधिक थीं कि दरबारी मीडिया को भी उन्हें छापना पड़ा।

*तीन* — चम्बल एक्सप्रेस-वे में जमीन अधिग्रहित किये जाने से घबराए श्योपुर के एक किसान ने अपनी जान ले ली।

*चार* — सीहोर और विदिशा के किसानों ने लगातार तीसरी बार फसल के बर्बाद होने पर सोयाबीन की शवयात्रा ही निकाल दी।

*पांच* — पिछली साल की शुरुआत में बुन्देलखंड और मालवा में और उसके बाद लगभग पूरे प्रदेश में बेमौसम की बारिश से कहीं ज्यादा, तो कहीं कम ज्यादा, औसतन  30 से 35 प्रतिशत फसल चौपट हो गयी। इनमें से किसी को भी प्रधानमंत्री फसल बीमा का फायदा मिला हो, ऐसी झूठी खबर भी नहीं आई।

*छह* – देश के साथ प्रदेश में भी किसान तेजी से अपनी खेती छोड़ रहे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के एक पुराने सर्वेक्षण के अनुसार, तब देश के लगभग 40% किसान खेती छोड़ना चाहते थे, क्योंकि यह घाटे का सौदा और जोखिम भरा लगता था। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के एक अध्ययन के अनुसार, अब लगभग 76% किसान किसी बेहतर विकल्प के मिलने पर खेती छोड़ना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

*सात* – किसान तेजी से मजदूरों में बदलते जा रहे हैं। प्रदेश के सभी जिलों में खेती करने वाले मुख्य किसानों की संख्या में कमी आई है और कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ी है। उदाहरण के लिए, सीधी जिले में किसानों की संख्या में 23.5% की कमी और सिंगरौली में 26% की कमी दर्ज की गई थी। 2011 की जनगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में पहली बार “किसानों” की संख्या में 11.93 लाख की कमी आई थी, जबकि कृषि मजदूरों की संख्या में 47.91 लाख की वृद्धि हुई। यह रुझान 2011 के बाद भी जारी है ।

*आठ* – किसानों की जमीन सिकुड़ रही है। राज्य में किसानों के पास औसत जमीन का आकार 2010-11 में 1.15 हेक्टेयर था और 2015-16 तक घटकर 1.08 हेक्टेयर रह गया। इसके बाद के 10 वर्षों में यह रफ़्तार और तेजी से बढ़ी है, क्योंकि खेत जितने छोटे होते हैं, खेती उतनी ही अलाभकारी होती जाती है और फिर उसे छोड़ना ही एक विकल्प बचता है।
              
दशा को बयान करने वाली दुर्दशाओं की कहानियां और भी हैं, मगर फिलहाल बात को इन आठ दिशाओं तक ही सीमित रखते हैं। कोई भी जिम्मेदार सरकार अपने बजट को तैयार करते समय इन हालात से निजात पाने के उपायों को ही प्राथमिकता देगी। इस लिहाज से मध्यप्रदेश सरकार के वर्ष 2026-27 के बजट में जो प्रावधान किये जाने की जरुरत है, उनमें से कुछ इस प्रकार होने चाहिए।

*उपज के दाम दिलाना और लागत घटाना*

खेती को अलाभकारी बनाने की बुनियादी वजहों को दूर करना इनमे से एक होगा। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कथनी और करनी दोनों में वास्तविक बनाने के कदम उठाये जाने चाहिये। एमएसपी का निर्धारण ए-2+एफएल की बजाय सी-2+50% के फार्मूले से किया जाए। व्यवहार में अभी इसके दायरे में सिर्फ गेंहू, धान, दलहन, तिलहन आते हैं, इसे बढाया जाए और सभी फसलों, शाक सब्जियों, दूध और अंडा तथा वनोपज के लिए भी एमएसपी निर्धारित की जाए। एमएसपी पर खरीदी सुनिश्चित करने के लिए खरीदी केन्द्रों का विस्तार और देखरेख का तंत्र मजबूत किया जाए तथा उससे कम दाम पर खरीद को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। इसी के साथ समय पर खाद – यूरिया और डीएपी – की उपलब्धता जी गारंटी की जानी चाहिए। खाद और बीज की कालाबाजारी, उसमें भी नकली थमाए जाने की बीमारी एक बड़ी समस्या बन गयी है। किसानों की आमदनी में कमी की एक वजह बिजली है : ऐसे प्रबंध किये जाने चाहिए कि खेती के समय पर आपूर्ति हो और इसके निजीकरण तथा स्मार्ट मीटर की योजना तत्काल बंद की जाए।

सिचाई मुहैया कराना एक और आयाम है। अभी प्रदेश में मात्र 17 सिचाई नहरों से और करीब ढाई प्रतिशत तालाब से होती है। मतलब कोई 70 से 80 प्रतिशत खेती के लिए भरोसेमंद और स्थायी सिंचाई बंदोबस्त नहीं है। लघु और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के लिए समुचित बजट प्रावधान और नदियों तथा पारम्परिक जल स्रोतों के निजीकरण पर रोक की नीति बनाकर ही यह स्थिति सुधारी जा सकती है।

लागत का एक और आयाम ऋण का है। अभी सहकारी समितियां और कोऑपरेटिव बैंकों में केसीसी धारक किसानों को बिना ब्याज के कर्ज उपलब्ध कराया जाता है, यह सुविधा राष्ट्रीयकृत बैंकों में और प्राइवेट बैंकों में भी उपलब्ध कराई जाए, ताकि साहूकारों से ऋण लेने को हतोत्साहित किया जा सके।

*सहकारी क्षेत्र में कृषि उद्योग*

घाटा कम करने का एक और तरीका जिला स्तर पर कृषि आधारित उद्योगों का तंत्र खड़ा करके उपज को ज्यादा विकसित और परिवर्धित करने और इस तरह किसान की आय बढाने का है। इसके लिए विशेषकर गन्ना, सरसों, दूध तथा आदिवासी क्षेत्रों में वनोपज के मामले में सहकारीकरण (कोऑपरेटिव्स) को प्रोत्साहित करने के कदम उठाये जाने चाहिए। केरल के मॉडल से काफी कुछ सीखा जा सकता है। इसी के साथ जो सहकारी कृषि उद्यम बंद का दिए गए हैं, जैसे कैलारस (मुरैना) का शक्कर कारखाना, उनके पुनर्जीवन के लिए भी बजट प्रावधान किये जाने चाहिए।

*ग्रामीण बाजार और रोजगार को प्रोत्साहन*

भूमि के सिकुड़ते आकार के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिर्फ खेती-किसानी पर जीवित नहीं रह सकती। इसके लिए रोजगार सृजन के कई कदम एक साथ उठाने होंगे। इनमे सबसे प्रमुख तो मनरेगा की मजबूती है। राज्य सरकार को अपनी रीढ़ की सलामती का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मनरेगा में किये गए बदलावों, पहले से ही घाटे में चल रहे राज्यों पर इसके खर्च का बोझ बढाने वाली कथित जी-रामजी योजना को वापस लेने का संकल्प पारित कर केंद्र को अपनी राय से अवगत कराना होगा । इसी के साथ इस योजना में काम के दिन बढ़कर 200, न्यूनतम वेतन बढ़ाकर कमसेकम 600 रुपये प्रतिदिन करने के लिए प्रावधान करने होंगे। यह एक आयाम है। बाकी रोजगार के अवसर सरकारी नौकरियों में भर्ती पर लगी रोक हटाकर और सभी खाली पदों को भरकर, आबादी के अनुपात में नए पद सृजित कर पैदा करने होंगे।

*मनमाने अधिग्रहण और बेदखली*

मप्र किसी न किसी बहाने से भूमि के मनमाने अधिग्रहण का अड्डा बना हुआ है। एक्सप्रेस-वे के नाम पर हों या किसी और बहाने, हर मामले में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मकसद कारपोरेट, उनमे भी जो दरबारी कार्पोरेट्स हैं, उन्हें फायदा पहुँचाना है। चम्बल से लेकर सिंगरौली तक एक जैसी कहानी है। अब तो आदिवासी इलाके और संरक्षित वन तथा आदिवासी बसाहटें भी इस तरह के अधिग्रहण की शिकार बन रही हैं। इन्हें रोकना होगा और जहां बहुत जरूरी है, वहां विस्थापित ग्रामीणों के सम्पूर्ण पुनर्वास के अलावा वर्ष 2013 के कानून के हिसाब से बाजार दरों से कम-से-कम चार गुना मुआवजा देना सुनिश्चित करना होगा।

ग्रामीण आबादी की भूमिहीनता की दूसरी बड़ी वजह भूमि के बंटवारे का काम न होना है। भूमि सुधार क़ानून का पालन करते हुए बेनामी और मनमानी से अभी तक सामंतों के कब्जे में कैद जमीन को छीन कर, सरकारी जमीन को चीन्ह कर भूमिहीनों में बांटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। इसी का एक और पहलू आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों के वनाधिकार का है। देश के सबसे अधिक आदिवासी आबादी वाले प्रदेश में ही यह क़ानून अपनी भावना के अनुरूप लागू नहीं किया गया। अब उलटा अमल – आदिवासियों की बेदखली का अमल और किया जा रहा है। आदिवासियों के लिए किये जाने वाले बजट आवंटन में भी वास्तविक राशि के हिसाब से काफी कमी आई है।

*शोध और अनुसंधान*

कृषि शिक्षा, कृषि विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों की संख्या बढ़ाने के प्रावधान जरूरी हैं। जिन स्कूलों में कृषि से संबंधित शिक्षा दी जाती है, उनकी संख्या में भी वृद्धि की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र में शोध और अनुसंधान को प्रोत्साहन दिया जाए। सरकार जैविक और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के नाम पर जितने गाल बजाती है, उसके दसवें अंश के लिए भी इस खेती के लिए खर्च नहीं करती, इसके बीज तक उपलब्ध नहीं कराये जाते। इस दिशा में ठोस आबंटन किये जाने चाहिए।

*सामाजिक कदम*

इसके अलावा, कुछ अन्य कदम भी उठाये जा सकते हैं : जैसे वृद्ध किसानों के लिए पांच हजार रूपये प्रतिमाह पेंशन, महिला किसानों को बिशेष प्रोत्साहन, ग्रामीण क्षेत्रों में आवासहीन परिवारों को आवास लगभग 5 लाख रुपए प्रति आवास कम से कम 1000 वर्ग फीट क्षेत्र में बनवाकर आधुनिक सुविधाओं के साथ उपलब्ध कराना, ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के बंद होने को रोका जाना, शिक्षा का लोकव्यापीकरण करना, डेयरी व्यवसाय, पशुपालन, मुर्गा पालन, मछली पालन आदि को प्रोत्साहित करना, पलायन रोकने तथा प्रवासी श्रमिकों की संख्या को कम करने के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों के स्तर पर रोजगार सुनिश्चित कराना वगैरा-वगैरा।

इस सबके साथ यदि गाँवों को ज्ञान के अँधेरे से बाहर निकालना है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास, कुरीतियों, कुप्रथाओं, निरक्षरता आदि के खिलाफ अभियान चलाया जाए। वैज्ञानिक और प्रगतिशील मूल्यों का प्रचार-प्रसार करने के काम को भी प्रोत्साहित तथा बजट संवर्धित करना होगा।

*(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा की केंदीय समिति के सदस्य तथा मप्र किसानसभा के महासचिव हैं। संपर्क : 94251-13347)*

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