धर्म और सत्ता के बीच टकराव का इतिहास पुराना है, लेकिन 2004 का कांची कामकोटि पीठ से जुड़ा मामला आज भी चर्चा में रहता है। उस समय तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता के शासनकाल में शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को हत्या की साजिश के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। यह घटना न केवल हिंदुत्व संगठनों में हलचल मचा गई, बल्कि पूरे देश में धर्म और राजनीति के रिश्तों पर गहन बहस छिड़ गई।गिरफ्तारी की रात: दीपावली पर पुलिस का छापा 11 नवंबर 2004 को, जब पूरा देश दीपावली मना रहा था, तब कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में त्रिकाल पूजा की तैयारी कर रहे थे। अचानक तमिलनाडु पुलिस ने मठ पहुंचकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। विशेष विमान से उसी रात चेन्नई लाकर वेल्लोर सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया।आरोप: मंदिर मैनेजर शंकररमन की हत्या में साजिश तमिलनाडु पुलिस ने शंकराचार्य को शंकररमन हत्याकांड की मुख्य साजिशकर्ता बताया। शंकररमन, कांचीपुरम के वरदराज पेरुमल मंदिर के प्रशासनिक मैनेजर थे, जिनकी 3 सितंबर 2004 को मंदिर परिसर में धारदार हथियार से हत्या कर दी गई थी। पुलिस का दावा था कि शंकररमन और मठ के बीच पुराना विवाद था। शंकररमन ने मठ के वित्तीय अनियमितताओं और घोटालों के आरोप लगाए थे तथा ‘सोमशेखर गणपाडिगल’ नाम से गुमनाम पत्र लिखकर सरकार को सूचित किया था।जयललिता का फैसला और राजनीतिक पृष्ठभूमि उस समय जयललिता शंकराचार्य को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं, लेकिन 2004 लोकसभा चुनाव में एनडीए की हार और यूपीए सरकार बनने के बाद परिस्थितियां बदल गईं। यूपीए में शामिल डीएमके (जयललिता की विरोधी) के नेता मठ आने लगे, जिससे जयललिता नाराज हुईं। उन्हें लगा कि मठ सत्ता का समानांतर केंद्र बन रहा है। शंकररमन हत्याकांड को मौका मानकर जयललिता ने पुलिस को गिरफ्तारी की छूट दे दी।जेल में साधारण कैदी जैसा व्यवहारशंकराचार्य को जेल में सामान्य कैदियों जैसी सुविधाएं दी गईं। शुरू में जमीन पर सोना पड़ा, लेकिन विरोध के बाद मठ से दूध-फल और लकड़ी का तख्त मिला। पूजा के लिए सीमित सामग्री की अनुमति मिली। इस कदम का देशव्यापी विरोध हुआ। भाजपा, लालकृष्ण आडवाणी, विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल और अन्य साधु-संतों ने जयललिता के खिलाफ मोर्चा खोला। इसे हिंदुत्व पर हमला माना गया।जमानत और बरी होने की राहलगभग दो महीने जेल में रहने के बाद 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में जमानत दी। जमानत पर रिहा होने पर कांचीपुरम में भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। ‘जय जय शंकर’ के नारे गूंजे और पूर्णकुंभ स्वागत हुआ। केस तमिलनाडु से पुडुचेरी ट्रांसफर हुआ। 9 साल चली सुनवाई में 189 गवाहों से पूछताछ हुई, लेकिन 83 गवाह मुकर गए। शंकररमन के परिवार ने भी आरोपियों की पहचान नहीं की। 27 नवंबर 2013 को पुडुचेरी की विशेष अदालत ने शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, उनके उत्तराधिकारी विजयेंद्र सरस्वती सहित सभी 23 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया।यह घटना धर्म और राजनीति के बीच संतुलन की याद दिलाती है, जहां सत्ता के दबाव में धार्मिक नेतृत्व को चुनौती मिली, लेकिन अंततः न्याय की जीत हुई। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और सरकार के बीच चल रही खींचतान इसी इतिहास का नया अध्याय प्रतीत होती है। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन डीजीपी कैलाश मकवाणा से IFS अधिकारियों ने की सौजन्य मुलाकात राष्ट्रपति पदक से सम्मानित IPS अभिषेक तिवारी ने दी इस्तीफा, मांगा VRS