(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने आने वाले विधानसभाई चुनावों के लिए अपना अश्वमेध का घोड़ा छोड़ दिया है। यह दूसरी बात है कि चुनाव आयोग ने अभी तक चुनाव की तारीखों का एलान तक नहीं किया है। अनुमान है कि अप्रैल में होने वाले चुनावों के लिए, फरवरी के दूसरे पखवाड़े में चुनाव आयोग किसी समय चुनाव की तरीखों की घोषणा कर सकता है। यानी यह वह अंतराल है, जिसमें सत्ताधारी पार्टी को आधिकारिक रूप से सत्ता के चुनावी दुरुपयोग से अपने चुनावी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए खुली छूट मिली रहती है। वैसे याद रखने वाली बात यह भी है कि केंद्र सरकार उर्फ सत्ताधारी पार्टी के इशारे पर, और खासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी के प्रचार की सुविधाओं का ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखकर, चुनाव आयोग के चुनाव की तारीखों का एलान करने बाद, विधिवत चुनाव प्रचार का जो दौर शुरू होता है, उसमें भी कौन-सा सत्ताधारी पार्टी और उसके स्टार प्रचारकों को, किसी तरह की रोक-टोक का सामना करना पड़ता है।

चुनाव आयोग ने निष्पक्षता की अपनी चदरिया जिस तरह से उतार कर रख दी है और जिस तरह आयोग वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के शिविर का हिस्सा बन गया है, उसके बाद तो चुनाव की तारीखों के एलान से पहले और उसके बाद के दौर में, व्यावहारिक मायनों में शायद ही कोई अंतर रह गया है। और चूंकि मोदी-शाह की जोड़ी तो हमेशा ही चुनाव के मोड में रहती है, उसके लिए तो यह विभाजन और भी आभासी है। फिर भी बाकायदा चुनाव प्रचार शुरू होने से लेकर मतदान तक के दौर और उससे पहले के दौर में, एक अवधारणात्मक अंतर तो अब भी बचा ही है। लेकिन, हमेशा से ऐसा ही नहीं था।

बेशक, नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और आम तौर न्यायपालिका से लेकर चुनाव आयोग तक, राज्य के स्वतंत्र स्तंभों से लेकर सभी संवैधानिक संस्थाओं तक पर, कार्यपालिका की ताकत के बल पर, तमाम वैध-अवैध तरीकों से तेजी से कब्जा कर लिया गया है। लेकिन, इससे पहले तक हमारी चुनाव व्यवस्था के विकास की दिशा इससे ठीक उल्टी थी। बेशक, चुनाव प्रणाली पूरी तरह से दोषमुक्त तो शायद कभी भी नहीं थी, फिर भी उसके विकास की दिशा चुनावों को ज्यादा से ज्यादा स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा समावेशी बनाने की ओर थी। यहां तक कि पिछली सदी के आखिरी दशक में तो टीएन शेषन के नेतृत्व में चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और स्वतंत्र व निष्पक्ष बनाने के लिए मजबूत शुरूआतें भी की थीं, जिनमें आदर्श चुनाव संहिता का लागू किया जाना भी शामिल था। और इसके लिए उन्होंने लड़कर कार्यपालिका से चुनाव आयोग की निष्पक्षता हासिल की थी, जो कि चुनाव प्रक्रिया की तमाम निष्पक्षता की बुनियाद है।

लेकिन, अब चुनाव प्रक्रिया के विकास की उस दिशा को पूरी तरह से ही पलटा जा चुका है। उल्टे चुनाव प्रक्रिया पर पूरी तरह से कार्यपालिका का नियंत्रण स्थापित कराया जा चुका है। और इस उल्टी यात्रा में स्वतंत्रता, निष्पक्षता, जनतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के आश्वासनों को अधिक से अधिक खोखला करनेे के लिए, नित नये-नये तजुर्बे किए जा रहे हैं। एसआइआर या मतदाता सूचियों का विशेष सघन पुनरीक्षण, ऐसा ही ताजातरीन एक्सपेरीमेंट है, जिसने चुनाव प्रक्रिया को जनता की राय जानने की प्रक्रिया के बजाए, शासन की मर्जी से मतदाताओं के ही छांटे जाने की प्रक्रिया बनाए जाने का खतरा पैदा कर दिया है।

यह खतरा कितना वास्तविक है, इसका अंदाजा जिन राज्यों में इस समय यह प्रक्रिया चल रही है, वहां इस प्रक्रिया को मतदाताओं की टार्गेटेड छंटनी का हथियार बनाए जाने की हर रोज आ रही खबरों से लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक और दलित तथा अन्य कमजोर जातियों व महिलाओं के नाम काटे जाने की खबरें आने के साथ-साथ, मुस्लिम बस्तियों में रहने वालों के पतों पर, बड़ी संख्या में अनजाने हिंदुओं के नाम मतदाता सूचियों में जोड़े जाने की खबरें आ रही हैं। उधर राजस्थान से एक हिंदू मतदाता सूची अधिकारी का वीडियो संदेश सोशल मीडिया में वाइरल हो रहा है, जिसमें यह अधिकारी इसकी धमकी दे रहा है कि अगर उस पर मुसलमानों के नाम काटने और दबाव डाला गया तो, वह आत्महत्या कर लेगा।

और पश्चिम बंगाल में तो, जहां मतदाता सूची के काम में लगे अधिकारियों की चिंताजनक रूप से बड़ी संख्या में आत्महत्याओं ने इसे राजनीतिक बहस का मुद्दा ही बना दिया है, भाजपा नेताओं की गाड़ियों में हजारों की संख्या में, मतदाताओं के नाम काटे जाने के प्रपत्र पकड़े गए हैं। यह लक्षित तबकों या संभावित रूप से विरोधी मतदाताओं के नाम कटवाने के संगठित खेल की कहानी कहता है। राजस्थान में भी, पहले चरण में नहीं काटे जा सके, राजनीतिक विरोधी व अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम कटवाने के लिए, डेढ़ लाख से ज्यादा परिपत्र मशीनों की मदद से जमा कराए जाने के उदाहरण सामने आये हैं। पाठकों को याद दिला दें कि संगठित तरीके से और औद्योगिक पैमाने पर, वर्तमान मतदाताओं के नाम कटवाने का यह खेल सबसे पहले राजधानी दिल्ली में विधानसभा चुनाव से पहले पकड़ा गया था, जिसे भाजपा-विरोधी पार्टियों के हो-हल्ला करने के बावजूद, चुनाव आयोग ने बहुत हद तक अनदेखा ही कर दिया था। बाद में संभावित रूप से विरोधी वोटों की कटाई के साक्ष्ययुक्त भंडाफोड कर्नाटक के मामले में देश ने देखा। दूसरी ओर, महाराष्ट्र तथा हरियाणा आदि में मुख्यत: फर्जी मतदाता जोड़े जाने के जरिए, मतदाता सूचियों में धांधली के भंडाफोड़ देश ने देखे।

खैर, सत्ता पक्ष के अश्वमेध के घोड़े पर लौटें, जिसे पांच विधानसभाओं के आने वाले चुनावों में जीत के लिए छोड़ा जा चुका है। जैसाकि आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है, इस घोड़े ने दो प्रकार के बड़े उल्लंघनों से यह अभियान शुरू किया है, लेकिन चुनाव आयोग को इन उल्लंघनों के दिखाई देने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। पहला उल्लंघन सांप्रदायिक डॉग व्हिसलिंग का बड़े पैमाने पर सहारा लिया जाना है। प्रधानमंत्री मोदी ने और उनसे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने, प. बंगाल तथा असम के अपने सघन दौरों में, तथाकथित घुसैठियों के मुद्दे को अपने प्रचार के मुख्य राजनीतिक मुद्दे के तौर पर विशेष जोर देकर उछाला है। जैसाकि हमने अपने पिछले लेख में रेखांकित किया था, मोदी-शाह जब घुसपैठियों की बात करते हैं, तो उनके निशाने पर तमाम मुसलमान होते हैं।

संघ परिवार की शब्दावली में घुसपैठिया, मुस्लिम का पर्यायवाची शब्द ही है। उनकी बोली में इन शब्दों की समानार्थकता कितनी गहरी है, इसे इसी सचाई से समझा जा सकता है कि उनकी परिभाषा के अनुसार, सिर्फ मुसलमान को ही ”घुसपैठिया” माना जा सकता है। चाहे दूसरे किसी देश से अवैध रूप से ही आया हो, हिंदू तो ”शरणार्थी” ही माना जाएगा! नागरिकता संशोधन कानून या सीएए के जरिए मोदी सरकार, इस बंटवारे को कानूनी रूप भी दे चुकी है और एक वैधानिक फर्जीवाड़े के जरिए, बिना संशोधन के ही संविधान के धर्मनिरपेक्ष आधार में यानी नागरिकता की परिभाषा में संशोधन भी कर चुकी है। फिर भी हमें मानना पड़ेगा कि 2024 के आम चुनाव से अब तक, अति-उपयोग से इस उल्लंघन की कहानी, घिसकर काफी भोंथरी भी हो चुकी है और उसे पूरी तरह से अनदेखा करने के हिसाब से, चुनाव आयोग से लेकर मीडिया तक की खाल ठीक-ठाक मोटी भी हो चुकी है।

इन दौरों में लगातार किया जाता दूसरा बड़ा उल्लंघन, जिसके चुनाव आयोग को नजर ही नहीं आने की बात तो छोड़ ही दें, विपक्ष तक उसे मुद्दा बनाना भूल चुका है, मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा सरकारी खजाने और सरकारी योजनाओं का, अपने निजी चुनावी संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया जाना है। इसे साधा गया है, सरकारी योजनाओं की घोषणाओं को, मतदाताओं पर निजी उपकार में तब्दील करने के जरिए। नरेंद्र मोदी ने जैसे चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले के दो-तीन महीनों के अपने सरकारी कार्यक्रम के नाम पर चुनावी दौरों में, सरकारी योजनाओं के ऐलानों को नया नॉर्मल ही बना दिया है। यह वास्तव में अधिकार संपन्न नागरिकों को, सारी संप्रभुता समेटे शासक की कृपा पर निर्भर, प्रजा बनाकर रखे जाने का ही नया नॉर्मल है।

यह वह मुकाम है, जहां न सिर्फ सत्ताधारी वोट के जरिए अपना लंबे समय तक सत्ता में बने रहना सुनिश्चित कर सकता है, यह भी सुनिश्चित कर सकता है कि जनतंत्र के अर्थ में चुनाव का कोई अर्थ ही नहीं रह जाए है। अगर जनतंत्र को फासीवादी तानाशाही का खोल भर बनकर रह जाने से बचाना है, तो सत्ताधारियों के साथ मिलीभगत किए बैठा चुनाव आयोग देखे या नहीं देखे, सुने या नहीं सुने, जनतंत्र के एक-एक उल्लंघन का तब तक हिसाब मांगना होगा, जब तक यह लोगों के नागरिक की अपनी पहचान के पुनराविष्कार का महत्वपूर्ण साधन नहीं बन जाता है।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

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