(आलेख : इंद्रजीत सिंह)

बीज संशोधन बिल 2025 नाम से एक मसौदा भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की ओर से जारी किया गया है । इस पर 11 दिसंबर तक सार्वजनिक रूप से सुझाव मांगे गए थे। इस बिल को व्यापक आर्थिक व राजनीतिक संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। ये कारपोरेट-सांप्रदायिक सरकार नव उदारवादी एजेंडा के तहत अनेक जनविरोधी कदम उठा रही है : जैसे बिजली संशोधन बिल, मनरेगा का खात्मा, चार लेबर कोड, कृषि मंडी विपणन का राष्ट्रीय प्रारूप का मसौदा आदि-आदि, जिन्हें ताबड़तोड़ ढंग से थोपा गया है। यही नहीं, बल्कि जनता संवैधानिक अधिकारों और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को भी सुनियोजित ढंग से तहस-नहस किया जा रहा है।

चूंकि बीज कृषि का आधार है और कृषि हमारे देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, इसलिए बीज या “प्लांट मैटर” अपने आप में एक अतिसंवेदनशील वस्तु है।वर्तमान दौर में कारपोरेट कंपनियां बीज पर पूर्ण नियंत्रण करके बेहिसाब मुनाफे कमाने के उद्देश्य से बीज संबंधी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों में मनमाने परिवर्तन करवाने पर आमादा हैं।

दिसंबर 2025 में जारी बिल का मसौदा भी कारपोरेट नियंत्रण की दिशा में एक हताशापूर्ण कदम है। यह समझना जरूरी है कि बीज पर जितना अधिक कारपोरेट नियंत्रण होगा, उतनी ही अधिक बीज के ऊपर किसान की सदियों पुरानी विरासत छिन जाएगी। इस विरासत की सुरक्षा और संरक्षण सरकार की वैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है, परंतु कारपोरेटपरस्त सरकार के चलते हर क्षेत्र में मज़दूर-किसानों और कारपोरेट का अंतर्विरोध इस दौर में गहरा हो रहा है। लाजमी है कि बीज पर किसान के प्राकृतिक अधिकार को छीन कर ही कारपोरेट के मंसूबों को पूरा किया जा सकता है। इससे बीज और किसान का जन्म-जन्म का संबंध छिन्न-भिन्न हो जाएगा। जाहिर है इस संदर्भ में  गांव से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक एक विमर्श छिड़ना स्वाभाविक है।

बीज का इतिहास मानव इतिहास से पुराना है। कहते हैं कि बीज का संचय और संरक्षण करने में सबसे अहम भूमिका महिलाओं की रही है। बीज तमाम जीव-जंतुओं के जीवन का आधार है। जीवों, फसलों और मनुष्यों की नस्ल/ किस्में बीज के रूप से ही तय होती हैं। वर्तमान में हमारे आसपास जो भी बीज हैं, उनके गुण या विशेषताएं लाखों सालों से गुजरकर ही बीजों ने अर्जित की हैं। जलवायु, भूमि की तासीर और बदलते हुए मौसम की गर्मी, सर्दी, सूखा, बारिश, आंधी, बीमारी आदि को झेलकर ही बीजों ने अपने अंदर प्रतिरोधी गुण ग्रहण किए। भूमि, नमी, वायु, तापमान की अनुकूलता से बीज अंकुरित हो कर पौधे/पेड़ /बेल का रुप धारण करके फिर से अनेक बीजों को पैदा करते हैं। हम देखते आए हैं कि जब फसल बोते हुए बीज कम पड़ जाए तो किसान मूंह से कभी नहीं बोलेगा कि “बीज खत्म हो गया”, बल्कि वह घर पर संदेश भेजता है कि बीज बढ़ गया है और भेज दो। गांव में आपस में झगडा़ हो जाए, तो ये गाली दी जाती है कि “थारा बीज मिटैगा”। ये मामूली-सी बातें भी हम इसलिए कह रहे हैं कि इससे आगे विषय को समझने में हमें मदद मिलेगी। बीज विज्ञान जब नहीं था, तब भी बीज विकास और बीज संरक्षण होता था, क्योंकि किसान खुद भी एक वैज्ञानिक होता है। वह खेत में अपनी नज़र से खास तरह के पौधे छांटने का काम करता था और इस प्रकार अच्छी किस्म के बीज तैयार करता था। लेकिन औपचारिक रूप से कृषि विज्ञान के विकास के बाद हुए आधुनिक शोध ने आश्चर्यचकित करने वाली प्रगति की है।

बीज के भीतर भी एक बीज होता है, उसमें “जीन कोड” होते हैं, जो पौधे के गुणों और उसकी विशेषताओं को अगली पीढ़ी/फसल में ट्रांसफर करने का काम करते हैं। विभिन्न किस्मों के पौधों के मिश्रण से नई संकर/हाइब्रिड किस्म निकाली जाती हैं। इस प्रक्रिया को प्रजनन कहते हैं। यह काम वैज्ञानिक लोग अति-आधुनिक यंत्रों और तकनीक से करने लगे हैं, जिसे “जेनेटिक इंजीनियरिंग” कहते हैं। इससे पौधों की ऊंचाई, दाने या फल का आकार व रंग और भीतर के प्रोटीन आदि तत्व भी डाले जा सकते हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि इसी तकनीक से अगर खिलवाड़ की जाए, तो उसके बहुत ही ख़तरनाक परिणाम भी निकल सकते हैं। जी-एम सीड भी ऐसे ही विवादास्पद उदाहरण के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं। कारपोरेट द्वारा इनकी मार्केटिंग के लिए स्वीकृति लेने का भारी  दबाव है।

आप जानते हैं कि 1960-65 की “हरित क्रांति” द्वारा खाद्यान्न उत्पादन के मामले में भारत ने जो आत्मनिर्भरता हासिल की, उसमें बिजली, सिंचाई, पानी, सड़क, मंडी आदि के अलावा अधिक उपज देने वाली गेंहू/चावल की नई किस्में तैयार करने का अहम योगदान था। उस समय बीज, दवाई, उर्वरक आदि पर निजी कंपनियों का विशेष नियंत्रण नहीं था और ये तमाम प्रबंध सरकारी विभागों और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा ही किये गए थे।

बाद के दौर में कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी का प्रवेश हो गया और कृषि उपकरणों समेत बीज, दवाई आदि के मामले में देशी/विदेशी कंपनियों ने पैठ बना ली। सरकार किसानों के नाम पर जो सब्सिडी देती थी, उसका बड़ा हिस्सा इन्हीं कंपनियों के खाते में जाता था और आज भी जाता है। धीरे-धीरे सरकार और कृषि अनुसंधान की भूमिका सुनियोजित ढंग से घटाई जाने लगी और निजी कंपनियों के वर्चस्व को प्राथमिकता दी जाने लगी। आज यदि जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और पौध प्रजनन के माहिर डा. रामधन सिंह को भुला दिया गया है, तो यह संयोग वश नहीं है। गेहूं और धान की अधिक उपज देने वाली किस्में उन्हीं की निकाली हुई हैं। अमरीका के जाने-माने पौध प्रजनन वैज्ञानिक नार्मन बोरलॉग, जिन्हें शांति का नोबेल प्राइज मिला था, वह भी डा. रामधन सिंह जी को अपने से वरिष्ठ मानते थे और उन्हें सम्मान देते थे।

अच्छे बीज के शोध, उत्पादन, वितरण और किसान के पास प्रयोग करने के लिए उनकी उपलब्धता को केंद्र में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर योजनाएं बनीं। प्रदेश स्तर पर बीज विकास निगम, राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय बीज निगम और विश्वविद्यालयों में बीज के शोध व नई विकसित किस्मों के उत्पादन का काम उल्लेखनीय रूप से आगे बढा़। परंतु हरित क्रांति के उपरांत बीज के क्षेत्र में निजी कंपनियों ने अपना दबदबा बनाना शुरू किया। अंधाधुंध मुनाफे बटोरने के लिए ज्यादा उत्पादन के दावे किए गए। ज्यादा उत्पादन हुआ भी, लेकिन कीट व बीमारी प्रकोप बढ़ गए, क्योंकि पुराने बीजों में जो कुदरती तौर पर प्रतिरोधी गुण बीजों ने ग्रहण किए, थे उनका क्षरण होने लगा, क्योंकि उनमें बीमारियों का प्रकोप बढ़ने लगता है। प्राईवेट कंपनियों ने कीट नाशक दवाईयां बेचने के लिए इसे भी एक अवसर की तरह देखा। यहां बी टी काटन का बहुत ही कड़वा उदाहरण हमारे सामने है । गुलाबी सूंड़ी की प्रतिरोधक क्षमता के दावे करके महंगे बीज बेचे गए और गुलाबी सूंड़ी से कपास उत्पादक किसानों की व्यापक बर्बादी कैसे हुई, वह किसी से छुपा हुआ नहीं है।

अब बीजों की प्रामाणिकता के सवाल पर आइये। बीज को प्रयोग में लाने से पहले कई चरणों की लंबी प्रक्रियाओं और प्रयोगों से गुजरना होता है। बहुस्तरीय और कई साल की ट्रायल के बाद ही बीज की नई किस्मों को स्वीकृति मिलती है। उसके बाद ही बीज को बेचे जाने की अनुमति मिल सकती है। बिक्री करने वाली कंपनी को विधिवत रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी है। किसान अपने बचे हुए बीज को बेचने, बदलने, विकसित करने और उसे स्टाक करने का अधिकार भी रखता है। बीज नियमों के संचालन और निगरानी को लेकर बीज अधिनियम 1966 बना था, जिसके तहत ये आवश्यक प्रावधान हैं। नकली और खराब क्वालिटी के बीजों पर, जब वे दावे किए गए मापदंड पूरे न करें या उगने का प्रतिशत कम हो, दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

बहरहाल अब चलते हुए सार्वजनिक क्षेत्र को पीछे हटाया जाने लगा, विश्वविद्यालय और बीज विकास संस्थानों को सिकोड़ दिया गया और तेजी  के साथ नियमों को उदार करके निजी क्षेत्र के प्रवेश को सुगम बना दिया गया। अब तक निजी क्षेत्र की 70% देशी-विदेशी बीज कंपनियां बीज मार्केट पर काबिज हो चुकी हैं। 56% बीज मार्केट पर मात्र 4 बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियंत्रण है। ये हैं बायर, कारटेवा, सिंजेंटा और बीएएसएफ। किसानों को अब इन्हीं कंपनियों के रहमो-करम पर निर्भर रहना पड़ता है, जो मनमर्जी के रेटों पर बीज बेच रहे हैं और नए बिल में रेटों को नियंत्रित करने का कोई प्रावधान नहीं है। सब्जियों के बीज तो और भी ज्यादा महंगे‌ हैं।

असल में जरूरत तो इस बात की थी कि क्वालिटी बीज का शोध, उत्पादन, वितरण सस्ते दामों पर सुलभता से सार्वजनिक व सहकारिता क्षेत्र के माध्यम से ही किसान को सुनिश्चित किया जाता। लेकिन हो यह रहा है कि यह सरकार बीज बिल 2025 लाकर बीज के विषय का अति केंद्रीयकरण करना चाहती है। इसमें एक राष्ट्रीय कमेटी बनाने का प्रावधान है, जिसमें 5-7 राज्यों के ही प्रतिनिधि होंगे और कोई भी मामला नीतिगत है या नहीं, इस पर केंद्र का निर्णय अंतिम होगा। संविधान में कृषि क्षेत्र राज्यों का विषय है, परन्तु अन्य सभी विषयों जैसे शिक्षा, सहकारिता आदि के मामले में भी मोदी सरकार राज्यों के अधिकारों का सरेआम अतिक्रमण करने पर उतारू है, वही कृषि क्षेत्र के साथ किया जा रहा है।

बिल में यह है कि यदि कोई विदेशी बीज कंपनी अपने ही देश में बीज परीक्षण के ट्रायल करके गुणवत्ता संबंधी सत्यापन कर देंगी, तो वह भी मान्य होगा। ये बहुत घातक प्रावधान है। इसके चलते भिन्न जलवायु में किये गए ट्रायल कहां तक दूसरी जलवायु में प्रासंगिक होंगे, इस पर प्रश्न चिन्ह है। इसके अलावा वहां की कोई भी बीमारी आदि बीज के साथ हमारे यहां भी आ सकती है। यदि किसी रजिस्टर्डशुदा कंपनी का बीज क्वालिटी संबंधी अपने दावे पर खरा नहीं उतरता है, तो उस पर आपराधिक कार्यवाही नहीं होगी और इसे एक मामूली श्रेणी की अनियमितता माना जाएगा।

बीज संबंधी कानूनों का उद्देश्य अच्छी गुणवत्ता का बीज सस्ते दामों पर किसान को मुहैया करवाने का होता है, परन्तु इस नए ड्राफ्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है। भारत में लगभग 700 सार्वजनिक व निजी बीज कंपनियां मार्केट में हैं। इनकी लगभग एक चौथाई सामग्री की गुणवत्ता नकली है। संसद में दिए गए एक प्रश्न के जवाब में बताया गया कि 2022 से 2025 के बीच 43001 बीज के नमूने विफल पाए गए है।

उपरोक्त स्थिति में बीज बिल 2025 अपने आप में बीज जैसे संवेदनशील और दूरगामी महत्त्व के मामले को कारपोरेट के हाथों में सौंपने का काम करेगा, जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा और किसान की बीज संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी।

ये आपत्तियां अखिल भारतीय किसान सभा ने विस्तार से लिखकर केन्द्र सरकार के मंत्रालय को 11 दिसंबर की निर्धारित तिथि तक सौंप दी हैं। किसान सभा ने मांग की है कि गुणवत्ता और सुरक्षा के मामले में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए। यह भी सुझाव दिया गया है कि केंद्र व राज्यों की बीज कमेटियों में कम से कम तीन किसान प्रतिनिधि भी शामिल किये जाएं, जिनमें एक महिला जरूर हो। बिल मसौदे के चैप्टर 5 के भाग 27 में विदेश के बीजों की वहीं पर दी गई प्रमाणिकता को मंजूरी प्रदान किए जाने के प्रावधान को हटाने की मांग की गई है। यह भी मांग की गई है कि मूल्य निर्धारण का किसान हितैषी प्रावधान इसमें शामिल किया जाए और जमाखोरी, ब्लैक मार्केट या इजारेदारी पर अंकुश लगे। स्थानीय स्तर के स्वयं सहायता समूहों और बीज सहकारी समितियों को प्रोत्साहन दिया जाए। एक सुझाव यह भी दिया गया है कि बीज विक्रेता का लाइसेंस योग्य व्यक्ति को ही दिया जाए।

बीजों के सवाल पर देश भर में व्यापक जनजागरण और संघर्ष किया जाना जरूरी है, जिसका आह्वान संयुक्त किसान मोर्चा ने किया है।

*(लेखक कृषि विशेषज्ञ और अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94164 95827)*

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