(व्यंग्य : संजय पराते)

आजकल हमारे देश में सब काम भगवान भरोसे चल रहा है। भगवान भरोसे इसलिए कि दुनिया के इस कोने में जितने भगवान हैं और अंधभक्त बनकर उसको मानने वाले लोग, दुनिया के किसी और कोने में नहीं मिलेंगे। धर्म प्रधान देश है, तो धत्कर्म भी होना ही है। वरना बताईए, किस देश का प्रधानमंत्री ऐसा बहुरूपिया होगा, जैसा हमारे देश का है। हाथ में त्रिशूल लिए, डमरू बजाते  भोले शंकर का बाना धरे दुनिया के किसी और नेता का फोटो-वोटो बताईए! इतना धर्मभक्त प्रधानमंत्री, जो दिन के 18-18 घंटे इस देश के सांस्कृतिक स्वाभिमान को जगाने के काम में लगा हो, उसे एक ट्रेन के 3 घंटे रुकने के लिए कोसना कितनी बड़ी असभ्यता है! निश्चित ही, यह धर्म विरोधी विपक्ष का काम है, जो दीन-दुनिया के हर काम-धाम में प्रधानमंत्री को कोसने के मौके खोजते रहता है। अब बताईए भला, ट्रेन को सही समय पर चलाना ड्राइवर का काम है या प्रधानमंत्री का?

खबर केवल इतनी-सी है कि समस्तीपुर से सहरसा तक जाने वाली 63348 नंबर की ट्रेन 12:45 बजे समस्तीपुर से रवाना हुई। यह ट्रेन भगवानपुर देसुआ से 12:57 में खुली, लेकिन भगवानपुर से निकलने के बाद और अंगार घर स्टेशन पहुंचने से पहले, बीच रास्ते में ब्रेक वैन का एक्सल लॉक हो गया और चलती ट्रेन के पहिए रुक गए। इस तकनीकी खराबी के कारण वहां ट्रेन लगभग 3 घंटे खड़ी रही। फिर एक्सीडेंट रिलीफ ट्रेन (आर्ट) मौके पर पहुंची, जिस पर कैरिज एंड वैगन स्टाफ तथा यांत्रिकी विभाग के अधिकारी-कर्मचारी सवार थे। उन्होंने युद्धस्तर पर मरम्मत कार्य किया, खराबी दूर की, ठोक-बजाकर ब्रेक वैन का ठीक होना घोषित किया। फिर ट्रेन वहां से रवाना हुई। तब तक के लिए ट्रेनों का आवागमन दोनों ओर से पूरी तरह बंद रहा। केवल समयबद्धता बनाए रखने के उद्देश्य से राजधानी एक्सप्रेस को बरौनी जंक्शन होते हुए समस्तीपुर के रास्ते डाइवर्ट किया गया। इस पूरी घटना और कार्यवाही की जानकारी देते हुए रेलवे ने प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की और यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद व्यक्त किया है।

इस खबर को सकारात्मक ढंग से देखना चाहिए। देखिए, भगवान की कितनी कृपा बरस रही है। पहली बात तो यह कि इस ट्रेन की किसी और ट्रेन से भिड़ंत नहीं हुई। हमारे देश का विपक्ष मोदीजी की रेल को बदनाम करने के लिए आजकल यही काम करवा रहा है। लेकिन विपक्ष का ऐसा दांव यहां फेल हो गया और किसी भी तरह के जान-माल का नुकसान नहीं हुआ। जान बची, सो लाखों पाएं। सरकार की तिजोरी से भी मुआवजा के रूप में माल निकलने से बच गया। इस माल को देश के विकास के लिए अडानी को सौंपा जा सकता है। इससे अर्थव्यवस्था का इंजन आगे बढ़ेगा और चौथी से तीसरी सीढ़ी पर पहुंचने की हमारी रफ्तार तेज होगी। यह तो हुआ पहला दृष्टिकोण।

अब दूसरे सकारात्मक दृष्टिकोण पर आईए। इंजन के फेल होने या न होने पर मोदी सरकार का बस नहीं है। भगवानपुर में भगवान समाया हुआ है। भगवान और खासकर हिंदुओं का भगवान सर्वशक्तिमान है। हमारे भगवान के गॉड और अल्लाह से भी ज्यादा शक्तिमान होने की चर्चा आजकल गली-कूचों में चल रही है। हमारा भगवान यहां-वहां अपनी शक्ति प्रदर्शन के जरिए इसके नमूने भी दिखा रहा है। अच्छी तरह से समझ लीजिए कि हमारे मोदीजी ऐसे ही डमरू नहीं बजा रहे हैं। अब यह भगवानपुर में विराजमान भगवान की मर्जी है कि वह किस ट्रेन को आगे जाने दे या न जाने दे या आगे ले जाकर कहां रोके! सो, अंगारघर से पहले शीतलता देने उसने ट्रेन रोक दी, ताकि थके हुए यात्री ट्रेन से उतरकर पेड़ों की छांव में कुछ सुस्ता लें, कुछ सूसू-वुसू आदि भी कर लें। शरीर हल्का होने से मन भी हल्का हो जाता है और मन हल्का होने से ताजगी आती है। ट्रेन के खड़ी होने की खबर से पास के गांव के लोग कुछ भजिए-समोसे भी तलकर ले आते हैं, उससे सस्ते में ही कुछ को पेट पूजा का, तो कुछ को अपने चटोरेपन को संतुष्ट करने का भी मौका मिल जाता है। भारतीय रेल गरीबों का जितना खयाल रखती है, अमेरिकी रेल भी अपने अमीरों का उतना खयाल नहीं रखती होगी। भगवानपुर के साथ-साथ मोदीजी को इसके लिए धन्यवाद देना तो बनता ही है।

अब तीसरे सकारात्मक दृष्टिकोण पर आईए। ट्रेन का रुकना हमारे अंक ज्योतिष के सही होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। इस मामले में सब कुछ तीन पर टिका है और कहावत ऐसे ही नहीं बनी है, तीन तिग़ाड़ा, काम बिगाड़ा! ट्रेन रुकी किलोमीटर संख्या 75/3 पर। अंकों का योग होता है 15 और फिर इनका योग 6 होता है। ट्रेन नंबर है 63348 और इसके अंकों का भी अंतिम योग 6 होता है।  ट्रेन चली 12:45 बजे याने 3 का योग। अटकी 12:57 पर — फिर 6 अंतिम योग। गार्ड ब्रेक वैन का नंबर 198732, फिर 3 का योग। पूरा मामला 3 के मूलाधार पर टिका है। जहां मामला ही 3 की अशुभ संख्या का हो, वहां मोदीजी शंकर का रूप धरे या राम का, कुछ हो नहीं सकता — होंहिहैं वोही जो राम रचि राखा। यह अंक ज्योतिष हैं, जिसके सामने पश्चिम का पूरा गणित फेल हैं। इस घटना ने हमारे सनातनी ज्ञान की बिना किसी तनातनी के फिर पुष्टि कर दी है। सनातन जिंदाबाद!

इधर सनातनी धीरेन्द्र शास्त्री ने सरकार को तीन के प्रकोप से बचने की सलाह दी है। धीरेन्द्र शास्त्री की महिमा जान लें कि वे अघोषित सरकार हैं। सरकार से भी बड़े सरकार, जिन्हें और जिनके चेलों-चपाटों को ढोने के लिए उच्च स्तर पर, गैर-कानूनी तरीके से विमानों का इंजाम किया जाता है। धीरेन्द्र शास्त्री की सलाह से सरकार कैसे करे इंकार! सो, रेलवे मिनिस्ट्री के निर्देश पर पूरा रेल महकमा तीन के प्रकोप को दूर करने में लगा है। एक-एक ट्रेन का नंबर देखा जा रहा है, किस स्टेशन पर कितने समय पहुंचती है और किस समय पर प्रस्थान करती है। ये सब नंबर और समय कहीं तीन के मूलाधार कर तो नहीं टिके हैं, टिके हैं, तो कैसे इसे बदला जाएं, आदि-इत्यादि। काम कोई छोटा-मोटा नहीं है, बाकायदा एक आयोग के गठन की मांग करता है। इसकी रिपोर्ट 2046 तक अपेक्षित होगी, ताकि दुर्घटना-मुक्त रेल के रूप में 2047 की पंद्रह अगस्त को हम विकसित भारत में प्रवेश कर सके।

सकारात्मक दृष्टिकोण का चौथा एंगल भी देखिए। दुर्घटना हुई नहीं कि हमारी रिलीफ ट्रेन तकनीज्ञों को लेकर पहुंच गई दुर्घटना स्थल पर। वरना पहले के राज में तो रिलीफ ट्रेन को पहुंचने में ही 13-13 घंटे लग जाते थे। पैसेंजर्स बोगियों से उतरकर जंगल-झाड़ियों में ही निबट लेते थे, लकड़ियां बटोरकर पूरे ट्रैक पर स्वाहा-स्वाहा की ध्वनि के साथ यज्ञ शुरू कर देते थे और रिलीफ ट्रेन का आह्वान करते थे। लेकिन इस बार ऐसा कोई मौका मोदीजी की ट्रेन ने पैसेंजर्स को नहीं दिया। रिलीफ टीम ने ट्रेन की बीमारी का भी तुरंत इलाज कर दिया, थमे हुए चक्कों में फिर जान डाल दीं। इससे यात्रियों की अटकी हुई सांस भी फिर से चलने लगी। वरना सोचिए, ठंड के दिन! और यात्री दोपहर से अगली सुबह तक कुछ अपनी किस्मत को कोसते, कुछ भारतीय रेल के चक्कों के पंक्चर होने को सराहते वही पड़े रहते न!!

असल में, मोदीजी हैं, तो मुमकिन है। उन्होंने भारतीय तकनीक को इतनी ऊंचाई तक पहुंचा दिया है कि नासा की नाक नीचे है और हम इतने ऊपर कि तीन का काट करने में भी सक्षम हैं। पहले होता यह था कि किसी दुर्घटना के इंतज़ार में बैठी-बैठी हमारी टीम इतनी उकता जाती थी, पस्त होकर सो जाती थी कि दुर्घटना के बाद उसे ही उठाने में घंटों लग जाते थे। अब उनको दुर्घटना का इंतज़ार नहीं करना पड़ता, छोटी-मोटी तो होते ही रहती है, बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं भी खुद उनके पास चलकर आती है। वे ताक में बैठे ही रहते हैं कि दुर्घटना अब हुई कि तब हुई और होने से पहले ही अपना आर्ट दिखा देते हैं। अब भारतीय रेल जैसा कोई चुस्त रेल इस दुनिया में नहीं है कि चौबीसों घंटे किसी दुर्घटना के इंतज़ार में बैठे रहे और अपने हुनर का कौशल दिखाए!!

और पांचवीं बात। ऐसी ही दुर्घटनाओं के सहारे हमारे देश के लोग थोड़ी-बहुत ज्यादा दुनिया भी देख लेते हैं, वरना तो उन्हें अपना परलोक सुधारने और इस जन्म में हिंदू धर्म को बचाने के झंझट से फुर्सत नहीं मिलती। लेकिन इसके लिए उन्हें किसी पैसेंजर ट्रेन में नहीं, राजधानी ट्रेन नंबर 20503 में सवार होना चाहिए, जिसके अंकों का मूलाधार 1 हो। हमारी कुशलता इसी से पता चलती है कि कितनी जल्दी दिल्ली पहुंचा जाएं। रुकने की फुर्सत नहीं है। दिल्ली पहुंचना है, तो बरौनी जंक्शन के भी मुफ्त में अतिरिक्त दर्शन हो जाएं, तो इसमें बुराई क्या है? स्वर्ग जाने के रास्ते की हर बाधा को दूर करना जरूरी है।

सब दिल्ली जाने की हड़बड़ी में है, क्योंकि जीवन का पूरा पुण्य वही समाया हुआ है। अब अगली बार से किसी पैसेंजर ट्रेन में भूलकर मत बैठना। बैठना है, तो राजधानी में बैठना। दिल्ली स्वर्ग है। मोदीजी का सेवा तीर्थ भी वही है, जहां से स्वर्ग की टिकट मिल रही है। इस पुण्य का लाभ कमाईये। जितनी जल्दी हो सके, दिल्ली जाइए। यात्री बनकर जाईए, विधायक-सांसद बनकर जाईए, मंत्री या उसके चमचे बनकर जाईए, राष्ट्रपति बनकर जाईए या उप राष्ट्रपति बनकर, या अडानी-अंबानी के वफादार नौकर बनकर जाईए, लेकिन दिल्ली जरूर जाएं। स्वर्ग का रास्ता दिल्ली से होकर जाता है।

(व्यंग्य-लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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