भोपाल- मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखक

हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के बाद अब बिहार में बीजेपी के एनडीए गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की है। बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार ने 20 नवंबर को 10वीं मर्तबा शपथ ले ली है। शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मौजूद रहे। मालूम हो कि बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइडेड और भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी जीत हासिल की है। बीजेपी की 89 और जेडीयू की 85 सीटों वाले गठबंधन के किसी भी फैसले को राजनीतिक तौर पर चुनौती देना विपक्षी दलों के लिए आसान नहीं होगा। 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में इसी बहुमत में नीतीश कुमार के लिए राह इतनी भी आसान नहीं होगी। बिहार के वोटरों ने जिन वादों के आधार पर नीतीश पर भरोसा जताया है, उसे पूरा करना होगा। खासकर नौकरी, रोजगार, उद्योग, पेंशन, मुफ्त बिजली जैसे कई वादे हैं, जिन्हें पूरा करना नीतीश कुमार के लिए अग्नि परीक्षा जैसा होगा। हिन्दी भाषी राज्यों में बिहार ही एकमात्र राज्य है, जहाँ बीजेपी अब तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है। इस बार भी सबसे बड़ी पार्टी होकर बीजेपी, नीतीश कुमार के सहयोगी की भूमिका में है। जानकारों की मानें तो भविष्य में भाजपा ही नीतीश के लिए चुनौती बन सकती है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए ने गरीबों को मुफ्त राशन, 125 यूनिट मुफ्त बिजली, पांच लाख तक के मुफ्त इलाज की सुविधा, 50 लाख नए पक्के मकान और सामाजिक सुरक्षा पेंशन आदि जैसे वादे किए थे। इन वादों को पूरा करने के लिए नीतीश सरकार को राजस्व जुटाना होगा। बिहार को अपराधमुक्त बनाना और सूबे के मजदूरों, युवाओं का पलायन रोकना भी नीतीश के चुनौती होगी। दो दशक तक सीएम रहने के बाद भी बिहार की गिनती बीमारू या गरीब राज्यों में होती है। नीतीश कुमार को बिहार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना होगा, यहां निवेश लाना होगा और औद्योगिक तरक्की तेज करनी होगी। नीतीश कुमार ने जब पहली बार अपने पूरे कार्यकाल के लिए बिहार की सत्ता संभाली थी, तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। बिहार में साल 2006 में साइकिल योजना, साल 2006 के अधिनियम के तहत पंचायत में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण और 2007 में जीविका योजना शुरू हुई। इन तमाम योजनाओं का लाभ नीतीश को मिला। नीतीश की पार्टी जेडीयू ने साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत हासिल की। इस बार के चुनाव के बाद ये अटकलें लगाईं जा रही हैं कि ये चुनाव नीतीश का आखिरी चुनाव हो सकता है। बढ़ती उम्र और सेहत को इसकी वजह बताया जा रहा है। नीतीश की सेहत का मसला चुनाव प्रचार के दौरान भी उठा था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा खुद अपनी पार्टी का सीएम तय कर सकती है।

एनडीए ने बिहार में 243 में से 202 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है। राष्ट्रीय जनता दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य पार्टियों के महागठबंधन को बड़ी और अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन तो निराशाजनक रहा है। 61 सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाली कांग्रेस ने सिर्फ छह सीटें जीत पाई। इस बार कांग्रेस का बिहार विधानसभा चुनावों में वोट शेयर 8.71 प्रतिशत रहा है। 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 9.6 प्रतिशत था। हालांकि तब कांग्रेस ने 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 19 सीटें जीती थीं। सन 2015 में पार्टी ने 27 सीटें जीतीं थीं. वहीं, 2010 में सिर्फ चार सीटें जीत सकी थी। इस बार कांग्रेस के खाते में सिर्फ छह सीटें आई हैं। सन 1990 के बाद से बिहार में कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं है। पिछले दो दशकों में कांग्रेस ने संगठन को मजबूत बनाने, कार्यकर्ताओं में जान फूंकने, वोटरों को जोड़ने और अपनी कमजोरी तलाशने का कोई काम नहीं किया। बिहार में कांग्रेस की इतनी बड़ी हार की वजह संगठनात्मक कमजोरी, नेताओं के बीच तालमेल का अभाव, प्रत्याशी चयन में लापरवाही, कार्यकर्ताओं की कमी, मतदाताओं के बीच पार्टी की कमजोर पकड़ को माना जा रहा है। कांग्रेस ने बेरोजगारी, सामाजिक न्याय, आरक्षण, मुफ्त बिजली, गरीब कल्याण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों को अपने घोषणापत्र में शामिल तो किया लेकिन मीडिया ओर सोशल मीडिया में वोट चोरी जैसे मुद्दे ही हावी रहे। एसआईआर और वोट चोरी के मुद्दे कांग्रेस के लिए उलटे पड़ते नजर आए। कांग्रेस ऐसे किसी मुददे को मजबूती से नहीं उठा पाई जो उसे चुनाव में फायदा पहुंचाता। वोटरों को ना तो कांग्रेस की रणनीति समझ आई और ना कोई चुनावी मुददा या कोई वादा। सूबे में कांग्रेस को ना तो उच्च जातियों के वोट मिले और ना पिछड़ी जातियों के। पार्टी अल्पसंख्यक वोटरों को भी जोड़कर नहीं रख पाई। भाजपा के हिन्दुत्व एजेंडे के विरोध में कांग्रेस के पास कोई एजेंडा नहीं था। बिहार को लेकर कांग्रेस के विजन और संकल्प पत्र को कार्यकर्ता, मतदाताओं तक नहीं पहुंचा सके। इसके अलावा जिन दलों से गठबंधन किया था वो भी फिस्सड़ी साबित हुए। दूसरी तरफ एनडीए गठबंधन ने अपने शासनकाल की खामियों को सामने ही नहीं आने दिया। कभी वोट चोरी और एसआईआर को ही कांग्रेस के खिलाफ उछाल दिया तो कभी लालू यादव के कार्यकाल की कमियां उजागर कर दी। चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के बीच तालमेल का अभाव दिखा। कांग्रेस में संगठन के भीतर भी तालमेल की कमी तो दिखी ही साथ ही कार्यकर्ताओं का अभाव भी नजर आया। कुल मिलाकर, कांग्रेस और उसके सहयोगी दल बिहार चुनाव में एनडीए गठबंधन के खिलाफ कोई ठोस चुनावी मुद्दा सेट नहीं कर पाए इसके विपरीत जेडीयू-बीजेपी ने अपने खिलाफ माहौल ही नहीं बनने दिया।

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