भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में होता है इज्तिमा का आयोजन  
 
दुनिया के सबसे बड़े तीन आलमी तबलीगी इज्तिमें तीन मुल्कों में होते हैं। इनमें पहला भारत, दूसरा पाकिस्तान और तीसरा बांग्लादेश है। धीरे-धीरे कर तबलीगी जमाअत की ये मुहिम दुनिया के दिगर देशों में भी फैलते गई। पाकिस्तान में लाहौर के करीब रायविंड में सालाना इज्तिमे का आयोजन होता है। इसमें दुनिया भर के तब्लीगी जमात से जुड़े करीब 5 से 7 लाख लोग शामिल होते हैं। बांग्लादेश के कई अलग-अलग शहरों में कई दिनों तक इज्तिमा जारी रहता है। बांग्लादेश के टोंगी में होने वाला इज्तेमा सबसे बड़ा माना जाता है। यहां दुनियाभर के 4 से 5 करोड़ लोग पहुंचते हैं। हिन्दुस्तान में आलमी (विश्वस्तरीय) तौर पर इज्तिमा सिर्फ भोपाल में ही होता है। भारत के दिल कहे जाने वाले भोपाल में हर साल होने वाले इज्तिमा में दुनियाभर जायरीन आते हैं। यहां करीब 10 से 14 लाख लोग शिरकत करते हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में होने वाले इज्तिमा को दुनिया के पांच बड़े इस्लामिक आयोजनों में से एक, दुनिया में सबसे बड़ा और सबसे पुराना माना जाता है। हिंदुस्तान में भोपाल के अलावा ये बुलन्दशहर, दिल्ली, हल्द्वानी, लाखोटा, चेन्नई, कोलकाता, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलुरु, कोयंबटूर, सूरत, राजकोट, कालीकट, तिरुवनंतपुरम, नागपुर, गया, ग्वालियर, मुजफ्फरपुर, नासिक में भी इज्तिमें का आयोजन किया जाता है लेकिन यहां जायरीनों की तादाद इतनी ज्यादा नहीं होती जितनी की भोपाल में। औरंगाबाद और यूपी के संभल में इसी तरह के प्रोग्राम का आयोजन हो चुका है। इस्लामी संगठन तब्लीगी जमात अपने अनुयायियों, समर्थक मुसलमानों के सहयोग से इज्तिमा आयोजित करता है।  
अरबी लफ्ज इज्तिमा के मायने है इकठ्ठा होना। तब्लीगी इज्तिमा एक तरह का मजहबी जलसा है। ये इज्तिमा जिला, प्रदेश-देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं। आलमी तब्लीगी इज्तिमा का शाब्दिक अर्थ विश्वस्तरीय धार्मिक सम्मेलन होता है। एक खास जगह पर इकट्ठा होकर इबादत करना, अमनो-चैन का पैगाम देना और खैरो-बरकत की दुआ करना, दीन के बताए रास्ते परचलना, सभी मजहबों का सम्मान करना, गुनाहों की माफी माँगना और दीनी बातें करना इज्तिमा का हिस्सा है। इज्तिमें में इस्लामिक तौर-तरीके सीखने और सिखाने वाले दोनों ही पहुंचते हैं। दुनिया भर से पहुंचने वाले उलेमा तकरीर, बयानों के जरिए कुरान में बताए गए तरीकों से जिन्दगी गुजारने का सलीका बताते हैं। इस्लामिक विद्वानों का मानना है कि इज्तिमा सदियों पुरानी परंपरा है। ये सिलसिला हजरत आदम के जमाने से चलन में है। कुरान पाक की तिलावत, हर किसी के लिए नेक ख्यालात, नमाज की पाबंदी और पैगंबर हजरत मुहम्मद सअस के अखलाक, आर्दशों और उनके दिखाए रास्तों पर चलकर दुनिया के साथ ही आखिरत में कामयाबी हासिल करना इन्हीं तरह की मंशाओं के साथ इज्तिमा में संदेश दिया जाता है। इज्तिमें या मजहबी जलसे की ये खासियत होती है कि यहां लाखों मुसलमान जमा होते हैं, दुनियावी भीड़ की तरह लेकिन उन्हें दुनिया की बातों से कोई सरोकार नहीं होता। दुनिया में रहकर दीन की बातें करना ही इज्तिमें का मूल मकसद है। इज्तिमे में उलेमा बताते हैं कि दीन के रास्ते पर बेहतर ढंग से कैसे चला जा सकता है। इज्तिमें के दौरान तकरीर, बयान, नमाज और सामूहिक निकाह होते हैं। दुनिया भर में अमनो-चैन, सुख-समृद्धि, देश की तरक्की, सामाजिक सद्भाव की दुआ के साथ इज्तिमें का समापन होता है। इज्तिमे में शामिल होने वाले जायरीनों की आमद से लेकर उनके ठहरने, भोजन, नमाज और रवानगी तक सारी व्यवस्थाओं का माकूल इंतेजाम होता है। इज्तिमे में एलोपेथी दवाखाने के साथ ही आयुर्वेद और यूनानी दवाखानों यहां तक की बाइक एंबुलेंस सेवा की व्यवस्था भी की जाती है। मोटरसाइकिल पर स्ट्रेचर और फर्स्ट एड बॉक्स लगाए जाते हैं। बीमार लोगों को इमरजेंसी में इज्तिमा पंडालों से एंबुलेंस तक पहुंचाने के लिए बाइक एंबुलेंस की पहल की गई है। इज्तिमा स्थल पर आने वाली जमातों के लिए तंबू लगाए जाते हैं। वाहनों की पार्किंग के लिए अलग से इंतजाम होता है। भोपाल में होने वाला इज्तिमा हमेशा से गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल रहा है। यहां हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोग जायरीरों की खिदमत करते हैं।

देश के सबसे बड़े इज्तिमे की शुरूआत सिर्फ 13 लोगों से हुई थी। भोपाल में शुरु हुए आलमी तबलीगी इज्तिमें को आज दुनिया भर में जाना-पहचाना जाता है। भोपाल में इज्तिमा की शुरुआत सन 1944 में भोपाल से हुई थी। सबसे पहले इसका आयोजन मस्जिद शकूर खाँ में हुआ था। अब इस इज्तिमें में दुनिया भर से 14 लाख जायरीन शिरकत करते हैं। तब्लीग के जरिए अल्लाह का संदेश, कुरान में दी गईं हिदायतें और ईमान का संदेश मुसलमानों को पहुंचाने की शुरुआत मौलाना मिस्कीन ने भोपाल की पुरानी मस्जिदों में से एक मस्जिद शकूर खां से की थी। कौम को कुरान और इस्लाम की हिदायतों की जानकारी, नबी साहब के बताए रास्ते पर चलने, इमान का संदेश देने की मंशा से भोपाल के घाटी भड़भूजा इलाके में इज्तिमा की शुरूआत की गई। साल 1948 में अता शुजा खां की मस्जिद में इज्तिमा का आयोजन होने लगा। नवाबों के शहर भोपाल में स्थित और एशिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक ताजुल मसाजिद से आलमी तब्लीगी इज्तिमा की शुरुआत साल 1949 के बाद हुई थी। मौलाना इमरान खान ने सन 1901 में शाहजहां बेगम की मौत के बाद से अधूरी पड़ी ताजुल मस्जिद का पुर्ननिर्माण शुरू कराया और 1949-1950 से इज्तिमा ताजुल मस्जिद में होने लगा। तब इज्तिमा की जिम्मेदारी मौलाना इमरान खां साहब और बड़े सईद मियां के पास रही। सन 1955 तक इज्तिमे में मध्यप्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात सहित कुछ अन्य प्रदेशों के जायरीन ही यहां पहुंचते थे। सन 1956 से इज्तिमें देश भर से जमातें आने लगी और ये राष्ट्रीय स्तर का हो गया। सन 1971 से इसका स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय हो गया। दुनिया भर से मुस्लिम समाज के लोग इज्तिमा में शामिल होने यहां आने लगे। कुछ जानकारों के अनुसार सन 1971 से इसका आयोजन ताजुल मसाजिद में होने लगा। वक्त गुजरने के साथ इसमें आने वालों की संख्या भी बढ़ने लगी और दूसरे देशों के जायरीन भी इज्तिमें में शिरकत करने लगे। जब एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद यानि ताजुल मसाजिद भी छोटी पड़ने लगी तो सन 2015 में इसे बैरसिया रोड स्थित ईंटखेड़ी के पास घासीपुरा में शिफ्ट किया गया। उसके बाद से ये यहीं लग रहा है। पिछले कुछ सालों से इज्तिमा प्रबंधन की जिम्मेदारी मौलवी मिस्बाह उद्दीन, इकबाल हफीज आदि बुजुर्गों के कांधों पर रही। इस आयोजन के लिए भोपाल में दो माह पहले से तैयारियां शुरू हो जातीं हैं। इज्तिमे में शामिल होने वाली जमातों की बुनियादी जरूरत पूरा करने के लिए हर इंतजाम किए जाते हैं।
  इज्तिमें से जुड़े लोग बताते हैं कि उस समय 13 लोगों में से कुछ लोगों ने कहा था कि हम सिर्फ 13 ही लोग तो हैं। ये आयोजन करने के लिए शहर की कोई भी छोटी मस्जिद चुन सकते थे। इतने कम लोगों के लिए इतनी बड़ी मस्जिद चुनना ठीक नहीं। इस पर जमात के अध्यक्ष ने जवाब कहा था कि आज इस मस्जिद को इतना बड़ा माना जा रहा है, लेकिन एक समय ऐसा आएगा जब एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाने वाली ताज-उल-मसाजिद भी छोटी पड़ जाएगी। जमात के मीर या अध्यक्ष की ये बात करीब पांच दशक बाद सहीं साबित हुई। इज्तिमे की शुरुआत एक छोटी मस्जिद से हुई और बाद में एशिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में शुमार ताजुल मसाजिद भी छोटी पड़ने लगी। आखिरकार इज्तिमें का आयोजन शहर से बाहर ईंट खेड़ी में करना पड़ा।  
  आलमी तब्लीगी इज्तिमे में दुनिया भर से जायरीन आते हैं। इनमें रूस, फ्रांस, इंडोनेशिया, मलेशिया, जाम्बिया, दक्षिण अफ्रीका, कीनिया, इराक, सऊदी अरब, इथियोपिया, यमन, सोमालिया, थाईलैंड, तुर्की, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, मोरक्को, किर्गिस्तान, जर्मनी, सूडान, मिस्र, ट्यूनीशिया, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, संयुक्त राज्य अमेरिका, सेनेगल, यूनाइटेड किंगडम आदि शामिल हैं। हालांकि, कभी कभी भारत के अन्य देशों के साथ राजनीतिक संबंधों पर भी जायरीनों की आमद निर्भर करती है। जैसे, भोपाल में हुए इज्तिमें में पाकिस्तान के लोगों को शामिल होने की परमिशन नहीं थी। करीब दो दशक पहले मध्यप्रदेश के इंदौर के खजराना स्थित नाहर शाह वली दरगाह के मैदान में भी इज्तिमा की शुरुआत हुई थी। बाद में रुक-रुक कर ये सिलसिला चला फिर थम गया। हालांकि, ये इज्तिमा नाहर शाह दरगाह की जानिब से था। बहरहाल, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल एक बार फिर आलमी तबलीगी इज्तिमे का गवाह बनने जा रहा है।  

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