(आलेख : बादल सरोज)

स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से दिए जाने वाले परंपरागत भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 2025 की 15 अगस्त का भाषण अब तक के हुए, खुद उनके भाषणों सहित, सभी भाषणों की तुलना में निराशाजनक ही नहीं, चिन्ताजनक भी था । आजादी के बाद से ही देश की जनता 15 अगस्त को दिए जाने वाले भाषण का इंतज़ार करती है। इस एक साल में देश जिन अब तक कभी न देखे दिनों से गुजरा है, उन्हें देखते हुए इस बार इन्तजार कुछ ज्यादा ही था। मगर 103 मिनट तक लगातार बोलकर अब तक के सबसे लम्बे भाषण का रिकॉर्ड बनाने के बाद भी इसमें ठीक वही नहीं था, जिसे देश और दुनिया में बैठे भारतीय सुनना चाहते थे।

पहलगाम की आपराधिक विफलता पर देश जो जानना चाहता है, वह नहीं था ; युद्धविराम को लेकर 34 बार किये गये अमरीकी राष्ट्रपति के दावे और टैरिफ के नाम पर हर रोज दी जा रही धमकी से दुनिया में बन रही भारत की हास्यास्पद और ट्रम्प से डरने वाले देश की छवि के प्रतिवाद में जो सुनना चाहता है, उसका एक शब्द भी नहीं था, मोदी राज में अपनाई गयी दिवालिया और संकीर्ण विदेश नीति के चलते शुरू हुए पड़ोसी देशों से मनमुटाव के चौड़ा होते-होते लगभग दुराव तक पहुँच जाने और दुनिया भर के सारे परम्परागत मित्र देशों के साथ अलगाव के बढ़ते जाने पर कोई टिप्पणी तक नहीं थी, जिस गज़ा पर हाल के सप्ताहों में दुनिया भर में करोड़ों लोग सड़कों पर उतर चुके हैं, उस परम्परागत मित्र फिलिस्तीन में किये जा रहे अमरीका संरक्षित इजरायली नरसंहार की निंदा पर बोल तक नहीं था, खुद के चुनाव की वैधता पर उठे सवाल सहित लोकतंत्र के साथ किये जा रहे छल और धोखे के सप्रमाण उजागर होने से देश की जनता में उभरती बेचैनी को दूर करने की झलक तक नहीं थी, अतिवर्षा से आयी बाढ़ में बर्बाद हुए भारतीयों के लिए चुटकी भर राहत की घोषणा नहीं थी, पिछले 11 वर्षों में रिकॉर्ड तोड़कर बढ़ी बेरोजगारी से बाहर आने, किसानों, मजदूरों और मध्यवर्गी भारतीयों को उनकी दिनों-दिन बढ़ती दुश्वारियों से उबारने का कोई संकेत तक नहीं था। हमेशा की तरह यदि कुछ था, तो शुरु से आखिर तक मैं, मैं और मैं का आत्मालाप था।

देश के प्रधानमंत्री का सालाना भाषण आमतौर से इस बीच हासिल उपलब्धियों को गिनाते हुए आत्मविश्वास पैदा करने और देश के समक्ष दरपेश चुनौतियों और उनके संकटों में बदलने की आशंकाओं के बारे में सचेत करता है। इन सबसे जूझने के लिए जो सबसे पहली जरूरत है, उस जनता – समूची जनता — की एकता को मजबूत करता है। दरारों को मूंदने, विग्रह की खाईयों को पाटने के कदम उठाता है। मगर पिछले 27 महीनों से मणिपुर में जारी हिंसा और लगभग गृहयुद्ध जैसी अफसोसनाक स्थिति पर इस भाषण में कुछ नहीं था। बिहार में कथित गहन पुनरीक्षण के बहाने मतदाता सूची से उड़ाये जा रहे जीते-जागते नामों को मार डालने से उपजी जायज बेचैनी से लेकर नस्ल और जाति, करणी और उच्चवर्णी सेनाओं द्वारा देश भर में मचाये जा रहे उत्पात पर कुछ नहीं था। जो बोला गया वह ‘संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य भारत’ के प्रधानमंत्री का भाषण नहीं था ; संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र से ऐलानिया बैर रखने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक का भाषण था। अपने संबोधन के समापन वाले हिस्से में उनका यह आव्हान कि किसी “षड्यंत्र के तहत, सोची-समझी साजिश के तहत देश की डेमोग्राफी को बदला जा रहा है …. यह घुसपैठिए, मेरे देश के नौजवानों के रोजी-रोटी छीन रहे हैं…… मेरे देश की बहन-बेटियों को निशाना बना रहे हैं, …….. यह घुसपैठिए भोले भाले आदिवासियों को भ्रमित करके उनकी जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं…“ बहुत ज्यादा संगीन निहितार्थों से भरा है। एक हाई पावर डेमोग्राफी मिशन शुरू करने की घोषणा करते हुए इस मिशन के द्वारा “भारत पर मंडरा रहे भीषण संकट” को मुख्य चिंता बताते हुए समय सीमा में इससे निबटने का एलान भी कर दिया। इस तरह स्वयंसेवक प्रधानमंत्री के लिए देश की वास्तविक समस्याएं, समस्याएं नहीं है, असली संकट देश के “घुसपैठियों और बाहरी” लोगों के हवाले हो जाने की है। कमाल की बात यह है कि इस ‘भयानक संकट’ की बात वह प्रधानमंत्री कर रहा था, जो खुद पिछली पूरे 11 बरस से सत्ता में है।

विग्रह और विभाजन में सुख देखने वाले विकृत सोच के लिए ही भारत की डेमोग्राफी – जनसांख्यिकी – चिंता और संकट की बात हो सकती है। असल में तो यह देश की ताकत है ; दुनिया में सबसे युवा आबादी वाला देश होना अपार संभावनाओं से भरी शक्ति और सामर्थ्य वाला देश होना होता है। जहां लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, वहां कोशिशें इस बात की होनी चाहिए कि इस युवतर मानव शक्ति को एक अवसर मानकर उसे इस तरह नियोजित करने की योजनायें बनाई जाएँ कि चौतरफा विकास हो सके। मगर जनसांख्यिकी को इस नजरिये से देखने की बजाय उसे विभाजनकारी मंतव्य के साथ रखना और वास्तविक संभावना की बजाय एक आभासीय आशंका बताना मोदी जी के कुनबे के साम्प्रदायिक दुष्प्रचार का आजमाया हुआ फंडा है ; इसे पिछले एक सौ साल से आरएसएस वापरता रहा है, इस बार इसे प्रधानमंत्री का वेश धरकर आये स्वयंसेवक ने लालकिले पर चढ़कर कहा है।

इस खेल के पीछे के इरादे को समझने के लिए भाषा की गतिशीलता पर नजर डालना उपयोगी होगा। जैसे भाषा जड़ नहीं होती, वैसे ही शब्द हमेशा एक अर्थ में नहीं रहते। वे भावों के मामले में रूप यहाँ तक कि अर्थ भी बदलते रहते हैं। कभी बहुत लम्बे समय तक सर्वनाम की तरह उपयोग में लाये गए शब्द संज्ञा भी बन जाते हैं। कई बार किसी ख़ास तरह के आचरण के आधार पर स्वयं जनता अपने विवेक से ऐसा कर देती है, जैसे ‘भक्त’ और ‘फेंकू’ या ‘गोदी मीडिया’ के इन दिनों प्रचलित भावार्थ हैं। भाषा यदि प्रतिरोध और उसके लिए एकजुट करने, होने का हथियार है, तो शोषकों द्वारा अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए शोषितों के दिमाग को कब्जाने और उनके बीच विभाजन करने का जरिया भी है। इस धतकरम के लिए विशेष इरादे के साथ योजना बनाकर शब्दों के साथ खिलवाड़ किया जाता है। शब्द कुछ और होता है, इस्तेमाल कहीं और निशाना साधने के लिए किया जाता है। भारत के इतिहास में इस तरह के कई उदाहरण है। आर्यों द्वारा यहाँ पहले से रहने वालो के लिए असुर, अनार्य, दास आदि शब्दों का इस्तेमाल और उसके बाद आये वर्णाश्रमी समाज में कथित रूप से नीचे बताये गए वर्ण और जातियों और सारी की सारी स्त्रियों के लिये उपयोग में लाये जाने वाले शब्द संबोधनों को तिरस्कार और अपमान के पर्यायवाची बना दिया जाना इसी प्रवृत्ति की मिसालें हैं। ठीक यही बर्ताब आरएसएस ने अपनी साम्प्रदायिक सोच के साथ इन दो शब्दों ‘घुसपैठिया’ और ‘बाहरी’ के साथ किया है। कथित बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर देश भर में बांग्लाभाषी भारतीय मुसलमानों के साथ की जा रही गुण्डई सबके सामने है। इसमें ‘आदिवासियों की जमीन और बहू बेटियाँ छीन लेने’ की वह नितांत बेहूदा बात, जो भाजपा के शीर्षस्थ नेता के नाते झारखण्ड के चुनाव अभियान में बोली थी, उसे लालकिले से प्रधानमंत्री के रूप में बोलकर स्वयंसेवक प्रधानमंत्री ने कथित डेमोग्राफी सुधारने की परियोजना के निशाने पर मुसलमानों के साथ ईसाइयों को भी ले लिया है।

यह सरासर निर्लज्ज बयान, वह भी इतने उच्चतम स्तर से तब दिये जा रहे है, जब 11 वर्ष से सरकार में होने के बावजूद पड़ोसी देशों से शरणार्थियों के आने का कोई आंकडा किसी के पास नहीं है ; न रॉ के पास है, न आईबी के पास, न सेना के पास, न अमित शाह जिस कुर्सी पर डटे हैं, उनके गृह मंत्रालय के पास!! यह सिर्फ और केवल रयूमर स्प्रेअडिंग सोसायटी – आर एस एस – का वैसा ही मनगढ़ंत झूठ है, जैसा हिन्दू आबादी के अल्पसंख्यक हो जाने को लेकर बोला जाता है।

यह सचमुच हैरत की बात है कि किसी देश का प्रधानमंत्री अपनी नाकामियों को छुपाने और अपने विचार-कुटुंब का संविधान विरोधी एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए स्वतन्त्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण दिन का इस कदर दुरुपयोग करे और अपनी ही आबादी में दुश्मन तलाशने का आव्हान करे। हालांकि यह कोई नया कारनामा नहीं है ; ठीक यही काम, जिन्हें ये कुनबा अपना प्रेरणास्रोत और आदर्श मानता है, उस हिटलर द्वारा किया जा चुका है, उसके हिसाब से पहले यहूदी राष्ट्र के लिए ख़तरा थे, बाद में बात और आगे बढ़कर जर्मन आर्यों को छोड़कर बाकी पूरी दुनिया को दोयम दर्जे का मनुष्य बनाने तक पहुंची। इस बीच में आज जिसे संयुक्त राज्य अमरीका कहते हैं, वहां के मूल निवासियों के कत्लेआम से शुरू हुई, फिर काले, भूरे, पीले रंगीन इंसानों को ‘बाहरी’ बनाने तक पहुंची। ऑस्ट्रेलिया से लेकर अफ्रीका तक, रवांडा से युगांडा तक कुछ और सिरफिरों ने इसे आजमाया, आज बेंजामिन नेतन्याहू इसे फिलिस्तीनी अवाम के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। मोदी इसी पुरानी, ध्रुवीकरण विरुदावली की फासिस्टों की प्रिय पटकथा को दोहरा रहे थे। अडानी-अम्बानी जैसे राहू-केतुओं के फंदे में हिचकोले खाती अर्थव्यवस्था में बेरोजगारों से रोजगार और बहुमत जनता से गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार छीनने के वास्तविक अपराध का जिम्मा काल्पनिक रूप घुसपैठियों और मनगढ़ंत बाहरी पर डालकर अपना विभाजनकारी एजेंडा आगे बढ़ा रहे थे।

लालकिले की प्राचीर से लक्ष्यबद्ध आक्रामक बहिष्करण अभियान का शंखनाद एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है। यह बहुआयामी चौतरफा अभियान है। अत्यंत व्यवस्थित और सुनियोजित तरीके से एक झूठ को हजार-हजार बार-बोलकर सच बना देने के गोयाबल्सी गुरुमंत्र पर चलते हुए देश के घुसपैठियों के हवाले हो जाने का डर दिखाया जा रहा है। हर तरह का मीडिया इसी में जुटा है, हर स्तर के नेता इसी में भिड़े हैं, चुनाव आयोग सहित ज्यादातर संवैधानिक संस्थाए संघ के आनुषांगिक नत्थी संगठनों की तरह इसी भ्रम को बढ़ाने में जुटी हैं, यहाँ तक कि कुछ माननीय न्यायमूर्ति भी इस कीच-कुंड में डुबकी लगाने के लिए व्याकुल आतुर हुए जा रहे हैं। फिल्म के माध्यम का भी इस्तेमाल किया जा रहा है ; कश्मीर और केरल फाइल्स की फ्लॉप फिल्मों के बाद इसी कड़ी में उदयपुर फाइल्स आई। इन फिल्मों का असली मकसद क्या है, यह इस उदयपुर फाइल्स फिल्म के सुपर फ्लॉप हो जाने के बाद इसके निर्माता अमित जानी ने अपने खीज भरे बयान में दे दिया। उन्होंने मान लिया कि उनका इरादा हिन्दुओं को मुसलमानों के खिलाफ उकसाने और भड़काने का था। इस असंदिग्ध अयोग्यता वाले संदिग्ध फिल्म निर्माता ने कहा कि “उसकी उम्मीद थी कि हिंदू समाज उनका साथ देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।” बन्दा इतना खिजियाया कि यहाँ तक बोल गया कि “पहले की तरह आज भी देश का हिंदू कौम मरा हुआ है। हिंदू जैसे पहले चादर तानकर सोया हुआ था, वैसे ही आज भी पड़ा हुआ है। मुस्लिमों, तुम लोग इस बात से खुश हो जाओ।” कायदे से इस व्यक्ति के इतने आपराधिक बयान के बाद इसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए और सेंसर बोर्ड सहित इसे रिलीज़ करने की अनुमति देने वाली अदालत की बेंच को देश से माफ़ी मांगते हुए इसका अनुमति पत्र रद्द कर देना चाहिए। मगर ऐसा होगा नहीं, बल्कि ताज्जुब मत कीजिएगा, यदि भक्तों के ब्रह्मा अपने गणों के साथ इसे देखते हुए नजर आयें। वे कश्मीर और केरल फाइल्स के वक़्त यह करतूत कर चुके हैं।

यह प्रोपेगंडा किसी जानी या किसी सी-ग्रेड फिल्मों के निर्देशक अग्निहोत्री का उत्पाद नहीं है, यह झूठा इतिहास गढ़कर नफरत और उन्माद भडकाने का कुनबे का प्रोजेक्ट है । ‘बंगाल फाइल्स’ के मामले में यह उजागर हो गया, जब जिस ‘डायरेक्ट एक्शन डे (अगस्त 1946)’ के दौरान हिंदू मोहल्लों के प्रमुख रक्षक रूप में दिखाए गए गोपाल मुखर्जी उर्फ ‘गोपाल पाठा’ के पोते शांतनु मुखर्जी ने अग्निहोत्री को लीगल नोटिस भेजा। शांतनु का कहना है कि “फिल्म ने उनके दादा को अमानवीय तरीके से पेश किया है और उन्हें राक्षसी रूप दिया है। यह भारत की आज़ादी की लड़ाई के एक महत्वपूर्ण चरित्र का अपमान है।” फिल्म के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराते हुए कहा कि फिल्म में न केवल गोपाल के ‘शब्दों और कामों’ को, बल्कि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और ऐतिहासिक संघर्ष को भी बदनाम किया जा रहा है। शांतनु ने कहा है, “दादाजी ने 1946 के दंगों के दौरान हमारे मोहल्ले में मुस्लिम परिवारों की भी रक्षा की थी। मेरे दादाजी ने अपने समर्थकों को संगठित किया और हथियार उठाए। उन्होंने ऐलान किया था — कि किसी निर्दोष मुस्लिम को नुकसान नहीं होना चाहिए। वे एक स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी और ‘महात्मा गांधी और नेताजी—दोनों के जाने-माने अनुयायी थे।” केरला फाइल्स के वक़्त भी यही हुआ था, जब खुद निर्माता को यह लिखा-पढ़ी में कबूल करना पड़ा था कि यह सिर्फ 3 महिलाओं की कहानी पर आधारित है। मोदी लालकिले की प्राचीर से इसी अमित जानी और विवेक अग्निहोत्री के आख्यान को आगे बढ़ा रहे थे। वे यही तक नहीं रुके, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशस्तिगान भी किया। यह कुछ दिन बाद स्वयं के 75 वर्ष का होने पर लागू होने वाले रिटायरमेंट की आशंका को टालने के लिए की गयी चापलूसी भर नहीं थी, बल्कि उस संगठन का प्रशस्तिगान था, जिसे आजाद भारत में चार-चार बार – अंग्रेजों से आजादी पाने का विरोध कर काले झंडे फहराने, महात्मा गांधी की हत्या, उसके बाद 1975 में तथा उसके बाद 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाकर भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढाँचे पर हमला करने — के लिए प्रतिबंधित किया जा चुका है। “सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन, यह जिसकी पहचान रही है, ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का यह सबसे बड़ा एनजीओ है। एक प्रकार से, 100 साल का उसका समर्पण का इतिहास है …” ऐसा कहते हुए वे इतने तक ही नहीं रुके ; मुस्लिम लीग के साथ मंत्रिमंडल में रहने वाले श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की 125 वीं वर्षगाँठ का उल्लेख भी लालकिले से कर दिया। उनकी सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक ऐसा विज्ञापन भी जारी किया, जिसमें सावरकर को गांधी, सुभाष चन्द्र बोस और भगत सिंह के भी सर पर बिठाया हुआ था। अगर सावरकर स्वतन्त्रता सेनानी हैं और आरएसएस एनजीओ है, तो लगता है शब्दकोश के सारे मायने बदलने पड़ेंगे। कुल मिलाकर, लालकिले से ऐसा भाषण इस देश ने इससे पहले कभी नहीं सुना था।

खैरियत की बात है कि अनदेखे दिनों को देखने के अभिशाप से बचने और बचाने की तलाश और जिद भी इस दौरान नया आख्यान गढ़ रही थी ; इंडिया ब्लाक के दलों की बिहार में चल रही पदयात्रा रूप में भले लोकतंत्र के हरण के खिलाफ निकल रही थी, मगर सार में रात के विरुद्ध प्रातः के लिए है। इस तरह की मुहिम तेज करके ही फासीवाद लाने की साजिशों को धूल चटाई जा सकती है। क्या यह मुमकिन है? हाँ, यही है जो मुमकिन भी है, तय भी है!!

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

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