भोपाल-मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक

आजादी की लड़ाई में साधु-संतों की भी अहम भूमिका रही ये और बात है कि ज्यादातर लोगों को उनके योगदान के बारे जानकारी नहीं है। अंग्रेजों ने कई तीर्थ स्थलों पर हिन्दुओं के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था जिसके चलते संन्यासियों में असंतोष फैल गया। अंग्रेजों के विरुद्ध सन् 1763 से 1773 तक चला संन्यासी आंदोलन काफी चर्चित रहा है। सन्यासियों और फकीरों ने उस वक्त आंदोलन कर हिंदू-मुस्लिम एकता का भी उदाहरण पेश किया था। रामनामी भिक्षु और मुस्लिम फकीरों ने जो कि इसी क्षेत्र में भिक्षा मांगकर जीवन जीते थे, उन्हें भी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। बंगाल में अकाल पड़ने से लोगों के पास खाने तक का अनाज नहीं बचा तो भिक्षा देने में भी लोग कतराने लगे। वहीं दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जबरन वसूली करते रहे। स्थानीय लोगों ने कंपनी अधिकारियों द्वारा जबरन वसूली का विरोध शुरू कर दिया, तब सन्यासियों और फकीरों ने भी विद्रोह कर दिया। और फिर पूरे बंगाल और बिहार में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष शुरू हो गया था। बंगाल में सन्यासियों और फकीरों के अलग-अलग संगठन थे। पहले तो इन दोनों संगठनों ने मिलकर अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया लेकिन बाद में उन्होंने अलग अलग रूप से विरोध किया। संन्यासियों में मोहन गिरि, भवानी पाठक और फकीरों के नेता के रूप में मजनूशाह का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। ये लोग हथियारबंद होकर अंग्रेजी सेना पर आक्रमण करते थे। अंग्रेजों की कई कोठियाँ इन लोगों ने छीन लीं और कई अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। ऐसा माना जाता है कि बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंदमठ का मूल आधार यही सन्यासी विद्रोह रहा है। आजादी के आंदोलन में लोक गायकों की भी भूमिका रही। बताया जाता है कि आनंद भट्टाचार्य, जैमिनी मोहन घोष. कुलदीप नारायण, जगदीश नारायण, मैनेजर पाण्डेय, भोलानाथ सिंह जैसे इतिहासकारों एवं लोक गायक लोगों में जोश जगाने का काम करते थे। चैतन्य महाप्रभु और श्रीमंत शंकर देव ने लोगों को दिशा दिखाई। मीराबाई, एकनाथ, तुकाराम, रामदास और नरसी मेहता, संत रामानन्द, कबीर दास, गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, गुरु नानक देव, संत रैदास ने लोगों को जागरूक करने का काम किया। इसी प्रकार से माधवाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य और रामानुजाचार्य ने अपना योगदान दिया। मलिक मोहम्मद जायसी, रसखान, सूरदास, केशवदास और विद्यापति आदि ने लोगों को प्रेरित किया। आजादी के आंदोलन में रामनगरी के संतों की भी अहम भूमिका रही। बृजनंदन ब्रह्मचारी जो छात्र थे, को नमक सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी के कारण छह माह की सजा हुई। जेल से छूटने का बाद वे क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गए। सन 1932 में जिले के कई स्थानों पर डाक बक्से जलाने और रेलवे लाइन का तार काटने के जुर्म में वे फिर से गिरफ्तार हुए और दो अलग अलग धाराओं में दो-दो वर्ष कैद और पचास रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई। अप्रैल 1940 से अप्रैल 1946 तक वे नजरबंद भी रहे। मणिरामदास जी की छावनी के तत्कालीन महंत रामशोभादास के शिष्य वासुदेवाचार्य को लगान बंदी आंदोलन में शामिल होने के कारण सन 1932 में एक माह की सजा हुई। इसी साल के आखिर में उन्हें फिर से छह माह की सजा मिली। क्रांतिकारियों से संपर्क रखने के कारण 1939-40 के बीच वासुदेवाचार्य तीन बार गिरफ्तार किए गए। भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने पर इन्हें नौ अगस्त 1942 को एक बार फिर गिरफ्तार किया गया। इस बार वासुदेवाचार्य करीब तीन साल तक जेल में रहे। रामवल्लभाकुंज के महंत रामपदारथदास के शिष्य अक्षय ब्रह्मचारी भी स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुए थे। सन् 1932 में सत्याग्रह के चलते इन्हें छह माह की सजा हुई। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान एक वर्ष की कैद के साथ दो माह तक नजरबंद रहने की सजा मिली। संतोषी अखाड़ा से जुड़े संत गंगादास ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया और छह माह कैद के साथ सौ रुपए जुर्माने की सजा भोगी। हनुमानगढ़ी के नागा साधु गोवददास के शिष्य प्रयागदास ने 1932 में छह माह कैद के साथ 25 रुपए जुर्माने की सजा भुगती। सन 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में वे नौ माह तक जेल में रहे। वर्ष 1942 में प्रयागदास को एक माह तक नजरबंद रखा गया। रामसमुझदास के शिष्य वासुदेवदास भी 1933 के दौरान ही स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े। 1942 तक उन्होंने 19 मास की कैद के साथ 20 रुपए जुर्माने की सजा भुगती। हनुमानगढ़ी के ही लालतादास को क्रंातिकारी गतिविधियों में शामिल होने के कारण सन 1941 में 15 माह की सजा मिली, उन्हें सन 1942 से 45 तक नजरबंद रहना पड़ा।

इसी तरह स्वामी दयानंद सरस्वती का स्मरण आज भी पूरे आदर के साथ किया जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने मुंबई की काकड़बाड़ी में 7 अप्रैल 1875 में आर्य समाज की स्थापना की थी। उन्होंने वैदिक धर्म के साथ ही वेदों का प्रचार प्रसार किया। आर्य समाज के कारण ही स्वदेशी आंदोलन का प्रारंभ हुआ था। इसके बाद लोगों ने अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार किया। आर्य समाज का आजादी की अलख जगाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। आपके द्वारा सन 1893 का शिकागो में दिया गया भाषण आज भी पूरी दुनिया याद करती है। इसी तरह स्वामी श्रद्धानंद ने दलितों को उनका अधिकार दिलाने के लिए अनेक कार्य किए। पश्चिमी शिक्षा की जगह उन्होंने वैदिक शिक्षा प्रणाली पर जोर दिया। इनके गुरु स्वामी दयानंद सरस्वती ही थे। वर्ष 1901 में स्वामी श्रद्धानंद ने अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान गुरुकुल की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में गुरुकुल विद्यालय खोला गया जिसे गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय नाम से जाना जाता है। स्वामी श्रद्धानंद ने आजादी और वैदिक प्रचार, शिक्षा, दलित सुधार का आंदोलन खड़ा कर दिया था जिसके चलते गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी। मैडम भीखा जी कामा जिनका जन्म और विवाह समृद्ध परिवार में हुआ था, उन्होंने आजादी की क्रंाति को नई दिशा दी। वर्ष 1896 में मुंबई में ब्यूबोनिक प्लेग फैल गया था और महामारी के चलते हर जगह लाशें दिखने लगी थीं। ऐसे में मैडम कामा ने राहत कार्य शुरू किया। कुछ दिनों में वो भी महामारी का शिकार हो गईं। ईलाज के लिए वर्ष 1902 में वे इंग्लैंड पहुँचीं। यहां पर उन्होंने पहली बार दादाभाई नौरोजी का भाषण सुना। इसके बाद मैडम भीकाजी कामा ने वहाँ रह रहे अन्य क्रांतिकारियों से मुलाकात की और ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई। इसी वजह से उन्हें भारत आने पर बैन लगा दिया गया तो पेरिस में उन्होंने शरण ली और वही से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काम किया। स्वामी सहजानंद को किसान आंदोलन और जमींदारी प्रथा के खिलाफ किए गए उनके कार्यों के लिए जाना जाता है। किसानों को संगठित कर प्रभावी आंदोलन खड़ा करने का काम स्वामी सहजानंद ने ही किया। इसके साथ ही स्वामी सहजानंद ने आजादी के आंदोलनों में हिस्सा लिया। महर्षि अरविंद का जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में हुआ था। आपके पिता केडी घोष एक डॉक्टर थे। कलकत्ता में उनके भाई बारिन ने उन्हें बाघा जतिन, जतिन बनर्जी और सुरेन्द्रनाथ टैगोर जैसे क्रांतिकारियों से मिलवाया। उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के साथ आंदोलनों में भाग लिया। सन् 1906 में जब बंग-भंग का आंदोलन चल रहा था तो वे बड़ौदा से कलकत्ता आ गए। स्वामी अरविंद के भाषण जोश से हुए होते थे। अरविंद का नाम सन 1905 के बंगाल विभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ा। सन 1908-09 में उन पर अलीपुर बमकांड मामले में राजद्रोह का मुकदमा चला, अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल की सजा सुना दी। जब उन्हें अलीपुर जेल में रखा गया तो जेल में अरविंद का जीवन ही बदल गया। वे जेल की कोठरी में ज्यादातर समय साधना और तप करते हुए बिताने लगे। वे गीता पढ़ा करते और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना किया करते। ऐसा कहा जाता है कि अरविंद जब अलीपुर जेल में थे, तब उन्हें साधना के दौरान भगवान कृष्ण के दर्शन हुए। कुल मिलाकर, हिन्दुस्तान की आजादी में साधु-संतों, फकीरों की भी उतनी ही भूमिका रही जितनी क्रांतिकारियों, किसानों और सेनानियों की।  

——– जफर की तोप …..पंडितों की आरती  ————
जंगे आजादी की शुरूआत तो सन 1857 में ही हो गई थी जिसे अंग्रेज शासकों ने ‘फौजी बगावत’ का नाम दिया था। हिंदुओं-मुसलमानों-सिखों ने पूरी एकजुटता के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ जंग लड़ी और कुर्बानियां दीं। हालांकि गद्दारों की वजह से अंग्रेज ये जंग जीत गए थे। 10 मई 1857 को छिड़े भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों ने मिलकर ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ जंग छेड़ दी थी। इस क्रांति के बाद अंग्रेजों को ये समझ आ गया था कि हिन्दुतान में राज करना होगा तो हिन्दु और मुसलमानों के बीच फूट डालना होगा। यही कारण था कि संग्राम की समाप्ति के बाद इंग्लैंड में बैठे भारतीय मामलों के मंत्री लॉर्ड वुड ने भारत में अंग्रेजी राज के मुखिया लॉर्ड एल्गिन को यह निर्देश दिया कि अगर भारत पर राज करना है तो हिंदुओं और मुसलमानों को लड़वाना होगा। 1857 की जंग-ए-आजादी का सलामी गीत अजीमुल्लाह खान ने रचा  था। सन 1857 की जंग का नेतृत्व नानासाहब, मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर, मौलवी अहमद शाह, तात्या टोपे, खान, बहादुर खान, रानी लक्ष्मीबाई, हजरत महल, अजीमुल्लाह खान और शहजादा फिरोजशाह ने मिलकर किया। इस संग्राम में मौलवी, पंडित, ग्रंथी, जमींदार, किसान, व्यापारी, वकील, नौकर, महिलाएं, छात्र सभी शामिल हुए। 11 मई 1857 को जिस क्रांतिकारी सेना ने मुसलमान बहादुर शाह जफर को भारत का स्वतंत्र शासक घोषित किया था, उसमें 70 प्रतिशत से भी ज्यादा सैनिक हिंदू थे। बहादुरशाह जफर को बादशाह बनाने में नाना साहब, तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मुसलमान, हिंदू और सिख सभी एक होकर लड़े और 1857 की जंगे-आजादी में एक साथ प्राणों की आहुति दी। क्रांतिकारियों ने दिल्ली को अंग्रेजी शासन से मुक्त करा के एक स्वतंत्र भारत की राजधानी घोषित कर दिया था। 1857 में जून से लेकर सितम्बर माह तक अंग्रेज सेना ने दिल्ली की घेराबंदी की हुई थी लेकिन हिंदू-मुसलमान-सिख मिलकर दिल्ली की हिफाजत करते रहे। दिल्ली की इंकलाबी सेना की कमान अजीमुल्लाह खान, शाम सिंह दूगा, सिरधारा सिंह, गौस मुहम्मद, हीरा सिंह के अलावा एक ब्राह्मण भी शामिल था। इंकलाबी सेना में अधिकांश हिन्दु ही शामिल थे। अंग्रेजों के हमले का जवाब देने के लिए शाहजहां के जमाने की एक तोप को दुरूस्त करके मोर्चें पर लगाया गया था। इस तोप को चलाने से पहले बहादुरशाह जफर और दूसरे सैनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पंडितों ने इसकी आरती उतारी, मालाएं चढ़ाई और विजयश्री की कामना की। अंग्रेज जासूस सांप्रदायिक जहर न फैला पाएं इसलिए इंकलाबी सेना ने दिल्ली में भी गौ-वध पर प्रतिबंध की घोषणा करते हुए यह एलान किया की जो भी ऐसा करते हुए पाया जाएगा उसे तोप से उड़ा दिया जायेगा।  

——— जैन को दफनाया, मुनीर को जलाया ———–
हांसी (अब हरियाणा में) में अंग्रेज शासकों के खिलाफ हुकुमचंद जैन और मुनीर बेग ने आंदोलन की अगुआई की। हांसी और करनाल के कानूनगो, फारसी और गणित के विद्वान और जमींदार हुकुमचंद जैन ने दिल्ली दरबार पहुंचकर तात्या टोपे से मुलाकात की। अपने करीबी साथी मिर्जा मुनीर बेग जो खुद भी फारसी और गणित में पारंगत थे, के साथ मिलकर सशस्त्र विद्रोह की तैयारियां शुरू की। इन दोनों ने अंग्रेजों से लोहा लिया। युद्ध में दिल्ली से सहायता न पहुंच पाने और कुछ अंग्रेजों के दलाल राजाओं की गद्दारी की वजह से इन्हें हार का सामना करना पड़ा। सितम्बर के अंत में इंकलाबियों के हाथ से दिल्ली निकल जाने के बाद इन दोनों को हांसी में गिरफ्तार किया गया और मौत की सजा सुनाई गई। अंग्रेज शासक इन दोनों और हिंदू-मुसलमान एकता से इतने परेशान थे कि उन्होंने 19 जनवरी 1858 को फांसी देने के बाद हुकुमचंद जैन को दफनाया जबकि मुनीर बेग को जलाया गया। हुकुमचंद जैन के 13 वर्षीय भतीजे फकीरचंद जैन को भी हांसी में सार्वजनिक तौर पर फांसी दी क्योंकि इस बच्चे ने उन्हें फांसी देने का विरोध किया था।  
————- एक साथ फांसी पर चढ़े मौलाना अमीर और पुजारी बाबा रामचरण ————–
  1857 में अयोध्या से सामाजिक सदभाव की मिसाल सामने आई। अयोध्या के मशहूर मौलवी मौलाना अमीर अली और यहां के प्रसिद्ध हनुमान गढ़ी मंदिर के पुजारी बाबा रामचरण दास को अंग्रेजों ने बंदी बनाया लिया था। इन दोनों को अयोध्या में कुबेर टीले पर एक इमली के पेड़ पर एक साथ फांसी पर लटका दिया गया। इसी तरह अयोध्या के ही अच्छन खान और शम्भु प्रसाद शुक्ला दो दोस्त थे जिन्होंने जिला फैजाबाद में राजा देबीबक्श सिंह की क्रांतिकारी सेना की कमान संभाली हुई थी। एक युद्ध के दौरान इनको बंदी बनाया गया। इन दोनों क्रांतिकारियों यातनाएं दी गई और सार्वजनिक रूप से दोनों के गले रेते गए।  
कोटा रियासत (अब राजस्थान में) पर अंग्रेज-परस्त महाराव का राज था। यहां के राज दरबारी जयदलाल भटनागर जो उर्दू-फारसी और अंग्रेजी भाषाओं पर समान महारत रखते थे। अंग्रेज शासकों के खिलाफ इन्होंने विद्रोह किया, इनके साथ थे वहां के सेनापति मेहराब खान। इन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ कोटा में अंग्रेज अधिकारियों और सैनिकों पर हमला बोला। बाद में ये लोग लक्ष्मीबाई के साथ कई मोर्चों पर अंग्रेज सेना से लोहा लेते रहे। लाला जयदलाल सन 1860 तक अंग्रेजों  के हाथ नहीं लगे लेकिन उसी साल 15 अप्रैल को जयपूर में गिरफ्तार किए गए। कोटा में 17 सितंबर 1860 को इन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। मेहराब खान को भी सन 1860 में ही गिरफ्तार कर कोटा में ही सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई।
   मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में अंग्रेज फौजों से लोहा लेने वाली क्रांतिकारियों की सेना के नायक तात्या टोपे, राव साहब, फिरोजशाह और मौलवी फजल हक थे। इन लोगों ने अंग्रेजों से कई लड़ाईयां लड़ी और जीतीं भी। फजल हक अपने करीब पांच सौ हिंदू, मुसलमान, सिख साथियों के साथ 17 दिसंबर 1858 को रानौड़ के युद्ध में शहीद हुए। तात्या टोपे 1859 तक स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करते रहे और 18 अप्रैल 1859 को ग्वालियर के राजघराने की गद्दारी की वजह से बंदी बनाए गए। इसके बाद इन्हें शिवपुरी में फांसी पर चढ़ा दिया गया। फिरोजशाह कभी भी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।
झांसी में रानी लक्ष्मीबाई की लड़ाई हर किसी को मालूम है। रानी लक्ष्मीबाई के तोप खाने के मुखिया गुलाम गौस खान  थे। रानी की घुड़सवार सेना के मुखिया भी एक मुसलमान खुदा बख्श थे। जब झांसी पर अंग्रेजों ने हमला बोला तो झांसी के किले में रानी की सेना का नेतृत्व करते हुए दोनों 4 अप्रैल 1858 को शहीद हो गए। रानी लक्ष्मी बाई की निजी सुरक्षा का जिम्मा  मुसलमान महिला मुंदार मुंजर थीं। उन्होंने रानी का साया बनकर झांसी, कूंच, कालपी और ग्वालियर के युद्धों में अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया। कोटा-की-सराए (ग्वालियर) युद्ध में वे लड़ते हुए रानी के साथ 17 जून 1858 शहीद हुईं।

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