(आलेख : बादल सरोज)

हाल में उर्दू पर चले विमर्श में कुछ टिप्पणियाँ संस्कृत को लेकर भी आयीं हैं। हालांकि भाषाओं के बीच कोई द्वंद्व या टकराव नहीं है, उन्हें एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसा सिर्फ वे ही कर  सकते हैं, जो किसी भी भाषा को न ठीक से जानते है, न बूझते हैं। तब भी, जब ऐसा करने वाले हैं ही, तो थोड़ा-सा संस्कृत के बारे में गुन लेने में, थोड़ा वक़्त खर्च करने में हर्ज नहीं है।

संस्कृत जितनी कमाल की भाषा है, उसमें उतना ही कमाल का साहित्य रचा गया है। यह साहित्य विश्व साहित्य की संग्रहणीय धरोहर है। बौद्ध और जैन और लोकायत के कुछ हिस्से छोड़, भारत का सारा दर्शन भी इसी भाषा में है। गणित, अंतरिक्ष विज्ञान, धातु विज्ञान,  भैषज, शल्य और चिकित्सा की अधिकाँश शुरुआती किताबें भी संस्कृत में हैं। दुनिया की प्राचीनतम भाषाओं में से एक संस्कृत, अपनी समकालीन अन्य भाषाओं की तुलना में सुन्दर और लावण्या भाषा है।

इस भाषा का सबसे पुराना साहित्य ऋग्वेद की ऋचाएं हैं, जो आनंदित करती है। इसे पढ़ते में आश्चर्य होता है कि इन्हें पहाड़ियां, घाटियाँ, जंगल और बियाबान लांघ दूरदराज से आये, घोड़े की पीठ पर बैठ इधर से उधर घूमते-विचरते, आसरा ढूंढते वे यायावर रच रहे हैं, जिन्होंने तब तक विधिवत घर-गाँव तक बसाना नहीं सीखा है। छाया, भोजन, आश्रय और मिलन जैसी जीवन की छोटी-छोटी इच्छाएं, प्रकृति से जूझते हुए अबूझे सवालों को लेकर मन में उठी जिज्ञासाओं को ठंड में ठिठुरते हुए, आग तापते हुए, गाते-गाते सुरताल में छंदबद्द करना विस्मित करता है। उससे भी अधिक चकित करता है लिपि के न होने के बावजूद जो रच रहे हैं, उसे संरक्षित करने का कौशल ; रट्टा लगा-लगाकर गाते-सुनाते बार-बार दोहराते, श्रुति का अभ्यास बनाते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृति में बिठाने का परिश्रम। पाणिनि द्वारा सुव्यवस्थित व्याकरण और जैन धर्मानुयायी युवा स्त्री ब्राह्मी द्वारा लिपि गढ़े जाने के भी कोई डेढ़ हजार साल पहले रचे जाने के बावजूद इस काव्य का  संयोजन मोहक भी है, आकर्षक भी।

वैदिक संस्कृत से लेकर प्राचीन से अर्वाचीन संस्कृत तक सृजन की तकरीबन हर विधा में संस्कृत की जानदार उपस्थिति है। काव्य है, नाटक हैं, व्यंग है, विनोद है, नृत्य, अभिनय से लेकर शासन प्रणाली के विधि-विधान हैं, अर्थशास्त्र,  द्यूत और चौर्य – जुआ खेलने और चोरी करने – की कला है, यहाँ तक कि कामक्रीड़ा तक के विविध आयामों से जुड़े शास्त्र है। दर्शन तो लगभग पूरे का पूरा है। इसी के साथ कोई दो-ढाई हजार वर्षो तक धरा के इस हिस्से के राजनैतिक और सामाजिक दोनों प्रभुओं शासकों की भी यह भाषा रही।

फिर ऐसा क्या अघट घटा  कि यह इतनी सुगठित भाषा लुप्तप्रायः हो गयी? 2011 में जो आख़िरी जनगणना हुई थी, उसमें इस देश में कुल जमा 24821 लोग ही संस्कृत को अपनी मातृभाषा बताने वाले निकले। मतलब कुल आबादी का मात्र 0.00198%, ये तकरीबन उतने ही थे, जितनों ने अफगानी भाषा पश्तो को अपनी मातृभाषा बताया है। इससे कहीं ज्यादा तो भूमिज नाम की भाषा बोलने वाले हैं, जिसका नाम आज इन पंक्तियों के लिखने से पहले जनगणना सांख्यिकी में झांकते हुए पहली बार पढ़ा। संस्कृत से दो गुने, मतलब 54947 भारतीय तो अरबी को मातृभाषा बताने वाले निकले और उर्दू — जिसके पीछे असभ्य और असंस्कृत, अज्ञानी और अपढ़ हाथ और पाँव दोनों कीचड में सान कर पड़े हैं, उसे बोलने वाले तो 5 करोड़ 7 लाख से अधिक यानि  कुल आबादी का 4.19% निकले हैं।

बहरहाल संख्या कम ज्यादा होने से कोई भाषा कमतर नहीं हो जाती, उसकी योग्यता अयोग्य करार नहीं की जाती। इसलिए आज यदि संस्कृत इस हालत में पहुँच गयी है, तो इससे संस्कृत की हेठी नहीं होती। हेठी जिनकी होनी चाहिये, अयोग्यता जिनकी उजागर होनी चाहिए, वे कोई और ही हैं। कौन हैँ ये लोग, कहाँ से आये, यह जानना-बूझना सिर्फ संस्कृत भर के लिए नहीं, धरती के इस हिस्से के इतिहास को समझने के लिए भी जरूरी है। इतना सब कुछ योगदान होने  के बावजूद उसका इस कदर सिमट जाना, विलुप्ति की कगार पर पहुँच जाना, वजह जानने की उत्सुकता पैदा करता है। उर्दू के बारे में लिखते हुए दर्ज किया था कि “लिपि भाषा की देह होती है। बिना देह के भाषा ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहती।“ मगर संस्कृत की देह तो नागरी है और यह अब तक तो सलामत है। फिर संस्कृत तो ऐसी भी भाषा है, जो जन्मना विदेह होने के बाद भी सदियों तक सलामत रही, फिर ऐसा क्या हुआ कि आज यह स्थिति आ गयी?

संस्कृत की इस गत की वजह इस भाषा के साथ हुआ कांड है और सिर्फ इसके साथ ही नहीं, धरती के इस हिस्से के समूचे समाज के साथ घटा एक विराट कांड है : एक ऐसा कांड, जिसने सिर्फ भाषा को ही नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि तेजी से उठते और कुदाल मारते आगे बढ़ते समाज को भी हथकड़ी-बेड़ी में जकड़ कर अज्ञान की अंधेरी कंदरा और आत्ममुग्धता के दलदल में लाकर पटक दिया।

सबसे पहले इसके हाथ-पाँव बाँधे गए ; कुछ श्रेष्ठ, कुछ अश्रेष्ठ, श्रेष्ठों में भी पुरुष श्रेष्ठ, महिला अश्रेष्ठों से भी अश्रेष्ठ का सिद्धांत गढ़कर उनको ही नहीं, भाषा को ही बाड़े में बंद कर दिया गया। संस्कृत पढ़ना-लिखना सिर्फ मुट्ठी भर लोगों का विशेषाधिकार बना दिया गया। इसे अत्यंत कड़ाई से लागू भी  किया गया। महान और उत्कृष्ट साहित्य में भी यह दिखता है। भास, भवभूति से कालिदास तक के नाटकों में महिलाओं और कथित अश्रेष्ठों और आम जन के हिस्से आये संवाद संस्कृत में नहीं है, उनसे वे प्राकृत में बुलवाये गये हैं। गुप्त काल का पूरा साहित्य, श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम साहित्य आम लोगो और महिलाओं से प्राकृत बुलवाता रहा ; सिर्फ राजा और ब्राह्मण ही संस्कृत बोलते रहे। इस तरह देव भाषा बताकर जन के लिए पूर्णतः प्रतिबंधित कर इसकी सांस, प्राणवायु ही रोक दी गयी।

मगर बाद में इन द्विजों – आर्यों के बीच से भी संस्कृत क्यों गायब हो गयी?  यह वह ठगी थी, जिसने आर्यों की अपनी भाषा को खुद “आर्यों” से ही छीन लिया। चतुराई शुद्धता के नाम पर शुरू हुई थी। ऋग्वैदिक काल में यज्ञ, हवन वगैरा में मंत्रोच्चार इत्यादि का काम उसे करने वाले लोग खुद ही कर लिया करते थे। यज्ञ के लिए न कोई पुरोहित हुआ करता था, न स्थूलकाय चुटिया और त्रिपुण्ड धारी तोंदिल प्राणी। जिसे याद हुआ, उसने पढ़ दिए मन्त्र और बस हो गया हवन। फिर कुछ चतुर सुजान आये। उन्होंने ऋग्वेद की हवन यज्ञ में काम आने वाली सारी ऋचाओं को उठाकर सामवेद में और यज्ञ के नियम विधान इकट्ठा कर यजुर्वेद में रख दिये।

और उसके बाद बाकी बचे आर्यों को समझाया कि हे वत्स, ऋचा या श्रुति पढना भर काफी नहीं है, उसका उच्चारण भी एकदम शुद्ध और प्रांजल और “पूर्ण” होना चाहिए। न हलन्त की गड़बड़ी हो, न अनुस्वार की गफलत। अक्षर के ऊपर विराजी बिंदी और चंद्रबिंदु के अलग-अलग वजन के साथ वाचन किये जायें। मात्रा का सांस भर भी दोष न हो। स्वर के आरोह-अवरोह में भी रत्ती भर फर्क न हो वरना ….वरना यज्ञ उल्टी भी पड़ सकती है।

यजमान को डराया गया कि ‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्’ में ॐ कहीं ओम हो गया और भूर्भुवः स्वः में थोड़ा भी भुरभुरापन आकर स्वः को स्व बोल दिया, तो असर उलटा पड़ सकता है : कल्याण की जगह विनाश हो सकता है!! पता चला कि किया था महामृत्युंजय और इधर हो गया खुद का ही तर्पण।

इस नए बने पुरोहित वर्ग – शास्त्रीय अर्थों में भी यह वर्ग ही था — ने जोर देकर कहा कि यज्ञ और हवन करते समय सिर्फ आहुति और तर्पण काफी नहीं। फलां वाचन के वक़्त बांये हाथ की तर्जनी यदि ऊर्ध्वाधर है, तो दांये की कनिष्ठा पश्चिमोन्मुखी हो और दोनों पांवों के अंगुष्ठ क्रमशः उत्तर और दक्खिन की ओर मुड़े हों और 6 प्रहर पूर्व तांबे के लोटे के पानी से भिगोई भूरी और सौंधी मिट्टी में नाखून तक घुसे हों। (अगर यह वाक्य पढ़ते में आपको भी समझ नहीं आया, तो उन यायावरों की समझ में भी नहीं ही आया होगा।)  यह सब सुनकर बाकी आर्यों ने जोर से चिल्लाकर कहा उड़ीबाबा और “अब का हुईए साब” के भाव मे ठोड़ी पर हाथ टिकाकर विचारवान मुद्रा में बैठ गए। इतना घबराये कि  कौन झंझट में पड़े, सो ‘भैया जो करनो है सो तुमई कर लेऊ’ कह के रही-सही संस्कृत भी पुरोहितो को सौंप दी।

सार यह है कि अशुद्ध उच्चारण के प्रतिघात और प्रकोप के भय और शुद्धता के याज्ञवलकीय मापदण्ड पर टंच न हो पाने के चक्कर में वे अपनी ही भाषा से वंचित हो गए। उनकी खुद की भाषा संस्कृत इने-गिने ‘शुद्ध रक्त उच्चारण में सिद्धहस्त’ पुरोहितों की पोथियों में कैद और उन्हीं की जिव्हा पर विराजमान हो कर रह गई। इस पुरोहितियाना छद्म के लिए खुद आर्यों ने इन भाषा-ठगों की जो खबर ली है, इनके बारे में जैसे उदगार व्यक्त किये है, उन्हें पढ़ने के लिए चार्वाक, बृहस्पति, जोतिबा, आंबेडकर या नम्बूदिरीपाद को पढने की जरूरत नहीं ; ऋग्वेद और छान्दोग्योपनिषद और बृहदारण्यक उपनिषद में ही इसकी पर्याप्त झलक मिल जाती है।

नतीजा वही निकला जो निकलना था ; बाकियों की छोडिये, कनौजियों से सरयूपारी, चितपावनों से देशस्थोँ तक ऊंचे वाले, शुद्ध रक्त बामनो के यहाँ भी शादी ब्याहों में आमने सामने बैठे पंडज्जी द्वारा द्रुतोत्तम गति से जो पढ़े और बोले जाते हैं, इनकी समझ में उनका विराम, अल्प विराम तक नहीं आता, मेजबान कोमा में चले जाते है, जो जजमान द्वारा दक्षिणा देने के आह्वान के वक़्त ही टूटता है।

जो थोड़ी-बहुत कसर बची थी, उसे इस भाषा को धर्म से जोड़कर पूरा कर दिया गया। इसका घाटा भाषा के साथ-साथ ‘धर्म’ को भी उठाना पडा। जिन्हें भारत को समझने वाले हरेक को पढ़ना चाहिए, ऐसे ‘भारत संबंधी लेखों’ में कार्ल मार्क्स अचरज व्यक्त करते हुए लिखते है कि “अजीब बात है कि जिस धर्म में भारत की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा विश्वास करता है, उस धर्म की सारी किताबें उस भाषा – संस्कृत – में हैं, जिस भाषा को पढ़ने का अधिकार सबको नहीं है।” तो सवाल सिर्फ अधिकार न होने का नहीं था, स्थिति इसे पढ़ने की हिमाकत करने वाले की गर्दन तक उतार लेने की थी।

अब शम्बूक भाई साहब कोई ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ या बाबा साब की ‘रिडल्स ऑफ़ हिंदूइज्म” या ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ तो पढ़ नही रहे थे, वे संस्कृत में उस किताब का अध्ययन कर रहे थे, जिसमें मुख, भुजा, जंघा और पांवो से पैदाईश वाला “ब्रा॒ह्म॒णो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा॑ज॒न्य॑: कृ॒तः। ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्य॑: प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत।।” श्लोक लिखा था। इसी बात पर भाई जी का सर धड़ से जुदा करवा दिया गया। यह भाषाई संकीर्णता और उसकी धर्म से संबद्धता कोई ख़त्म हो चुकी पुरानी बात नहीं है।

अभी 2019 की बात है, जब बनारस विश्वविद्यालय में संस्कृत के  विद्वान और अध्येता फिरोज़ खान को सारी योग्यता और अर्हताओं के होने के बावजूद संस्कृत भाषा के साहित्य विभाग में इसलिए प्रोफेसर नहीं बनने दिया गया, क्योंकि वे मुसलमान थे। शूद्र में वर्गीकृत की गयी जाति वालों के साथ यह कांड पहले ही किया जा चुका था।

यह ऐसा कांड था, जिसकी  कीमत भाषा को ही नहीं, धर्म को भी इस तरह भी  चुकानी पड़ी कि जन भाषाओं में आये धर्म जनप्रिय बन गये ; जनता की भाषा प्राकृत (अर्ध-मागधी) में अपना फलसफा लेकर महावीर स्वामी आये, पाली भाषा में बोलते-बतियाते गौतम बुद्ध आये और शुद्ध-अशुद्ध, श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ वालों के तम्बू ऐसे उखड़े कि 10-12 शताब्दियों तक उन्हें श्राद्ध करने वाले भी नसीब नहीं हुए। नतीजा यहाँ तक भुगतना पड़ा कि कई हजार बरस तक  वेदों और उपनिषदों तक का अनुवाद नहीं हो पाया – दुनिया इन अदभुत किताबों में क्या लिखा है, यह जान ही नहीं पाई। यह तो भला हो औरंगजेब के भाई दारा शिकोह का, जिसने 52 उपनिषदों और भगवद गीता का संस्कृत से फ़ारसी में अनुवाद किया था, योग वशिष्ठ का भी अनुवाद करवाया था। भारतीय जमीन पर जन्मी दार्शनिक परम्परा से दुनिया को परिचित कराया था।

कोई भी भाषा तभी बचती है और समृद्ध होती है, जब उसकी बोलचाल आम अवाम द्वारा बोली और वापरने वाली बोलियों से बनी रहती है। अब जब संस्कृत को ठोक-पीट कर ऐसी सिद्धशिला पर विराज दिया गया, जहां से बोलियों के साथ संवाद उसकी तौहीन और अपयश बना दी गयी। उसे अतिशुद्ध होने, देव भाषा होने के भरम में उलझा दिया गया, तो उसका इस हालत में पहुंचना उसकी नियति ही बन गयी। इस तरह लुब्बोलुबाव यह है कि  संस्कृत की यह गत उन्हीं ने बनाई है, जिन्होंने इसे जनेऊ पहनाया और इस तरह 90-95 प्रतिशत आदमियों, 100 फीसद औरतों की पहुँच से बाहर कर मारा, जो उसके नाम पर दुकान खोले, मनु के मचान पर बैठे हैँ। आज भी जब वे संस्कृत की बहाली की बात करते हैँ, तब भी उनकी मंशा इस भाषा को बचाने की नहीं, उसके साथ इन्हीं के पुरखों द्वारा नत्थी कर दी गई सामाजिक व्यवस्था, मनुसम्मत ब्राह्मणवाद  की पुनर्प्राणप्रतिष्ठा की होती है।

पंगा इस बदनीयती भरे सोच से है, संस्कृत से नहीं।

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