(आलेख : जसविंदर सिंह)

सी पी आई (एम) की 24 वीं पार्टी कांग्रेस के राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे के जारी होते ही सी पी आई (एम) पर सवाल उठना शुरू हो गए हैं। सी पी आई (एम) पर बीजेपी के प्रति नरम रुख अपनाने की सिर्फ बात ही नहीं की जा रही है, बल्कि कभी-कभी तो फासीवाद और साम्प्रदायिकता के खिलाफ उसके संघर्ष पर ही प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं, जैसे सी पी आई (एम) फासीवाद विरोधी लड़ाई को छोड़ कर फासीवाद के पक्ष में खड़ी हो गई है। इस लेख की कोशिश इन आरोपों का जवाब देना नहीं है। सिर्फ सी पी आई (एम) के राजनीतिक प्रस्ताव को लेकर गलतफहमियों के कोहरे को साफ करना है।

कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यनीतिक लाइन उसकी रणनीतिक लाइन से निकलती है। रणनीतिक दस्तावेज पार्टी का कार्यक्रम होता है। पार्टी कार्यक्रम को पार्टी ने 2000 में अपडेट किया था। इस कार्यक्रम के पैरा 5.7 में आरएसएस के चरित्र को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है : “साम्प्रदायिक और फासीवादी आरएसएस के नेतृत्व वाले गठबंधन के उदय और केंद्र में इसके सत्ता में आने से धर्मनिरपेक्ष नींव के लिए खतरा पैदा हो गया है l राज्य, प्रशासन, शिक्षा प्रणाली और मीडिया की संस्थाओं का साम्प्रदायिकरण करने के लिए व्यवस्थित प्रयास किए जा रहे हैं। बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का विकास अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता की ताकतों को मज़बूत करेगा और राष्ट्रीय एकता को खतरे में डालेगा। भाजपा और उसके साम्प्रदायिक मंच के लिए बड़े पूंजीपतियों के कुछ हिस्सों का समर्थन देश में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए गंभीर परिणामों से भरा है।”

फासीवाद औऱ साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए पार्टी कार्यक्रम के पैरा 5.8 में कहा गया है : “इसलिए हमारी पार्टी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के सुसंगत क्रियान्वयन के लिए, बिना किसी समझौते के, संघर्ष करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें थोड़ी-सी भी चूक नहीं की जानी चाहिए और उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। हर धार्मिक समुदाय के अधिकारों की रक्षा करते हुए — चाहे वह बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक — साथ ही उन लोगों के अधिकार की रक्षा करते हुए, जो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखते हैं, किसी भी धर्म में विश्वास करने और उसका पालन करने या किसी भी धर्म का पालन न करने के अधिकार की रक्षा करते हुए, पार्टी को राष्ट्र के आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक जीवन में धर्म के सभी प्रकार के हस्तक्षेप के खिलाफ लड़ना चाहिए और संस्कृति, शिक्षा और समाज में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखना चाहिए। धार्मिक साम्प्रदायिकता पर आधारित फासीवादी प्रवृत्तियों के पनपने के खतरे से सभी स्तरों पर दृढ़ता से लड़ना चाहिए।”

पार्टी कार्यक्रम की इसी समझदारी से पार्टी हर तीन साल बाद होने वाली पार्टी कांग्रेस (राष्ट्रीय महा-अधिवेशन) में राजनीतिक प्रस्ताव के जरिए कार्यनीतिक लाइन निर्धारित करती है। 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी के सिद्धांत को छोड़कर आरएसएस के नियंत्रण और निर्देशन में चलने वाली बीजेपी को मुख्य खतरा माना। इसी समझदारी के आधार पर अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार को गिराया गया। कांग्रेस के बाहर से समर्थन से संयुक्त मोर्चे की गैर-भाजपा सरकार का गठन किया गया। फिर 2004 में भी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को हराकर डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार का गठन किया गया, जिसे वामपंथी दलों ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर बाहर से समर्थन दिया।

आरएसएस और भाजपा के फासीवादी चरित्र को लेकर सी पी आई (एम) को कभी कोई गलतफहमी नहीं रही। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने पर 16वीं लोकसभा चुनावों की समीक्षा करते हुए कहा था, “पहली बार देश मे एक ऐसी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है, जिसका आजादी के आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। इस पार्टी का देश के संघीय ढांचे में कोई विश्वास नहीं है। इस पार्टी का नियंत्रण फासीवादी विचारधारा वाला आरएसएस करता है, जो देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को खत्म कर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है।”

पार्टी ने रेखांकित किया था कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के गठन से देश के संविधान, लोकतंत्र, संघीय ढांचे और धर्मनिरपेक्षता पर हमले तेज होंगे और इनकी रक्षा करना पार्टी की प्राथमिकता होगी | पार्टी की पिछली 23वीं पार्टी कांग्रेस के राजनीतिक प्रस्ताव में भी भाजपा और आरएसएस के बढ़ते खतरे को इन शब्दों में रेखांकित किया गया है, “22वीं पार्टी कांग्रेस के बाद के दौर में भाजपा की स्थिति और पुख्ता हुई है। सरकार में रहने के चलते फासिस्टी आरएसएस के हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक एजेंडे पर आक्रामक तरीके से चल रही है। … इसमें साम्प्रदायिक- कॉरपोरट गठजोड़ को मज़बूत किया जा रहा है … भारतीय संवैधानिक गणराज्य के चरित्र को बदलने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं।”

इस चुनौती का मुक़ाबला करने के लिए 23 वीं पार्टी कॉंग्रेस के राजनीतिक प्रस्ताव में कहा गया था : “हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक एजेंडे और साम्प्रदायिक ताकतों की गतिविधियों के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने के लिए पार्टी और वामपंथी ताकतों को मज़बूत करना जरूरी है। पार्टी को हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता के खिलाफ सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों की व्यापक लामबंदी के लिए काम करना चाहिए। … जब भी चुनाव होंगे, उपरोक्त राजनीतिक लाइन के आधार पर भाजपा विरोधी वोटों को अधिकतम एकजुट करने के लिए उपयुक्त चुनावी रणनीति अपनायी जाएगी।” इस प्रकार, भाजपा विरोधी मतों को अधिकतम एकजुट कर भाजपा को सत्ता से हटाने का आव्हान किया गया था। इंडिया एलायंस का प्रयास इसी समझदारी का परिणाम था, जिसके गठन में सी पी आई (एम) और वामपंथी दलों की भी भूमिका रही है।

मज़ेदार बात यह है कि जिस 24 वीं पार्टी कांग्रेस के राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे को लेकर पार्टी की आलोचना हो रही है, उसमें तानाशाही से आगे बढ़ कर नव-फासीवादी प्रवृत्तियों का उल्लेख किया गया है। मसौदे की प्रस्तावना में ही नोट किया गया है, “23वीं पार्टी कॉंग्रेस के बाद के दौर की निशानी है, हिन्दुत्व-कॉरपोरट निजाम की ताकतों, जिनका प्रतिनिधित्व मोदी सरकार करती है और उसके विरोध में खड़ी धर्मनिरपेक्ष-जनवादी ताकतों के बीच बढ़ता संघर्ष। एक प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्ववादी एजेंडा थोपने का धक्का और विपक्ष तथा जनतंत्र को कुचलने का तानाशाहीपूर्ण अभियान, नव फासीवादी विशेषताएं प्रदर्शित कर रहा है।”

सी पी आई (एम) की भूमिका को लेकर चिंता व्यक्त करने वाले शुभचिंतक आरएसएस और राजसत्ता के बीच का अंतर नहीं समझ पा रहे हैं l भाजपा और आरएसएस के फासीवादी चरित्र को लेकर सी पी आई (एम) का दृष्टिकोण वही है। दूसरी ओर भारतीय संविधान का धर्मनिरपेक्ष, संघीय और लोकतांत्रिक ढांचा आरएसएस और मोदी सरकार के फासीवादी मंसूबों पर अंकुश लगाता है। यह सही है कि यह सरकार संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने में लगी हुई है। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। लेकिन जो न्यायपालिका राममंदिर पर विवादित निर्णय सुनाती है, सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुनवाई में देरी करती है, वही न्यायापालिका इलैक्टोरल बॉन्ड के सवाल पर मोदी सरकार को बेनकाब भी करती है, धार्मिक स्थानों के सर्वेक्षण के सवाल पर नीचे की अदालतों को फटकार भी लगाती है और बिलकिस बानो के बलात्कारियों को फिर से जेल भी पहुंचाती है। अभी देश मे विपक्षी सरकारें भी हैं और सरकार और भाजपा के चरित्र पर बहस करने और सम्मेलन आयोजित कर इसके खिलाफ लड़ने का आव्हान करने का अवसर भी है। क्या फासीवाद के आ जाने पर यह सम्भव है? खुलेआम सरकार का विरोध सम्भव हो सकता है? लोकसभा चुनावों में भाजपा की ताकत का कम होना भी साबित करता है कि भाजपा को हराया जा सकता है।

सी पी आई (एम) ने इस परिस्थिति का सही आकलन कर एक ओर आरएसएस की साम्प्रदायिकता के खिलाफ व्यापक एकता बनाने का आव्हान भी किया है और दूसरी ओर इस सरकार की कॉरपोरटपरस्त नीतियों का वामपंथी-जनवादी विकल्प भी प्रस्तुत किया है।

(साभार : राष्ट्रीय सहारा। लेखक मप्र. माकपा के सचिव और केंद्रीय समिति सदस्य हैं। संपर्क : 94250-09909)

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