दूसरी हिजरी में हुई थी शुरूआत

अन्य पैंगबरों पर भी फर्ज था रोजा


 

भोपाल– मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखक

 इस्लाम के पांच फर्ज में से एक है रोजा रखना। जो पांच फर्ज हैं उनमें कलमा (अल्लाह को एक मानना), नमाज, जकात (दान), रोजा और हज (मक्का में काबा) शामिल हैं। रमजान को पाक महीना भी कहा जाता और माना जाता है ये महीना रब को इंसान से और इंसान को रब से जोड़ता है। माना जाता है कि इस्लामिक कैलेंडर के नौंवे महीने रमजान में रोजा रखने की शुरुआत दूसरी हिजरी में हुई है। इस्लामी कैलेंडर चांद की स्थितियों के आधार पर चलता है। हिजरी कैलेंडर की शुरुआत 622 ई. में हुई थी, जब हजरत मुहम्मद साहब मक्का से मदीना गए थे। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार रमजान एक महीने का नाम है, जो शाबान के महीने के बाद आता है। यह महीना आठ महीने के बाद यानि नौवें नंबर पर आता है। चांद देखकर रमजान की शुरूआत होती है और चांद देखकर ही ईद मनाई जाती है। अमूमन, सबसे पहले सऊदी अरब में रमजान या फिर ईद का चांद नजर आता है। कुरान की दूसरी आयत सूरह अल बकरा में कहा गया है कि रोजा तुम पर उसी तरह का फर्ज है जैसे तुम से पहले की उम्मत पर फर्ज था। कहा जाता है कि पैगंबर साहब के हिजरत कर मदीना पहुंचने के एक साल बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों को रोजा रखने का हुक्म मिला। तब रोजा रखे जाने की परंपरा की शुरुआत दूसरी हिजरी में हुई। रमजान का पाक महीना हर मुसलमान के लिए बेहद खास माना जाता है। रोजे को अरबी में सौम कहा जाता है, इसलिए इस मास को अरबी में माह-ए-सियाम भी कहा जाता हैं। सोम का मतलब होता है संयम, रोजदार अपने मन और शरीर को वश में कर नमाज पढ़ता है और खुदा की इबादत करता है। फारसी में उपवास को रोजा कहते हैं। रमजान चांद दिखने पर शुरू होता है और उसके अगले दिन से रोजा रखा जाता है। रमजान की महीने को भागों में बांटा गया है, जिसे अशरा कहा जाता है। रमजान के हर अशरे का अलग महत्व है। अशरा अरबी का शब्द है, जिसका मतलब 10 होता है। इस तरह रमजान के महीने के 30 दिनों को 10-10 दिनों में बांटा गया है. जिन्हें पहला अशरा, दूसरा अशरा और तीसरा अशरा कहा जाता है। शुरुआती 10 दिन पहला अशरा कहलाते हैं, 11वें दिन से 20वें दिन तक दूसरा अशरा और 21वें दिन से 29वें या 30वें दिन तक तीसरा अशरा होता है। रमजान के मुकद्दस महीने का खास महत्व है। कुरान शरीफ में बताए नियमों का पालन करते हुए जो रोजा रखते हुए खुदा की इबादत करते है उन्हें 70 गुना सवाब यानी पुण्य मिलता है। कई देशों में रमजान के महीने को कुरान का महीना भी कहा जाता है।


  रमजान महीने के पहले दस दिनों को रहमत के दिन कहा जाता है। कहा जाता है कि इन दस दिनों में मुसलमान जितने नेक काम करता है, जरूरतमंदों की मदद करता है अल्लाह उस पर रहमत करता है। दूसरे अशरे को मगफिरत यानी माफी का अशरा कहा जाता है। ये अशरा 11वें रोजे से 20वें रोजे तक चलता है। माना जाता है कि इसमें अल्लाह की इबादत करके अगर सच्चे मन से अपने गुनाहों की माफी मांगी जाए तो अल्लाह गुनाहों को माफ कर देता है। तीसरे अशरे को बेहद अहम माना जाता है। ये जहन्नम की आग से खुद को बचाने के लिए है। रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम पुरूष और औरतें एतकाफ में बैठते हैं। माना जाता है कि एतकाफ में बैठने वाले लोगों पर अल्लाह की विशेष रहमत होती है। एतकाफ के दौरान दस दिनों तक एक ही स्थान पर बैठते हैं, वहीं सोते हैं, खाते हैं और इबादत करते हैं। मुस्लिम पुरुष मस्जिद में एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं, जबकि महिलाएं घर के किसी कमरे में पर्दा लगाकर एतकाफ में बैठती हैं।
रमजान…एक ऐसा बा-बरकत महीना है जिसका इंतेजार साल के ग्यारह महीने हर मुसलमान को रहता है। रोजा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है। रोजा आंख से मतलब बुरा मत देखो, कान से गलत बात न सुनो, मुंह से अपशब्द न निकले, हाथ से अच्छा काम ही हो, पांव सिर्फ अच्छाई की राह पर चले। कुल मिलाकर बुराई से बचने और भलाई के रास्ते पर चलने का नाम रोजा है। यह महीना गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. से आपके किसी सहाबी ने पूछा यदि हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो क्या करें। तो हज़रत मुहम्मद ने जवाब दिया कि एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए। यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। गरीब और जरूरतमंद चाहे वह किसी भी मजहब के क्यों न हो, उनकी मदद करने की नसीहत दी गयी है। रमजान के महीने में तमाम मुस्लिम लोग जकात देते हैं। बता दें कि जकात का मतलब अल्लाह की राह में अपनी आमदनी से कुछ हिस्सा गरीबों में देना होता है। जकात, सदका, फितरा, खैर खरात, गरीबों और जरुरतमंद हैं उनकी मदद करना जरूरी समझा और माना जाता है। अपनी जरूरीयात को कम करना और दूसरों की जरूरीयात को पूरा करना अपने गुनाहों को कम और नेकियों को ज्यादा कर देता है। रोजा परहेजगारी पैदा करता है। रोजा का मतलब तकवा यानी खुद को बुराई से बचाना और भलाई के काम करना है। मुस्लिम मान्यताओं के मुताबिक पवित्र कुरान इसी महीने नाजिल हुआ था यानी आसमान से उतरा था। रमजान में इबादत खास महत्व माना जाता है। रमजान में गुनाहों की माफी होती है और अल्लाह रहमतों का दरवाजा अपने बंदों के लिए खोलता है। 

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