परिंदों को मंजिल मिलेगी यकीनन,
ये फैले हुए उनके पंख बोलते हैं,
वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर,
जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं।
अक्सर कम बोलने वाले डाॅ मनमोहन सिंह अब हमेशा के लिए खामोश हो गए लेकिन उनकी काबलियत और गंभीर आर्थिक संकट के दौर में देश को बखूबी उबारने का हुनर पूरी दुनिया में बोलता रहेगा। वित्त मंत्री और फिर प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने देश के लिए जो योगदान दिया उसे भुलाया नहीं जा सकता। सिंह की काबलियत लोहा पूरी दुनिया मानती थी। मनमोहन सिंह सिख समुदाय से थे और पहली बार कोई सिख भारत का प्रधानमंत्री बना था। अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गांव गाह में जन्में मनमोहन सिंह 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री रहे। उनके कार्यकाल को आरटीआई, शिक्षा का अधिकार और मनरेगा के अलावा आर्थिक नीतियों के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा। सिंह के चाहने वाले सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हैं, खासकर पाकिस्तान में। मनमोहन सिंह के पीएम बनने के बाद पाकिस्तान सरकार ने गाह गांव का कायापलट ही कर दिया था। गांव के स्कूल का नाम मनमोहन सिंह के नाम पर रखा गया। इसी प्राइमरी स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की थी। इतना ही नहीं यहां सड़कें, पीने का पानी, अस्पताल आदि की भी व्यवस्था की गई। हालांकि, मनमोहन सिंह के मन में अपनी जन्मभूमि के दर्शन की इच्छा हमेशा बनी रही। पंजाब के चकवाल जिले के गाह गांव में वे कभी जा नहीं पाए। पीएम रहते हुए भी वे पाकिस्तान नहीं जा पाए। जब वे पाकिस्तान नहीं गए तो उनके दोस्त राजा मोहम्मद अली खुद भारत आए थे। मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 में जिस गाँव में हुआ था, वो अविभाजित भारत का हिस्सा था। अब ये गाँव पाकिस्तान में है। पाकिस्तान बनने के बाद मनमोहन सिंह का परिवार भारत आ गया था। कैंब्रिज और ऑक्सफर्ड से पढ़ाई के बाद मनमोहन सिंह ने कुछ सालों तक संयुक्त राष्ट्र में काम किया और फिर वर्ष 1969 में भारत लौट आए थे।
अक्सर नीली पगड़ी पहनने वाले मनमोहन सिंह ने 92 वर्ष की उम्र में 26 दिसंबर 2024 को दिल्ली में आखिरी सांस ली। केंद्र सरकार ने 27 दिसंबर को होने वाले सारे सरकारी कार्यक्रम रद्द कर दिए। साथ ही सरकार ने मनमोहन सिंह के निधन पर 7 दिनों के राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया है।
  15 साल का सिख शरणार्थी लड़का, जिसके परिवार को 1947 में भारत के विभाजन के बाद अपना घर-बार छोड़ना पड़ा. बाद में यही लड़का ऑक्सफर्ड और कैंब्रिज में पढ़ने जाता है और फिर अव्वल दर्जे का अर्थशास्त्री, आरबीआई का गर्वनर, देश का वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री बनता है। सन 1990 के दशक का आर्थिक सुधार भारत में सरकारें बदलने के बावजूद जारी रहा। डाॅ मनमोहन सिंह को न सिर्फ प्रधानमंत्री बल्कि वित्त मंत्री रहते हुए उनकी उपलब्धियों को साहसिक फैसलों के लिए याद किया जाता रहेगा। 90 के दशक में जब विकसित देश तक आर्थिक मंदी से गुजर रहे थे तब वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी थी। 1991 में वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने लाइसेंस राज को खत्म किया, अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के खोल दिया, आर्थिक उदारीकरण को बढ़ावा दिया। उन्होंने देश को तब गंभीर आर्थिक संकट से उबारा था जब विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो गया था, मंहगाई नियंत्रण से बाहर हो गई थी। यहां तक कि देश के दिवालिया होने का संकट आ गया था। नरसिम्हा राव की अगुआई वाली केन्द्र सरकार के कार्यकाल में तब अमेरिकी डाॅलर अठारह प्रतिशत तक नीचे आ गया था। खाड़ी में चल रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमत आसमान छू रही थीं। तब राजकोषीय घाटा करीब आठ फीसदी और चालू खाता घाटा ढाई प्रतिशत तक पहुंच गया था। ऐसी हालत में मनमोहन सिंह ने अपनी सूझ बूझ से देश को आर्थिक संकट से बाहर निकाला था। उन्होंने तब बतौर वित्त मंत्री कार्पोरेट टैक्स की दरों को बढ़ाया, आयात शुल्क घटाया, सीमा शुल्क घटाया, आयात के लिए लाइसेंस प्रक्रिया को आसान बनाया, विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई गई।  
  सन 1991 से वर्ष 1996 तक वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निजी निवेश के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था का दरवाजा खोला था। ऑक्सफोर्ड के ट्रेंड अर्थशास्त्री डाॅ सिंह अपनी सौम्यता, विनम्रता और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। सन 2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को जीत मिली तो प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह को चुना। मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल किसानों को कर्ज माफी, मनरेगा और आरटीआई के लिए जाना जाता है। इसी कार्यकाल में सिंह ने अमेरिका से संबंधों को नया आयाम दिया। इससे पहले अमेरिका ने भारत पर परमाणु परीक्षण के कारण कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे थे। अमेरिका से परमाणु करार के लिए मनमोहन सिंह ने 2008 में अपनी सरकार को दांव पर लगा दिया था। इस करार को अंजाम देकर मनमोहन सिंह शीत युद्ध के दौर से दोनों देशों के बीच चले आ रहे अविश्वास को खत्म किया था। वर्ष 2009 में मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल को बड़े सुधार के अवसर के रूप में देखा गया था।

गाह से लेकर आक्सफोर्ड तक
डॉ मनमोहन सिंह ने सन 1948 में पंजाब विश्वविद्यालय से मेट्रिक की शिक्षा पूरी की। उसके बाद उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। 1957 में उन्होंने अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी से ऑनर्स की डिग्री अर्जित की। इसके बाद 1962 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के नूफिल्ड कॉलेज से अर्थशास्त्र में डी.फिल किया। डॉ. मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती गुरशरण कौर की तीन बेटियां हैं।
आर्थिक सलाहकार से पीएम तक  
मनमोहन सिंह ने आर्थिक सलाहकार से लेकर प्रधानमंत्री तक सफर तय किया। साल 1971 में वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में शामिल हुए। 1972 में उनकी नियुक्ति वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में हुई। सिंह ने वित्त मंत्रालय के सचिव, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर, प्रधानमंत्री के सलाहकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के तौर पर काम भी किया। मनमोहन सिंह सन 1991 से 1996 तक भारत के वित्त मंत्री रहे।  
डॉ मनमोहन सिंह को मिले सम्मान
डॉ मनमोहन सिंह को मिले कई पुरस्कारों और सम्मानों सम्मानित किया जा चुका है। इनमें से अहम है भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण(1987)। इसके अलावा भारतीय विज्ञान कांग्रेस का जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी पुरस्कार (1995)। वर्ष के वित्त मंत्री के लिए एशिया मनी अवार्ड (1993 और 1994)। वर्ष के वित्त मंत्री के लिए यूरो मनी अवार्ड (1993), कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (1956) का एडम स्मिथ पुरस्कार। कैम्ब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज में विशिष्ट प्रदर्शन के लिए राइट पुरस्कार (1955)। इतना ही नहीं डॉ. सिंह को जापानी निहोन किजई शिम्बुन एवं अन्य संघो द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. सिंह को 2006 में डाॅक्टरेट आॅफ लाॅ से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें कैंब्रिज एवं ऑक्सफोर्ड तथा अन्य कई विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधियां प्रदान की गई हैं।  
तीसरा सबसे बड़ा कर्जदार देश बन गया था भारत
सन 1990-1991 में भारत आर्थिक संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो गया था। भारत को तब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ में सोना गिरवी रखना पड़ा था। तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो चुका था। एक अरब डॉलर से भी कम बचा था। ये डॉलर महज 20 दिनों के तेल और फूड बिल के भुगतान में खत्म हो जाते। भारत के पास इतनी विदेशी मुद्रा भी नहीं थी कि बाकी दुनिया से कारोबार कर सके। भारत का विदेशी कर्ज 72 अरब डॉलर पहुँच चुका था।
ब्राजील और मेक्सिको के बाद भारत तब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कर्जदार देश था। महंगाई, राजस्व घाटा और चालू खाता घाटा भी बढ़ गया था। सन 1990 में गल्फ वॉर शुरू हुआ था और इसका असर भारत पर भी पड़ा। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गईं। 1990-91 में पेट्रोलियम आयात बिल दो अरब डॉलर से बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया। इसका असर व्यापार और घरेलू कारोबार पर तो पड़ा ही साथ ही खाड़ी के देशों में काम करने वाले भारतीयों की कमाई भी प्रभावित हुई और इससे विदेशों से आने वाला रेमिटेंस प्रभावित हुआ। एनआरआई अपना पैसा निकालने लगे थे और निर्यातकों को लगने लगा था कि भारत उनका उधार नहीं चुका पाएगा। महंगाई काफी बढ़ गई थी। आर्थिक सुधारने के लिए तेल की कीमतें बढ़ाई गईं, आयात रोका गया। सरकारी खर्चों में कटौती की गई और रुपए में 20 फीसदी तक का अवमूल्यन किया गया। बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की। आईएमएफ ने भारत को 1.27 अरब डॉलर का कर्ज दिया लेकिन इसके बावजूद भी हालात नहीं सुधरे। वित्तीय वर्ष 1991 के अंत तक चंद्रशेखर की सरकार 20 टन सोना गिरवी रखने पर मजबूर हो गई थी। जब पीवी नरसिम्हा राव 21 जून 1991 में प्रधानमंत्री बने तो ऐसा लग रहा था कि भारत विदेशी कर्ज तय तारीख पर नहीं चुका पाएगा और डिफॉल्टर घोषित हो जाएगा। लेकिन पीवी नरसिम्हा राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के जरिए कई सुधारों को अंजाम दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था को काबू कर लिया। मनमोहन सिंह ने लाइसेंस राज को खत्म करना शुरू किया। डाॅ सिंह की नीतियों की बदौलत भारत की अर्थव्यवस्था जो दो और तीन फीसदी की वृद्धि दर से बढ़ रही थी, वो करीब 9 प्रतिशत की दर से बढ़ने लगी।

राजनीतिक अस्थिरता से गुजरा देश
गंभीर आर्थिक संकट से पहले भारत राजनीतिक अस्थिरता के दौर भी गुजरा। सन 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने गठबंधन सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। इस इंकार के बाद कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी जनता दल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई। लेकिन इसके बाद देश भर में दंगे हुए और दिसंबर 1990 में वीपी सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। मई 1991 में आम चुनाव होने तक कार्यवाहक सरकार रही। इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। इसके बाद सन 1991 के आम चुनाव दो चरणों में हुए थे। प्रथम चरण के चुनाव राजीव गांधी की हत्या से पूर्व हुए थे और द्वितीय चरण के चुनाव उनकी हत्या के बाद में। प्रथम चरण की तुलना में द्वितीय चरण के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा। इस चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ लेकिन वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। कांग्रेस ने 232 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। फिर नरसिम्हा राव को कांग्रेस संसदीय दल का नेतृत्व प्रदान किया गया। ऐसे में उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया। सरकार अल्पमत में थी, लेकिन कांग्रेस ने बहुमत साबित करने के लायक सांसद जुटा लिए और कांग्रेस सरकार ने पाँच वर्ष का अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूर्ण किया। पीवी नरसिंह राव ने देश की कमान काफी मुश्किल समय में संभाली थी। तब उन्होंने रिजर्व बैंक के अनुभवी गवर्नर डॉ. मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाकर देश को आर्थिक संकट से बाहर निकाला।
  अर्थव्यवस्था को बारीकी से समझने वाले डाॅ सिंह ने नोट बंदी की मुखालफत की थी। नवंबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की और इसके तहत प्रचलन में रही भारत की 86 प्रतिशत मुद्रा अवैध हो गई। मनमोहन सिंह ने तब इसे विनाशकारी कदम बताते हुए कहा था कि इससे संगठित लूट को बढ़ावा मिलेगा। मनमोहन सिंह की यह भविष्यवाणी सही साबित हुई थी। बहरहाल, डाॅ मनमोहन सिंह के निधन से भारतीय राजनीति, भारतीय आर्थिक क्षितिज पर जो शून्य उभरा है उसे नहीं भरा जा सकेगा। उनका निधन ऐसे वक्त में हुआ है जब देश का आर्थिक कारोबार केन्द्रीत हो गया है, देश की टैक्स प्रणाली पेचिंदा है, मंदिर-मस्जिद को लेकर बखेड़ा हो रहा है। भारत दुनिया की पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है और आने वाले कुछ सालों में तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। हालांकि, 140 करोड़ की आबादी में एक बड़ा तबका अभी भी गरीबी के दौर से गुजर रहा है। अब भी भारत में प्रति व्यक्ति आय ढाई हजार डॉलर प्रति वर्ष है। ऐसे दौर में बतौर वित्त मंत्री और फिर बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कमी हमेशा खलेगी।

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