प्राब्लम यह नहीं है कि महुआ मोइत्रा की संसद की सदस्यता चली गयी है। प्राब्लम यह है कि महुआ मोइत्रा और वास्तव में सारे विपक्ष वाले पूरे मामले को ही गलत समझ रहे हैं। मोइत्रा चीख-चीखकर कह रही हैं कि उनकी सांसदी की अडानी के सामने बलि दी गयी है। जैसा कि कई दक्षिण भारतीय फिल्मों में होता है, ताकतवर खलनायक अपने विरोधियों को पकड़ बुलवाता है और अपने देवता की मूर्ति के सामने उनकी बलि चढ़वा देता है ; उसी तरह अडानी के सामने उनकी सांसदी की बलि चढ़ायी गयी है। न वह अडानी के घोटालों का शोर मचातीं और न अपनी सांसदी गंवातीं। और यह भी कि वह ऐसी कुर्बानी से पीछे हटने वाली नहीं हैं। ऐसे बड़े घोटालेबाजों के खिलाफ लडऩे के लिए, अपनी सांसदी का एक तो क्या, कई-कई जन्म कुर्बान करने के लिए तैयार हैं। वह फिर-फिर संसद में आएंगी और तब तक अडानी के घोटालों के खिलाफ अपनी आवाज उठाती रहेंगी जब तक घोटालों का यह साम्राज्य गिर नहीं जाता है, वगैरह वगैरह।

पर हमें लगता है कि यह उनकी गलतफहमी है। नहीं, ऐसा नहीं है कि उनके, राष्ट्रभक्त अडानी जी के घोटालों का शोर मचाने से, उनकी सांसदी के प्राण छिनने का कोई संबंध ही नहीं है। बेशक है! वर्ना उन्हीं की सांसदी क्यों? इस बार सिर्फ उन्हीं की सांसदी क्यों? अडानी जी के घोटालों का शोर मचाने वालों के सांसदी गंवाने का इतिहास कम-से-कम उनके मामले से पुराना जरूर है। राहुल गांधी ने भी इस पर बहुत शोर मचाया था और उनकी सांसदी पर प्राण-हरण का ऐसा ही संकट आया था। पर सुप्रीम कोर्ट बीच में आ गया और उसने राहुल गांधी की सांसदी का प्राण लौटा दिया। लेकिन इससे कोई यह नहीं समझे कि अडानी के सामने जिस-जिस की सांसदी की बलि चढ़ायी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरेक की सांसदी पुनर्जीवित कर दी जाएगी। खैर! बात अगर सिर्फ अडानी की मूर्ति के सामने कुर्बानी की होती, तो राहुल की सांसदी की कुर्बानी हो तो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सांसदी को पुनर्जीवित कर दिया तो क्या, कुर्बानी का शगुन तो हो गया। तब यह दूसरी कुर्बानी क्यों?

महुआ मोइत्रा और राहुल गांधी की सांसदी की कुर्बानी में अडानी तत्व कॉमन है, तो एक और बड़ा तत्व है, जो भिन्न है। नहीं हम राहुल गांधी और महुआ मोइत्रा की पार्टियां अलग होने या एक के पुरुष और एक के महिला होने की बात नहीं कर रहे हैं। हम उस संसद के ही भिन्न होने की बात कर रहे हैं, जिसमें राहुल गांधी की सदस्यता की कुर्बानी ली गयी थी। वह पुरानी संसद थी। गोल वाली संसद। अंगरेजी राज में बनी इमारत में चलने वाली संसद। अंबेडकर से संविधान लिखवाने वाली और नेहरू को पहला प्रधानमंत्री बनाने वाली संसद। लोक-लाज की मारी संसद। चुने हुए सांसदों की सांसदी की बलि लेने में हिचकिचाने वाली संसद। राहुल गांधी की सांसदी की बलि चढ़ाने के लिए भी अदालत के फैसले के बहाने की जरूरत पड़ी थी। तभी तो ऐसी कच्ची कुर्बानी हुई कि सबसे ऊंची अदालत के फैसले ने कुर्बानी को ही पलट दिया।

पर महुआ मोइत्रा की सांसदी की कुर्बानी इससे बहुत डिफरेंट है। इस बार कुर्बानी का काम बहुत ही पक्का है। कुर्बानी के लिए किसी अदालत के फैसले के बहाने की जरूरत नहीं पड़ी है। सीधे संसद ने अपने वोट से कुर्बानी का फैसला सुनाया है, जिसे कोई अदालत पलटेगी, इसमें शक है। हां! पब्लिक ही 2024 में इस संसद के गणित को ही पलट दे, तो बात दूसरी है। खैर! हमें तो लगता है कि ये उतनी अडानी जी के आगे कुर्बानी नहीं है, जितनी नयी संसद के द्वार पर कुर्बानी है। नयी संसद है। उसके नये चलन हैं। अमृतकाल चल पड़ा है। ऐसे में नया बनाने वालों के लिए शुरूआत को शुभ करने के लिए एक कुर्बानी तो बनती है। कुर्बानी स्त्री की हो तो और भी शुभ है। शुभारंभ के लिए कुर्बानी देना हमारी प्राचीन परंपरा है। सत्तर साल हमारी इन प्राचीन परंपराओं की उपेक्षा हुई, पर अब और नहीं। मोदी है, तो ही कुर्बानी की प्रथा की संसद तक पहुंंच मुमकिन है।

हमें पता है कि जरूर यह दलील देने वाले भी निकल आएंगे कि नयी संसद का उद्घाटन तो मोदी जी ने पहले ही कर दिया था, जब संविधान की प्रति लेकर पुरानी संसद से नयी संसद तक जूलूस लेकर आए थे। रही बात नयी संसद के उद्घाटन को शुभ बनाने के लिए कुर्बानी की तो उसके लिए जनतंत्र के सभी नियम-कायदों की बलि भी दी ही जा चुकी थी। जब मोदी जी ने संसद का विशेेष सत्र बुलाया था, पर सांसदों से ही यह छुपाया था कि विशेष सत्र में क्या होगा? और उस समय अगर कोई कोर-कसर रह गयी हो, तो वह भी उस विशेष सत्र में ही रमेश बिधूड़ी ने संसद के लिए एकदम से नयी सांप्रदायिक गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग कर सारी संसदीय मर्यादाओं की बलि देकर पूरी कर दी थी। और स्पीकर ने सिर्फ भविष्य में गलती नहीं करने की चेतावनी देकर इस बलि यज्ञ में पूर्णाहुति भी डाल दी थी। जब नयी संसद का भली-भांति पदार्पण हो ही चुका था, उसके बाद महुआ मोइत्रा की सांसदी की कुर्बानी की क्या जरूरत थी?

जरूरत थी? बिल्कुल जरूरत थी। मर्यादाओं की बलि काफी नहीं थी, बल्कि सर्वोच्च बलिदान की जरूरत थी। और भले अमृतकाल की अमृत संसद हो, उसकी चौखट पर सबसे बड़ी कुर्बानी तो सांसदी की ही कुर्बानी मानी जाएगी। कुर्बानी हो या कुछ और, मोदी जी हैं, तो सर्वोच्च से कम पर कौन रुकता है। फिर संसदीय मर्यादाओं की कुर्बानी तो पिछले विशेष सत्र के लिए थी। अब सत्र नया है, तो नयी कुर्बानी भी तो चाहिए। अगले सत्रों में अगली कुर्बानियों के लिए विपक्ष तैयार रहे। अमृत संसद की कुर्बानी के खून की प्यास बहुत ज्यादा है।

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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