मद्रास। जब हो मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी यह कहावत आपने तो बहुत सुनी होगी पर मद्रास सुप्रीम कोर्ट ने इसे सच कर दिया है।हाई कोर्ट ने याचिका कर्ताओं को मान्यता क्यों नहीं दी..?मद्रास हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के विवाह को यह कहते हुए मान्यता नहीं दी थी कि वकीलों के समक्ष किया विवाह तब तक वैध नहीं माना जाएगा जब तक तमिलनाडु विवाह पंजीयन कानून 2009 के तहत उसे पंजीकृत न किया जाए। विवाह पंजीयक के दौरान वर वधु की निजी तौर पर यानी प्रत्यक्ष उपस्थिति हाईकोर्ट में आवश्यक बताया था।सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा…वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में यह साफ कर दिया, कि वर वधु एक दूसरे को पति पत्नी स्वीकार करने की घोषणा किसी भी भाषा में किसी भी प्रथा, रस्म या अभिव्यक्ति के जरिए करते हैं तो वह सामाजिक और कानूनी तौर पर मान्य मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में मद्रास हाईकोर्ट का 5 मई को दिए गए वह फैसल भी पलट दिया ।जिसमें वकीलों के चेंबर में हुए विवाह को अवैध बताया गया था , क्योंकि वहां पुरोहित नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट जस्टिस ने दिया बड़ा फैसला…सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एस रवींद्र भट्ट और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने अपने फैसले में तमिलनाडु में 1967 से प्रचलित स्वाभिमान विवाह कानून पर भी अपनी मान्यता की मुहर लगा दी। पीठ ने कहा कि यह कानून उन जोड़ों की मदद कर सकता है जो सामाजिक विरोध या खतरे की वजह से अपने विवाह को गोपनीय रखना चाहते हैं। शादी या विवाह के लिए समारोह करना तय विधि पूरी करना या फिर विवाह की सार्वजनिक घोषणा करना कोई आवश्यकता नहीं है। विवाह की घोषणा के लिए महत्वपूर्ण…विवाह में एक दूसरे को माला,अंगूठी पहनाकर, ताली बांधकर या फिर तय विधि पूरी कर विवाह की घोषणा या किसी की साक्षी में एक दूसरे को पति पत्नी स्वीकार किए जाने की हामी भरी जा सकती है। इसमें किसी भी प्रकार का किसी का भी कोई हस्तक्षेप नहीं है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन मुज़फ्फरनगर : धर्म या मजहब नहीं देखती नफरत, सब कुछ निगलना ही है उसकी फ़ितरत नरेंद्र सिंह बघेल ने उपनिरीक्षक आरएस बागरी का थाना चोरहटा से थाना पनवार में किये गये स्थानान्तरण पर रोक लगाये जाने हेतु अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को लिखा पत्र।