— मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल (मध्यप्रदेश)

मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बालाघाट जिले की तहसील बैहर, बिरसा और परसवाड़ा में बीमारी से 30 से ज्यादा बैगा आदिवासी बच्चों की मौत और बच्चे और बड़े मिलाकर 1500 से अधिक लोगों के बीमार होने के हादसे ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीन दशक से भी ज्यादा वक्त तक नक्सलप्रभावित रहे इस जिले में अब असल चुनौती सुदूर गांवों में साफ पीने का पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं, पोषण आहार उपलब्ध कराना है। कुपोषण, खसरा, मलेरिया और दूषित पेयजल सहित अन्य योजनाओं का लाभ गांव वालों तक ना पहुंचने के लिए भले ही मुख्यमंत्री मोहन यादव और संबंधित विभागीय अफसर ये कहकर पल्ला झाड़ लें कि नक्सलियों के कारण यहां योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पाया, तो फिर सवाल ये है कि अब तक योजनाओं के नाम पर जारी हुई करोड़ों-अरबों की राशि कहां गई, बैगा समुदाय विकास के लिए सरकार अलग से फंड जारी करती है वह कहां गया, नल-जल योजना कागज़ों में कैसे बन गई ? बालाघाट जिले में 2565 आंगनवाड़ी केन्द्र हैं इनमें से बिरसा में 357, परसवाड़ा में 258 और बैहर में 284 हैं। कुपोषण से मौतें हुईं तो इन क्षेत्रों में चल रही सरकारी राशन दुकानों का अनाज कौन खा रहा था, आंगनवाड़ियों के जरिए बच्चों को दिया जाने वाला पोषण आहार कहां गया। अगस्त 2026 की स्थिति में विभागीय आंकड़े ही बताते हैं कि जिले में 27 हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषित और 3741 बच्चे अतिकुपोषित श्रेणी में हैं। इनमें से बिरसा में 551, बैहर में 460 अतिकुपोषित, परसवाड़ा में 302, लांजी में 356 बच्चे अतिकुपोषित श्रेणी में हैं। आदिवासी गांवों में बच्चों का वैक्सीनेशन ही नहीं हुआ। इधर, बच्चों की मौतों के बाद विभागीय मंत्रियों से लेकर संभाग आयुक्त तक ने बैगा बाहुल्य गांवों में जाकर जमीनी हकीकत देखी। संभाग आयुक्त की रात्रि चैपाल और जन चैपाल में तो जितनी योजनाओं की समीक्षा हुई उतनी योजनाओं का लाभ आदिवासियों तक पहुंचना तो दूर उन योजनाओं के नाम तक उन्होंने नहीं सुने होंगे। मच्छरदानी से लेकर जमीनों के पटटे वितरण तक की समीक्षा अफसरों ने कर डाली। इस सबसे ये तो ज़ाहिर हो ही गया कि इतने सालों तक इन बैगा आदिवासी बाहुल्य गांवों तक विभागीय अमला नहीं पहुंचा और योजनाएं सिर्फ कागजों पर चलतीं रहीं।  बालाघाट जिला मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है। इसी सीमाएं छत्तीगढ़ और महाराष्ट्र से लगतीं हैं। बालाघाट जिले को कान्हा नेशनल पार्क की वजह से भी जाना जाता है। कान्हा नेशनल पार्क बालाघाट के साथ ही मंडला जिले तक फैला हुआ है। बालाघाट जिला जो कभी नक्सलियों का गढ़ रहा है वहां अब कुपोषण और दूषित पेयजल की वजह से बीमारियों का कहर जारी है। बैगा और आदिवासी बाहुल्य गांवों की हालत ये है कि आजादी के इतने सालों बाद और करोड़ों रूपयों की योजनाओं के बाद भी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। यहां पर मलेरिया, मीजल्स, कुपोषण सहित अन्य बीमारियों की वजह से 30 से ज्यादा बच्चों की मौत की खबर सामने आई है। कुछ रिपोर्ट के अनुसार मृत बच्चों की संख्या 33 तो कुछ में 35 बताई जा रही है। 400 से ज्यादा बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया गया। हालात ये थे कि बालाघाट जिला मुख्यालय में छिंदवाड़ा जिले में बेड और जबलपुर में मेडिकल स्टाॅफ और बच्चों के डाॅक्टर, मंडला और सिवनी से स्टाॅफ नर्स बुलवाना पड़ा। बच्चों की मौतों और बीमारों के आंकड़ों को देख कमिश्नर, कलेक्टर सहित अन्य विभागीय आला अफसर यहां तक कि विभागीय मंत्री भी प्रभावित गांवों में पहुंचे। खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बैगा बाहुल्य गांव में पहुंचकर पीड़ितों से मुलाकात की। उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ल, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री संपतिया उइके, जनजातीय कार्य, लोक परिसंपत्ति प्रबंधन, भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह ने भी इन क्षेत्रों में जाकर निरीक्षण किया। मध्यप्रदेश शासन के परिवहन एवं स्कूल शिक्षा मंत्री तथा बालाघाट जिले के प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह मीडिया के सामने 28 बच्चों की मौत को स्वीकार कर चुके हैं। बता दें कि प्रभारी मंत्री ने 7 सितंबर को परसवाड़ा विकासखंड के ग्राम पंचायत कावेली के जनजातीय बहुल ग्राम बोदल-बेहरा पहुंचे। 
इतना ही नहीं बैगा बच्चों की मौतों को लेकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर सरकारी मुलाजिमों की शिकायत की। कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी की भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर की गई टिप्पणी वायरल हुई जिसमें उन्होंने आदिवासी बच्चों की मौतों पर चिंता और पीड़ा जताई। उन्होंने कहा कि घातक बीमारी के साथ पीने का पानी, पोषण और समय पर इलाज जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव बच्चों की जान ले रहा है। राहुल ने इन मौतों के लिए सरकार की विफलता को जिम्मेदार ठहराया। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का तीन सदस्यीय जांच दल भी सिलसिलेवार बच्चों की मौतों की वजह खंगाल रहा है। इसके अलावा जबलपुर हाईकोर्ट में भी नरसिंहपुर निवासी अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने जनहित याचिका दायर की है जिसकी सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ भी चल रही है। न्यायालय में सर्वे रिपोर्ट, वीडिया साक्ष्य पेश करते हुए बैगा बाहुल्य क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, राशन सहित बुनियादी सुविधाओं के अभाव का दावा किया गया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार से जवाब पेश करने को कहा है। दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता कृष्णा राजपूत ने भी मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराते हुए बच्चों की मौतों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके भी हाल ही में बालाघाट पहुंचे। उन्होंने कहा कि आजादी के इतने सालों बाद भी बच्चों की दूषित पानी, मलेरिया आदि से मौतें हो रही हैं। दीपके ने बच्चों की मौतों के लिए विभागीय अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया। अभिजीत दीपके ने बैगा बाहुल्य और प्रभावित गांवों में पहुंचकर पीड़ितों से मुलाकात की और वस्तुस्थिति का जायजा लिया। 13 सितंबर को कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय मुख्य संगठक बी.वी. श्रीनिवास भी बालाघाट पहुंचे। यहां से वे प्रभावित ग्राम बोंदारी गए। उनकी अगुवाई में आदिवासी परिवारों को मच्छरदानी, राशन सहित राहत सामग्री बांटी गई, मेडिकल कैम्प भी लगाया गया। मीडिया से बात करते हुए बीवी श्रीनिवास ने बच्चों की मौत के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए स्वास्थ्य मंत्री की इस्तीफे की मांग की। श्रीनिवास ने कहा कि कांग्रेस न्याय मिलने तक लड़ाई लड़ते रहेगी। वहीं, बालाघाट के पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ने तो 50 से बच्चों की मौत होने का दावा किया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की अगुआई में भी आदिवासी बच्चों की मौत की जवाबदेही तय करने और किसानों की समस्याओं को लेकर कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया है। जीतू पटवारी का कहना है कि आदिवासियों और किसानों की आवाज़ सड़क से लेकर सदन तक गूंजेगीं। 15 सितंबर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी बालाघाट पहुंचे। पटवारी की अगुआई में कांग्रेसियों ने न्याय यात्रा निकालकर प्रदर्शन किया। जनसभा को संबोधित करते हुए पटवारी ने भाजपा सरकार को हत्यारी सरकार कहा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार मृत बच्चों के वास्तविक आंकड़े छिपा रही है और दोषियों को बचा रही है। पटवारी ने कहा कि बालाघाट ही नहीं झाबुआ, शिवपुरी, अलीराजपुर, मंडला, डिंडौरी जिलों में भी कुपोषण हावी है। पटवारी के साथ आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया भी बालाघाट पहुंचे थे।    — सीएम ने की राहत राशि की घोषणा
रक्षा बंधन के दूसरे दिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड के सुदूर ग्राम कोरका-बोंदारी पहुंचे। उन्होंने बैगा बाहुल्य कोरका-बोंदारी गांव में पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का जायजा लिया और मृतकों के परिवार को 2-2 लाख राहत राशि देने की घोषणा की। मुख्य मंत्री मोहन यादव बालाघाट दौरे पर आए और बैगा बाहुल्य गांवों के विकास के लिए 225 करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान भी किया। अडोरी, घुम्मुर और मछूरदा पंचायत के अंतर्गत कई गांव दूषित पानी और अन्य बीमारी से प्रभावित हैं। मलेरिया, मीजल्स संक्रमण और पोषण की समस्या से 30 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। मालूम हो कि बालाघाट के नक्सलमुक्त होने के बाद मुख्यमंत्री पहली बार यहां पहुंचे थे। सीएम यादव ने पर्यटन, पशुपालन, खेती, बकरी पालन को प्रोत्साहित करने और महिलाओं और युवाओं को रोजगार से जोड़ने की बात कही। इस दौरान प्रदेश के प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री संपतिया उइके सहित अन्य जनप्रतिनिधि मौजूद थे। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री के दौरे से पहले उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला भी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर स्वास्थ्य व्यवस्था का निरीक्षण कर चुके हैं।

………………… इन बच्चों की हुई मौत
  ग्राम पंचायत मछुरदा के कोरका निवासी सुंदरी पिता लखन मेरावी उम्र 5 साल, गठिया निवासी मंगली सहर सिंह मरकाम उम्र 6 साल, मातला निवासी रोही पिता महासिंह परते उम्र 5 साल, राम पिता महासिंह परते उम्र 3 साल, सदेसिंह पिता संताजसिंह उम्र 7 साल, मछुरदा निवासी सूरज पिता सगनू मरकाम उम्र डेढ़ वर्ष, रोवन पिता टेकसिंह धुर्वे उम्र 1 साल, ग्राम पंचायत घुम्मुर के चिखली निवासी रेयांश पिता कुंवर सिंह उम्र उम्र 5 वर्ष, ग्राम पंचायत अडोरी के ग्राम बोंदारी निवासी लमनी पिता सम्हारू धुर्वे उम्र 14 साल, साहिल पिता सम्हारू धुर्वे उम्र 1 साल, ग्राम कुंडेकसा निवासी प्रीति पिता मेहरू उम्र 3 साल, ग्राम बोंदारी निवासी सचिन पिता चैन सिंह मरकाम उम्र 6 साल, ग्राम कुंडेकसा निवासी अरविंद पिता चैतू धुर्वे उम्र 4 साल, ग्राम बोंदारी निवासी प्रियंका पिता सुखचंद उम्र 3 साल, ग्राम बोंदारी निवासी रूपल पिता बिसरू धुर्वे उम्र 16 वर्ष, ग्राम बोंदारी निवासी पूजा पिता चम्हरू धुर्वे उम्र डेढ़ वर्ष, बोंदारी निवासी रूपल पिता दशरथ धुर्वे उम्र 16 वर्ष, ग्राम कोरका निवासी आकाश पिता बिसन धुर्वे उम्र 2 साल, ग्राम पंचायत लालपुर के ग्राम धामनगांव निवासी गौरी पिता मंगलू खुशरे उम्र डेढ़ वर्ष, ग्राम पंचायत माना के गांव माना निवासी राजवीर पिता अशोक कुशरे उम्र 11 वर्ष, ग्राम पंचायत घुम्मूर के गांव
खिनरीटिग निवासी सुरमिला पिता भगालसिंह उम्र 4 साल, ग्राम कोडबीरकोना निवासी राजू पिता पहाड़ सिंह तिलगाम उम्र डेढ़ वर्ष, ग्राम मुरकुटटा निवासी राम प्यारी पिता मोलोचंद धुर्वे उम्र 2 वर्ष, ग्राम पंचायत लालपुर के ग्राम तेन्दुडेही निवासी रोवनु पिता बरन सिंह मरकाम उम्र 9 वर्ष, ग्राम पंचायत बोंदारी के ग्राम बोंदारी निवासी साहिल पिता समारू धुर्वे उम्र 1 वर्ष, माही पिता राकेश मरकाम निवासी धामनगांव, लवकुश पिता सुकलू मरकाम निवासी बैगाटोला पंचायत मोहनपुर, काजल पिता प्रभुलाल सैययाम निवासी मोहनपुर, चंद्रेश, रंजीत मरावी, हिमांशु मरावी, अंकेशा धुर्वे आदि शामिल हैं। बता दें कि प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह ने बालाघाट प्रवास के दौरान 28 बच्चों की मौत होना स्वीकारा था। इसके बाद जिला प्रशासन ने भी कुपोषण, मलेरिया सहित विभिन्न बीमारियों से 32 बच्चों की मौत होने की बात कही थी। साथ ही सभी मृतकों के परिजनों को शासन की ओर से 4-4 लाख रूपये की सहायता स्वीकृत की गई। 
   जिस दिन मुख्यमंत्री मोहन यादव प्रभावित बैगा बाहुल्य गांव पहुंचे थे उसी दिन दो बच्चों की मौत हुई थी। परसवाड़ा ब्लॉक के मोहनपुर की 5 वर्षीय काजल और बैहर ब्लॉक के गोगाटोला भंडेरी के 2 वर्षीय हिमांशु ने दम तोड़ दिया। मोहनपुर पंचायत की 5 वर्षीय काजल को तेज बुखार के बाद 22 अगस्त को स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराया गया, जहां मलेरिया की पुष्टि हुई। 26 अगस्त को हालत बिगड़ने पर परिजन उसे बालाघाट के निजी अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे गोंदिया रेफर किया गया। इलाज के दौरान काजल ने दम तोड़ दिया। बताया जा रहा है कि वह सेलेब्रल मलेरिया से पीड़ित थी। वहीं बैहर ब्लॉक के ग्राम गोगाटोला भंडेरी में भी 2 वर्षीय हिमांशु की मलेरिया से मौत हो गई। बताया गया कि हिमांशु मलेरिया से पीड़ित था और परिजन उसका इलाज घर पर ही झोलाछाप डॉक्टर से करा रहे थे। इनसे पहले धामनगांव की 4 वर्षीय माही मरकाम के बाद मोहनपुर बैगाटोला के 4 वर्षीय लवकुश की मौत हुई थी।

………………………………. झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे स्वास्थ्य सुविधा
  बैगा आदिवासी ग्राम अतरिया आरामटोला निवासी साढ़े 10 वर्षीय गजेंद्र मरकाम की 3 सितंबर लूद ग्राम पंचायत के मसीहाटोला में मौत हुई थी। गजेंद्र मरकाम पिता विश्राम मरकाम, उम्र 10 वर्ष, मूल रूप से अतरिया पंचायत के आरामटोला का निवासी था। गजेन्द्र चैथीं कक्षा में पढ़ाई करता था, मृतक गजेन्द्र तीन भाई थे। पिछले कुछ महीनों से वह अपने माता-पिता के साथ लूद ग्राम पंचायत के मसीहा टोला में अपने मौसा के घर रह रहा था। कुछ दिनों से उसकी तबीयत खराब थी और उसे मलेरिया होने की जानकारी सामने आई थी। परिजनों के द्वारा उसका उपचार क्षेत्र में निजी तौर पर कराया जा रहा था। फिर अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसने दम तोड़ दिया। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर 4 सितम्बर को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उकवा में पोस्टमार्टम करवाने के बाद शव परिजनों को सौंपा। मृतक बच्चे का उपचार क्षेत्र के एक कथित झोलाछाप डॉक्टर द्वारा किए जाने की जानकारी सामने आई है। कलेक्टर कुमार सत्यम ने मीडिया से कहा था कि लूद के मसीहा टोला में एक बालक को मलेरिया होने पर उसके स्वजनों ने झोलाछाप चिकित्सक से इलाज कराया जिससे बालक की मौत हो गई। इस मामले में जांच कर झोलाछाप चिकित्सक पर एफआईआर दर्ज की जाएगी। कलेक्टर के इस बयान से साफ हो जाता है कि दूरस्थ गांवों के लोग आज भी झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे ही हैं। 

———  देर तक और दूर तक बना रहेगा मुददा
  मध्यप्रदेश में मौतों का सिलसिला लगातार जारी है। छिंदवाड़ा में दवा से बच्चों की मौतें हुईं तो सागर में जहरीली शराब से तो बालाघाट जिले में कुपोषण और बीमारियों से बैगा बच्चों की मौतें हुईं। इन घटनाओं का असर देर तक और दूर तक रहेगा। बैगा बच्चों की मौत और बड़ी तादाद में आदिवासियों के बीमार होने का मुददा ना सिर्फ बालाघाट बल्कि सिवनी, छिंदवाड़ा, खण्‍डवा, मण्‍डला, शहडोल, डिंडोरी, अनूपपुर, उमरिया, श्योपुर और धार सहित अन्य जिलों में चुनाव के दौरान असर दिखाएगा। कांग्रेस इसे राजनीतिक और चुनावी मुददा बनाने के साथ ही प्रदेश सरकार नाकामियों के लिए घेर रही है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के बाद दिग्विजय सिंह ने सीएम डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखा है। दिग्विजय सिंह ने लिखा कि विशेष पिछड़ी जनजाति में शामिल बैगा आदिवासी परिवारो में संक्रमण की बीमारी कहकर बनकर टूटी है, जिससे परिवारों में मातम है। यह गंभीर लापरवाही का परिणाम है। विभागीय लापरवाही से जनित इस प्रकोप की राज्य स्तर से जांच कराई और दोषी अमले पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। उन्होंने पत्र में बताया कि यह गरीब आदिवासी परिवारों पर बड़ी विपदा है, जिसमें मृत बच्चो के परिवार को दस-दस लाख रूपए की रूपए की राहत राशि सीएम राहत कोष से दी जाए तथा गंभीर रूप से बीमार बच्चों को एयरलिफ्ट कर नागपुर, रायपुर और भोपाल में भर्ती कराकर, उनके सारे इलाज का खर्च शासन उठाए। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का कहना है कि केन्द्र सरकार के मिशन पोषण 2 के तहत 6 साल तक के बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को साल में कम से कम 300 दिन पोषण आहार दिए जाने का प्रावधान है लेकिन इसके आधे दिन भी ये पोषण नहीं मिल पा रहा है। होशंगाबाद, शिवपुरी, रीवा, सागर, देवास के प्लांट बंद हैं जिसके कारण बच्चों तक पोषण आहार नहीं पहुंच पा रहा है। वहीं, बैहर के विधायक संजय उइके का कहना है कि सरकार सिर्फ 100 बैगा बाहुल्यों को ही क्यों चिह्नित कर रही है जबकि बालाघाट में 150 बैगा बाहुल्य गांव है। वहां पर पहले भी बैगा प्राधिकरण के नाम पर करोड़ों नहीं अरबों रुपए खर्च हुए लेकिन वह जमीन तक नहीं पहुंचे। ऐसे में 225 करोड़ रुपए से कैसे विकास होगा। बच्चों की मौतों पर दुख जताते हुए उन्होंने कहा कि कुपोषण और मलेरिया की वजह से बच्चों की मौतें हुईं हैं। इन क्षेत्रों मंे ना तो टीकाकरण हुआ, ना ही मलेरिया की दवा वितरित हुई और ना ही पोषण आहार, राशन वितरित किया गया। विभागीय अमले ने कोई काम ही नहीं किया। बीमारी फैलने के बाद भी समय पर विभागीय अधिकारी-कर्मचारी प्रभावित गांवों तक नहीं पहुंचे जिसके कारण प्रभावित बच्चों और गांव वालों की संख्या बढ़ते गई। कांग्रेस के अलावा बहुजन समाज पार्टी, काॅकरोच जनता पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी प्रदेश स्तर पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है।

……………… अभी तक कहां थी मेडिकल मोबाइल यूनिट
बालाघाट जिले के विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) बहुल एवं अति पिछड़े गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के उद्देश्य से जनमन मोबाइल मेडिकल यूनिट द्वारा स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की। जनवरी 2025 में राज्य शासन द्वारा बालाघाट जिले को चार मोबाइल मेडिकल यूनिट उपलब्ध कराई गई थीं। ये मोबाइल मेडिकल यूनिट बालाघाट, बैहर, परसवाड़ा एवं लांजी विकासखंड के अति पिछड़े एवं पीवीटीजी गांवों में अपनी सेवाएं दे रही हैं। हर मोबाइल मेडिकल यूनिट में छह सदस्यीय चिकित्सीय दल तैनात है। दल द्वारा गांवों में पहुंचकर मरीजों की स्वास्थ्य जांच की जाती है और आवश्यकता के अनुसार तत्काल उपचार उपलब्ध कराया जाता है। मरीजों को आवश्यक दवाइयां भी निःशुल्क वितरित की जाती हैं। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत और सैकड़ों लोगों के बीमारी ने ये सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर अब तक ये मेडिकल मोबाइल यूनिट कहां चल रही थी और किसे निशुल्क दवा दी गई। 
……………………………….. प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंची बैगाओं की आवाज़
बालाघाट जिले में बैगा आदिवासियों के बच्चों की लगातार हो रही मौतों को लेकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है। सिंघार ने अपने पत्र में लिखा है कि मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बैगा आदिवासी बच्चों की लगातार हो रही मृत्यु अत्यंत पीड़ादायक एवं चिंताजनक है। प्रभावित ग्रामों में लगभग 30 बैगा बच्चों की मृत्यु की सूचना प्राप्त हुई है। पिछले कई महीनों से मलेरिया, खसरा एवं अन्य संक्रमणों के साथ कुपोषण, दूषित पेयजल और पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा है कि बैगा समुदाय विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) है, जिसके लिए केंद्र सरकार द्वारा पीएम-जनमन के माध्यम से स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छ पेयजल एवं अन्य बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करने का लक्ष्य है। ऐसे में बच्चों की उपचार योग्य बीमारियों से मृत्यु योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। उमंग सिंघार ने प्रधानमंत्री से मांग की कि पूरे मामले में प्रशासनिक जवाबदेही तय की जाए। 
……………. पहले उपलप फिर मनोज को हटाया
बैगा बच्चों की सिलसिलेवार मौतों के बाद तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डाॅ परेश उपलप को हटाकर डाॅ मनोज पांडेय को पदस्थ किया गया। मनोज पाण्डेय के विवादों में घिरने के बाद उन्हें भी हटा दिया गया और फिर डाॅ शत्रुघन सिंह दाहिया को पदस्थ किया गया। डाॅ दाहिया जिला चिकित्सालय जबलपुर में शिशु रोग विशेषज्ञ के पद पर पदस्थ थे। मालूम हो कि बालाघाट के टीकाकरण अधिकारी डॉ. परेश उपलप के साथ ही मलेरिया अधिकारी मनीष जुनेजा को पद से हटा दिया गया था। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी का चार्ज लेते ही डॉ. शत्रुघन दाहिया ने प्रभावित गांवों दौरा किया। साथ ही इस क्षेत्र के स्वास्थ्य केन्द्रों और व्यवस्थाओं का भी जायजा लिया। 
………………………  बालाघाट में बैगा मार्ट, खंडवा, मंडला, शहडोल एवं धार में ट्राइबल मार्ट
मध्‍यप्रदेश शासन के जनजातीय कार्य, लोक परिसंपत्ति प्रबंधन, भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुर्नवास मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह 10 सितंबर को बालाघाट प्रवास पर पहुंचे थे। जनजातीय कार्य मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह ने अफसरों की बैठक में कहा कि बैगा जनजाति बहुल क्षेत्रों में नर्सिंग स्टाफ एवं बाल विकास परियोजना से संबंधित कोई भी पद खाली नही रहना चाहिए, इन पदों की 15 दिनों के भीतर पूर्ति की जाए। उन्‍होंने बताया कि जनजाति कार्य विभाग द्वारा बैगा जनजाति के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए बैहर, बिरसा एवं परसवाडा तीनो विकासखंड एक-एक एंबुलेंस उपलब्‍ध करायी जाएगी। डॉ. विजय शाह ने बैगा जनजाति की बस्तियों में आने जाने के रास्ते पक्के बनाने, सभी बैगा बस्तियों में सीमेंट-कांक्रीट सड़क बनाने, बैगा जनजाति के लोगों को प्रधानमंत्री आवास के लिए 2.5 लाख रुपए दिए जाने, बैगा बस्तियों में बिजली, पानी की सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही। मंत्री डॉ. शाह ने कहा कि शहरों में संचालित मॉल की तर्ज पर बैगा बहुल क्षेत्रों में ‘बैगा मार्ट’ खोलने की दिशा में जनजातीय कार्य विभाग काम कर रहा है। प्रथम चरण में खंडवा, मंडला, शहडोल एवं धार में ट्राइबल मार्ट खोले जा रहे है। इसी तर्ज पर बालाघाट जिले में भी बैगा मार्ट खोला जाएगा। इसका संचालन स्वयं सहायता समूह द्वारा किया जाएगा और उसे मार्ट खोलने के लिए 5 करोड़ रुपए का ऋण एवं 5 प्रतिशत ब्‍याज अनुदान दिलाया जाएगा। इस मार्ट से जनजाति क्षेत्र के ग्रामों के युवाओ को जोड़ा जाएगा और उन्‍हें इस मार्ट से 25 प्रतिशत डिस्काउंट पर सामग्री उपलब्‍ध करायी जाएगी। उन्होंने जनजाति क्षेत्र के प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक उचित मूल्य दुकान के लिए प्रस्‍ताव तैयार करने के निर्देश दिये। मंत्री डॉ. विजय शाह ने छात्रावास के सभी बच्‍चों का माह में एक बार स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण करने, हर बच्‍चे का हेल्‍थ कार्ड बनाने, छात्रावास अधीक्षक रात्रि में छात्रावास में ही रहने, छात्रावास में बच्चों की कोचिंग की व्यवस्था, सभी छात्रावासों में वाटर प्‍यूरीफायर, छात्रावासों में बिजली की सुविधा के लिए सोलर पैनल लगाने विभाग द्वारा 200 करोड़ रुपए स्‍वीकृत किए जाने की बात कही। उन्होंने बताया कि जनजाति कार्य विभाग द्वारा बालाघाट जिले के बैहर, बिरसा, परसवाड़ा विकासखंड में 7 सांदीपनि विद्यालय के प्रस्ताव तैयार किये गए है। उन्‍होंने सांदीपनि विद्यालय के 20 किमी की परिधि के बच्‍चों के स्‍कूल आने के लिए बस का टेंडर करने के निर्देश भी दिये। जनजाति कार्य विभाग द्वारा कॉलेज पढने वाली बालिकाओं के लिए अलग से बसों की व्यवस्था भी करने कार्य योजना बनायी जा  रही है। इसमें बैहर क्षेत्र को भी 10 बसे मिलने की संभावना है। 

……………….. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग कर रहा जांच 
  बैगा बच्चों की मौत के मामले की राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने जांच शुरू कर दी है। तीन सदस्यीय दल ने प्रभावित गांवों का दौरा कर स्वास्थ्य केंद्र, आंगनवाड़ी और छात्रावासों का निरीक्षण किया। टीम ने पीड़ित ग्रामीणों, मृत बच्चों के परिजनों से जानकारी ली। जांच दल ने लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, स्वास्थ्य, मलेरिया तथा महिला एवं बाल विकास विभाग सहित संबंधित विभागों की भूमिका और संबंधित अफसरों की लापरवाही के बारे में जानकारी जुटाई। साथ ही संबंधित विभागों से रिकॉर्ड और दस्तावेज मांगे गए हैं। आयोग अध्यक्ष अंतर सिंह आर्य के निर्देश पर तीन सदस्यीय दल ने प्रभावित गांवों का दौरा किया। जांच दल में विधि सलाहकार प्रकाश कुमार उइके, डायरेक्टर पूर्णेंदु कांत और इन्वेस्टिगेटर शिव प्रकाश शामिल हैं। जांच दल ने सोनगुड्डा, बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, गठिया और मछुरदा गांवों में पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। टीम ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, आंगनवाड़ी केंद्र और जनजातीय छात्रावासों का निरीक्षण किया। दल के सदस्यों ने मृतक बच्चों के परिजनों से बीमारी, इलाज, टीकाकरण, पोषण और पेयजल आपूर्ति के संबंध में चर्चा कर जानकारी जुटाई। निरीक्षण के दौरान महाकौशल वनवासी विकास परिषद के लखन मेरावी भी टीम के साथ मौजूद थे। मरावी ने ही आयोग को पत्र लिखकर बैगा गांवों में बच्चों की मौतों की जानकारी दी थी। 
………………………………. बंद रखा, रैली निकाल किया प्रदर्शन
बालाघाट जिला मुख्यालय सहित बैहर, बिरसा, परसवाड़ा, वारासिवनी और कटंगी सहित अन्य अंचल बंद रखकर बच्चों की कुपोषण और बीमारियों से मौत का विरोध भी जताया गया था। 3 सितंबर को बंद का आह्वान आदिवासी युवा साथी और बैगा समाज ने किया था। पंवार क्षत्रिय समाज, लोधी समाज, बौद्ध समाज, ओबीसी महासभा, बिरसा ब्रिगेड, भीम आर्मी, राष्ट्रीय क्रांति मोर्चा और मुस्लिम समाज ने भी बंद का पूर्ण समर्थन दिया और प्रदर्शन में शामिल हुए। जिला मुख्यालय में जन आक्रोश रैली निकाली गई। इसमें बड़ी की संख्या में आदिवासी युवा, बैगा समाज और विभिन्न सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता शामिल हुए। न्याय दो या कुर्सी छोड़ो! मासूमों की मौत का हिसाब दो! के नारों के साथ शासन-प्रशासन से जवाब मांगा गया। रैली के बाद आयोजित आम सभा में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि ये मौतें बीमारी से नहीं, बल्कि मोहन यादव सरकार और जिला स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से हुई हैं। बैहर-बिरसा जैसे सुदूर वनांचलों में समय पर डाक्टर नहीं पहुंचे, दवाओं की कमी रही और स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाओं का अभाव रहा। आदिवासी बाहुल्य इलाकों में नल-जल योजनाओं के नाम पर करोड़ों रूपये खर्च किए गए लेकिन आज भी आदिवासी झिरिया के पानी पीने के लिए मजबूर हैं। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि मृत बच्चों के परिजनों को 25 लाख रूपये आर्थिक मुआवजा दिया जाए, दोषी अधिकारियों को निलंबित कर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए और प्रभावित गांवों में स्थायी स्वास्थ्य शिविर, एंबुलेंस और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम तैनात की जाए।
बच्चों की मौतों के विरोध में बालाघाट जिला मुख्यालय में हुए प्रोटेस्ट में मंडला, डिण्डोरी, बैतूल, सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों के आदिवासियों सहित अन्य समाज के लोगों ने पहुंचकर अपना समर्थन दिया। गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी ने भी 5 सितम्बर को राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति की अगुआई में बालाघाट जिला मुख्यालय में धरना देकर प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में गोंगपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तुलेश्वर मरकाम भी मौजूद रहे। आदिवासी और विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय से जुड़े मामलों और अफसरों की गैरजिम्मेदारी का आरोप लगाते हुए उन्होंने बैगा बच्चों की मौतों के लिए संबंधित विभागीय अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया। तुलेश्वर मरकाम ने मृत बच्चों के परिजनों को 50-50 लाख रूपये और वन्यजीव हमलों में मृत तीन महिलाओं के परिजनों को भी 50-50 लाख रूपये सहायता राशि दिए जाने की मांग की। धरना प्रदर्शन के बाद राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा गया जिसमें बैगा बच्चों की मौतों और वन्यजीव हमले में मौतों की परिस्थितियों, प्रशासनिक लापरवाही, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग सहित संबंधित विभागीय अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच और दोषी अफसरों-कर्मचारियों के खिलाफ दंडात्मक एवं वैधानिक कार्यवाही किए जाने की मांग की है।
वहीं, बिरसा, बैहर सहित जिला मुख्यालय में युवाओं ने धरना प्रदर्शन कर स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोत्तरी, डाक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति, पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजे, मौतों की स्वतंत्र जांच, जिम्मेदारों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का प्रकरण दर्ज करने की मांग की। युवाओं के ये अनिश्चितकालीन धरना, प्रशासन को 15 दिन के अल्टीमेटम के साथ समाप्त किया गया। मालूम हो कि सत्येंद्र इनवाती, ललित उइके, संजय धुर्वे और मोहन मरकाम सहित सर्व आदिवासी समाज के युवाओं की ओर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की गई थी, जो पखवाड़े भर तक चली। आंदोलनकारियों का कहना है कि मिजल्स, मलेरिया और कुपोषण से 30 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई है। सत्येंद्र इनवाती ने चेतावनी दी है कि मांगे पूरी नहीं हुई तो भोपाल में विधानसभा घेराव होगा और जरूरत पड़ी तो दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन आंदोलन किया जाएगा।  …………….. कॉकरोच जनता पार्टी ने दिया अल्टीमेटम 
   कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आदिवासी समाज के आंदोलन को समर्थन दिया है। सीजेपी चीफ दीपके भी 12 सितंबर को बालाघाट पहुचें। इसके बाद वे कोरका, बोंदारी, अडोरी, कुंडेकसा सहित कुछेक ग्राम पहुंचे। यहां गांव वालों और पीड़ित परिजनों से मुलाकात कर बुनियादी सुविधाओं की जानकारी ली। दीपके ने आदिवासी बच्चों की मौतों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। दीपके ने कहा कि आजादी के इतने सालों बाद भी आदिवासी इलाकों मंे पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य आदि की बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हैं। बच्चों का वैक्सीनेशन तक नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग सहित संबंधित विभागों के अधिकारी-कर्मचारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। दीपके ने कहा कि सीजेपी पीड़ित परिजनों को न्याय दिलाने के लिए बड़े स्तर पर आंदोलन करेगी। मालूम हो कि दीपके से कुछ दिन पहले ही सीजेपी कार्यकर्ताओं ने बालाघाट पहुंचकर पीड़ित परिजनों से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी ली। इस दौरान ग्रामीणों की अभिजीत दीपके से मोबाइल पर बातचीत भी कराई गई। 4 सितंबर को नागपुर से सीजेपी के कार्यकर्ता मयूर, अजिंक्य, अभिजीत और एक अन्य कार्यकर्ता बालाघाट पहुंचे। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों मोहन मरकाम, ललित उइके, सत्येंद्र इनवाती और संजय धुर्वे से मुलाकात कर बैगा बहुल गांवों की स्थिति और बच्चों की मौत के मामले में स्वास्थ्य व्यवस्था की जानकारी ली। सत्येंद्र इनवाती, ललित उइके, संजय धुर्वे और मिथिलेश उइके की मौजूदगी में अभिजीत दीपके से मोबाइल पर बातचीत हुई। इस दौरान दीपके ने बच्चों की मौत पर दुख जताते हुए सरकार की ओर से मृतक बच्चों को 2-2 लाख रुपए मुआवजा दिए जाने से नाराजगी जताई। दीपके ने कहा कि बच्चों को न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे। यहां बता दें कि दीपके का सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया पत्र भी वायरल हुआ था। राज्यपाल मंगू भाई पटेल को संबोधित इस पत्र में दीपके ने तंज करते हुए खुद को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए लिखा कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं। इस्तीफा देने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि हर घर नल योजना, स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में विफल रहे।

……………….  संभागायुक्त की चौपाल में नप गए कई अफसर 
संभागायुक्त धनंजय सिंह ने भी बैगा बाहुल्य गांवों में पहुंचकर योजनाओं का क्रियान्वयन देखा। उन्होंने बालाघाट जिले अंतर्गत बैहर विकासखंड के बैगा जनजातीय बाहुल्य ग्राम पाथरी में रात्रि चौपाल आयोजित कर ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं। उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, वनाधिकार पट्टा, आहार अनुदान, पेयजल, रोजगार एवं आजीविका सहित शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं की मैदानी स्थिति की समीक्षा की। विभागीय योजनाओं की प्रगति संतोषजनक नहीं पाए जाने पर जिला कार्यक्रम अधिकारी, महिला एवं बाल विकास को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। रात्रि चौपाल से पहले संभागायुक्त श्री सिंह ने पाथरी स्थित शासकीय सीनियर आदिवासी बालक छात्रावास का निरीक्षण किया। उन्होंने टीकाकरण की व्यवस्था में लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारी को नोटिस जारी करने के निर्देश भी दिए। संभागायुक्त जबलपुर धनंजय सिंह ने बिरसा विकासखंड के बैगा जनजाति बाहुल्य ग्राम घुम्मुर और मछुरदा में विशेष शिविर-सह-जन चौपाल आयोजित कर ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। मछुरदा कैम्प में किसान क्रेडिट कार्ड की प्रगति संतोषजनक नहीं पाए जाने पर सहायक प्रबंधक प्राथमिक सहकारी संस्था बिठली को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। विभागीय योजनाओं में अपेक्षित प्रगति नहीं पाए जाने पर जिला कार्यक्रम अधिकारी महिला बाल विकास, परियोजना अधिकारी महिला एवं बाल विकास के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के निर्देश दिए। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की समीक्षा में हैंडपंपों के सुधार और समुचित पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित नहीं किए जाने पर कार्यपालन यंत्री, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए। वही पशुओं में टीकाकरण नहीं होने पर उप संचालक पशुपालन के विरुद्ध भी कार्यवाही हेतु नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। जन चौपाल से पहले संभागायुक्त श्री सिंह ने ग्राम घुम्मुर स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का निरीक्षण किया। 
………………………….. समाजसेवी संस्थाएं आगें आईं 
  बालाघाट जिले के अति-दुर्गम एवं आदिवासी बहुल एवं नक्सल प्रभावित अंचलों में संक्रमण से बच्चों की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति के बीच सहयोग हॉस्पिटल, गोंदिया ने ‘सहयोग- मिशन जीवन’ अभियान चलाया। सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं वाले इन क्षेत्रों में सहयोग हॉस्पिटल, गोंदिया की टीम द्वारा घर-घर स्वास्थ्य जांच, जनजागरूकता एवं निःशुल्क चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई। अभियान के अंतर्गत स्वास्थ्य दल द्वारा मोहनपुर, उशाचक्र, कुलपा, माटे, पालागोंदी, लुध, बिटोली, अडोरी, कोरका, कुंडेकसा, देवरबेड़ी, मछुरदा एवं धर्मशाला सहित अन्य आदिवासी गांवों में घर-घर स्वास्थ्य जांच, जनजागरूकता एवं निःशुल्क चिकित्सा शिविर आयोजित किए। इस दौरान तीन सैकड़ा से ज्यादा बच्चों की जांच की। जांच के दौरान चिन्हित गंभीर रूप से बीमार बच्चों को सहयोग हॉस्पिटल, गोंदिया में भर्ती कराया गया। साथ ही इनके परिजनों के रहने, भोजन एवं आवश्यक देखभाल की व्यवस्था संस्थान ने की। सहयोग संस्थान के अध्यक्ष जयेशचन्द्र रमन रामादे के अनुसार सहयोग क्लिनिक, बालाघाट में प्रारंभिक जांच के बाद गंभीर बच्चों को सहयोग हॉस्पिटल, गोंदिया लाकर उच्च स्तरीय उपचार दिया जा रहा है। प्रभावित क्षेत्रों से अस्पताल तक तथा वापसी के लिए परिवहन, साथ ही परिजनों के रहने एवं भोजन की व्यवस्था भी संस्थान द्वारा की जा रही है। इसके अलावा लांजी सिविल अस्पताल में प्रकाश वस्त्रालय के विजय आसटकर ने बैगा मरीजों और उनके परिजनों को मच्छरदानियां वितरित की। आशा सामाजिक कल्याण समिति बालाघाट के सदस्य विधान जोगी ने मरीजों और उनके परिजनों के लिए निशुल्क नाश्ते और भोजन की व्यवस्था की। सिविल अस्पताल लांजी में भर्ती वनांचल के बैगा मरीजों और एनआरसी के बच्चों के लिए समाजसेवी संस्थाओं द्वारा सेवा का सिलसिला जारी है। माँ लंजकाई ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने अस्पताल पहुंचकर बैगा मरीजों, उनके परिजनों और एनआरसी में भर्ती बच्चों को फल वितरित किए। माँ लंजकाई ट्रस्ट ने बताया कि अस्पताल में बैगा समुदाय के मरीज जब तक भर्ती रहेंगे, तब तक उन्हें प्रतिदिन फल वितरित किए जाएंगे। 

………………………. 21 हजार से ज्यादा बच्चों का टीकाकरण   
लगातार बच्चों की मौत के बाद बच्चों के टीकाकरण और जांच में तेजी आई है। बिरसा, बैहर और परसवाड़ा विकासखंड के 137 गांवों में स्वास्थ्य अमला तैनात है। प्रभावित क्षेत्रों में 5 हजार से ज्यादा लोगों की स्वास्थ्य जांच की जा चुकी है। साथ ही 21 हजार से ज्यादा बच्चों का टीकाकरण किया जा चुका है। जांच के दौरान सर्दी-खांसी, मीजलस, मलेरिया, दस्त, दाने के साथ बुखार और चर्म रोग से पीड़ित मरीज सामने आए हैं। अस्पताल में भर्ती कराए गए साढ़े चार सौ से ज्यादा बच्चों में से अधिकांश बच्चे स्वस्थ होकर अपने गांव लौट चुके हैं। बिरसा विकासखंड के ग्राम कुडेकसा, अडोरी, कोरका, बोन्दारी, घुम्मुर, मछुरदा, मातला सहित सर्वेक्षण किए जा रहे आसपास के 36 ग्रामों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं एवं मौसमी बीमारियों से पीड़ित आधा सैकड़ा से ज्यादा बच्चों को उपचार के लिए भर्ती किया गया था। इन ग्रामों में करीब 7 हजार व्यक्तियों की जांच की गई है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अब तक विभिन्न बीमारियों से पीड़ित करीब 1200 मरीज मिले। इनमें से 1 हजार से ज्यादा लोगों स्वस्थ हो चुके हैं। हालांकि अभी भी लगातार नए मरीज मिल रहे हैं जिन्हें अस्पताल में भर्ती किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि प्रभावित ग्रामों में 20 सर्वेक्षण टीमों के माध्यम से घर-घर जाकर स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। इसके अलावा 6 पीएम जनमन एएमएमयू, बीमार व्यक्तियों की जांच के लिए 18 चिकित्सा अधिकारी तथा मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए 4 एंबुलेंस लगाई गई हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा कुंडेकसा, बोंदारी, कोरका, घुम्मुर, अडोरी, मछुरदा, गठिया एवं मातला सहित विभिन्न ग्रामों में घर-घर सर्वे किया जा रहा है। विकासखंड बिरसा के 34, बैहर के 42 तथा परसवाड़ा के 61 गांवों में स्वास्थ्य विभाग की टीमें लगातार निगरानी कर रही हैं। इन गांवों में प्रत्येक दो गांवों पर एक चिकित्सा अधिकारी की तैनाती की गई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा कुल 18 चिकित्सा अधिकारियों तथा 23 सेक्टर सुपरवाइजरों के नेतृत्व में 34 सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों, 34 महिला बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और 33 आशा कार्यकर्ताओं को अभियान में लगाया गया है। इसके अलावा 24 सीएचओ के माध्यम से सार्वजनिक सर्वेक्षण कराया जा रहा है।
—– सवालों के घेरे में सरकार   
    बहरहाल, मध्यप्रदेश मौतों का प्रदेश बनता जा रहा है। बालाघाट जिले में 33 बैगा बच्चों की कुपोषण, खसरे और अन्य बीमारियों से मौत, सागर में जहरीली शराब से 11 मौत, छिंदवाड़ा में कोल्ड्रिफ सिरप से डेढ़ दर्जन से ज्यादा बच्चों की मौतें हुई। सड़क हादसों के आंकड़े तो डराने वाले हैं। जनवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच ही 90,138 सड़क हादसे हुए इनमें 25,869 लोगों की मौत हो गई और 95,843 लोग जख्मी हो गए। जुलाई के बाद से अब तक तो ये आंकड़ा और बढ़ गया है। जहां तक बालाघाट जिले की बात है तो यहां मृत बच्चों और भर्ती मरीजों के प्रशासनिक आंकड़े झकझोर देने वाले हैं। हकीकत में कितने बच्चों के मौतें हुईं हैं और कितने बीमार इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। बच्चों की मौतों के बाद जितने मंत्री, विभागीय उच्चाधिकारी और प्रशासनिक अफसर इन बैगा क्षेत्रों में पहुंचे शायद ही आज़ादी के बाद से अब तक कभी इतने पहुंचे हों। यदि ये सुध पहले ही ले ली जाती तो शायद इतने बच्चों की जान नहीं जाती। बैगा बच्चों की मौंतों और सुदूर इलाकों में बीमारी फैलने पर शासन-प्रशासन का तर्क है कि नक्सलियों के कारण यहां बुनियादी सुविधाएं इन गांवों तक नहीं पहुंच पाई। सवाल ये है कि जब नक्सलियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल जैसी सुविधाएं आदिवासी क्षेत्रों में नहीं पहुंचने दीं तो ये योजनाएं कागजों पर कैसे चलतीं रहीं, इन योजनाओं की राशि कहां गईं। आदिवासियों के नाम पर पोषण आहार कौन खा गया, नल-जल योजना का काम कैसे हो गया। इसके अलावा भारत में नक्सलवाद के जड़ से खात्मे की डेडलाइन 31 मार्च 2025 थी। मध्य प्रदेश में नक्सल मुक्त होने का लक्ष्य 26 जनवरी 2026 था। बालाघाट जिले में साल 1990 में नक्सलियों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। निर्धारित समय से पहले ही 11 दिसंबर 2025 को एमएमसी जोन के अंतिम सक्रिय नक्सली दीपक उर्फ सुधाकर और रोहित उर्फ मंगलू ने बालाघाट में सरेंडर कर दिया। इनके सरेंडर के बाद सीएम डॉ. मोहन यादव ने एमपी के नक्सल मुक्त होने की घोषणा की थी। सवाल ये है कि जब बालाघाट के साथ ही पूरा मध्यप्रदेश नक्सलमुक्त घोषित हो गया तो फिर विभागीय नाकामियों का ठीकरा नक्सलियों के सिर क्यूं फोड़ा जा रहा है? आखिर, अब तक आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं, राशन, पोषण आहार क्यूं नहीं पहुंचा? जब नक्सली खत्म हो गए तो फिर आदिवासी इलाकों में रात में एंबुलेंस क्यूं नहीं जाती? सरकारी स्कूल, आंगनवाड़ियों की साफ सफाई, मलेरिया की दवा, खसरे के टीके, सरकारी राशन आदिवासियों को क्यूं नहीं बट पाया? जब मलेरिया सहित अन्य बीमारियां फैली तब ही स्वास्थ्य सहित अन्य विभाग के अफसरों ने प्रभावित गांवों में पहुंचकर संवेदनशीलता से काम क्यूं नहीं किया ? इसके ही कई सवाल है जिसका जवाब शासन-प्रशासन को देना होगा। 
— मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल (मध्यप्रदेश)

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