(आलेख : एम ए बेबी, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)

31 मार्च, 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि भारत नक्सलवाद से मुक्त हो गया है। वहीं, 15 अगस्त को लाल किले से दिए गए स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके लौटने की बात कही।

इन चार महीनों के बीच कई घटनाएँ हुईं हैं। लेकिन तीन घटनाएँ खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं : अप्रैल और मई में देश के उत्तरी हिस्से में कुछ समय के लिए फैला मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन का दौर ; छात्रों और युवाओं का वह ऐतिहासिक आंदोलन, जिसके कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा ; और बांकीपुर उपचुनाव, जिसमें बीजेपी को उस सीट पर ज़बरदस्त हार का सामना करना पड़ा, जहाँ तीन दशकों से ज़्यादा समय से उसका दबदबा था और जिसे हाल ही में उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने खाली किया था। इन घटनाओं ने निस्संदेह बीजेपी को बैकफ़ुट पर ला दिया है।

मोदी का अपने भाषण में ‘दिमागी नक्सलियों’ के खतरे का ज़िक्र इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जब कोई नेता घबराया हुआ हो और उसके पास नए विचार न हों, तो वह अक्सर उन्हीं पुरानी बातों और तरीकों का सहारा लेता है, जो पहले काम आ चुके हों। इसलिए, ‘दिमागी नक्सल’ वाला ताना, पहले इस्तेमाल किए गए ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘आंदोलनजीवी’ और इसी तरह के दूसरे लेबलों को ही फिर से सामने लाने जैसा है।

फ़ासीवाद लगातार नाराज लोगों की राष्ट्रीय भावनाओं को भड़काने और उन्हें अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने की कोशिश करता है। मौजूदा सरकार के तौर-तरीके भी, जिनमें नव-फ़ासीवादी लक्षण दिखते हैं, इससे अलग नहीं हैं। फिर भी, भले ही सांप्रदायिक बहुसंख्यकवादी सोच का लोगों के एक बड़े हिस्से पर असर बना हुआ है, लेकिन नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ एकजुट विरोध-प्रदर्शनों ने यह दिखा दिया है कि बढ़ते असंतोष — खासकर युवा पीढ़ी में मौजूदा हालात को लेकर — के सामने इसकी भी सीमाएँ हैं।

*छात्रों, महिलाओं, मज़दूरों या किसानों के लिए कुछ नहीं*

प्रधानमंत्री के भाषण में की गई बड़ी घोषणाओं में इस असंतोष को दूर करने के लिए बहुत कम उपाय थे। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के लिए मुफ़्त ऑनलाइन कोचिंग की घोषणा के ठीक एक दिन बाद, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने बताया कि यूजीसी-नेट के तीन पेपर दोबारा आयोजित किए जाएंगे। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उनमें कई तथ्यात्मक, टाइपिंग और अनुवाद संबंधी गलतियाँ थीं, साथ ही पहले पूछे गए कई सवाल दोबारा आ गए थे। कई लोगों ने तुरंत कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सस्ती कोचिंग का वादा बेकार है, जब एक के बाद एक परीक्षा में पेपर लीक, गलतियाँ, परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा जैसी समस्याएँ होती हैं, और खुद परीक्षा प्रणाली पर ही कोई भरोसा नहीं रह जाता।

जिस दिन मोदी ने नई शिक्षा नीति की सफलता का ऐलान किया, उसी दिन पश्चिम बंगाल के बांकुरा ज़िले के इंदस इलाके के करिशुंडा गांव में बीजेपी के गुंडों के बेरहम हमले में घायल शेख़ मोहम्मद माफ़िक की मौत हो गई। मोहम्मद माफ़िक को कथित तौर पर इसलिए निशाना बनाया गया, क्योंकि उनके बेटे अब्दुल हाफ़िज़ ने जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन में हिस्सा लिया था और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की अपील पर अपने गांव के स्कूल की सुविधाओं का ‘नागरिक ऑडिट’ करने की कोशिश की थी। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले 10 सालों में देश भर में 94,000 से ज़्यादा सरकारी स्कूल बंद हो गए — यानी हर दिन औसतन 25 स्कूल — जबकि सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में 2.26 करोड़ की कमी आई है। यह नई शिक्षा नीति, 2020 की विफलता को दिखाता है, जिसे बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार मानने को तैयार नहीं है।

अब उन्हें ‘वन डे, वन यूनिवर्सिटी’ नाम से जेन-ज़ी तक पहुँचने के एक कार्यक्रम का सहारा लेना पड़ रहा है। इसे देशव्यापी आउटरीच प्रोग्राम के तौर पर आयोजित किया जा रहा है, जिसके तहत एक केंद्रीय मंत्री हर दिन किसी यूनिवर्सिटी का दौरा करेंगे, ताकि वे सीधे छात्रों से बातचीत कर सकें, उनकी चिंताएँ सुन सकें और युवाओं के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बता सकें। फिर भी, वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि समस्या की जड़ नई शिक्षा नीति में है, जो हमारी शिक्षा का व्यवसायीकरण, केंद्रीकरण और सांप्रदायिकीकरण करना चाहती है। इसकी वजह से कोचिंग सेंटरों की बाढ़ आ गई है और पेपर लीक व परीक्षाओं की गड़बड़ी से जुड़ी समस्याएँ और बढ़ गई हैं। जब तक नई शिक्षा नीति को खत्म नहीं किया जाता, तब तक हमारे छात्रों को न्याय नहीं मिलेगा। और जब तक रोज़गार के पर्याप्त अवसर पैदा करने के लिए ठोस कोशिशें नहीं की जातीं, तब तक भारत के युवाओं को भी न्याय नहीं मिल पाएगा।

अपने भाषण में मोदी ने महिला आरक्षण कानून के पास होने की तारीफ़ की है और फिर संसद और राज्य विधानसभाओं में इसे लागू करने की ज़िम्मेदारी विपक्षी दलों पर डाल दी। बहरहाल, यह बात जगज़ाहिर है कि असल में उनकी सरकार ही इसमें बाधा बनी हुई है। मॉनसून सत्र के दौरान, 20 जुलाई से 13 अगस्त तक, हज़ारों महिलाओं ने जंतर-मंतर और उसके आस-पास विरोध प्रदर्शन किया। उनकी माँग थी कि 33% महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग करके तुरंत लागू किया जाए। ‘नेशनल कोएलिशन फ़ॉर विमेंस रिज़र्वेशन’ के बैनर तले महिला संगठनों और नागरिक समाज समूहों ने कई राजनीतिक दलों से मुलाक़ात की और इस मुद्दे पर उनका समर्थन हासिल किया है। फिर भी, बीजेपी इस पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। साफ़ है कि उनके लिए यह कानून सिर्फ़ चुनावी क्षेत्रों में हेर-फेर करने और चुनावी नक्शे को अपने फ़ायदे के हिसाब से फिर से तैयार करने का एक ज़रिया है।

किसानों को कोई परेशानी न होने देने और उनके लिए नए मौके बनाने के मोदी के दावे असलियत से मेल नहीं खाते। सिर्फ़ पिछले साल ही 32,000 से ज़्यादा किसानों और खेत मज़दूरों ने आत्महत्या की है, और ये आँकड़े सिर्फ़ उन राज्यों के हैं, जिन्होंने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो को जानकारी दी है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि बहु-प्रचारित वीबी-ग्राम-जी की वजह से ग्रामीण रोज़गार पैदा होने में 50% की कमी आई है। इस साल जुलाई में 68.94 लाख परिवारों ने ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना का फ़ायदा उठाया, जिससे 7.67 करोड़ मानव दिवस का रोज़गार पैदा हुआ ; जबकि पिछले साल इसी महीने में 1.42 करोड़ परिवारों ने इस योजना का लाभ उठाया था और 15.33 करोड़ मानव-दिवस रोज़गार पैदा हुआ था।

केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी करने और बिजली संशोधन विधेयक से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के मामले में किसानों से किए गए अपने वादे को अभी तक पूरा नहीं किया है। इसके बजाय, वह किसान संगठनों और यूनियनों से सलाह-मशविरा किए बिना ऐसे मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ा रही है, जो किसानों के हितों के लिए नुकसानदेह हैं। जहाँ तक मज़दूरों की बात है, मोदी ने उनका ज़िक्र तक नहीं किया है। चार श्रम संहिताओं के मज़दूर-हितैषी होने के खोखले दावे इस साल की शुरुआत में ही तब बेनकाब हो गए, जब मज़दूर अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतर आए।

*प्रधानमंत्री को कोई परवाह नहीं है*

देश के कई हिस्सों में बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित परिवारों को प्रधानमंत्री ने सिर्फ़ यह खोखला भरोसा दिया है कि पूरा देश मजबूती से उनके साथ खड़ा है। भले ही उन्होंने कहा कि वे उनका दर्द और तकलीफ़ समझते हैं, लेकिन देश के कई हिस्सों के लोग यही कहेंगे कि असल में वे ऐसा नहीं समझते। बाढ़, भूस्खलन या सूखे के दौरान राहत के लिए मांगी गई धनराशि का बहुत छोटा हिस्सा ही उन राज्यों को मिला है, जहाँ बीजेपी की सरकारें नहीं हैं। अब फंड जारी करने का पैमाना आपदा की गंभीरता नहीं, बल्कि राजनीति बन गई है।

केरल के लोग यह नहीं भूले होंगे कि 2018 में आई भयानक बाढ़ के बाद, विदेशों से मदद के कई उदार प्रस्तावों के बावजूद, केंद्र सरकार ने उन्हें विदेश से सहायता लेने की इजाज़त नहीं दी थी। इसके उलट, पिछले साल केंद्र के गृह मंत्रालय ने महाराष्ट्र को ‘मुख्यमंत्री राहत कोष’ के लिए विदेशी फंड लेने की मंज़ूरी दे दी थी। असल में, बाढ़ के दौरान अनाज और वायु सेना की सेवाओं के लिए केंद्र ने राज्य सरकार से सैकड़ों करोड़ रुपये वसूले थे। केंद्र सरकार ने वायनाड में 2024 में हुए भूस्खलन के बाद भी केरल को सहायता देने से इंकार कर दिया था। यहाँ तक कि बड़े संकट के समय भी राज्यों के बीच भेदभाव किया जाता है।

हाल ही में आई कैग की एक रिपोर्ट से पता चला है कि केंद्र सरकार ने ‘नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड’ (एनडीआरएफ) के तहत मिले फंड का आधा हिस्सा भी खर्च नहीं किया है। 2024-25 के दौरान एनडीआरएफ के तहत मंज़ूर किए गए कुल 11,474 करोड़ रुपयों में से राज्यों को सिर्फ़ 5,356 करोड़ रूपये ही ट्रांसफर किए गए, जिससे 6,118 करोड़ रूपये बिना इस्तेमाल के रह गए। पीएम केयर्स फंड के ताज़ा आंकड़ों से पता चलता है कि 2024-25 के आखिर तक, इस फंड में 8,452 करोड़ रूपये जमा थे। यह फंड ‘किसी भी तरह की इमरजेंसी या मुश्किल हालात’ से निपटने के लिए बनाया गया था और इसका 93% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉज़िट में रखा गया है। पिछले साल, फंड के कुल कॉर्पस का सिर्फ़ 0.001% यानी महज़ 88 लाख रूपये ही जारी किया गया था।

यह फंड प्रधानमंत्री कार्यालय से संचालित किया जाता है और इसे बिना किसी सीमा के सीएसआर फंड मिलता है, फिर भी केंद्र सरकार ने आरटीआई कानून का पालन करने और कैग से  ऑडिट कराने से इंकार कर दिया है। पारदर्शिता की कमी का मतलब है कि यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं है कि क्या कंपनियों ने इस फंड का इस्तेमाल सत्ताधारी पार्टी का पक्ष पाने के लिए किया है, जैसा कि चुनावी बॉन्ड योजना के मामले में हुआ था। प्रधानमंत्री को इसकी कोई परवाह नहीं है।

*आज़ाद सोच पर हमले का विरोध करें*

मोदी ने एक ऐसे देश की तस्वीर पेश करने की कोशिश की थी, जो नई ऊर्जा के साथ ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ रहा है, लेकिन अब इस बात पर बहुत कम लोग यकीन करते हैं। इसलिए, एक नए नाम की ज़रूरत पड़ी — ‘दिमागी नक्सल’। यह एक ऐसा जुमला है जिसका मकसद अपने समर्थकों में जोश भरना और उन लोगों में डर पैदा करना है, जो उनसे अलग सोचने की हिम्मत करते हैं। उन्हें लगता है कि ‘विकसित भारत’ के अपने सपने को पूरा करने के लिए ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान करना और उन्हें अलग-थलग करना ज़रूरी है, ठीक वैसे ही जैसे हथियारबंद नक्सलियों को अलग-थलग करके खत्म किया गया था।

यह याद रखना ज़रूरी है कि पिछले साल वामपंथी पार्टियों ने संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर ‘ऑपरेशन कगार’ के नाम पर हो रही गैर-न्यायिक हत्याओं को रोकने की मांग की थी। माओवादियों द्वारा एकतरफा संघर्ष-विराम की घोषणा करने और बार-बार सरकार से बातचीत की उनकी अपील पर विचार करने का आग्रह करने के बावजूद, केंद्र और बीजेपी-शासित राज्य सरकारों ने बातचीत के ज़रिए समाधान खोजने का रास्ता नहीं अपनाया। इसके बाद हत्या और खात्मे की एक अमानवीय नीति अपनाई गई।

अगर मोदी सरकार की ‘स्टेट टेरर’ (राजकीय आतंक) की नीति से उन गुमराह माओवादियों का सफाया किया गया — जिन्होंने गलत रास्ता चुना और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए अलोकतांत्रिक तरीके अपनाए — तो ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने की धमकी असल में सभी वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ है ; बल्कि यह उन सभी लोगों के खिलाफ है, जो सवाल उठाते हैं और आधिकारिक आख्यान को मानने से इंकार करते हैं। यह स्वतंत्र सोच पर होने वाले हमले का संकेत है।

भीमा कोरेगांव केस, दिल्ली दंगों का केस और न्यूज़क्लिक केस जैसे मामलों में जिन लोगों को सरकारी कार्रवाई का सामना करना पड़ा, उन्हें ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘आंदोलन जीवी’ जैसे लेबल दिए गए। जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले या अभी भी संघर्ष जारी रखने वाले युवाओं की निगरानी, उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक करने (डॉक्सिंग), उन्हें धमकाने और उनके खिलाफ बदले की भावना से की गई हिंसा से पता चलता है कि उन्हें निशाना बनाने का सिलसिला और भी ज़ोर-शोर से जारी रहेगा। हमारा काम संगठित होना और विरोध करना है।

(लेखक पूर्व सांसद और माकपा के महासचिव हैं। वे केरल के शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया's avatar

By NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया

NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) / NNW TV NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) is a trusted digital media group and online Hindi news portal providing the latest breaking news and updates from India and around the world. Our coverage includes Politics, Crime, Public Issues, Sports, Entertainment, Bollywood, Business, Lifestyle, Art & Culture, Tourism, Social Affairs, and more. Our mission is to deliver accurate, reliable, and impactful journalism while keeping our audience informed about important developments at local, national, and international levels. "NEWS NATIONAL WORLD – Trusted Digital Media for Accurate News & Meaningful Stories." -- Management & Editorial Team -- Managing Director (MD) Ankul Pratap Singh Baghel Mobile: +91 85168 70370 // Editor Gaurav Jain (Indore) Mobile: +91 98276 74717 // Associate Editor Aamir Khan Mobile: +91 90099 11100 // Divisional Bureau Chief (Indore) Pradeep Chaudhary Mobile: +91 94250 52518 // Rewa Editor Kushmendra Singh Mobile: +91 94247 01399 // Join NEWS NATIONAL WORLD Share local news, public issues, social activities, events, sports updates, and important information from your area with us. For News Coverage, Advertising & Business Inquiries: Mobile: +91 85168 70370 Email: allindiamedia12340@gmail.com Follow and join the NEWS NATIONAL WORLD (PVT. LTD.) WhatsApp Channel for fast, reliable, and authentic news updates. NNW TV | NNW NEWS

Leave a Reply

You missed

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading