(आलेख : राजेंद्र शर्मा)जंतर-मंतर पर केंद्रित जेन जी के हाल के आंदोलन के लगभग सभी प्रेक्षकों ने युवाओं की इस गोलबंदी की अन्य प्रमुख विशेषताओं के अलावा एक खासियत जरूर नोट की है। और यह खासियत है, मुख्यधारा के मीडिया के प्रति खुली होस्टिलिटी या बैर-भाव। गोदी मीडिया और उसमें भी खासतौर पर खबरिया चैनलों ने शुरूआत से इस आंदोलन के विरोध की भूमिका अपनायी। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के पहले एक दिन के धरने में, इंटरनेट पर उसके करोड़ों समर्थकों में से, कुछ हजार लोगों के ही जुटने के प्रचार के जरिए, इस नयी कोशिश को खारिज करने पर सारा जोर लगा दिया गया। लेकिन, बाद में जब जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया और हफ्ते भर बाद अनिश्चितकालीन भूख हड़तालों का सिलसिला शुरू हुआ, खबरिया चैनलों ने आम तौर पर इस आंदोलन को अनदेखा करने की ही रणनीति अपनायी। यह तब हो रहा था, जब सोशल मीडिया पर और जनतंत्र-समर्थक यूट्यब चैनलों के चलते, यह सारी घेरेबंदी भी इस आंदोलन की खबरों को दबा नहीं पा रही थी। नतीजा यह कि जंतर-मंतर पर जमावड़ा बढ़ता गया और गोदी मीडिया के खिलाफ लोगों का गुस्सा भी बढ़ता गया। टीवी चैनलों के माइक देखते ही, गोदी मीडिया हाय-हाय या गो बैक के नारे लगना और चैनलों के कनिष्ठ रिपोर्टरों को धरना स्थल से एक तरह से खदेड़ा जाना ही शुरू हो गया। यह पांच साल पहले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के समय जो हुआ था, उसी की पुनरावृत्ति थी। फर्क इतना था कि किसान आंदोलन के समय, गोदी मीडिया शुरू से ही उसके खिलाफ दुष्प्रचार छेड़ने की प्रतिक्रिया में, लोगों के बहिष्कार के निशाने पर आया था, जबकि इस बार जन-शत्रु के रूप में उसकी पहचान, उसके जान-बूझकर आंखें फेरने से ही शुरू हो चुकी थी। यह नतीजा था किसान आंदोलन के दौरान, जन-शत्रु के रूप में गोदी मीडिया की पहचान स्थापित होने के बाद से, उसके सत्ता की सेवा के लिए हमेशा जन-विरोधी हमलों के हथियार की भूमिका के लिए ज्यादा से ज्यादा तत्पर होते जाने का। अब गोदी मीडिया सिर्फ इस अर्थ में सत्ता की गोदी में बैठा यानी सत्ता का बचाव करने वाला मीडिया नहीं रहा था कि उसने सत्ताधारियों पर भोंकना बंद कर दिया था। अब वह सत्ता की ओर से, उसके विरोधियों या आलोचकों पर हमले का हथियार बन गया था। अब वह लैप डॉग से, सत्ता का बुलडॉग बन गया था। यह सच तब और खुलकर सामने आ गया, जब लंबे खिंचते धरने और भूख हड़तालियों की बिगड़ती हालत के चलते, मोदी पर दबाव बढ़ने लगा। हर रात इसकी आशंका की रात थी कि पुलिस बल के जरिए, जबर्दस्ती धरना स्थल को खाली कराया जा सकता है। यह सिलसिला 20 जुलाई के संसद मार्च के दिन तक जारी रहा, जब शाह की पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की विशाल संख्या को तितर-बितर करने के नाम पर, दमन की सारी सीमाएं ही पार कर लीं। उसने बिना वर्दी के बाहरी गुंडों, कील लगी लाठियों और पैलेट गनों व बंदूकों के इस्तेमाल से लेकर, पूरी तरह से अकारण निहत्थे लोगों पर हमले करने तक के सरासर आपराधिक हथकंडों का भी इस्तेमाल किया। इनकी सच्चाई सैकड़ों सेलफोन कैमरों के जरिए, सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में इसके बावजूद पहुंच गयी कि, जंतर-मंतर तथा आस-पास के पूरे इलाके में मोदीशाही ने कई घंटों के लिए इंटरनेट सेवाएं ही बंद करा दी थीं। जाहिर है कि इस दमन की सच्चाई, गोदी मीडिया के बावजूद, सारी दुनिया में पहुंच रही थी। याद रहे कि वांगचुक के धरना स्थल से उठाए जाने के बाद से, चैनलों के कैमरे किसी बड़े एक्शन को कवर करने के उम्मीद में जंतर-मंतर पर पहुंचे तो जरूर थे, लेकिन आंदोलन को कवर करने के लिए नहीं। जैसा कि जंतर-मंतर से लगातार रिपोर्टिंग करते रहे एक समाचार वेबसाइट के पत्रकार ने लिखा, ‘वे शिकार पर निकले थे’—आंदोलन के खिलाफ कोई बाइट, कोई तस्वीर पाएं, तो खबर चलाएं। कहने की जरूरत नहीं है कि इस पूरे दौर में गोदी मीडिया के सचेत रूप से शासन की एक अलग तरह की लाठी की भूमिका में ज्यादा से ज्यादा खुलकर सामने आने से, इस आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों ही नहीं, व्यापक स्तर पर आम जनता का भी गोदी मीडिया के साथ विरोध का रिश्ता और पुख्ता तथा तीखा ही हुआ है। गोदी मीडिया के दुर्भाग्य से यह स्थिति, सत्ताधारियों की सेवा के लिए उसकी उपयोगिता को और इस सेवा के बदले में मिलने वाले मेवा की मात्रा को भी तेजी से घटा ही रही है। खबरिया चैनलों के दर्शकों की संख्या से लेकर विज्ञापन राजस्व तक, सब में तेजी से गिरावट हो रही है। संसद मार्च पर बर्बर दमन चक्र, मोदीशाही को उल्टा पड़ गया। उसकी पुलिस बर्बरता की झांकी ही सारी दुनिया ने नहीं देखी, हमारे देश के विभिन्न शहरों में ही नहीं, अनेक विश्व महानगरों में भी, इस आंदोलन के समर्थन में उल्लेखनीय प्रदर्शन हुए। इधर दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी था और प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। समूचा विपक्ष एक स्वर में संसद में और संसद के बाहर, इस आंदोलन के पक्ष में आवाज उठा रहा था। इसी मुकाम पर, अपनी छवि का और संघ-भाजपा शासन का नुकसान सीमित करने की नीयत से, किसान आंदोलन के बाद एक बार फिर, नरेंद्र मोदी ने युवाओं के आंदोलन के सामने झुकना ही फायदेमंद समझा। मोदी की ‘सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं’ की अकड़ छोड़कर, धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा दिलाया गया, ताकि इस आंदोलन को खत्म कराया जा सके और जंतर-मंतर से आंदोलन खत्म भी हो गया। यहां तक कि गोदी चैनलों पर इस आंदोलन के विश्लेषण के नाम पर, कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ताओं के साक्षात्कार भी नजर आने लगे। लेकिन, मजबूरी में झुकने की बात दूसरी है, पर मोदी ने और जाहिर है कि उनके गोदी मीडिया ने भी, अपने खिलाफ बगावत करने वाले युवाओं को दिल से माफ नहीं किया था। नतीजा यह कि न सिर्फ आंदोलन के वापस लिए जाने के समय हुए समझौते के, इस सिलसिले में दायर किए गए सभी केस वापस लिए जाने के वादे को ईमानदारी से पूरा नहीं किया गया, खुद प्रधानमंत्री मोदी का आंदोलन के दौरान अपने लिए कथित रूप से अपशब्द कहे जाने को ‘माफ’ करने का स्वांग भी, झूठा निकला। हार से खिसियाई मोदीशाही की डबल-ट्रिपल इंजन सरकारों से लेकर, संघ प्रायोजित गुंडा वाहनियों तक के जरिए, इस आंदोलन में शामिल हुए युवाओं और खासतौर पर किशोरियों को, उनके वक्तव्यों से लेकर सोशल मीडिया पोस्टों तक के लिए, प्रताड़ित करने और डराने-धमकाने का सिलसिला लगातार जारी है। नोएडा में एक पंद्रह वर्षीया स्कूली छात्रा के परिवार को तो अपना ठिकाना बदलने पर मजबूर होना पड़ा है। राजा से बढ़कर उसका वफादार नजर आने की कोशिश में गोदी मीडिया इस खेल में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है और युवाओं के इस आंदोलन को बदनाम करने के लिए बहाने गढ़ रहा है। इसमें, 20 जुलाई की घटनाओं में पुलिस को विक्टिम बनाने के जरिए, इस बगावत के लिए युवाओं को अपराधी और मोदी को विक्टिम बनाने का अभियान शामिल है। यह मोदीशाही और उसके गोदी-चढ़ाए मीडिया, दोनों को ही युवाओं की नजरों में पक्का जन-शत्रु बनाता जा रहा है। ताजातरीन विधानसभाई उप-चुनाव के नतीजे और खासतौर पर बांकीपुर सीट से तीन दशक बाद भाजपा की हार तथा दतिया से कांग्रेस की वापसी और सबसे बड़े धन्नासेठों के खबरिया चैनलों के तेजी से बढ़ते घाटे, इसी का इशारा कर रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन नाना पटवारी प्रकरण में नया मोड़, शिकायत वापस लेने के लिए 20 लाख देने का आरोप शासन के नैतिक खोखलेपन के ख़िलाफ़ छात्रों का विद्रोह