1. गाय-गोबर है चॉकलेटी : विष्णु नागर

तुमसे न लड़ा जाएगा देश पर आए इस आर्थिक तूफान से। मोदी जी और उनके भाइयो-बहनों, तुम अब रहने दो। तुम्हें‌ तूफान के समय घर में छिपना और ईश्वर से प्रार्थना करना आता है, लड़ना नहीं। लड़ोगे भी तो काली टोपी पहनकर डंडे से, इसलिए कृपया रहने दो। आजादी की लड़ाई के समय जब यह कृपा तुमने नहीं की थी, तो अब शरीर को क्यों कष्ट देते हो, रहने दो! देश मरता है तो मरने दो। तुम अपनी-अपनी मेलोनियों को  मेलोडी चाकलेट खिलाना, मत भूलो!

हां तुम इतना अवश्य कर सकते हो कि इस आर्थिक तूफान से भारत को निकालने के लिए यज्ञ-हवन  करो, जैसे कि तुमने ट्रंप और नेतन्याहू के लिए किया था।अब फिर करो। बार-बार करो। 7, लोक कल्याण मार्ग पर तो अवश्य ही करो। खूब शुद्ध घी और चंदन की लकड़ी की बलि देकर पूरे वातावरण को धुंआ-धुंआ कर दो, शायद इससे आर्थिक तूफान भी धुआं-धुआं हो जाए! इससे भी न रुके, तो तुम 11 हजार लीटर दूध, ढाई सौ साड़ियां और काजू-बादाम नर्मदा में बहा दो। हो सकता है, नर्मदा मैया इससे खुश हो जाएं और इस तूफान से देश को बाहर निकाल लें! मोदी जी से कहो कि कल से वे फिर मंदिरों के चक्कर लगाना शुरू कर दें। इस बार अपने लिए नहीं, देश की आर्थिक बहबूदी के लिए प्रार्थना करें। शायद इससे रास्ता निकल आए! और हां ताली-थाली बजाने का ट्राइड और टेस्टेड रास्ता तो है ही, उस पर चलें। भारत ने कोरोना संकट का ‘सफलतापूर्वक ‘ सामना तो इसी तरह किया था न! क्यों न आज रात नौ बजे से ही ताली-थाली अभियान शुरू कर दिया जाए! और हां, पश्चिम बंगाल में मदरसों में वंदे मातरम् के सभी छंद गाने का आदेश दिया गया है, उसके सकारात्मक प्रभाव से भी यह संकट दूर हो सकता है। मुसलमानों को बक़रीद चैन से मनाने न देने से भी आर्थिक तूफान, बांग्लादेश या पाकिस्तान की तरफ मुड़ जा सकता है। तुम कुछ और करोगे, मतलब आर्थिक उपाय करोगे, तो देश को और संकट में फंसा दोगे। वह तुम्हारा मार्ग नहीं है। वह तुम्हारा धर्म और कर्म नहीं है।

तूफान सामने है और तुम्हारा लीडर आज भी ‘विकसित भारत’ के नारे की कीचड़ में लिथड़ा पड़ा है। उसे अच्छी तरह मालूम है कि विकसित-टिकसित भारत न कुछ था, न कुछ है और न कुछ होने वाला है। अगली दस सदियों का भी उसे समय मिले तो वह ‘विकसित भारत’ नहीं बना सकता। बिलाशक वह इस देश को नफ़रत में विकासशील से ‘विकसित भारत’ की मंजिल तक पहुंचा सकता है। इसकी गरीबी का और ‘विकास’ कर सकता है। डालर अरबपतियों में देश को अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर सकता है। सरकारी स्कूल बंद करने की दिशा में उत्तरोत्तर विकास करते-करते वह एक दिन ऐसा ला सकता है, जब पूरे देश में एक भी सरकारी स्कूल न हो, एक भी सरकारी अस्पताल न हो, उनकी जगह आरएसएस की शाखाएं हों या ‘प्राचीन मंदिर’ हों! वह बचे-खुचे जंगल, जमीन और कारखानों को अडानी को भेंट करने की दिशा में सौ कदम और आगे बढ़ते हुए भारत को और अधिक ‘विकसित’ बना सकता है!

‘विकसित भारत’ यहां अवश्य बनेगा, क्योंकि  विदेशी निवेशक यहां से भाग चुके हैं। जो अभी तक नहीं भागे हैं, वे सामान बांध चुके हैं। हजारों करोड़ रुपए, डालर का रूप धारण करके अमेरिका- चीन आदि मुल्कों में पधार चुके हैं। जिन्होंने इस देश के नागरिक के रूप में अनाप-शनाप धन बटोरा है, वे ‘विकसित भारत’ का संकल्प पूरा करने के लिए विदेशों की नागरिकता हर साल ग्रहण कर रहे हैं। बेशक इनमें से ज्यादातर भगवा हैं, ‘मोदी-मोदी’ हैं, मगर उन्हें पता है कि इस भगवा में, इस ‘मोदी-मोदी’ में उनका और उनकी संततियों का भविष्य सुरक्षित नहीं है। जब मोदी जी उनके ‘पितृ देश’ में आएंगे, तो ये भी ‘भारत की मां की जय’ बोलने आ जाएंगे। जरूरत पड़ी तो ‘मदर लैंड’ के लिए दो आंसू भी बहा देंगे। ‘मोदी-मोदी ‘का नारा लगा जाएंगे। फिर वहां बस कर ये मोदी का ‘विकसित भारत’ बनाने की साधना करेंगे। और तो और, जो बड़े-बड़े अरबपति यहां अभी भी डटे और फंसे हुए हैं, वे भी अपना माल धीरे-धीरे विदेशों में खिसका रहे हैं, ताकि मोदी जी का ‘विकसित भारत’ का स्वप्न साकार हो सके।

तुम्हारे ‘विकसित भारत’ में इस आर्थिक तूफान से निकलने का रास्ता नहीं है, क्योंकि तुम्हारा फोकस हमेशा से छोटे-छोटे, घटिया-घटिया कामों पर रहता है। इसे-उसे परेशान करने का ‘संकल्प’ पूरा करने पर रहता है। देश संकट में है और तुम्हारी राज्य सरकारें इस बात पर आमादा हैं कि किसी भी तरह इस देश का मुसलमान बकरीद खुशी से मना न सके। पश्चिम बंगाल में चुनाव हो चुके हैं, भाजपा सरकार बन चुकी है, फिर भी चैन नहीं है। अभी भी एसआईआर के फंदे में लोगों का गला फंसाने का अभियान जारी है। वंदे मातरम् के छहों छंद मदरसों के छात्रों से गवाने पर फोकस है। संकट कितना ही बड़ा हो, मगर उमर खालिद को छह साल बाद भी लंबी अवधि की जमानत न मिले, इस पर फोकस है। फोकस अडानी को जालसाजी के जंजाल से निकालने पर है। कई कंपनियों के दिवालिया होने के कगार पर हैं, मगर फोकस राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर है। इनका फोकस विपक्ष को नीचा दिखाने से हटता ही नहीं। दुनिया छूट जाए, मगर गाय और गोबर इनसे  छूटना नहीं। मगर जब इनकी राजनीति की हवा निकालने के लिए पश्चिम बंगाल के मुसलमान गाय को ‘राष्ट्रीय पशु ‘ घोषित करने की मांग करते हैं, तो इनकी जीभ तालू से चिपक जाती है! एं-एं भी इनके मुंह से  निकलता नहीं!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
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2. और अब कॉकरोच ‘जिहाद’! : राजेंद्र शर्मा

लीजिए, अब कॉकरोच जिहाद शुरू हो गया। जहां से देखो, वहां से निकल-निकल कर कॉकरोच आ रहे हैं। मैं भी कॉकरोच, मैं भी कॉकरोच का शोर मचा रहे हैं। और बहाना, न्यायमूर्ति के बोल-बचन से नाराजगी का है, पर असल में एक सौ चालीस करोड़ भारतवासियों के चुने हुए प्रधानमंत्री की हंसी उड़ा रहे हैं।

और हंसी भी उड़ा रहे हैं डिजिटल दुनिया की सुरक्षा के पर्दे के पीछे से, जहां भक्त तो भक्त उनके भगवान भी न पूरी तरह से दबा सकते हैं, न बहुत ज्यादा डरा सकते हैं और न अपने कानफोड़ू शोर से परेशान कर के भगा सकते हैं।

खुद को कॉकरोच बताते-बताते, जेन ज़ी और दूसरी पीढ़ियों के भी युवा, खुद को कॉकरोच साबित करने पर तुल गए हैं — निडर भी और अजर-अमर भी। यूं ही थोड़े ही कहते हैं कि नाभिकीय प्रलय के बाद भी, पृथ्वी पर कॉकरोच बचे रहेंगे।

क्या कहा? इसमें जिहाद कहां से आ गया? इसे सिर्फ युवाओं की नाराजगी की व्यंग्य भरी हंसी समझने की गलती कोई नहीं करे। बेशक, इसमें युवा हैं। सौ-दो सौ नहीं, हजार-दस हजार नहीं, लाख-दस लाख भी नहीं, करोड़ों युवा हैं। बेशक, इसमें युवाओं की नाराजगी है, बेशुमार नाराजगी। खराब पढ़ाई पर नाराजगी। पेपर लीक पर नाराजगी। फीस की लूट पर नाराजगी। रोजगार नहीं मिलने पर नाराजगी। हर चीज में लुटने पर नाराजगी। झूठे बहानों से बार-बार ठगे जाने पर नाराजगी। कुछ कहने चलें, तो तरह-तरह से मुंह बंद किए जाने पर नाराजगी। और हां हर वक्त, हर जगह, हर तस्वीर में, हरेक स्क्रीन पर, एक ही चेहरा देखने पर भी नाराजगी। और इस नाराजगी का एक व्यंग्य भरी हंसी के रूप में प्रकटीकरण तो हइए। प्रकटीकरण भी विस्फोटक किस्म का। विस्फोट भी इतना तेज कि एक बार को तो भक्तों के भगवान का आसन भी डोल गया। पर यही तो इसके जिहाद होने का सबूत है।

यह जो विपक्ष का नेता बार-बार शोर मचा रहा है कि आर्थिक तूफान आ रहा है, सब कुछ तहस-नहस करने वाली आंधी आने वाली है वगैरह, इसका मतलब समझते हैं? इसे सिर्फ आर्थिक तबाही की चेतावनी समझने की गलती कोई न करे। यह तो नाभिकीय प्रलय का इशारा है। यह कॉकरोचों को इसका चेत दिलाना है कि प्रलय उनके हक में है। प्रलय में वही बचेंगे। जब प्रलय में वही बचेंगे, तो प्रलय के बाद उन्हीं का राज होगा। यानी यह मोदी जी का आसन गिराने के लिए प्रलय को न्यौतने का षडयंत्र है। कॉकरोचों को इस मोदी विरोधी षडयंत्र  का मोहरा बनाने का षडयंत्र है। कॉकरोचों, क्या तुम्हें विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता के खिलाफ षडयंत्र का हिस्सा बनना मंजूर है!

और हां! मोदी जी के विरोधियों के इसके दावों से कॉकरोच भ्रमित हर्गिज नहीं हों कि वे तो अजर-अमर हैं। भक्त इस वास्तविक दुनिया में, वास्तविक कॉकरोचों को, वास्तव में मार कर, जगह-जगह अपनी मारकता का प्रदर्शन भी कर चुके हैं। भक्त दिखा रहे हैं कि अल्पसंख्यकों, महिलाओं, दलितों और अन्य कमजोरों को ही नहीं, खुद को अजर-अमर मानने वाले कॉकरोचों को मारने में भी, उनके हाथ नहीं कांपेंगे। वर्चुअल दुनिया से उन्हें मिटाने के लिए भक्तों के भगवान की सरकारी एजेंसियां ही काफी हैं – एक-एक एकाउंट बंद करा देंगी। और रीयल दुनिया में, काला हिट समेत तरह-तरह के कीटनाशकों के साथ, भक्तगण पूरी तरह से तैयार हैं। कोई यह नहीं समझे कि मोदी जी की कमांडरी में भक्तगण, चुनाव जीतना ही जानते हैं। भक्त सड़कों पर युद्ध जीतना और भी जोरदारी से जानते हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी ने पांच दिन में वर्चुअल दुनिया में फोलोअरों की संख्या में, स्वयं भक्तों के भगवान की पार्टी को पीछे छोड़ दिया होगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कॉकरोच रीयल दुनिया में भक्तों के भगवान पर भारी पड़ जाएंगे।

फिर यह तो इसलिए भी जिहाद का मामला है कि यह षडयंत्र लोकल नहीं है, इंटरनेशनल है। मोदी जी के विरोध के चक्कर में, उनके विरोधी उनके खिलाफ षडयंत्र तक में लोकल  के लिए वोकल होने को तैयार नहीं हैं। इन्हें षडयंत्र तक इंटरनेशनल चाहिए। और इंटरनेशनल भी अमरीका-इस्राइल वगैरह वाला नहीं, जेहादी। किरण रिजिजू जी ने फौरन गिनती कर के बता दिया कि कॉकरोच जनता पार्टी ने, पाकिस्तानी फॉलोवरों के बल पर मोदी जी की पार्टी को वर्चुअल दुनिया में फोलोवरों की संख्या में मात दी है। अब मोदी जी की सरकार में रिजिजू बार-बार मंत्री बनाए गए हैं, उनकी बात झूठी तो हो नहीं सकती है। अब कॉकरोच पार्टी वाले कहते रहें कि उनके तो पचानवे फीसद फॉलोवर भारतीय हैं, हम नहीं मानेंगे।

वैसे भी कॉकरोच पार्टी के भारतीय फोलोवर तो तब होंगे, जब भारत में कॉकरोच होंगे। पर भारत में तो कॉकरोच हैं ही नहीं। असल में कॉकरोचों को झूठे ही भारतीय बताया जा रहा है, जो भारत में घुसपैठ कराने के षडयंत्र का हिस्सा हो सकता है।

खैर, यह मोदी जी के स्वच्छता मिशन को बदनाम करने के  षडयंत्र का हिस्सा तो है ही। सभी जानते हैं कि कॉकरोच गंदी जगहों में पाए होते हैं। अगर यह सच भी हो कि कॉकरोच गंदगी को साफ करते हैं, जिसका दावा खुद को कॉकरोच बताने वालों ने करना शुरू कर दिया है, तब भी कॉकरोचों के होने के लिए पहले तो गंदगी का होना जरूरी है। भारत में भी कॉकरोच तब हुआ करते थे, जब भारत में गंदगी हुआ करती थी। पर 2014 में भारत को गंदगी की मुक्ति के साथ कॉकरोचों से भी मुक्ति मिल गयी। उसके बाद इक्का-दुक्का कोई भारतीय कॉकरोच अभिजीत दिपके की तरह उड़कर कहीं इधर-उधर चला गया हो और बच गया हो, तो बात दूसरी है, पर भारत में अब कोई भारतीय कॉकरोच नहीं हैं। और जब कोई भारतीय कॉकरोच हैं ही नहीं, तो कॉकरोच वोटर कहां से होंगे? तब मोदी जी किसी कॉकरोच जनता पार्टी की परवाह क्यों करें!

वैसे भी मोदी जी कॉकरोचों से डरने वालों में थोड़े ही हैं। छप्पन इंच की छाती सिर्फ दिखाने को ही थोड़े ही ढो रहे हैं। भक्तों और भगवान ने मिलकर, बारह साल में बहुत से जिहाद नाकाम किए हैं, एक जिहाद और सही! कॉकरोचो, तुम अंधेरे कोनों में भागकर छुप जाओ। वर्ना तुम्हारी खैर नहीं। तुमने ट्रंप-नेतन्याहू के फ्रेंड को छेड़ दिया है।

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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