(आलेख : बादल सरोज)

पिछले सप्ताह कुनबे ने भारत की जगहंसाई कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक तरफ ट्रम्प के माय डिअर फ्रेंड मोदी की सरकार और दूसरी तरफ इस सरकार के रिमोटधारी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने दुनिया के सामने देश की जैसी दयनीय पिछलग्गू की छवि बनाई है, उसकी कोई मिसाल शायद ही कोई और मिले। दुनिया के नन्हे और आर्थिक, सैनिक और हर तरह से कमजोर देश भी, जिस जिल्लत को बर्दाश्त नहीं करते, ऐसे सार्वजनिक अपमान पर ये दोनों – मोदी नीत भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार और आरएसएस — शरणागत और चरणागत दोनों ही दिखे और पूरी निर्लज्जता के साथ दिखे। हडसन इंस्टिट्यूट में हुए एक खुले संवाद में, राम माधव ने अमरीका के विदेश मंत्रालय की अधिकारी — डिपार्टमेंट ऑफ़ स्टेट की डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी — बेथनी पोलोस मोरिसन की मौजूदगी में याचना के सुरों को निम्न से भी निम्नतर करते हुए जिस कातरता का परिचय दिया है, उसे कायरता कहना भी कम होगा। यह उससे भी कहीं आगे की बात है और इसलिए और अधिक नाकाबिले बर्दाश्त है, क्योंकि ऐसा वे निजी या दलीय हैसियत से नहीं, भारत के प्रतिनिधि के नाते कह रहे थे। 

राम माधव ने अमरीकी विदेश मंत्रालय की अधिकारी के सामने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा कि ‘अमरीका ने कहा ईरान से तेल खरीदना बंद करो, रूस से तेल मत खरीदो, हमने तेल खरीदना बंद कर दिया। अमरीका ने 50% टैरिफ लगा दिया, हमने मान लिया, बाद में औरों से ज्यादा 18% के टैरिफ लगा दिया, हमने मान लिया। विपक्ष की कड़ी आलोचनाओं के बाद भी हमने अमरीका का हर कहा माना। इसके बाद भी भारत पर अमरीका भरोसा नहीं करता, आखिर वह भारत से चाहता क्या है?’ करीब डेढ़ अरब की विशाल आबादी और कोई 7 हजार वर्ष पुरानी सभ्यता की सत्ता, अपराधी और दुष्ट सरकार के सामने  मुम्बईया फिल्म के कॉमेडियन राजपाल यादव के संवाद में ‘अब क्या बच्चे की जान लोगे’ की गुहार लगा रही थी।

इस अत्यंत शर्मनाक बयान पर देश भर में हुई प्रतिक्रिया और दुनिया भर में पिटी भद्द के बाद राम माधव ने माफ़ी मांगी है और रूस के तेल के बारे में कही बात को गलत तथ्यों पर आधारित बताया। हालांकि उनकी यह सफाई बिलकुल लचर है, क्योंकि हाल में होरमुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने के बाद अमरीका द्वारा रूस से तेल खरीदने की महीने भर की ‘अनुमति’ की खबर अक्खा दुनिया को पता है।

राम माधव न तो अपरिपक्व अज्ञानी हैं, ना ही वे कोई हाशिये के आदमी – फ्रिंज एलिमेंट — हैं। संघ और भाजपा दोनों में उनकी विशेष हैसियत है। 1981 से संघ में हैं, उसके प्रचारक हैं। कोई बीस बरस तक संघ के प्रकाशनों के पत्रकार और उसके ‘भारतीय प्रज्ञा’ जैसे प्रकाशन के सम्पादक रहे हैं, इसलिए इतना तो वे अच्छी तरह जानते ही हैं कि कहाँ क्या और कितना बोलना है। आरएसएस के आधिकारिक प्रवक्ता रहे हैं, भाजपा के महासचिव और मुख्य प्रवक्ता रहे हैं। वे नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य भी हैं, जो भारतीय राजनीति के मुद्दों, चुनौतियों और अवसरों पर ध्यान केंद्रित करता है। इसलिए वैदेशिक मामलों में शब्द का महत्त्व समझते ही होंगे।

राम माधव संघ – जनसंघ – भाजपा के अब तक के लुका-छुपी वाले संबंधों के इतिहास में अकेले आपला मानुष हैं, जो एक साथ भाजपा के राष्ट्रीय नेता और आरएसएस की केन्द्रीय कार्यकारिणी दोनों में रहे हैं और हैं। यह ऐसी हैसियत है, जो दीनदयाल उपाध्याय से लेकर अटल, अडवाणी, यहाँ तक कि नरेन्द्र मोदी तक की नहीं रही। वे जितने संघ के चहेते और भाजपा के चेहरे हैं, उतने ही सगे अम्बानी और अडानी के भी हैं। इतने सगे कि तब के जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल सतपाल मलिक ने  सार्वजनिक तौर पर कहा था कि अम्बानी के नियम विरुद्ध काम करवाने के लिए उनके पास 300 करोड़ रूपये की रिश्वत की पेशकश लेकर स्वयं राम माधव पहुंचे थे। जो व्यक्ति लीडर और डीलर दोनों हो, उसके तथ्य या शब्द गलत होंगे, इस पर शाखा में जाने वाला भी विश्वास नहीं कर सकता।

अभी इस गिरावट के सदमे की कोफ़्त से देश उबरा भी नहीं था कि तभी अमरीका के प्रति मान-सम्मान-स्वाभिमान समर्पित करने की दूसरी शर्मनाक बानगी मोदी सरकार ने स्वयं पेश कर दी। ट्रम्प ने भारत और चीन को नरक बताते हुए एक निहायत अपमानजनक भारत तिरस्कारी बयान जारी कर दिया। कोई भी देश इस पर कड़ी प्रतिक्रिया करता, निंदा और भर्त्सना करता। मगर खुद को राष्ट्रवादी बताने वाली मोदी सरकार औपचारिक आपत्ति भी नहीं जता पाई। इस बारे में पूछे जाने पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ‘हाँ,हमने ऐसी रिपोर्ट्स देखीं हैं …. बस इतना ही कहूंगा’ कहकर सरे आम अमरीका-भीरुता का परिचय दे दिया। जब चीन ने कड़ा रुख अपनाते हुए ट्रम्प प्रशासन और अमरीका को आईना दिखाया, अपमान भारत का था जवाब ईरान ने दे दिया।

इससे हुई थुक्का फजीहत को टालने के लिए भैंस की पूँछ पकड़ने की अदाकारी दिखाई गयी। ‘भारत के नेता एक्टिंग अच्छी करते हैं’ की व्हाईट हाउस की चुटकी को चरितार्थ करते हुए पहले ट्रम्प, वाशिंगटन या वहां के किसी अधिकारी से नहीं, दिल्ली में बैठे अमरीकी राजदूत के भी प्रवक्ता से कहलवाया गया कि ‘”राष्ट्रपति ने कहा है कि भारत एक महान देश है, जहां शीर्ष पद पर मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं।” मजे की बात यह थी कि ऐसा ट्रम्प ने कब कहा था, इसका स्रोत बताये बिना ही, वह भी  आधिकारिक बयान में नहीं, पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में कह दिया गया।

इस पूरे ड्रामे के बाद, एक तरह से उनकी अनुमति मिलने के बाद, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक बयान जारी किया। मगर इसमें भी कातरता और खुश करने की आतुरता छलकी पड़ रही थी। बजाय निंदा, खेद, अफ़सोस, दुख, खण्डन, असहमति जैसे किसी शब्द का इस्तेमाल किये प्रवक्ता ने बस इतना भर कहा कि, “हमने वो बयान देखे और बाद में इस पर अमरीकी दूतावास की प्रतिक्रिया भी देखी। ये टिप्पणियाँ स्पष्ट रूप से बिना जानकारी के और अनुचित हैं। ये निश्चित रूप से भारत-अमेरिका संबंधों की असलियत को नहीं दर्शातीं, जो लंबे समय से आपसी सम्मान और साझा हितों पर आधारित रहे हैं।” इस मामले में अप्रसन्नता व्यक्त करने की सबसे शाकाहारी मानी जाने वाली – अमरीकी राजदूत को विदेश मंत्रालय बुलाने —  की कूटनीति भी अपनाने का साहस मोदी सरकार नहीं जुटा पाई, जबकि ठीक एक दिन पहले, एक अलग मामले में,  ईरान के राजदूत को बुलाकर कूटनीति का यह रूप आजमाया जा चुका था।

ध्यान रहे, भारत और चीन को नरक बताने वाली ट्रम्प की यह टिप्पणी सिर्फ आप्रवासन तक सीमित नहीं थी। यह सरासर नस्लवादी बकवास थी और कुछ सप्ताह पहले अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा ‘श्वेत सर्वोच्चता’ के महान गौरव की बहाली और दुनिया को पश्चिमी प्रभुत्व की दुनिया में बदलने और बाकी की दुनिया और उसके संसाधनों पर फिर एक बार इस कथित विकसित पश्चिम का वर्चस्व और आधिपत्य स्थापित करने के खुले आह्वान   की निरंतरता में थी। इसी रौ में ट्रम्प ने भारत को उन 23 देशों की सूची में भी डाल दिया, जिन्हें वह नशीली दवाओं का नेटवर्क चलाने वाले देश मानता है। अमरीकी विदेश नीति के बारे में तनिक भी जानने वाले जानते हैं कि देशों पर निशाना साधने के इसके दो आजमाए बहाने हैं : विनाशकारी हथियार और नशीली दवाओं का कारोबार!! इन्हें लेकर वह पहले एक माहौल बनाता है, उसके बाद प्रतिबन्ध लगाता है और आखिर में चढ़ाई कर देता है। इस सबके बाद भी भारत सरकार का लिजलिजा रुख उस रीढ़ विहीन साम्राज्यवादपरस्ती का उदाहरण है, जिसे मोदी सरकार ने अपनाया हुआ है।

मोदी राज में बाकी सबके साथ-साथ विदेश नीति का भी कुंडा हुआ है। मगर अब तो उसकी बची-खुची साख मिटाने के लिए इसका भी संघीकरण करने का सिलसिला शुरू कर दिया गया है। हडसन इंस्टिट्यूट में संघ का हाई पावर डेलीगेशन यही कर रहा था। हडसन इंस्टिट्यूट और इंडिया फाउंडेशन मिलकर यहाँ नीतियों के संबंध में संवाद – पालिसी डिस्कशन — के लिए इकट्ठा हुए थे। पालिसी बनाना संबंधित देशों की सरकारों का काम होता है। इसे राजनीतिक नेतृत्व स्वयं या उसके मार्गदर्शन में कूटनीति के विशेषज्ञ करते हैं। यहाँ अमरीका की तरफ से उसके विदेश मंत्रालय के अधिकारी मौजूद थे, जबकि  भारत की तरफ से आरएसएस महासचिव – सरकार्यवाह – दत्तात्रय हौसबोले और राम माधव सहित आरएसएस के आला पदाधिकारी थे।

ये कौन हैं? इन्हें देश की नीति बनाने का जनादेश किसने दिया? किसी ने नहीं। फिर ये हडसन इंस्टिट्यूट में क्या कर रहे थे? वही कर रहे थे, जिसके बारे में ट्रम्प ने एक बार बोला था कि ‘मोदी मुझे खुश करना चाहते हैं।“ संघ पदाधिकारियों के कहे-बताये को देखकर लगता है कि उसी तर्ज पर संघ भी ट्रम्प और अमरीकी शासकों को खुश करने गया था। यह बात उसने भी मानी और कहा कि आरएसएस का अमेरिका में “मिशन” मुख्य रूप से संगठन के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में एक व्यापक वैश्विक संपर्क और वैचारिक स्पष्टीकरण अभियान है। होसबाले ने हडसन इंस्टीट्यूट में माना  कि अमेरिका में आरएसएस के बारे में कई गलत धारणाएं हैं।

रिश्तों को बढाने, पालने-पोसने वाले इस ‘थ्राइव’ 2026 शिखर सम्मेलन में बोलते हुए होसबाले बोले कि, ‘लगातार हुए आक्रमणों के कारण, जो परंपराएं नष्ट हो गई थीं, अब हम इन्हें फिर से जीवित कर रहे हैं।‘ इस बारे में मोदी सरकार के कई काम उन्होंने गिनाये। अमरीकियों के आगे उन्होंने आरएसएस का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करते हुए इसकी समाज सेवा, संस्कार, संस्कृति  उत्थान की घिसी-पिटी  कथा सुनाई। उनकी निगाहों में खुद को अच्छा साबित करने की धुन में खुद को सेक्युलर साबित करने तक जा पहुंचे। पड़ोसियों के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा कि “राजनीतिक हितों, इतिहास की गलत व्याख्या और अन्य कारणों से समय-समय पर तनाव रहे हैं। आरएसएस अल्पसंख्यकों के एक समूह और उनके नेतृत्व के साथ ऐसी बातचीत में लगा हुआ है।”

इसके लिए अपनी धार्मिक पहचान से पीछा छुड़ाने की हड़बड़ी में संघ महासचिव ने न सिर्फ हिन्दू धर्म से ही नाता तोड़ लिया, बल्कि हिन्दू धर्म के अस्तित्व से ही इंकार कर दिया। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि “हिंदू कोई धर्म नहीं है। आरएसएस ने हमेशा सांस्कृतिक लोकाचार और सभ्यतागत मूल्यों पर जोर दिया है, जिनका किसी धर्म से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं है।’

यह सारी कवायद उस अमेरिका में हो रही थी, जिसके धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े आयोग “यू एस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम’ ने इसी 4 मार्च को आरएसएस को अन्य धर्मों के अनुयायियों की हत्याओं, सामूहिक बलात्कार आदि-इत्यादि का दोषी बताकर अमेरिकी सरकार से कहा था कि वह इस पर प्रतिबन्ध लगाए और इससे जुड़े व्यक्तियों के अमरीका प्रवेश पर रोक लगाए। अब जिसे कुनबा पुण्य और प्रतापी दोनों मानता है, उस अमरीका के आगे अपनी छवि सुधारनी ही होगी। पहले करोड़ों डॉलर देकर एक एजेंसी को नियुक्त किया। उससे काम बनता नहीं लगा, तो अब बड़े-बड़े पदाधिकारी खुद पहुँच गए।

इस मौके पर छवि सुधारने के लिए लॉबीइंग करने वाले एक एजेंट मौजूद थे – पालिसी डिस्कशन के नाम पर छवि सुधारो का यह आयोजन उन्हीं ने आयोजित कराया था। इसमें कितने पैसे लगे और एक अपंजीकृत ‘सांस्कृतिक’ संगठन के पास ये पैसे कहाँ से आये, यह बाद का सवाल है। अमरीकी कमीशन की सिफारिश के अलावा ‘कुछ तो पैगामे जबानी’ मोदी का भी रहा होगा । उनका माय डिअर फ्रेंड भी इन दिनों उनके मजे लेने से नहीं चूक रहा। बहरहाल संघ के मिशन अमरीका का जो भी गोपनीय-अगोपनीय मकसद रहा हो, उसमें भारत की संप्रभुता का मान-सम्मान नहीं था। अगर होता तो, अमरीकी नीति-निर्धारकों के सामने अपना गान करने वाले संघ नेताओं ने भारत को नरक बताने वाले ट्रम्पियापे पर अवश्य आपत्ति की होती। मगर वे अंग्रेजों के जमाने की अपनी विरासत पर डटे रहे और चूं तक नहीं की।

हालांकि इस खर्चीली कवायद का कुछ फायदा हुआ होगा, ऐसा लगता नहीं है। इसलिए कि इस पूरे साफ़-सफाई, स्पष्टीकरण महोत्सव को अमरीकी मीडिया में कोई जगह नहीं मिली, मगर अमरीकी पत्रकार का वह विडियो जरूर वायरल हो गया जिसमें वह सवाल पूछता जा रहा है और राम माधव अपनी कार की तरफ दौड़ लगाते जा रहे हैं। पीटर फ्रेडरिक नाम के इस पत्रकार ने माधव से जो सवाल पूछे, उनमें ‘आप अमरीका की धरती पर क्यों हैं? आपका एजेंडा क्या है? किससे मिल रहे हैं? क्या कोशिश कर रहे हैं?’ से लेकर ईसाईयों को जिंदा जलाने, मुस्लिम महिलाओं से सामूहिक बलात्कार करने, ईसाईयों और मुसलमानों के नरसंहार, ननों के साथ बलात्कार, बीफ खाने पर लिंचिंग आदि से जुड़े सवाल थे। हडसन इंस्टिट्यूट के सजे-धजे सभागार में खुद को सेक्युलर बता रहे संघ के नेता बाहर निकलते ही पत्रकार के सवालों पर भागते हुए नजर आये।

अब तक के इतिहास में अब तक सबसे अलग-थलग और लगभग अकेले से पड़े अमरीका और खुद अमरीकी स्टैण्डर्ड से भी अब तक के सबसे घटिया राष्ट्रपति के साथ निकटता बढाने के लिए इतने लालायित संघ और भाजपा से सवाल बनता है कि ट्रम्प का पूजन, अमरीका का अर्चन करके मयूर नृत्य करते हुए भारत की साख और विदेश नीति का तर्पण करने पर काहे आमादा हैं? 

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव है। संपर्क : 94250-06716)

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