(मई दिवस पर विशेष आलेख : बादल सरोज)

इस बार के मई दिवस की तकलीफ देने वाली विशेषता यह है कि यह उन हालात को साक्षात साकार करने वाले समय में आया है, जिनके खिलाफ 1886 में शिकागो के मजदूरों ने जंग शुरू की थी : शहादतें दी थीं। यूं भारत में हावड़ा के रेलवे मजदूर इससे पहले भी यही मांग : आठ घंटे काम की मांग को लेकर हड़ताल कर चुके थे, मगर शिकागो की शहादतों ने इसे दुनिया भर के मजदूरों की आठ घंटे ही नहीं, पूँजीवाद के खात्मे की मांग के संघर्ष में बदल दिया।

इसी लड़ाई और उसके साथ मजदूर वर्ग की अगुआई में रूस सहित दुनिया के एक बड़े हिस्से में समाजवादी समाज की स्थापना ने आठ घंटे कार्य दिवस को वास्तविकता में बदल दिया। आज ठीक वही उपलब्धि खतरे में है। पूँजीवाद के भेड़िए मजदूरों को चींथने, भभोड़ने के लिए लपक रहे हैं। थोड़े-बहुत उजाले को भी बुझाने और अन्धकार का साम्राज्य कायम करने की हर संभव कोशिशें की जा रही हैं।

12 फरवरी की देशव्यापी हड़ताल के बाद हाल के दिनों में बरौनी, पानीपत, गुड़गाँव, नोएडा, फरीदाबाद, सूरत  सहित सैकड़ों औद्योगिक केंद्रों में लाखों मजदूर सीधे लड़ाई में उतरे हैं और आठ घंटे काम तथा समुचित वेतन की मांग को लेकर अपने गुस्से का इजहार किया है। आक्रोश के इस विस्फोट ने इस शर्मनाक सच्चाई को उजागर किया है कि देश की राजधानी की नाक के नीचे के इलाकों से लेकर प्रधानमंत्री के सूरत तक में देश के मेहनतकश कितनी शर्मनाक स्थिति में काम कर रहे हैं, नारकीय जीवन जी रहे हैं। इसी तरह का गुस्सा तेलंगाना, कर्नाटक में भी फूटा है, जहां हजारों संविदा श्रमिक अपने अधिकारों — न्यूनतम वेतन, 8 घंटे का कार्यदिवस, नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान — के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 

इन सबके साथ सरकारें क्या कर रही हैं? वे श्रमिकों को अधिकार देने, उनके संवैधानिक अधिकारों का अमल सुनिश्चित कराने के बजाय मजदूरों को पीट रही हैं। उनके  नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। यह सब जानते हैं कि यह दमन केवल कॉर्पोरेट लूट को बचाने के लिए किया जा रहा है। यह अलग बात है कि इतने कठोर दमन, गिरफ्तारी और धमकियों के बावजूद श्रमिकों ने अद्भुत साहस दिखाया है।

लूट कितनी भयावह है, यह इन इलाकों और इस दौर के शोषण की प्रवृत्ति को लेकर हुए कुछ अध्ययनों ने दर्ज किया है। अर्थशास्त्री वी. अनंथा नागेश्वरन ने आर्थिक सर्वेक्षण में कहा कि कॉर्पोरेट सेक्टर “मुनाफ़े में तैर रहा है”, जबकि वेतन वृद्धि सुस्त बनी हुई है। आंकड़े उनकी बात की पुष्टि करते हैं।

◾आंकड़े बताते हैं कि 13,000 से अधिक कंपनियों के नमूने सर्वे में कर-पूर्व लाभ 2019-20 से 2022-23 के बीच लगभग चार गुना हो गया है।
◾ निफ्टी में सूचीबद्ध  500 कंपनियों ने अकेले 2023-24 में 22.3% की लाभ वृद्धि दर्ज की है, जबकि इस अवधि में इन कंपनियों में रोजगार केवल 1.5% ही बढ़ा है।

इसका मतलब है कि मौजूदा लोगों से ही ज्यादा काम लेकर उन्हें दिए जाने वाले वेतन को बढ़ाने की बजाय कम किया गया है। खुद सरकार सरकार का श्रमशक्ति – लेबर फोर्स – का सर्वे एक और गंभीर तस्वीर पेश करता है। इसके मुताबिक़ 2021-22 से 2023-24 के बीच भारत की जीडीपी लगभग 6.7% सालाना की दर से बढ़ी, लेकिन नियमित कामगारों का वास्तविक वेतन 0.07% घट गया। जब नियमित मजदूरों की यह हालत है, तो असंगठित कहे जाने वाले मेहनतकश किस स्थिति में होंगे, समझा जा सकता है।

इसी सरकारी रिपोर्ट के हिसाब से  लगभग एक दशक से औपचारिक विनिर्माण क्षेत्र में, खासकर ठेका मजदूरों के बीच, वेतन ठहराव बना हुआ है। इस ठहराव का संरचनात्मक कारण एक दोहरी व्यवस्था है, जो फैक्ट्रियों में चुपचाप जड़ जमा चुकी है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के विश्लेषण — जो उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित है — के अनुसार, संगठित फैक्ट्री रोजगार में ठेका मजदूरों की हिस्सेदारी लगभग दोगुनी हो गई है —2001-02 में करीब 22% से बढ़कर 2021-22 में 40% से अधिक। ऑटोमोबाइल और ऑटो-कंपोनेंट सेक्टर, जो आज के असंतोष का केंद्र है, इसमें यह प्रवृत्ति विशेष रूप से स्पष्ट है।

ठेका मजदूर, जो उसी असेंबली लाइन पर लगभग वही काम करते हैं, जो नियमित कर्मचारी करते हैं, मगर वे उनकी तुलना में 30% तक कम वेतन पाते हैं। उन्हें कोई वैधानिक लाभ भी नहीं मिलता। कुछ प्लांट्स में कुल श्रम लागत का अंतर 78–85% तक है। मालिक कानूनी जिम्मेदारियों से बच जाता है, ठेकेदार अपना मार्जिन रखता है और सारा जोखिम मजदूर को ही उठाना पड़ता है — न सुरक्षा, न महंगाई से बचाव। भारत के 80% से अधिक कामगार औपचारिक रोजगार ढांचे से बाहर हैं। ठेका फैक्ट्री मजदूर की औसत मासिक आय लगभग 13,000 रुपये है।

यह सिर्फ असंतोष के इलाकों के उदाहरण हैं। असल में तो यह पूरे देश की बात है। मोदी राज में शोषण कई गुना और प्रतिरोध से निबटने के लिए दमन और भी अधिक गुना हुआ है। इसके रूप में जाने की बजाय इसके सार को देखने से इसका कारण और इसकी वजह समझ आ जाती है। शासक वर्गों की बर्बरता की जाहिर उजागर वजहें हैं ; उनका गुब्बारा पिचक रहा है, शीराजा बिखर रहा है। लाख साजिशों के बाद भी पूँजीवाद का संकट सुलझने में नहीं आ रहा, हर गुजरते दिन के साथ और गहरा हो रहा है। अपने आपको बचाने के लिए पूँजीवाद जिस वैश्वीकरण की रणनीति को लाया था, वह भी इस शोषणकारी निजाम को बचा नहीं पायी है।

पूँजीवाद को गाय की पूंछ की तरह वैतरणी पार करने का मुक़द्दस जरिया बताने वाले पंडित भी अब विलाप कर  रहे हैं। उन्होंने भी इस व्यवस्था के दिवालियेपन को कबूल कर लिया है। पूँजीवाद के इस अतार्किक बेतुकेपन से मुक्ति पाने के लिए वे नव-उदार चालबाजी के एक और उतने ही अतार्किक बेतुके रास्ते को आजमाने पर आमादा हुए थे। मगर यह नव-उदार मंत्र भी, जैसा कि होना ही था, चौतरफा विफल होकर चारों खाने चित्त हुआ पड़ा है।

इसके चलते जो होना था वही हो रहा है : भारी गरीबी बढ़ रही है, पूरी दुनिया में असमानता की खाई चौड़ी हुई है और दौलत का कुछ हाथों में अश्लीलता की हद तक केन्द्रीकरण हो गया है। इस सबने इस निजाम की भंगुरता और अव्यावहारिकता को उजागर करके रख दिया है।

लोग इस सबको स्वीकार करने को तैयार नहीं है, वे लड़ रहे हैं। कारर्पोरेट की चाकर सरकारें अपने आका के इशारे पर इनका दमन कर रही हैं। क्या ये लड़ाई सिर्फ उनकी है? नहीं। भारत के शास्त्र-पुराण के रूपक मे कहें, तो यह एक समुद्र मंथन है। इसमें हर मनुष्य की हाजिरी को जांचने के लिए कवि दिनकर, मुक्तिबोध और बल्लीसिंह चीमा तीनों खड़े हुए हैं।

🔺 चीमा सुझा रहे हैं कि “तय करो किस ओर हो तुम”। 
🔺 रामधारी सिंह दिनकर आगाह कर रहे हैं कि “जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध”। 
🔺 वहीँ  मुक्तिबोध “पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है” पूछ भी रहे हैं और अँधेरे की सीमाएं बताते हुए आह्वान भी कर रहे हैं कि : “अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे / उठाने ही होंगे।/ तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।/ पहुँचना होगा /दुर्गम पहाड़ों के उस पार”

मई दिवस 2026 इस संकल्प को दोहराता है कि वह अँधेरे के खिलाफ है, उजाले के साथ है।

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

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