1. चाणक्य और चंद्रगुप्त : विष्णु नागर

बिना शिखा और बिना जनेऊ के आधुनिक चाणक्य जी अपने चन्द्रगुप्त मौर्य जी को पश्चिम बंगाल की विजयश्री  भेंट करना चाहते थे, मगर तमाम हिकमतों के बावजूद जब उन्होंने देखा कि पहले चरण में 92.9 प्रतिशत मतदान हो चुका है और उन्होंने ज्यादा वोट दिए हैं, जिन्हें रोकने के लिए सबसे मजबूत किलेबंदी की गई थी, तो उनकी सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम है, बल्कि गिट्टी भी गुम है। उनकी चाणक्यगिरी पर  खतरा मंडरा रहा है। फिर भी उन्हें चुनाव आयोग पर पूरा भरोसा है कि वह 23 और 29 अप्रैल की बंपर वोटिंग के बाद भी कुछ ऐसा कमाल दिखाएगा कि चार मई को सब दंग रह जाएंगे। उनकी चाणक्यगिरी सुरक्षित रहेगी।

उनका प्लान यह सिद्ध करने का था कि उनका राजा चन्द्रगुप्त मौर्य हो न हो, मगर वे चाणक्य हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं रहना चाहिए। अपने को चाणक्य मानने की गलतफहमी के लिए स्वयं उतने जिम्मेदार नहीं हैं, जितने कि पत्रकार, गोदी मीडिया और यहां तक कि उनके धुर विरोधी, जिन्होंने उन्हें बार-बार चाणक्य संबोधित कर उनका दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ा दिया है। वे यह तक भूल गए हैं कि वे अमित शाह हैं और नरेन्द्र मोदी की सरकार में गृहमंत्री हैं। वे चाणक्य होने के मुगालते में दिन-रात एसी में पसीना बहा रहे हैं।

चाणक्य जी, चाणक्य होने के भ्रम में
यह भी भूल गए हैं कि यह इक्कीसवीं सदी की दूसरी चौथाई है। यह चाणक्य के करीब ढाई हजार साल बाद का समय है। इस समय भारत में राजा नहीं होते। जिन्हें प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री होते हुए राजा होने का मुगालता हो जाता है, वे इतिहास के पन्नों के इतने नीचे दब जाते हैं कि उनकी आह तक सुनाई नहीं देती। चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का नाम तो उन पन्नों में मिल जाता है, मगर इक्कीसवीं सदी के इन चंद्रगुप्तों और चाणक्यों का किसी फुटनोट में भी नहीं मिलता, हालांकि इन बेचारों को क्या पता कि किताब क्या होती है और उसमें फुटनोट क्या होते हैं! एंटायर पोलिटिकल साइंस के विद्यार्थियों को एम ए करने के लिए किताबें नहीं पढ़नी पड़तीं, न परीक्षा देनी होती है और न डिग्री लेनी होती है!

चाणक्य होने के भार से गले-गले तक दबे बेचारे शाह जी बंगाल में अंतिम रूप से यह साबित करने में लगे हैं कि इक्कीसवीं सदी के असली चाणक्य वही हैं। बल्कि सच तो यह है कि ईसा पूर्व तीसरी- चौथी शताब्दी के बाद भारत में अगर कोई चाणक्य पैदा हुआ है, तो वे केवल वह हैं। चूंकि वे चाणक्य हैं, इसीलिए उनका राजा चन्द्रगुप्त मौर्य है, वरना उस बेचारे की क्या हैसियत? वे हैं, इसीलिए नरेन्द्र मोदी, चंद्रगुप्त मौर्य हैं। जिस दिन वे चाणक्य नहीं रहेंगे, उस दिन मौर्य साहब भी धूल चाटते मिलेंगे। आजकल गोमूत्र और गोबर की महिमा बहुत गाई जा रही है, उसका सेवन करते हुए भी वे पाये जा सकते हैं!

चाणक्य जी बजरंग बली का नाम लेकर पश्चिम बंगाल की रणभूमि में कूद पड़े थे। अकेले नहीं, चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई , अर्द्धसैनिक बलों के हजारों जवानों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, धन की मोटी-मोटी थैलियों, हिंदू-मुसलमान के पचड़े, वोट चोरी, वोट कटाई जैसे सैकड़ों औजारों के साथ। इसके लिए चाणक्य जी ने भय के ऐसे वातावरण का निर्माण  किया, जिसकी मिसाल आजाद भारत में नहीं मिलती! चतुरंगिणी सेना तो बहुत पुरानी बात हो चुकी, वे बहुरंगिणी सेना के सेनापति हैं। वे साम-दाम-दण्ड-भेद के साथ ही नहीं, उन हथियारों से साथ भी कूदे, जिनकी कल्पना बेचारे असली चाणक्य जी को थी ही नहीं। ईडी का नाम प्राचीन चाणक्य जी ने क्या ही सुना होगा। मेरा खयाल है कि आज की सीबीआई भी चाणक्य जी के गुप्तचरों से बहुत आगे है। तब लोकतंत्र नहीं था, तो असली चाणक्य जी वोट चोरी नामक कला के बारे में भी नहीं जानते रहे होंगे। चुनाव आयोग नहीं था, तो वोट काटने की कल्पना भी उनके दिमाग आ नहीं सकती थी। चाणक्य जी हिंदू-मुसलमान का खेल भी नहीं जानते थे।

मतलब आधुनिक चाणक्य जी के सामने बेचारे वे कहीं नहीं लगते थे। मान लो, वे भी इतने ही बड़े उस्ताद हुए होते, जितने कि आज के फोटोकापी चाणक्य हैं, तो 2014 आता या 2026 आता, ये कुछ नहीं कर पाते। ये मौर्य जी के साथ अहमदाबाद के किसी हनुमान मंदिर में भजन करते और इधर-उधर से चंदा करके भंडारे करते, जिससे वोट नहीं मिलते। भजन करने से चने और हद से हद केले का प्रसाद मिलता है और भंडारा खाने वाले इतने नाशुक्रे होते हैं कि भंडारा खाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं और तर्क देते हैं कि यह बात लोकमान्य तिलक ने कही थी। भंडारे की जगह पर कितने ही भगवा झंडे लहरा दो, खाने वाले खाने में मगन रहते हैं और खाने के बाद हाथ धोने के लिए आगे बढ़ जाते हैं और ये ज्जा,वो ज्जा। वे नजर उठाकर झंडे की तरफ देखते तक नहीं! ऐसी स्थिति में इनकी चाणक्यगिरी और उनकी मौर्यगिरी की प्रतिभा इस जीवन में बेकार चली जाती और दूसरा जीवन मिलता नहीं!

‘दीदी ओ दीदी’ और ‘ए दीदी’ बोलने के बाद मौर्य साहब और चाणक्य जी, पिछली बार ममता बनर्जी को हरा नहीं पाए थे। अभी भी ये दोनों चुनाव आयोग के अलावा बजरंग बली के भरोसे हैं और रोज उन्हें नारियल चढ़ाने जा रहे हैं। चाणक्य जी की कला अगर इस बार सिरे नहीं चढ़ पाई, तो चंद्रगुप्त मौर्य जी — जो पहले से एपस्टीन आदि प्रसंगों के कारण खतरे की जद में हैं — संकटापन्न हो जाएंगे और उनके साथ चाणक्य जी का भी बंटाधार हो जाएगा। बारह साल की सारी ‘मेहनत’ चौपट हो जाएगी!

हे चुनाव आयोग के प्रभु जी, आप पर इन दोनों ने इतना अधिक भरोसा किया है, तो इसका सुफल भी इन्हें देना। फिर इस बार आपने पूरी तरह ‘निष्पक्ष’ टाइप चुनाव करवाया है, तो इसके पीछे आइडिया यही होगा कि मौर्य साहब और चाणक्य जी को इसका पूरा-पूरा लाभ मिले वरना ‘निष्पक्ष’ चुनाव कराने की ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी! पक्षपातपूर्ण चुनाव करवाने से भी काम चल जाता! और जहां तक संविधान का सवाल है, वह ऐसा ग्रंथ बन चुका है, जिसके आगे सिर झुकाना ही उसका पालन करना माना जाता है। क्यों मौर्य साहब, मैंने कुछ ग़लत तो नहीं कहा! कहा हो, तो आप  सुधार देना!

“(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
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2. ये फ्रेंडशिप, वो नहीं छोड़ेंगे! : राजेंद्र शर्मा

पूछता है भारत, बल्कि पूछता है विश्व कि ये विरोधी, मोदी जी को क्या बिल्कुल वेला ही समझते हैं। बताइए, ट्रंप जी ने अपने सोशल मीडिया पर भारत को जरा सा नर्क कुंड उर्फ हैल होल क्या लिख दिया, बस मोदी जी के पीछे पड़ गए कि इसका जवाब क्यों नहीं देते? जैसे को तैसा जवाब क्यों नहीं देते? अब भी जवाब नहीं देंगे तो क्या कहने पर जवाब देंगे, वगैरह, वगैरह।

फिर यह मानकर कि मोदी जी इस बार भी मुंह नहीं खोलेंगे, इस पर बहस भी करने लगे कि ट्रंप ने इसी बयान में भारतीयों को लैपटॉप वाले आतंकवादी भी कहा था। उसने तो भारतीयों पर इसका भी इल्जाम लगाया था कि वे सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए अमेरिका में जा जाते हैं और इन बच्चों को क्योंकि खुद-ब-खुद नागरिकता का अधिकार मिल जाता है, बाद में उनकी उंगली पकड़ कर उनके मां-बाप, दादा-दादी सब अमेरिका में आ धमकते हैं! यह तो भारत का घोर अपमान है। मोदी जी अब भी जवाब नहीं देंगे, तो कब देंगे?

जब ज्यादा ही हाय-हाय होने लगी, तो मोदी जी के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा पहले तो इसका नोटिस लेने के बाद भी, इस पर दो शब्द तक खर्च करने से इंकार कर के, इशारे में नापसंदगी का इजहार कर दिया। उससे भी काम नहीं चला, तो बाकायदा इस सब को अनुचित, अनुपयुक्त बताते हुए, भारत के साथ अमेरिका के असली रिश्ते की याद भी दिला दी। पर विरोधियों को इससे भी संतोष नहीं हुआ। उन्हें तो मोदी जी के जवाब से कम कुछ मंजूर ही नहीं था। जैसे मोदी जी के पास ऐसी बातों के जवाब देने के अलावा और कोई काम ही नहीं हो।

लेकिन, सच इससे ठीक उल्टा है। जिस शाम को ट्रंप का ताजा वाला बयान आया, मोदी जी ने खुद बताया कि वह कोलकाता में हावड़ा ब्रिज पर विशाल रोड शो में व्यस्त थे। और अगली सुबह तो जैसा कि खुद मोदी जी ने वीडियो डालकर पूरे देश को दिखाया, मोदी जी सुबह-सुबह हुबली में नौका की सैर का आनंद ले रहे थे। और उसके बाद, जादवपुर विश्वविद्यालय को छात्र-राजनीति से मुक्त कराने का वादा कर रहे थे। (शुक्र है, छोटा भाई की तरह वह छात्र-कार्यकर्ताओं को उल्टा कर के सीधा करने का वादा करने तक नहीं गए।) और फिर तृणमूल के दीपक के बुझने से पहले फड़फड़ाने की भविष्यवाणियां कर रहे थे।

अब मोदी जी देश और भारतीय संस्कृति की सेवा करें और हिंदुओं की रक्षा करें या सोशल मीडिया में आए इसके-उसके बयानों का जवाब देते फिरें?

विरोधी तो जाहिर है कि यह चाहते ही हैं कि मोदी जी का ध्यान, चुनाव में देश की सेवा की तरफ से हट जाए और मोदी जी के चुनावी अश्वमेध का घोड़ा, इस बार भी कोई छत्रप पकड़ कर ले जाए। और फिर मोदी जी को राज्यपाल से लेकर सारी एजेंसियों के जरिए से, अपना अश्वमेध का घोड़ा छुड़वाने के लिए पांच साल तक लड़ाई लड़नी पड़े।

बेशक, हमेशा मोदी जी को पांच साल इंतजार करना ही पड़ता हो ऐसा भी नहीं है। कई बार जो घोड़ा युद्ध से नहीं छुड़ाया जा सकता है, उसे खरीद-फरोख्त से छुड़ाने का भी जुगाड़ बन सकता है। जैसे इस वक्त पंजाब में बनता लग रहा है। आम आदमी पार्टी के दस में सात राज्यसभा सांसदों के मोदी-पार्टी में आने की मिठाई खाने के बाद, अब देश की सेवा के लिए पंजाब की सरकार आप पार्टी से छुड़ाने की तैयारी है। बंगाल के चुनाव से निपटते ही, मोदी जी-शाह जी पंजाब के रण में लगेंगे।

बेशक, बंगाल के रण में लगे हुए भी, वह पंजाब के लिए समय बिल्कुल ही नहीं निकाल रहे हों, ऐसा भी नहीं है। मोदी जी और शाह जी, कई मोर्चे एक साथ संभालना बखूबी जानते हैं। पर अब पंजाब के रण में फुलटाइम लगेंगे। सीबीआइ, ईडी, आयकर, अदालत, चुनाव आयोग सब के साथ।

महाराष्ट्र में शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस की मिल्कियत का मुकद्दमा तो याद होगा; वैसे ही राज्यसभा के सभापति से लेकर, सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग तक, बंटवारे का मुकद्दमा कम से कम पंजाब में अगली सरकार बनने तक तो मोदी जी-शाह जी को व्यस्त रखेगा ही!

हमें पता है कि विरोधी जरूर कहेंगे कि यह सिर्फ चुनाव में व्यस्तता की बात नहीं है। यह तो मोदी जी का कायदा ही हो गया है। बार-बार उनका डियर फ्रेंड ट्रंप भारत का और भारतीयों का अपमान करता है। और मोदी जी के मुंह से डियर फ्रेंड, डियर फ्रेंड के सिवा दूसरा बोल ही नहीं निकलता है। ट्रंप ने भारत को टैरिफ लुटेरा कह दिया, मोदी जी डीयर, डीयर करते रह गए। ट्रंप ने भारतीयों को हथकड़ी-बेड़ियां लगाकर अपने फौजी जहाजों से वापस भेजा, जब मोदी जी अमेरिका में थे, तब भी ऐसे ही भारतीयों को वापस भेजा, मोदी जी के विदेश मंत्री उसको अमेरिका का अपने नियमानुसार काम करना बताते रह गए। ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर जुर्माने के तौर पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया, मोदी जी रूस से तेल खरीदना करीब-करीब बंद करने के बाद, उसके सोशल मीडिया पोस्ट में मोदी मेरे अच्छे मित्र हैं, पर फूलकर कुप्पा होते रहे। ट्रंप ने भारत पर पूरी तरह से इकतरफा व्यापार समझौता थोप दिया, मोदी जी अमेरिका से सहयोग बढ़ने के सपने देखते और दिखाते रहे। और ट्रंप ने जब ऑपरेशन सिंदूर को रुकवाने का दावा कर दिया, मोदी जी बगलें झांकते रह गए। यह तो मोदी जी की आदत ही हो गयी है – ट्रंप भले अपमान पर अपमान करता रहे, मोदी जी खुशामद ही करते रहेंगे।

पर मोदी जी का डीयर फ्रेंड तो इतने पर भी खुश नहीं है। खुद आरएसएस-भाजपा के साझा थिंक टेंक, राम माधव ने अमेरिका में जाकर पूछ दिया कि मोदी जी अब और क्या करें, जिससे ट्रंप जी खुश हो जाएंगे! अमेरिका ने कहा, रूस से तेल मत खरीदो, मोदी जी ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया। अमेरिका ने भारत पर 50 फीसद टैरिफ लगा दिया, मोदी जी ने चूं भी नहीं की। व्यापार समझौते में भारत पर 18 फीसद टैरिफ लगा दिया, जो पहले औसतन 3 फीसद था, देश में बहुत विरोध हुआ, पर मोदी जी ने कुछ नहीं कहा। मोदी जी और क्या करें, जिससे ट्रंप को संतोष हो जाए कि भारत उसकी इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ कर रहा है।

पर विरोधियों के इस संतोष वाले आइडिया में ही प्रॉब्लम है। यह फ्रेंडशिप की हमारी प्राचीन संस्कृति के खिलाफ है। मोदी जी और ट्रंप जी की पक्की फ्रेंडशिप है। और पक्की फ्रेंडशिप, फ्रेंड के संतोष करने की तलबगार नहीं होती है। फ्रेंड झुका रहा है, हम झुक रहे हैं ; फ्रेंड अपमान कर रहा है, हम हंसी में उड़ा रहे हैं, यही तो सच्ची फ्रेंडशिप की निशानी है। ट्रंप जी भारत को भले नर्क कुंड बताएं, ये फ्रेंडशिप मोदी जी नहीं छोड़ेंगे। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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