(वक्तव्य : सुभाष गाताडे)

हम एक नाजु़क वक्त़ से गुजर रहे हैं। कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति – जो न्याय, अमन और बराबरी की चाहत रखता हो, समूची मानवता को तरक्की के रास्ते पर ले जाना चाहता हो, यह दावा नहीं कर सकता कि उनमें से किसी ने भी इस बात का तसव्वुर भी किया होगा कि 21 वीं सदी की तीसरी दहाई में हम ऐसे दौर से रूबरू होंगे। एक ऐसा दौर जहां ‘हम और वे’ की सियासत उरूज पर दिख रही है, आबादी के अच्छे खासे हिस्से को अमनुष्य घोषित करना, दीमक, कीड़ों, मकौड़ों की श्रेणी में शुमार करना एक सम्मानित उद्यम में रूपांतरित हुआ है। नागरिक शुद्धता की कवायदों के जरिए – अवांछितों को, अधर्मियों को, असहमतों को — गणतंत्र के दायरों से भी बाहर सरहद पार मुल्कों के बियाबान में ढकेल देने की मुहिमों पर इंसाफ के रखवाले कहे जाने वाले संस्थानों से भी मुहर लग रही है।

इस खत़रनाक समय को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया जा रहा है। कोई कहता है कि यह ऐसा दौर है, जब यह प्रतीत हो रहा है कि समूचा समाज एक उन्मादी खुशी के साथ एक गर्त में जा रहा है और उसे इस बात का कोई इल्म भी नहीं है। मेरे एक मित्र – जो एक प्रख्यात मार्क्सवादी  विचारक हैं – कहते हैं, यह ऐसा दौर है, जब समाज को गोया अंधेरे की आदत हो गयी है, मद्धिम-सी रौशनी से भी उसकी आंखें चुंधिया जाती हैं।

जाहिर सी बात है कि यह ऐसा दौर है, जहां लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, विचारशील जनों से यह खास उम्मीद की जाती है कि वह समाज में फैल रहे कुहासे को भेदने में पहल करें। अपने साहस, अपने विवेक, अपनी कुशलता, अपनी आकलन क्षमता और अपनी चतुरता के बल पर समय के युगबोध को, वक्त़ की सच्चाई को लोगों तक पहुंचाए।

आशवित्ज अब और नहीं?

विडम्बना ही है कि ऐसे हालात महज अपने मुल्क तक ही सीमित नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाए जाने वाले मुल्क के कर्णधारों से लेकर सबसे ताकतवर मुल्क के प्रेसिडेंट तक अपने आप को ‘ईश्वर के प्रेषितों ’ के रूप में पेश करने की होड़ में हमारे सामने है, भले ही उनकी नीतियां, उनके कदम मुल्क की अवाम के बड़े हिस्से पर कहर बरपाते दिख रहे हैं।

1945 में जब दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका खतम हुई थी और रफता-रफता आशवित्ज जैसे यातना शिविरों में  नात्सी नस्लीय सफायों की खूरेंजी का, यहूदियों के, असहमतों, कम्युनिस्टों, जिप्सियों या समलैंगिकों के क़त्लेआम की खबरों का दुनिया को पता चला था – जिसमें आधिकारिक तौर पर 11 लाख लोग गैस चैम्बरों में डाल कर मार दिए गए थे, तमाम लोग भुखमरी और बीमारी से ही मर गए थे — तब यह कहा गया था कि आशवित्ज इसलिए हुआ, क्योंकि शेष मानवता को पता नहीं चला। यह संकल्प भी दोहराया गया कि आशवित्ज अब और नहीं!

गाज़ा में – चौबीसों घंटा प्रसारण करते रहने वाले मीडिया के सामने – सम्पन्न जनसंहार, जब आधिकारिक तौर पर 60-70 हजार लोग मार दिए गए, जिसका बहुलांश बच्चों और महिलाओं का था, मानवता के खिलाफ अपराध घोषित किए गए अपराधों को – अस्पतालों, स्कूलों पर बमबारी, जनता के व्यापक हिस्से को भूखा रखना, गाज़ा के सघन आबादी वाले इलाकों में तोपों, बमों के जरिए सफेद फाॅस्फोरस का छिड़काव, जो मनुष्य के शरीर पर चिपककर भयानक जलन पैदा करता है (815 डिग्री सेल्सियस), आदि को – डंके की चोट पर अंजाम दिया गया।

इस जनसंहार के कर्णधार इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय द्वारा युद्ध अपराधी घोषित किए जाने के बावजूद हथियारों, बमों की सप्लाई करने में अमेरिका से लेकर लिबरल डेमोक्रेसी कहलानेवाले यूरोप के तमाम मुल्क आगे रहे, उन्होंने भी इस जनसंहार को रोकने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि उसे होने दिया। हमारी आंखों के सामने संपन्न  गाज़ा का जनसंहार – जिसमें सैकड़ों पत्रकार यहूदीवादी हुकूमत की निशानदेही पर हत्या का शिकार हुए – जैसी त्रासदी इसी बात की ताईद करती हैं कि आशवित्ज अब कहीं भी, कभी भी हो सकता है, होने दिया जा सकता है।

इतिहास गवाह है!

अगर हम अपने चारों ओर निगाह डालें, तो यही बात कह सकते हैं कि बदलते हालात में अब खामोशी ओढ़ना विकल्प नहीं! लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, विचारशील जनों के सामने अब यह विकल्प नहीं कि वह तटस्थ रह सकें!

ऐसा भी प्रतीत हो सकता है कि इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है। याद कर सकते हैं कि आज से ठीक नब्बे साल पहले, जब नवोदित स्पैनिश गणतंत्र को कुचलने के लिए जनरल फ्रैंको  की सेना के साथ, जर्मनी और इटली की नात्सीवादी, फासीवादी हुकूमतों की मशीनरी खड़ी हुई थी, तब मशहूर ब्रिटिश लेखिका एवं राजनीतिक एक्टिविस्ट नॅन्सी कुनार्ड (1896-1965), ब्रिटिश अमेरिकन कवि डब्लू एच ऑडेन (1907-1963) और इंग्लिश कवि और उपन्यासकार स्टीफन स्पेण्डर (1909-1995) ने मिल कर इस युद्ध को लेकर यूरोप के 200 लेखकों को एक प्रश्नसूची भेजी, जिसके नतीजे बाद में ‘लेफ्ट रिव्यू’ में ‘आथर्स टेक साइडस ऑन द स्पैनिश वाॅर’ शीर्षक से प्रकाशित हुए। लेखकों को भेजी गयी प्रश्नसूची में यह सवाल उठाया गया था : ‘क्या आप स्पैनिश गणतंत्र की कानूनी सरकार और उसकी जनता के पक्ष में या विपक्ष में खड़े हैं, क्या आप फ्रैंको और फासीवाद के पक्ष में या विपक्ष में खड़े हैं? क्योंकि अब यह मुमकिन नहीं कि आप कोई पक्ष न लें।’ कुल मिलाकर 147 लोगों ने जवाब दिया था, जिनमें से 126 गणतंत्र के पक्ष में थे, तो पांच फ्रैंको के समर्थन में थे।

यह अपील जारी होने के दो साल पहले ही पैरिस में ‘संस्कृति की रक्षा के लिए लेखकों की पहली कांग्रेस’  का आयोजन हुआ था, जिसके लिए रोमा रोलां और हेनरी बारब्युज जैसे लेखकों ने पहल की थी। फासीवाद के आसन्न खतरे को देखते हुए लेखकों के संयुक्त मोर्चे के गठन की पृष्ठभूमि इस कांग्रेस के पीछे थी। मैक्सिम गाॅर्की के संरक्षण में सम्पन्न लेखकों के इस सम्मेलन के लिए आमंत्रित लेखकों में विविध किस्म के लेखक शामिल हुए थे।

महान कवि एवं नाटककार बर्तोल्त ब्रेश्ट ने इसी फासीवाद विरोधी लेखक सम्मेलन में अपने संक्षिप्त भाषण में ‘सत्य को बयां करने की मुश्किलों के बारे में’ पांच बातें रखी थी। उनके मुताबिक पांच मुश्किलें इस प्रकार हैं : ‘..सत्य को लिखने के लिए साहस की जरूरत, सत्य को पहचानने की जिद, सत्य को हथियार की तरह आजमाने की कुशलता, सत्य किनके हाथों में प्रभावी हो सकता है, इसका आकलन करने की क्षमता, सत्य को तमाम लोगों तक पहुंचाने की चतुरता..’। उनका कहना था कि ‘..इन पांचों मुश्किलों को एक साथ और एक ही वक्त दूर करना होगा।’

बीसवीं सदी की ओर पलट कर देखें तो हमें ऐसे कई उदाहरण दिखते हैं, जो ‘अंधेरे की आदत हुए इस समाज को जगा देने के लिए प्रेरणास्त्रोत बन सकते हैं।’

स्पैनिश गणतंत्र को बचाने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की पहल पर हुई ‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’ के गठन की बात और उसके आह्वान पर किस तरह सैकड़ों लेखक, कलाकार, चित्रकार वहां संघर्ष में शामिल होने के लिए पहुंचे थे और किस तरह उसूलों की हिफाजत के लिए उन्होंने वहां शहादत दी, क्रिस्टोफर काॅडवेल, राल्फ फाॅक्स जैसे महान लेखक रणभूमि पर ही कुर्बान हुए, यह इतिहास भले ही अब गोया विस्मृत  हो चला है, मगर इस कठिन समय में उन्हें याद करना मददगार साबित हो सकता है।

हिन्दोस्तां की सरजमीं पर उन्हीं दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की नींव पड़ी थी, जिसके पहले सम्मेलन की अध्यक्षता प्रेमचंद ने की थी, (अप्रैल 9-10, 1936), जिसमें मुल्क की तमाम जबानों के लेखक इकटठा हुए थे।

यह जानना भी दिलचस्प है कि लेखकों की एक तंजीम बनाने की जरूरत का खयाल उन दिनों लंदन में अध्ययनरत या सक्रिय रहे चार दोस्तों सज्जाद जहीर, अहमद अली, मुल्कराज आनंद और मोहम्मद को पहली दफा आया, जो खुद मार्क्सवादी  विचारों से इत्तेफाक रखते थे और तरक्कीपसंद संगठनों के साथ सरगर्म भी थे। औपनिवेशिक हिन्दोस्तां की हालात से वह बेहद परेशान थे और एक नया समाजी-सियासी निज़ाम कायम करने का खयाल रखते थे। उन्होंने आपसी गुफ्तगू में यह महसूस किया कि इसे मुमकिन बनाने के लिए साहित्य एक अच्छा जरिया बन सकता है, जो सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा कर सकता है और एक नयी साहित्यिक संस्कृति  को जनम दे सकता है।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने प्रस्तावित संगठन/तंज़ीम का एक मसविदा घोषणापत्र तैयार किया और हिन्दी-उर्दू के तमाम लेखकों, रचनाकर्मियों को भेजा। लेखकों की जिस तरह उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया थी, उसे देखते हुए लखनऊ में स्थापना सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए हिन्दी-उर्दू के महान लेखक और उपन्यासकार प्रेमचंद को आमंत्रित किया गया था।

अपने अध्यक्षीय भाषण, जिसका फोकस ‘साहित्य का उददेश्य’ था, के अंत में प्रेमचंद ने साहित्य की अपनी समझदारी को साझा किया था : ‘..हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो – जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’

जैसे हालात आज मौजूद हैं, प्रगतिशील ताकतों में, तरक्कीपसंद स्वरों में जो आपसी मतभेद अभी समाप्त नहीं हुए है, और आज़ाद जुबानों पर जिस किस्म के पहरे लगा दिए गए है, उस वक्त़ यह उम्मीद करना बेकार होगा कि हम किसी अलसुबह किसी इंटरनेशनल ब्रिगेड के गठन की ख़बर पढ़ेंगे, 1935 के पैरिस की तरह लेखकों के बड़े जलसे का आगाज़ देखेंगे!

दरअसल हमें इसकी जमीन तैयार करने के लिए पहल करनी होगी, अपने विवेक के आधार पर फैसला लेना होगा, जिस तरह की पहल भारत की विभिन्न भाषाओं में सृजनरत लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों ने ली थी, जब उन्होंने मुल्क के बदतर होते हालात को देखते हुए महसूस किया कि उन्हें अब बोलना ही होगा, जो कुछ उनके इर्द-गिर्द घटित हो रहा है, उसको लेकर अपनी बेआरामी को जाहिर करना होगा, सत्ता के नशे में चूर हुक्मरानों को बताना होगा कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता या बढ़ रही भीड़ द्वारा हत्याएं उम्मीदों के नहीं, बल्कि डर के गणतंत्र को ढाल रही हैं।

इसी असहिष्णुता का परिणाम था कि कामरेड गोविन्द पानसरे, प्रोफेसर कलबुर्गी या गौरी लंकेश जैसे अग्रणी लेखक, विद्वान तथा एक्टिविस्ट मारे गए थे और नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को अंजाम देने वाली विचारधारा की तूती बोलने लगी थी। अपने आक्रोश को प्रकट करने के लिए उन्होंने उन्हें मिले प्रतिष्ठित सरकारी एवार्ड वापस किए थे।

अगर हम उस समय को याद करें, तो दिखता है कि केन्द्र में मोदी हुकूमत कायम हुए एक साल भी नहीं बीता था, लेकिन असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही थी, भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं ने परिघटना का रूप लिया था, कभी बीफ के नाम पर, तो कभी किसी अन्य बहाने से निरपराधों पर, खासकर दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों पर हमले बढ़ रहे थे।

बीफ के नाम पर दिल्ली के बगल में स्थित दादरी में अखलाक की हत्या, जो उनके घर में घुस कर कर दी गयी थी — जिसे गांव के ही निवासियों ने बाहरी आततायी तत्वों के साथ मिल कर अंजाम दिया था, ने उस चिंगारी का काम किया कि लेखकों, सृजनकर्मियों को लगा कि अब मौन रहना अपराध होगा। अवार्ड वापसी की इस ऐतिहासिक मुहिम का आगाज़ गोया हिन्दी के मशहूर साहित्यकार उदय प्रकाश ने लिया था, जब 2015 में उन्होंने ‘बढ़ती असहिष्णुता’ तथा भीड़ द्वारा हत्या की घटना विरोध में उन्हें मिले साहित्य एकादमी के एवार्ड को वापस किया था।

याद रहे उदयप्रकाश के अवार्ड वापसी के बाद देश के तमाम भाषाओं के लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों द्वारा अपने एवार्ड वापस करने की मुहिम गोया चल पड़ी थी। अशोक वाजपेयी, नयनतारा सहगल आदि तमाम बड़े-बड़े नाम उसमें जुड़ते गए थे। रचनाकर्मियों के इस अहिंसक प्रतिरोध ने मोदी हुकूमत को बचाव का पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर किया था।

प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू की भतीजी और मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल ने उन्हें 1986 में मिले साहित्य अकादमी के विख्यात पुरस्कार को वापस करते हुए ‘द अनमेकिंग ऑफ़ इंडिया’ शीर्षक से अपना बयान जारी किया था और बताया था कि : ‘सांस्कृतिक विविधता को बचाने में मोदी सरकार की चुप्पी और सत्ताधारी हिन्दुत्व की विचारधारा से असहमत आवाज़ों के बचाव के लिए अपना पुरस्कार वापस कर रही है।’

असहमति की आवाज़ से आगे

मौजूदा निजाम और हमारे इर्द-गिर्द बद से बदतर हालात के प्रति अपनी असहमति गोया पहला कदम होगा हमारे हस्तक्षेप का। हम जो विभिन्न जुबानों में, विभिन्न फार्म में सक्रिय है, हमें भी चाहिए कि हम अपनी-अपनी सलाहियत/विशिष्टता के इलाके में भी नये परचम लहराएं। हम ऐसी रचनाओं का सृजन करें, जो इस दौर के अन्तर्विरोधों को, उनकी विडम्बनाओं को, रक्तपिपासु शासकों के स्तुति-सुमन गाने को ही धन्य मानते मानस की गहराइयों तक पहुंच सके और वास्तविक सत्य, शिव और सुंदर को स्थापित करने के लिए इन्सानियत को प्रेरित करे।

लगभग सौ साल पहले जब नात्सीवाद-फासीवाद की समाप्ति के लिए इंसानियत ने डग भरे थे, उस स्याह दौर में ऐसी तमाम विविधतापूर्ण और कालजयी रचनाओं ने जनम लिया था। कौन भूल सकता है कि बर्ताेल्त ब्रेष्ट की तमाम अग्रणी रचनाओं को या उनका वह बहुचर्चित नाटक ‘द रेजिस्टेबल राइज ऑफ़ ऑर्टरो ली’, जिसमें शिकागो के एक माफिया सरगना आरटुरो ली’ के उदय के कहानी के जरिए हिटलर के आगमन को दर्शाया गया था! यही वह समय था जब ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ जैसी फिल्म के माध्यम से चार्ली चैपलिन ने हिटलर के मनुष्यद्रोही प्रोजेक्ट को बेपर्द किया था या गुएर्निका जैसी पेंटिंग के माध्यम से फासीवाद की जंगखोरी और मनुष्यता पर अंतहीन कहर बरपा देने की उसकी क्षमता पाब्लो पिकासो ने उजागर की थी। ऐसी अनगिनत रचनाओं ने – सृजन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रस्फुटित इन विभिन्न स्वरों ने फासीवाद की आसन्न मौत की दुर्दुंभी बजा दी थी।

अपनी तटस्थता से तौबा कर अपना पक्ष तय करना, अपने रचनाकर्म में युगबोध को स्वर देना आदि के बाद हमें उस बेहद जरूरी वैचारिक हस्तक्षेप की अहमियत को समझना होगा, जिसकी आज हमारे समाज को बेहद जरूरत है।

समस्याओं को सुलझाने के लिए उसी चिंतन का सहारा लेने की जिद

अल्बर्ट आईनस्टाईन का मशहूर उद्वरण है : ‘अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए उसी चिंतन का सहारा लेने की जिद, जिसने उन्हें पैदा किया।’ सभी इस उद्वरण को जानते हैं , तबादले खयालात में इस बात पर जोर देते हैं कि हमें घिसे-पिटे रास्तों पर नहीं चलना है, नयी जमीन तोड़नी है। मगर वह संकल्प कदमताल तक सीमित रहते हैं।

नया चिन्तन कैसे उभरता है? जब हम पुराने स्थापित चिन्तन की, उसके अमल की पड़ताल करते हैं, उसे प्रश्नांकित करते हैं और अपनी नयी प्रस्थापना पेश करते हैं। हम नयी जमीन तब तक तोड़ नहीं सकते, जब तक हम अपने आप को प्रश्नांकित करने की, अपनी स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने की, अपने आप को कटघरे में खड़ा कर देने की जिद नहीं पालते।

पिछले ही साल इसी सुरजीत भवन में – जहाँ जनवादी लेखक संघ का यह दसवां राज्य सम्मेलन हो रहा है – प्रख्यात इतिहासकार इरफान हबीब ने हम सभी के सामने ऐसी ही बात कही थी, जबकि वह कामरेड सीताराम येचुरी की याद में पहला व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे थे। अफसोस ही बात यह है कि विस्फोटक-सी लगने वाली उनकी बात पर भी विचारशील जनों के आपसी विचार-विमर्श में कुछ बात आगे नहीं बढ़ सकी।

प्रोफेसर इरफान हबीब की बात भी भुला दी गयी। क्या कहा था प्रोफेसर इरफान हबीब ने? उनके व्याख्यान का विषय था ‘राष्ट्रीय आंदोलन में वाम और उसकी विरासत’। निचोड़ के तौर पर कहें, तो उन्होंने मार्क्सवादी  इतिहास लेखन के एकांगीपन तथा वाम आंदोलन के अंदर व्याप्त लोकरंजकता जैसे तत्वों को बखूबी उजागर किया था। मिसाल के तौर पर, अपने व्याख्यान में उन्होंने मार्क्सवादी इतिहास लेखन में माॅडरेट कांग्रेस नेताओं के प्रचंड योगदानों – दादाभाई नौरोजी और आर सी दत्त द्वारा ब्रिटिश हुकूमत द्वारा की जा रही भारतीय सम्पदा की लूट को पहली बार बेपर्द करने की हक़ीकत – को अनदेखा करने की बात कही थी।

याद रहे, वर्ष 1901 में दादाभाई नौरोजी की किताब प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक था ‘पाॅवर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’। भारतीय सम्पदा की लूट की बात पहली दफा उन्होंने अपने पेपर ‘इंग्लैण्ड डेब्ट टू इंडिया’ में बयां की थी, जिसे लंदन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के सामने प्रस्तुत किया गया था। दादाभाई नौरोजी का मानना था कि कच्चे मालों को निर्यात करके और बने बनाए सामानों को आयात करके, अधिक दरों से करों को वसूलते हुए और तनखा, पेंशन और मुनाफे के रूप में भारत की प्रचंड सम्पदा को बाहर भेज कर ब्रिटिश शासक भारत को लूट रहे हैं। अपने व्याख्यान में प्रोफेसर हबीब ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उस स्टैण्ड की हिमायत की थी, जिसके लिए पार्टी लगातार आलोचना का शिकार होती रही है और अपने आप का ठीक से बचाव भी नहीं कर पाती है।

इतिहास बताता है कि 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की यही नीति थी कि इस दौरान ब्रिटिश हुकूमत पर दबाव डाल कर भारतीय जनता के लिए अधिक से अधिक सुविधाएं हासिल की जाएं। 1942 में जब सोविएत रूस नात्सी हमले का शिकार हुआ तब पार्टी ने आननफानन में अपना स्टैण्ड बदला था और ब्रिटिश हुकूमत के विरोध के बजाय उसका समर्थन करने का निर्णय लिया था। वजह साफ थी कि नात्सीवाद और कम्युनिजम की इस जंग में वह उस चुनौती को समझते थे कि आज की तारीख में सोविएत रूस के समाजवादी प्रयोग की हिमायत करना जरूरी है।

प्रोफेसर इरफान हबीब का कहना था कि स्थितियां वाकई बेहद कठिन थीं, जापान भारतीय सीमा पर आ पहुंचा था और जब तक स्तालिनग्राद की ऐतिहासिक लड़ाई में – जिसमें 20 लाख से अधिक सोवियत नागरिक मारे गए थे – हिटलर को शिकस्त नहीं मिली थी, तब तक उसका और उसके सहयोगियों मुसोलिनी आदि ताकतों का तीसरी दुनिया के अन्य मुल्कों पर भी प्रत्यक्ष दबदबा कायम हो सकता था और फिर आज़ादी की लड़ाई कई दशक पीछे चली जाती।

याद रहे, वह भारत छोड़ो आन्दोलन का दौर था और कांग्रेस ने ब्रिटिशों के खिलाफ व्यापक दबाव बनाया था। गौरतलब है कि उन दिनों के बदलते हालात को लेकर कांग्रेस के अन्दर भी जबरदस्त उहापोह की स्थिति थी। खुद जवाहरलाल नेहरू – जो फासीवाद, नात्सीवाद के खतरे के प्रति पहले से सचेत थे – उन्हें भी यह संभावना नज़र आ रही थी कि फासीवाद के खिलाफ विश्वव्यापी संघर्ष अगर कमजोर पड़ा, तो उसके डैने तीसरी दुनिया के मुल्कों पर कायम हो सकते हैं।

अपने व्याख्यान में आगे चलकर प्रोफेसर हबीब ने बंटवारे के झंझावाती दिनों में कम्युनिस्ट पार्टी के उस दूसरे स्टैण्ड की मुखालिफत की, जो उन्होंने बंटवारे को लेकर लिया था, जिसे ‘अधिकारी थीसिस’ के तौर पर जाना जाता है। याद किया जा सकता है कि पाकिस्तान निर्माण की बात जब जिन्ना ने और उनके सहयोगियों ने उठायी, भारतीय उपमहाद्धीप को धर्म के आधार पर बांट देने की अपनी समझदारी को प्रस्तुत किया, तब जहां गांधी, नेहरू की अगुआई वाली कांग्रेस ने इसका विरोध किया, गांधीजी ने यहां तक कहा कि ऐसा बंटवारा मेरी लाश पर होगा, लेकिन उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान के निर्माण को राष्ट्रीयताओं की मुक्ति के संदर्भ में देखा था और उसकी हिमायत की थी।

सोवियत रूस में इन्कलाब सम्पन्न होने के बाद कामरेड स्तालिन ने राष्ट्रीयताओं की मुक्ति की थीसिस रखी थी, जहां विभिन्न राष्टीयताओं को उजागर किया गया था, इस पद्धति को प्रस्तुत किया था कि किस आधार पर राष्ट्रीयताएं सम्बोधित की जाती हैं। उनकी इस थीसिस का भारतीय संदर्भ में बेहद गलत इस्तेमाल पार्टी की पाकिस्तान लाईन को लेकर सामने आया था। पार्टी के नेतृत्व ने इस बात पर भी गौर नहीं किया था कि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से सम्बद्ध अग्रणी नेता रजनी पाम दत्त — जो भारतीय पार्टी के साथ नजदीकी सम्पर्क में रहते थे – उन्होंने भी राष्ट्रीयताओं की थीसिस के इस गलत इस्तेमाल को रेखांकित किया था और उसे सुधारने की सलाह दी थी।

यही वह दौर था कि जब मुस्लिम लीग – जो सारतः एक सांप्रदायिक पार्टी थी तथा कांग्रेस – जो राष्ट्रीय आंदोलन के सूत्रधार के तौर पर संघर्षरत थी और जिसमें प्रगतिशीलों से लेकर रूढिवादियों तक सभी शामिल थे, दोनों को समकक्ष रखने की जिद तत्कालीन कम्युनिस्ट नेतृत्व ने पाली थी, और वह समूचे उपमहाद्वीप में उपहास का कारण बने थे।

अगर कोई भी व्यक्ति जिन्ना के उन दिनों के साक्षात्कारों को पढ़ेंगे, तो वह तीन झंडों के साथ उनकी सभाओं में उपस्थित होने वाले कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का बखूबी मज़ाक उड़ाते थे। याद रहे कम्युनिस्ट कार्यकर्ता लाल झंडा, कांग्रेस का तिरंगा झंडा और मुस्लिम लीग का झंडा थामें अलग-अलग सभाओं में पहुंचते थे।

कोई भी पूछ सकता है कि इस किस्म का गलत स्टैण्ड कम्युनिस्ट नेतृत्व ने कैसे लिया और जब इस स्टैण्ड के दिवालियापन उनके सामने ही उजागर हुआ, तब उन्होंने इसको लेकर गहरी आत्मसमीक्षा क्यों नहीं की।

चुप्पी बनाए रखना निश्चित ही विकल्प नहीं हो सकता है। अपने अतीत को लेकर हमारा आज भी चला आ रहा मौन भले ही हमें फौरी तौर पर असुविधाजनक सवालों से बचा लें, लेकिन वह उस गतिरोध को नहीं तोड़ सकता, जिसका शिकार वाम आंदोलन आज भी है।

विचार की अहमियत

मार्क्स का ऐतिहासिक उद्धरण है : ‘विचार जब जन समुदाय द्वारा ग्रहण किए जाते हैं, तब वह भौतिक शक्ति बनते हैं।’ जाहिर है, यह बात सभी किस्म के विचारों पर लागू होती है, गलत विचारों पर भी और सही विचारों पर भी। फिलवक्त जो समाजी-सियासी मंज़र हमारे सामने है उसमें यह बात गलत, जनद्रोही बातों पर अधिक लागू होती दिखती है, हिन्दुत्व वर्चस्ववाद के विचारों पर अधिक लागू होती है, जिसका जादू लोगों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा है।

अगर इस परिदृश्य को बदलना है, तो स्थापित सही विचारों की खामियों के बारे में बेबाकी से राय बनानी होगी और सही विचार सामने लाने होंगे। अपने पुराने विचारों को, अपनी पुरानी धारणाओं को परखना भी होगा कि हम कहां चूक गए ?

मेरे खयाल से लेखकों, विचारशील लोगों के सामने यह चुनौती है कि वह अपना पक्ष को चुनें, उसकी मजबूती से हिमायत करें या अपनी सलाहियत के इलाके में – रचनाकर्म के दायरे में नयी उंचाईयां कायम करें, ताकि लोगों में फैली पस्ती, निराशा समाप्त हो सके। वहीं साथ-साथ आज यह सबसे अहम हो चला है कि वह नए विचारों को सामने लाने के उद्यम में जुट जाएं।

मुझे तीन ऐसे इलाके दिखते हैं, जहां नए किस्म के चिन्तन की या नयी जमीन तोड़ने की जरूरत दिखाई देती है।

एक : बंटवारे को लेकर हमारी समझदारी, जिसमें लगभग 10 से 15 लाख लोग मारे गए थे और जिनका बहुलांश आपसी हिंसा में मारा गया था और एक से डेढ़ करोड़ लोग अपने-अपने वतन से बेदखल कर दिए गए थे।

दूसरा : सांप्रदायिक-फासीवाद के उदभव की या इस परियोजना को लेकर समय-समय पर प्रकट प्रगतिशील तबकों की समझदारी और उन पर अमल को लेकर हमारी राय।

तीसरा : आज जब हिन्दुत्व वर्चस्ववाद का विचार एक सहजबोध के तौर पर समाज में मौजूद है, हिन्दू आयडिया आफ इंडिया अर्थात ‘भारत की हिन्दूवादी संकल्पना ने बड़े हिस्से को प्रभावित किया है, तो प्रगतिशील ताकतों की तरफ से इसको लेकर क्या वैकल्पिक नज़रिया पेश किया जा सकता है?

याद करें, विभाजन की विभीषिका को लेकर जब-जब बात चलती है, तो अक्सर यह बात पेश की जाती है, जो दक्षिण एशिया में स्थित अवाम के मानस में गहराई में छिपी हिंसा को, उसकी संकीर्णताओं को, उसके पिछड़ेपन को उदात्त तरीके से पेश करती है, यहां तक कि इस खूरेंजी में लोगों की अपनी सक्रिय संलिप्तता को एक तरह से अनदेखा करते हुए सारा जिम्मा ब्रिटिशों के माथे पर डालती है।

उनका कहना रहता है कि अंग्रेज भारत में आए और उन्होंने हमें बांट दिया। गोया ब्रिटिश आगमन पूर्व भारत में लोग बड़े मेल मिलाप और आपसी सदभाव से रहते थे। कुछ लोगों की तरफ से यह दावे भी किए जाते हैं कि ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स मिल ने जिस तरह ब्रिटिशकालीन भारत के इतिहास को बयां कि

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