(आलेख : बादल सरोज)

भारत में औपनिवेशिक गुलामी की शुरुआत ईस्ट इंडिया कंपनी की 1757 की प्लासी की लड़ाई की अनैतिक जीत के साथ हुई। अंग्रेजी राज में इस देश की जो बर्बादी की गयी है, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है ; जो लूट की गयी, यह भयानक रूप से विनाशकारी थी और सर्वआयामी थी।

सबसे पहले तो इसने उस आर्थिक व्यवस्था को ध्वस्त किया, जो भारत के स्वाभाविक पूंजीवादी विकास की आधारशिला बन सकता था। भारत के कपड़े और दस्तकारी, जिसको धाक दुनिया भर में थी, की कमर ही तोड़ दी। यह काम दो तरह से किया : भारतीय उत्पादों पर चुंगी बढ़ाकर और अंग्रेजी माल को बिना चुंगी लाकर। भारत के रेशम और सिल्क की कीमत मशीनों से बनने वाले अंग्रेजी सूती कपडे से आधी से भी कम थी, उस पर और भारत को छींट पर 78 प्रतिशत चुंगी लगा दी गयी। करघे तोड़ दिए गए। कहते हैं कि अंगूठे भी कुचल दिए गए। लोहे, तांबे और पीतल के उद्योगों के साथ भी यही हुआ। नतीजा यह निकला कि मुर्शिदाबाद, जो सम्पन्नता और आबादी में लंदन के बराबर था, भुतहा हो गया। ढाका की आबादी 1880 में 2 लाख और निर्यात एक करोड़ पौंड का था ; 1890 में घटकर आबादी में 79 हजार का और निर्यात में 30 लाख का रह गया। सूरत तबाह हो गया। गोरखपुर में 1 लाख 75 हजार 600 महिलायें चरखा कातकर सूत उत्पादन करती थीं, वे बेरोजगार हो गयीं। पुरानी ग्राम व्यवस्था का आधार कृषि और दस्तकारी था, वह पूरी तरह टूट गया। मार्क्स लिखते हैं कि ‘हिन्दुस्तान के मैदानों में जुलाहों की हड्डियां बिखरी हुयी हैं। 18 वी सदी में देश में शहरी आबादी करीब 50 प्रतिशत थी, जो 19 वी सदी के अंत में घटकर सिर्फ 15 प्रतिशत रह गयी।’

कृषि संबंधो में भी विनाशकारी परिवर्तन किये गए। प्रक्रिया ही उलट गयी, सारे दस्तकार खेती की ओर वापस गए। जो पहले ही अलाभकारी थी, अंगरेजी राज में हुए परिवर्तनों ने और त्रासद बना दिया। मालगुजारी की दरें भयानक थीं। लगान की दर 1895 में 61 प्रतिशत थी, जो 1921 में 73 प्रतिशत हो गयी। हिन्दुस्तानी शासकों ने बंगाल में 1764 में 8 लाख 17 हजार पौंड मालगुजारी वसूली थी, जो कार्नवालिस के आने और इस्तेमारी बंदोबस्त के बाद 1793 में 34 लाख पौंड तक जा पहुँची। वारेन हेस्टिंग्स की रिपोर्ट बताती है कि 1770 के बंगाल, बिहार और ओडिसा के अकाल में 1 करोड़ लोग मारे गए, जो आबादी का एक तिहाई थे। एक तिहाई जमीन जंगल बन गयी, जहां जंगली जानवर रहने लगे। इसके बाद भी मालगुजारी पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हुयी। कारिंदों की लूट इसके अलावा थी। इसी दौर में यूरोप और आस्ट्रेलिया के लिए नील पैदा करने के नाम पर किसान और खेती दोनों को और बर्बाद किया गया।

मुगल काल में किसानो पर 1/3 लगान था, जो विलायती जमींदारी प्रणाली लाकर अंग्रेजो ने दोगुना कर दिया। नतीजे में किसानों का 80 प्रतिशत हिस्सा कर्ज में डूब गया। कुल कर्ज का चौथाई कर्ज लगान चुकाने के लिए लिया जाने वाला कर्ज था।

खेत मजदूर की आमदनी पर भी इसका असर पड़‌ना ही था। यह 1842 में एक आना थी, जो 90 साल बाद 1922 में 4 से 6 आना हुयी। यह वृद्धि नकारात्मक थी, क्योंकि 1842 में चावल की कीमत 40 सेर प्रति रुपया थी, जबकि 1922 में चावल 1 रूपये का पांच सेर था। मतलब 1842 में दिन भर की मजदूरी से वह ढाई किलो चावल खरीद सकता था, जो 1922 में दिन भर की मजदूरी के बाद सवा किलो रह गया।

खेती की दुर्दशा और किसानो की मौतें रोकने के लिए आये रॉयल कमीशन (1926) को निर्देश था कि ‘लगान, जमींदारी, मालगुजारी और आबपाशी की मौजूदा व्यवस्था के बारे में किसी तरह का सुझाव पेश करना कमीशन का काम नहीं होगा।’ इस तरह हुयी लूट के बारे में दादा भाई नौरोजी ने 1901 में लिखा था कि ‘महमूद गजनवी 18 बार में जितना लूट कर नहीं ले गया था, उससे अधिक अंग्रेज एक साल में लूट कर लंदन ले जाते हैं।’ उनकी बात सही थी ; 1757 से 1815 के बीच ब्रिटिश बैंकों में 1 अरब पौंड भारत से लूटी गयी रकम जमा हुयी थी। गजनवी के 18वें हमले के बाद उसके दिए गए घाव भर गए थे, मगर अंग्रेजों की लूट ने बुनियादी शक्तियों का जो ध्वंस कर दिया था, वे घाव कभी नहीं भर पाए।

इस दौर की मुख्य समस्याओं को रजनी पामदत्त ने इस तरह सूत्रबद्ध किया है :
(1) जीविका निर्वाह के दूसरे सहारे बंद होने से खेती करने वालों की संख्या बहुत बढ़ गयी। (1891 में 61.1 से 1921 में 73 प्रतिशत)
(2) जमीन पर एकाधिकारी प्रथा होने से किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया।
(3) खेती करने का ढंग बहुत पिछड़ा था, उसकी उन्नति करने में हजार अड़चनें थीं।
(4) अंगरेजी राज में खेती में ठहराव और ह्रास पैदा हुआ। (5) किसानो की गरीबी दिनों-दिन बढ़ती गयी। जमीन के  छोटे-छोटे टुकड़े हुए। किसानों के एक हिस्से से जमीन छिन गयी।
(6) वर्गभेद बढ़ा : खेतिहर मजदूर 33 से बढ़‌कर 50 प्रतिशत हो गए।

किसानों के उबाल, संघर्ष और बगावतें

इस तरह की असहनीय स्थितियों में ग्रामीण आबादी में उबाल आना ही था। यही उबाल अनगिनत संघर्षों और बगावतों, विद्रोहों में उभर कर सामने आया। अफसोस की बात है कि इन सारी बगावतों का कोई एकजाई संकलन नहीं है। अयोध्या सिंह ने 1763 से 1900 के बीच हुये ऐसे 84 बड़े विद्रोहों को संकलित किया है। ये बगावतें विराट और देशव्यापी थीं। क्रूर और अमानवीय दमन के बावजूद काफी अरसे तक चली थीं। अखिल भारतीय किसान सभा इन्हीं संघर्षों, बगावतों, विद्रोहों की सांगठनिक-राजनीतिक अभिव्यक्ति थीं/है। 1855 की संथाल आदिवासियों की बगावत, 1875 में दक्खिन के किसानों का विद्रोह, मुम्बई में भील कोल, राजपूताना में मेव, कांची, छोटा नागपुर, खोंडस, उड़ीसा, गोंड मध्यप्रांत, मोपला मालाबार, सन्यासी और फकीर बगावतें और चौरी चौरा इनमे से कुछ नाम हैं। उत्तरप्रदेश में शायद ही कोई जिला बचा हो, जहां ये बगावतें नहीं हुयी हों।

भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 की लड़ाई, जिसे सिपाही विद्रोह कहा गया, भी मूलतः इस किसान असंतोष का विस्फोट था। इसकी लामबंदी के लिए एक गाँव से दूसरे गाँव तक एक रोटी पर नमक और मांस का टुकड़ा रखकर भेजा जाना देसी किसानी प्रतीकात्मकता भर नहीं थी। दिल्ली फतह करने के बाद गठित शासन प्रणाली कमाल की मौलिक थी। इसलिए और ज्यादा मानीखेज कि यह पेरिस कम्यून के भी पहले हुयी थी। भारत का स्वतन्त्रता संग्राम मूलतः किसानों की लड़ाई था। गांधी द्वारा इसकी शुरुआत के लिए चम्पारण को चुनना अचानक लिया गया फैसला नहीं था।

इन लड़ाइयों को चलाने के लिए किसानों ने खुद आगे बढ़ाकर ग्राम सभाएं बनाई। इन्हीं ग्राम सभाओं ने अपने आपको जिले/जनपद के स्तर पर संगठित किया। यही जिला किसान सभाएं बाद में सूबाई कमेटियों तक पहुँची।

इन संघर्ष, बगावतों के मुख्य रूप से चार आयाम थे : औपनिवेशिक राज की लूट और बर्बादी के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति, जमींदारी के सभी रूपों से मुक्ति, भूमि का बंटवारा और खेत मजदूरों की मजदूरी और उन्हें जमीन।

इसी के साथ इन संघर्षों की एक अंतर्धारा भी थी, भारतीय समाज की विशिष्टता के सामाजिक शोषण का प्रश्न, जो अंततः वर्गीय शोषण का ही एक रूप था/है, के खिलाफ संघर्ष।

आजादी की लड़ाई के उस वक्त के साझे मंच – कांग्रेस – में भी इन संघर्षों की गूंज सुनाई दी, लेकिन कांग्रेस के प्रमुख नेता सामंतवाद के खिलाफ बोलने के लिए तैयार नहीं थे। चौरी चौरा (5 फरवरी 1922) घटना के बाद असहयोग आंदोलन को वापस लेना सिर्फ उस दिन हुयी हिंसा से व्यथित होकर की गयी कार्यवाही नहीं थी। वे और उनके साथ के कांग्रेसी उस दौरान उत्तर प्रांत में इस आंदोलन के तेजी से किसान विद्रोहों और लगान न देने की लड़ाई में बदलते हुए देखकर घबरा गए थे।

कांग्रेस के कराची सम्मेलन ने, जिसने अनेक नीतिगत सवालों पर कांग्रेस के रुख को सूत्रबद्ध किया था, जो आजादी के बाद के भारत की दिशा भी बना, उसमें भी जमींदारी प्रथा के खात्मे की मांग का सख्त विरोध किया गया था और किसानो पर टैक्स घटाने भर की मांग की गयी थी।

यही समय था, जब कम्युनिस्टों ने कांग्रेस के सम्मेलन के मंचों को किसान-मजदूरों की समस्याएं उठाने का मंच बनाया। जमींदारी प्रथा की पूर्ण समाप्ति की मांग उठाई और इसको लेकर नीचे जाकर लड़ाईयां लड़ी।

1925 में लेबर स्वराज्य पार्टी ने किसानों के सवाल उठाये। आखिर में 18 जनवरी 1936 को मेरठ में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी — जिसमें बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट और वामपंथी शामिल थे और जो एक अलग पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस का हिस्सा भी थी — की एक बैठक में किसानों का एक संगठन बनाने की राय बनी। श्रीमती कमलादेवी चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में हुयी इस बैठक ने जयप्रकाश नारायण और प्रोफेसर एन जी रंगा के संयुक्त संयोजकत्व में एक समिति बनाई और इसे लखनऊ में किसानों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने का दायित्व सौंपा। किसान सभा के कार्यकर्ताओं को यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि उसके संगठन के निर्माण के फैसले वाली बैठक की अध्यक्षता एक महिला ने की थी।

स्थापना सम्मेलन

अंततः यह सारे संघर्ष किसानों के एक संगठन में मूर्तिमान हुए। संघर्ष की विविध धाराओं में से विकसित हुआ किसान आंदोलन 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में हुए स्थापना सम्मेलन के साथ एक अखिल भारतीय संगठन अखिल भारतीय किसान सभा में बदल गया। सम्मेलन की अध्यक्षता उस दौर के और कुल मिलाकर अब तक के सबसे महान किसान नेताओं में से एक स्वामी सहजानंद सरस्वती ने की।

अपने उ‌द्घाटन भाषण में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि यह किसान संगठन पूर्ण स्वतंत्रता का का हामी है और इसकी लड़ाई किसानों-मजदूरों और शोषितों को पूरी आर्थिक-राजनीतिक ताकत दिलाने की लड़ाई है। प्रोफेसर एन जी रंगा इसके महासचिव चुने गए। देश के सभी प्रमुख वामपंथी, समाजवादी तथा कांग्रेस के प्रगतिशील नेता इस सम्मेलन के प्रतिनिधि थे।

सम्मेलन के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा गया कि ‘किसानों की तात्कालिक राजनीतिक, आर्थिक मांगों के लिए संघर्ष करते हुए राजनीतिक सत्ता हासिल करने की लड़ाई लड़ी जाएगी। इस लड़ाई के केंद्र में हर तरह की जमींदारी व्यवस्था के खात्मे, लगान की समाप्ति, टैक्स प्रणाली में बदलाव कर उसका ग्रेडेशन, जमीन जोतने वाले को, भूमिहीनों को जमीन तथा कर्ज मुक्ति की मांगे रहेंगी।’

इस सम्मेलन ने देश के किसानों की आगामी लड़ाईयों के लिए जिन 38 सूत्री मांगों को तय किया था, उनमें सभी के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा, मुफ्त स्वास्थ्य, मुफ्त पीने का शुद्ध पानी और राष्ट्रीय आवास नीति बनाये जाने की मांगों के साथ-साथ सभी किसानों को बंदूकें और हथियार रखने का अधिकार दिए जाने की मांगे शामिल थीं। जाहिर है कि इस सम्मेलन के ऊपर 1917 में हुयी समाजवादी क्रान्ति और उसके बाद गुजरे 19 वर्षों में सोवियतों, किसान-मजदूरों की संस्थाओ द्वारा किये गए कामों तथा उपलब्धियों का प्रभाव था।

कांग्रेस अध्यक्ष के नाते पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस सम्मेलन को संबोधित किया। किसानों की दुर्दशा और उसके कारणों का उल्लेख किया। स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने उम्मीद जताई कि नेहरू और पटेल किसानों की लड़ाई का साथ देंगे। नेहरू ने उन्हें आश्वस्त भी किया – किन्तु पटेल ने इस संगठन का मजाक ही उड़ाया। जब प्रोफेसर रंगा ने उन्हें अक्टूबर के सत्र की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने “रंगा मद्रासी को किसानों के बारे में क्या पता” कहकर आमंत्रण ठुकरा दिया।

बहरहाल, उनके न चाहने के बाद भी हिन्दुस्तान के किसान अपने संघर्षों का हथियार गढ़ चुके थे। अब उनके आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता था। यही हुआ भी, 1936 से 2026 तक किसान सभा का 90 वर्षो का इतिहास किसानों और मेहनतकशों के हितों, देश और उसकी एकता की हिफाजत में किये गए संघर्षों और आम किसान तथा खेतमजदूर को नेता बनाने सहित अनगिनत उपलब्धियों का इतिहास है। इसे प्रत्येक राष्ट्रीय सम्मेलन के आधार पर अलग अलग विवरण देकर देखने-समझने की बजाय प्रमुख आयामों के आधार पर समझना चाहिए।

जिन महान संघर्षों ने अखिल भारतीय किसान सभा के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की थी, अपने निर्माण के बाद के जीवन में किसान सभा ने उन्हें आगे बढ़ाया। ये इतने अधिक और इतने विराट हैं कि इन्हें एक ग्रंथ में भी नहीं समेटा जा सकता। इनमें से कुछ की बानगी काफी है बाकी की झलक दिखाने के लिए।

आजादी की लड़ाई में किसानों की भागीदारी के लिए जरूरी था कि जर्मीदारों के अन्याय तथा प्रत्यक्ष शोषण के खिलाफ संघर्ष छेड़े जाएँ। इनकी शुरुआत 1936 से ही हो गयी, खुद इसके राष्ट्रीय नेताओं ने इनकी अगुआई की। सातवें सम्मेलन (अमृतसर 2-4 अप्रैल 1943) के दौरान कय्यूर के शहीदों को फांसी की खबर आयी। आजादी के ठीक पहले तेलंगाना के किसानों का निजाम और उसके रजाकारों के खिलाफ शानदार सशस्त्र संग्राम (अक्टूबर 1946 से 21 अक्टूबर 1951 तक) चला। इसमें किसानों ने 3000 गाँवों में अपना राज स्थापित किया, 10 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन बांटी। भूमि वितरण को राष्ट्रीय एजेंडे पर लाया।

दूसरी बड़ी लड़ाई पुन्नप्रा वायलार की लड़ाई थी। तीसरी बड़ी लड़ाई बंगाल के अनेक जिलों में एक साथ उभरा तेभागा आंदोलन था, जो जोतदारों को उपज का एक और बंटाईदारों को दो हिस्से देने की मांग पर हुआ था।

सूरमा घाटी, गोरा घाटी, वर्ली आदिवासियों का विद्रोह आदि शानदार लड़ाईयां भी इतिहास का हिस्सा हैं। इनके अलावा चौथे दशक में बंगाल में खास लैंड और लगान को लेकर, बिहार में बख्शत सत्याग्रह और पंजाब में टेनेन्सी बिल को लेकर संघर्ष हुए। छोटा नागपुर की आदिवासी लड़ाइयां और मध्य प्रांत में गोंडो और भीलों के संघर्ष में किसान सभा ने अगुआई की। पेप्सू के किसानों की बेटरमेंट लेवी के खिलाफ लड़ाई ने अपनी छाप छोड़ी। आजादी के बाद भूमि सुधार के वादे से कांग्रेस के मुकरने के चलते किसान सभा ने भूमि कब्जे की अनगिनत लड़ाईयां छेड़ी। 1960 का बंगाल का खाद्य आंदोलन भी हुआ।

साठ के दशक और उसके बाद केरल में तथा सत्तर के दशक में बंगाल में युक्त फ्रंट की सरकारों के दौरान भूमि सुधार के सरकार के फैसलों को लागू करवाने के लिए किसान मैदान में डटे और बाद में वाम मोर्चा के दौर में भूमि वितरण को संरक्षण देकर बंगाल में ग्रामीण वर्ग के संतुलन में बुनियादी बदलाव ला दिया। किसान सभा ने यही भूमिका त्रिपुरा में भी निबाही।

किसानों के हितों की रक्षा, विश्व व्यापार संगठन सहित नवउदारीकरण के हमलों तथा पशु व्यापार पर सांप्रदायिक हमलों से लेकर भूमि अधिग्रहण कानून को उलटवाने और आदिवासियों के वनाधिकार तक के शानदार संघर्ष इस बीच हुए और किसान सभा इसकी धुरी रही। ताजे अतीत के आंदोलन हमारी स्मृति में हैयुग इसलिए उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं है।

संघर्षों के बहुविध आयाम

अपने स्थापना सम्मेलन से ही इसने छुआछूत और जाति-श्रेष्ठता बोध पर आधारित सामाजिक उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष को अजेंडे पर लिया हुआ था। इसे लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश से लेकर केरल और तामिलनाडु तक चेतना और व्यवहार दोनों स्तर पर कार्यवाहियां हुयी।

केरल और त्रिपुरा में किसान सभाओं ने बड़े पैमाने पर शिक्षा के प्रसार की मुहीम भी छेड़ी। त्रिपुरा में यही जनशिक्षा आंदोलन 1948 में गणमुक्ति परिषद में बदला तथा शिक्षा के साथ जनतंत्र, अंधविश्वास और सामाजिक शोषण को अपने निशाने पर लिया, जिसके चलते 1949 में महाजनी लूट के खिलाफ गोरा घाटी का संघर्ष हुआ। केरल में गाँव-गाँव तक लाइब्रेरी आंदोलन ले जाने में किसान सभा की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

आदिवासी भाषा और संस्कृति की रक्षा के संघर्ष और उनके वनाधिकार की लड़ाइयों के सवाल भी प्रमुखता से लिए। महिला अधिकारों का प्रश्न भी अनेक स्थानों पर किसान सभा ने उठाया। 1959 में तंजौर में हुए सम्मेलन के समय महिला किसानों का एक दिनी सम्मेलन हुआ, जिसमे 5000 महिला किसानों ने भाग लिया।

आजादी के पहले समय-समय पर महात्मा गांधी सहित राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग को लेकर भी किसान सभा ने देशव्यापी आह्वान किये। इसी के साथ साम्प्रदायिकता की बढ़त पर आजादी से पहले और बाद में भी विशेष मुहिम भी चलाई।

द्वितीय विश्वयुद्ध में जब जापानी बमबारी ने भारत के कई हिस्से तबाह कर दिए, तब किसान सभा राहत और पुनर्वास को लेकर सामने आयी। देश की जनता पर आयी हर प्राकृतिक आपदा के समय किसान सभा उनके साथ खड़ी हुई।

दमन और बलिदानों का इतिहास
किसान सभा शुरू से ही दमन के निशाने पर रही। आजादी के पहले इसे अंग्रेजों और जमींदारों के अलावा प्रांतों में बनी सीमित शक्तियों वाली कांग्रेस सरकारों के दमन और गिरफ्तारियों का भी सामना करना पड़ा।

तेलंगाना के किसान विद्रोह में दमन ने सारी सीमाएं लांघ दीं। इसमें 4000 से अधिक किसान तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता मार डाले गए, 10000 से ज्यादा को 3 से 4 सालों के लिए जेल तथा बंदीगृहों में डाला गया। 50000 से ज्यादा किसान बार-बार पुलिस और मिलिट्री द्वारा पूछताछ के लिए ले जाए गए और यातना के शिकार बने। लाखों किसानों को गाँवों में घुसकर पुलिस निजाम के रज्जाकारों और मिलिट्री ने उत्पीड़ित किया, लाठियां चलाई, उनकी खड़ी फसलें फूंक दीं। पुन्नप्रा-वायलार में जमींदारों और कारखानेदारों के गंठजोड़ ने अक्टूबर 1946 में सैकड़ों किसानों को भून दिया। बंगाल के तेभागा आंदोलन में मरने वालो की संख्या भी काफी अधिक थी।

दमन का एक तीखा दौर देश में पहली बार भूमि सुधार लागू करने वाली ई एम एस नम्बूदिरीपाद की अगुआई वाली केरल सरकार की बर्खास्तगी के बाद चला। बंगाल इस दमन के कई चरणों से गुजरा, जिसमें एक कठिन समय 1972 से 77 तक चला अर्द्धफासिस्ट आतंक का दौर था। इसमें 50000 लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, 1200 से अधिक की हत्याएं हुईं। ममता बनर्जी के सरकार में आने के बाद यह दमन किसान और मजदूर संगठनों पर और भी तेजी से हुआ है। सैकड़ों कार्यकर्ताओं की हत्या के बाद हजारों की संख्या में कार्यालयों पर कब्जा कर लिया गया। इमरजेंसी (26 जून 1975 मार्च 1977) की यातनाएं भी अंततः जनतांत्रिक आंदोलनों को झेलनी पड़ी। हमारे कुछ नेता जेलों में ही शहीद हो गए। बिहार में भूमि आंदोलन में अनेक कार्यकर्ता और किसान नेता शहीद हुए। यह दमन और हमले उनके अलावा हैं, जो तकरीबन हर जिले में किसानों को संगठित करते हुए किसान सभा के कार्यकर्ताओं को भुगतान पड़ता है।

विस्तार, व्यापकता और सुदृढ़ीकरण का इतिहास

महिलाओं को संगठन से जोड़ने की विशेष काम आज भी किये जाने वाले कामों में शामिल हैं। जिस अखिल भारतीय किसान सभा को बनाने का निर्णय एक महिला नेत्री कमला देवी चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में हुआ हो, जिसकी अध्यक्षा कामरेड गोदावरी पारुलेकर (25 वां सम्मेलन 17-19 मई 1986 पटना) जैसी कद्दावर दंत नायिका रही हो, जिनके संघर्षों में महिलाओं की भागीदारी बराबर की होती हो, उसकी सदस्यता और नेतृत्व की पांतों में महिलाओं की भागीदारी बराबरी पर लाना एक जरूरी काम है।

किसान सभा ने आरम्भ से ही खेत मजदूरों की मांगों को अपनी लड़ाई में शामिल रखा है और उन्हें लेकर संघर्ष किये। लेकिन धीरे-धीरे, ग्रामीण इलाकों में बेदखली और भूमिहीनता के शिकार किसानों की तादाद बढ़ते-बढ़ते इतनी हो गईं  कि उन्हें ज्यादा प्राथमिकर्त पर लेना आवश्यक हो गया। यह काम एक पृथक संगठन के आधार पर ज्यादा असरदार तरीके से किया जा सकता था।

मिदनापुर में 8-11 नवम्बर 1962 को हुआ सम्मेलन, किसानो और खेत मजदूरों का आखिरी संयुक्त सम्मेलन था। इसी में एक पृथक सत्र खेत मजदूरों के लिए हुआ और उनका अलग से नेतृत्व चुना गया।

बाकी सभी किसान संगठनो को भी एक ‘साझे मंच पर लाने के प्रयास किये जाते रहे। हाल के दौर में जब भारत की खेती–किसानी और देहातों के हर कोने को नवउदारीकरण ने अपनी विनाशलीला का रंगमंच बना दिया है, तब यह काम और भी तेजी से किया जाना आवश्यक था। किसान सभा ने इसे सफलता के साथ निबाहा और देश के किसानों की अब तक के इतिहास की व्यापकतम एकता संगठित करने में अपनी भूमिका निभाई।

सबसे पहले भूमि अधिकार आंदोलन अस्तित्व में आया, जो मोदी सरकार द्वारा 2014 में लाए गए भूमि अधिग्रहण कानून के विरुद्ध सफल संघर्ष का परिणाम था। इसमें 86 संगठन शामिल है। इसकी तरफ से दो -दो संसद मार्च हुए। इसने पशु व्यापार पर रोक और उसकी आड़ में सांप्रदायिक तथा जातीय आधार पर दलितों और  अल्पसंख्यकों  पर किये जा रहे हमलों के विरुद्ध अनेक आंदोलन चलाये। इसी के साथ किसान सभा ने देश भर में  संघर्ष संदेश जत्था निकाला, जिसका समापन 24 नवम्बर 2016 की दिल्ली रैली में हुआ। इसने देश भर के संगठनों को संगठित करने का काम किया।

6 जून 2017 को मंदसौर (मध्यप्रदेश) में किसानों पर हुए गोलीकांड और 6 किसानों की मौत के बाद फसलों के वाजिब दाम तथा कर्ज मुक्ति का सवाल मुखर होकर सामने आया। इस गोलीकांड के खिलाफ किसान सभा ने खुद वहां जाकर हस्तक्षेप किया और इसे देश भर का मुद्दा बनाया। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का साझा मंच अस्तित्व में आया, जिसमें अब तक जुड़े 234 संगठन सदस्य बन चुके हैं। इस संयुक्त मंच की तरफ से फसल के दाम तय करने के लिए स्वामीनाथन आयोग के फार्मूले (सकल लागत+50 प्रतिशत) अमल में लाने तथा कर्ज मुक्ति करने की मांग को लेकर अभियान चलाने के बाद 20-21 नवम्बर 2017 कोई दिल्ली पर किसान संसद लगाई गयी और इन दोनों कानूनों का मसविदा अपने सांसदों के माध्यम से संसद के दोनों सदनों में निजी कानून के रूप में रखवाया। यह एकता और इसके लिए चले अभियान का प्रभाव इतना था कि 21 राजनीतिक पार्टियां दिल्ली में इस मंच पर आई और अपने पूर्ण समर्थन का एलान किया। अखिल भारतीय किसान महासंघ के नाम से एक संयुक्त समन्वय भी विकसित हुआ, किसान सभा इसमें भी शामिल है। वाम किसान संगठन तथा खेत मजदूर यूनियन भी शामिल हैं।किसानों और मजदूरों के साथ ही महिला, छात्र, युवा एवं अन्य संगठनो को जोड़कर एक व्यापक समन्वय जन एकता जन अधिकार आंदोलन के नाम से गठित हुआ, जिसे नवउदारीकरण तथा साम्प्रदायिकीकरण के विरुद्ध व्यापकतम समुदाय तक ले जाना है।

इसके अतिरिक्त किसानों के बीच फसल आधारित समन्वय भी विकसित किये गए हैं, जिनके जरिये किसानों के अब तक अछूते रहे हिस्सों तक पहुंचा जा रहा है

सामाजिक मुद्दों पर समन्वय की काफी बेहतर पहलकदमियां इस बीच की गयी, जो दलितों और अल्पसंख्यकों पर हिन्दुत्वी गिरोहों के योजनाबद्ध हमलों के खिलाफ प्रतिवाद विकसित करने में सफल रहीं। किसान सभा का शानदार सफर जारी है।

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 9424231650)

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