(आलेख : प्रभात पटनायक, अनुवाद : राजेंद्र शर्मा)

जो भारत सरकार बहुत ही डरपोक साबित हुई है और जिसने ईरान पर अमेरिकी-इस्राइली हमले पर निंदा का एक शब्द तक नहीं बोला है, अब मीडिया में काम कर रहे अपने विभिन्न हमदर्दों के जरिए यह दिखाने में जुटी हुई है कि उसका इस लड़ाई में कोई भी पक्ष लेने से इंकार करना और उसका इस मामले में आम तौर पर चुप्पी साधे रखना, वास्तव में मास्टरस्ट्रोक है और ऐसा करना ही देश के बेहतरीन हित में है।

इसके लिए दलील यह दी जा रही है कि अमेरिकी-इस्राइली हमले की निंदा करना, नैतिक आधार पर तो सही प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन किसी देश को अपनी विदेश नीति तो राष्ट्रीय हितों की ठोस सचाई के आधार पर तय करनी होती है, न कि ‘‘हवा-हवाई’’ नैतिक आग्रहों के आधार पर। इसलिए, भारत के राष्ट्रीय स्वार्थ तो इसी का तकाजा करते हैं कि हम पश्चिम के साथ अपने रिश्ते बनाए रखें, न कि किसी अमूर्त तीसरी दुनिया की एकजुटता के नाम पर, जो नैतिक रूप से भले ही संतोषजनक हो, पर भौतिक रूप से हमें कोई फायदा नहीं देने वाली है, पश्चिम के साथ रिश्तों को बिगाड़ लें।

लेकिन, दो कारणों से यह बहुत ही खतरनाक दलील है। पहला तो यह कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में नैतिक आग्रहों का परित्याग करना खतरनाक है, क्योंकि यह तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद की समूची अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के त्यागे जाने को औचित्य प्रदान करना हो जाता है।

हमारे यह कहने का अर्थ यह कतई नहीं है कि युद्धोत्तर व्यवस्था ने, जिसमें संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था भी शामिल है, हर बार नैतिक तरीके से सही काम ही किया है। यह कहने का आशय सिर्फ इस तथ्य को रेखांकित करना है कि इस व्यवस्था को और इसके साथ जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को, बुनियादी तौर पर कुछ खास नैतिक आग्रहों से ही औचित्य हासिल होता था, जिनके आगे साम्राज्यवाद को सिर झुकाना पड़ा था, क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में वह कमजोर हो गया था। बेशक, इस पूरे दौर में ही वह बार-बार अपनी जानी-पहचानी कपट लीला भी करता रहा था, लेकिन ये प्रसंग जब-तब होते थे और उपयुक्त मौका हाथ आने पर निर्भर होते थे। सबसे बढक़र यह कि उसके कपट लीला के कुकृत्य, तीसरी दुनिया की अपने अनुकूल न पड़ने वाली सरकारों के खिलाफ घरेलू तख्तापलट के आवरण में पेश किए जाते थे और ये आम तौर पर नंगई से हमले का रूप नहीं लेते थे। इस व्यवस्था का परित्याग ही करने की दलील देना, जो काम अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नैतिक आग्रहों का उपहास करना होता है, नंगे साम्राज्यवादी हमले को उचित ठहराने का ही काम करता है।

*हमलावर साम्राज्यवाद पर कमज़ोर हुआ अंकुश*

दूसरे, इस व्यवस्था का ही परित्याग करने की सूरत में हमें सिर्फ जब-तब साम्राज्यवादी हमले के प्रकरणों का ही सामना नहीं करना पड़ेगा, बल्कि हमलों की एक अविराम शृंखला का ही सामना करना पड़ रहा होगा, जो औपनिवेशिक शासन से औपचारिक स्वतंत्रता हासिल करने की तीसरी दुनिया की बहुत भारी उपलब्धि को ही पलट देगा। एक विशेष परिस्थिति-संयोग के चलते ही तीसरी दुनिया को औपनिवेशिक या अर्ध-औपनिवेशिक गुलामी से आजादी हासिल हुई थी। इस परिस्थिति-संयोग की पहचान उत्पीड़ित जनगण के एक वैश्विक ऐतिहासिक उभार से होती थी, जिसे बोल्शेविक क्रांति से जबर्दस्त बल मिला था। इस सचाई को तो अमेरिकी विदेश सचिव, मार्को रूबियो तक ने कुछ ही हफ्ते पहले यूरोपीय नेताओं के सामने अपने कुख्यात भाषण में स्वीकार किया था। इस परिस्थिति-संयोग के पराभव से, जिसका सबसे बढक़र द्योतक सोवियत संघ का पराभव था, साम्राज्यवादी हमले की पलट द्वंद्वात्मकता उन्मुक्त हो गयी है।

इस द्वंद्वात्मकता की पहचान अनेक घटना-विकास से होती है। जैसे विभिन्न ‘रंगीन क्रांतियों’ या कलर रिवोल्यूशन्स के जरिए पूर्व-सोवियत गणराज्यों में साम्राज्यवादी घुसपैठ। नाटो का रूस की सीमाओं तक विस्तार किया जाना। ग़ज़ा में भयावह नरसंहार। इस्राइली सैटलर उपनिवेशवाद का क्षेत्रीय विस्तार। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी का अमेरिका द्वारा अपहरण। क्यूबा में समाजवादी क्रांति को खत्म करने के लिए, क्यूबा में हस्तक्षेप करने की अमेरिका की खुली धमकी। और अब ईरान के खिलाफ खुल्लमखुल्ला युद्ध।

इस समय ईरान इस हमले का जो जोशीला प्रतिरोध कर रहा है, वह साम्राज्यवादी हमले की इस द्वंद्वात्मकता पर रोक का काम कर रहा है। अगर किसी तरह यह प्रतिरोध परास्त हो जाता है, तो साम्राज्यवादी हमले की यह द्वंद्वात्मकता और भी नंगई से तथा और भी दबंगई से आगे भी जारी रहेगी।

इसलिए, वर्तमान ईरानी निजाम की विचारधारा तथा उसकी संस्थाओं के प्रति हमारा रुख चाहे जो भी हो, आज साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ हमारा ईरान का समर्थन नहीं करना, हमारे अपने देश को कल को साम्राज्यवादी प्रभुत्व के लिए अरक्षित बनाना ही होगा। दूसरे शब्दों में साम्राज्यवाद के खिलाफ ईरान का समर्थन, सिर्फ नैतिक आग्रह का मामला नहीं है, बल्कि हमारी अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए, साम्राज्यवादी हमले की अनमनीय द्वंद्वात्मकता को रोकने के लिए जरूरी है। आज ईरान में क्या होता है, इसका असर सिर्फ ईरान पर नहीं पड़ेगा, बल्कि इसके साथ हमारी अपनी स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई है।

*साम्राज्यवाद की कच्चे मालों और संसाधनों की भूख*

इस साम्राज्यवादी द्वंद्वात्मकता की अटलता डोनाल्ड ट्रंप के सनकीपन में निहित नहीं है, बल्कि यह तो पूंजीवाद की प्रकृति में अंतर्निहित है। लेनिन ने, जो ऐसे हालात में लिख रहे थे, जहां पूंजीवादी दुनिया को साम्राज्यवाद की आपसी प्रतिद्वंद्विताओं ने टुकड़ों में बांट दिया था, साम्राज्यवादी बुलडोजर के इस अटल मार्च की ओर ध्यान खींचा था। इसके चलते बहुत बार यह समझ लिया जाता है कि इलाकों को हड़पने की साम्राज्यवाद की प्यास, सिर्फ साम्राज्यवाद की आपसी प्रतिस्पर्धा से जुड़ी हुई है। लेकिन, यह भ्रांतिपूर्ण है।

इस तथ्य से कि वर्तमान परिस्थिति की पहचान साम्राज्यवाद की आपसी प्रतिस्पर्धा के शमन से होती है, साम्राज्यवाद के इस अटल मार्च में रत्ती भर कमी नहीं आती है। कच्चे मालों के वास्तविक या संभावित स्रोतों पर नियंत्रण की तलाश, जिसकी ओर लेनिन ने ध्यान खींचा था, साम्राज्यवाद के लिए आज भी उतनी ही प्रबल है, जितनी कि उनके जमाने में थी। इसलिए, कच्चे माल के इन वास्तविक या संभावित स्रोतों को, तीसरी दुनिया की स्वतंत्र सरकारों के नियंत्रण में जाने से रोकना, साम्राज्यवाद के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण मामला हो जाता है।

साम्राज्यवादी दुनिया की पहचान तो राजधानियों के बीच डार्विनवादी ढंग की प्रतिस्पर्धा से होती है और उसके कदम, इस तरह की प्रतिस्पर्धा के सर्वव्यापीपन से अनुशासित होते हैं। इस दुनिया में, साम्राज्यवाद कभी भी, स्थायी संतुलन की किसी अवस्था में टिका रह ही नहीं सकता है। और वह शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की किसी स्थायी अवस्था को भी मंजूर नहीं कर सकता है। लेनिन ने जिसे ‘आर्थिक इलाका’ या इकॉनमिक टेरेटरी कहा था, उस पर कब्जा करने की मुहिम, इसके अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए, साम्राज्यवाद का उस युद्धोत्तर व्यवस्था का अंर्तध्वंस करने की कोशिश करना, जो इस पर कुछ अंकुश लगाती थी, इसके अस्तित्व में ही अंतर्निहित है। और सोवियत संघ के पराभव के रूप में एक ‘जीत’ हासिल हो जाने के बाद, वे अब हमले की अपनी द्वंद्वात्मकता को आगे बढ़ाना चाहेंगे। तीसरी दुनिया के जनगण इस हमले की काट प्रतिरोध की द्वंद्वात्मकता से कर सकते हैं और इस मुकाम पर, इस द्वंद्वात्मकता के केंद्र में होना चाहिए, जो कोई भी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ रहा हो, उसका समर्थन करना।

*इस्लामवाद के सामराजी इस्तेमाल की विडंबना*

इस दलील का एक विशिष्ट संदर्भ भी है। समाजवाद के खिलाफ और तीसरी दुनिया में धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील राष्ट्रवाद के खिलाफ अपने संघर्ष में, साम्राज्यवाद ने अपने हथियार के तौर पर इस्लामवाद का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। धुर-साम्राज्यवादी विन्स्टन चर्चिल के ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय जनता के संघर्ष को नष्ट करने के औजार के रूप में, भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम अलगाववाद को समर्थन देने से लेकर; ईरान में मोहम्मद मुसद्देह के धर्मनिरपेक्ष तथा प्रगतिशील निजाम के खिलाफ तख्तापलट कराने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा अयातुल्ला कासानी के साथ गठजोड़ कायम किये जाने तक ; अफगानिस्तान में सौर क्रांति के खिलाफ अमेरिका द्वारा इस्लामवादी ताकतों के इस्तेमाल तक, जिसने सोवियत संघ को थकाने का भी काम किया था ; एक जैसी कहानी है। यह कहानी है साम्राज्यवाद द्वारा तीसरी दुनिया में प्रगतिशील आंदोलनों को विफल करने के लिए, जनता को धार्मिक आधार पर विभाजित किए जाने की।

इसके बावजूद, पहली नजर में यह इतिहास की एक विडंबना लग सकती है, लेकिन वास्तव में हालात के तर्क पर आधारित सचाई यह है कि इस्लामवादी ताकतें भी जब सत्ता में आयी हैं, अक्सर वे भी साम्राज्यवाद के खिलाफ हो गयी हैं। ऐसे मुकाम पर साम्राज्यवाद ‘जनतंत्र’ तथा ‘स्वतंत्रताओं’ के रखवाले का बाना धारण कर के सामने आता है और उन्हीं निजामों के खिलाफ कदम उठाने लगता है, जिनकी खुद उसने सत्ता में आने में मदद की होती है। कभी-कभी तो उसने इससे उल्टा भी किया है और धर्मनिरपेक्ष निजामों का समर्थन किया है, जिन्होंने साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ी हो गयी इस्लामवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाइयां लड़ी हों। ईरान-इराक युद्ध के दौरान उसने ऐसा ही किया था।

*यह तो हमारे उपनिवेशविरोधी स्वतंत्रता संघर्ष का अपमान है*

ऐसे निजामों के खिलाफ, जो साम्राज्यवाद से रंजिश मानते हैं या ऐसे निजामों के प्रति भी, जो साम्राज्यवाद के प्रति ज्यादा दोस्ताना रुख नहीं रखते हैं, असंतोष भड़काने के लिए साम्राज्यवाद हमेशा से ही नेशनल एंडाउमेंट फॉर डैमोक्रेसी (एनईडी) जैसे अपने औजारों का इस्तेमाल करता आया है। एनईडी को, जो यूक्रेन में विक्टर यानुकोविच के खिलाफ सक्रिय रहा था और उसके खिलाफ तथाकथित ‘जन-विद्रोह’ भड़काने में उसे सफलता भी मिली थी, ईरान में इस्लामी निजाम के खिलाफ ‘जन-विद्रोह’ में मदद करने तथा उसे बढ़ावा देने के लिए भी काम पर लगाया गया था। बहरहाल, ईरान में यह कोशिश नाकाम रही और इस नाकामी की पृष्ठभूमि में ही साम्राज्यवाद ने ईरान पर सीधे सैन्य हमला किया है।

आज जबकि ईरान पर हमला जारी है, इसे सारी दुनिया पर दबदबा कायम करने की साम्राज्यवाद की वृहत्तर परियोजना से अलग कर के देखना, एक आपराधिक भूल होगी। इस तरह की भूल करना, एक प्रकार से उसी गलती को दोहराना होगा, जो खुद इस्लामवादियों ने अतीत में की थी, जब उन्होंने तीसरी दुनिया के प्रगतिशील निजामों के खिलाफ साम्राज्यवाद के साथ गठजोड़ कायम किया था। इसलिए, साम्राज्यवाद के मंसूबों को विफल करने के लिए और साम्राज्यवाद की हमले की द्वंद्वात्मकता के खिलाफ प्रतिरोध की द्वंद्वात्मकता को खड़ा करने के लिए, तीसरी दुनिया के जनगण की एकता जरूरी है।

जाहिर है कि यह सब हिंदुत्ववादी तत्वों की समझ में नहीं आएगा। आखिरकार, उनके पूज्य-पुरुषों में से एक, वीडी सावरकर ने भारत में ‘‘द्विराष्ट्र’’ सिद्धांत का प्रवर्तन किया था, जिसका मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रसार किया था और जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के तत्कालीन नेता, विंस्टन चर्चिल ने सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया था। हिंदुत्ववादी तत्वों का इस्राइल के साथ रब्त-जब्त रखना और अमेरिका की हां में हां मिलाना, ईरान के खिलाफ युद्ध के सवाल पर उनकी कायरतापूर्ण चुप्पी से पूरी तरह से मेल खाता है। यह चुप्पी, उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष से निकली कोई भी प्रगतिशील राष्ट्रवादी धारा जो करती, उससे ठीक उल्टी है। यह स्वांग करना कि यह चुप्पी भारतीय जनता के बेहतरीन हित में है, सरासर बकवास है! यह सिर्फ साम्राज्यवाद की करतूतों की ओर से आंखें मूंदना ही नहीं है, हमारे देश के उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का अपमान भी है। 

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। अनुवादक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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