(आलेख : बादल सरोज)

न तो इन्होने शेक्सपीयर को पढने का झंझट पाला हैं, न इन्हें क्लियोपेट्रा के बारे में ही कुछ मालूम है, वरना ताजे अमरीकी कारनामे पर जुलियस सीजर के अंदाज में हैरत जताते हुए आहत भाव से इतना तो  कहते ही कि ‘हे ब्रूटस तुम भी’!! क्योंकि हाल के दौर में न जाने क्या-क्या सहने, करने और गगनचुम्बी चाटुकारिता की पातालगामी  मिसालें कायम करने के बाद भी कमबख्त अमरीका  ने सीधे मर्म पर चोट की है।

ट्रम्प की रहनुमाई वाली संघीय सरकार के  धार्मिक स्वतन्त्रता पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग  — यूएस कमीशन ओन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम – ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस को लोगों की धार्मिक स्वतन्त्रता के हनन और हिंसक कार्यवाहियों का जिम्मेदार मानते हुए इस पर प्रतिबन्ध लगाने, इससे जुड़े व्यक्तियों के अमरीका प्रवेश पर रोक लगाने तथा उनकी संपत्तियों को जब्त करने सहित 6 सिफारिशें की हैं। इसी मार्च में जारी इस रिपोर्ट में इस अमरीकी आयोग ने कई घटनाओं के उल्लेख के साथ भारत को चिंताजनक देशों की सूची में शामिल किया है और संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार से कहा है कि वह भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों तथा व्यापार के रिश्तों को तय करते समय इन बातों को आधार बनाए। आयोग ने हथियारों की आपूर्ति रोकने की तक की बात कही है। इस रिपोर्ट में आरएसएस के साथ खुफिया एजेंसी रॉ का भी नाम है – जिसके पीछे कनाडा में लगे आरोप हो सकते हैं।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, पिछले कुछ वर्षों से इस तरह के उल्लेख होते रहे हैं। इसी तरह की एक रिपोर्ट के आधार मौजूदा प्रधानमंत्री जब गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, तब उनको ‘अवांछित व्यक्ति’ घोषित कर उनके अमरीका प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगाया जा चुका है। इस तरह की रिपोर्ट्स को ऐन्वेई मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता, बाद में इन्ही को बहाने के रूप में इस्तेमाल किये जाने के ढेर उदाहरण मौजूद हैं।

वैसे अमरीका न तो दुनिया का दरोगा है, न सरपंच कि बाकी देशों को सर्टिफिकेट बांटता फिरे, मगर संघ और भाजपा के मामले में ऐसा इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि भारत में – शायद दुनिया में भी – ये अकेला ऐसा कुनबा है, जो अपने पड़ोसी देशों के बारे में अमरीकी आयोगों और एजेंसियों के इस तरह के एलानों को ईश्वरीय वचन मानकर फुदकते रहता है। इसलिए भी कि हाल के दौर में तो इन्होने अपने आपको अमरीका के साथ कुछ इस कदर नत्थी कर लिया है कि कई बार तो खुद अमरीकी भी संशय में पड़ जाते हैं कि वे अपने देश के प्रति ज्यादा वफादार हैं या कोई साढ़े तेरह हजार किलोमीटर दूर धरती के दूसरे कोने पर बैठे संघी और भाजपाई उनसे भी ज्यादा हैं।

2014 में सत्ता में आने के बाद साफ़-साफ़ नजर आने वाला एक यही काम तो हुआ है। कभी भरे गले से बराक ओबामा को अपना जिगरी बताया और उससे तू-तड़ाक के संबंधों का बखान खुद गा-गाकर सबको सुनाया। ट्रम्प के साथ तो रही सही दूरियां भी इस कदर नजदीकियां बन गयीं कि इधर हाउडी ट्रम्प, हिंदी में बोले तो ‘कैसा है रे ट्रम्पवा’, तो उधर हाउडी मोदी के तमाशे होने लगे। लगाव इतना उन्मुक्त हुआ कि सारी कूटनीतिक भद्रता की भद्रा उतारते हुए ‘अब की बार ट्रम्प सरकार’ का नारा बनकर अगले के चुनाव प्रचार तक जा पहुंचा। हालांकि अगले को इससे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ – उस चुनाव में उसकी लुटिया डूब ही गयी। चार साल बाईडेन को रिझाते मनाते गुजरे, मगर ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद तो जैसे सारे तटबंध ही टूट गए।

उसके बाद जो-जो और जैसा-जैसा हुआ है और उससे भारत जैसे देश की जितनी भद्द पिटी है, उसकी इतिहास में कोई दूसरी मिसाल नहीं है। ओबामा को बराक बराक उवाचने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प को तुरंतई ‘माय डिअर फ्रेंड डोलांड’ कहकर ऊंची आसंदी पर विराज दिया और उसका जो सिला उनके दोस्त ने दिया, उसे देखकर ‘हुए तुम दोस्त जिनके दुश्मन उसका आसमाँ क्यों हो’ मिसरा याद आ गया।

‘माय डिअर फ्रेंड’ ने पहला झटका तो शपथ ग्रहण समारोह में न बुलाकर दिया। उसके बाद बड़ी मानमनुहार और जुगाड़ करने के बाद जब मुलाक़ात के लिए पहुंचे, तो प्रेस कांफ्रेंस में लाइव कैमरों के सामने ही हड़काकर तत्काल नीतियाँ बदलने का हुकुम सुना दिया। मगर मजाल है कि इस पर मुंह से कोई बोल तक फूटा हो!मुलाक़ात करके वापस लौट आने के बाद भी किसी तरह की अप्रसन्नता या असहमति नहीं जताई गयी। मोदी संघ के प्रचारक, भाजपा के नेता या निजी हैसियत से नहीं गए थे। वे अमरीका के राष्ट्रपति के सामने 140 करोड़ नागरिकों के प्रधानमंत्री के नाते बैठे थे, जबकि ऐसे ही बर्ताब पर अमरीकी रहमोकरम पर जिंदा यूक्रेन के ज़ेलिंसकी तक ने ट्रम्प को खरी खरी सुना दी थीं, मगर जैसा कि खुद ट्रम्प ने बार बार कहा है, मोदी उन्हें खुश करने के जरिये ढूंढ रहे थे, सो नाराज कैसे करते। इसके बाद तो दुनिया के इस सबसे घिनौने राष्ट्रपति ने जैसे भारत को पंचिंग बैग ही बना लिया और अपमानों की अंतहीन झड़ी ही लगा दी और वह आज भी जारी है।

पहलगाम के बाद बजाय भारत का साथ देने के धमकी देकर  युद्ध रुकवाने के दावे को तो उसने जैसे तकिया कलाम ही बना लिया। गिनने वाले बताते हैं कि बन्दा अब तक कोई एक सौ बार कह चुका है कि उसने फोन करके धमकाया और युद्ध रुक गया। असली संख्या इससे अधिक ही होगी। इतना ही नहीं, अपनी इस ‘उपलब्धि’ की बिना पर भाई ने खुद को नोबल देने की मांग भी खुद ही कर डाली। मजाल है जो हस्तिनापुर में बैठे मोदी या उनके किसी अदने अफसर ने मिमियाकर भी इसका खंडन किया हो। जले पर नमक छिडकने के लिए इसी माय डिअर फ्रेंड ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को दावतें देना शुरू कर दी : उसके सेनाध्यक्ष को अपने एक प्रमुख राष्ट्रीय दिन के समारोह का मेहमाने खुसूसी बनाया, एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का सर्वेसर्वा बना दिया। इस तरह एक बार फिर जान-बूझकर अंगूठा भी दिखाया, मुंह भी चिढ़ाया। मगर इधर से ‘छोड़ेंगे सब मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे’ का दोस्ती राग बजता रहा।

उसके बाद टैरिफ ब्लैकमैलिंग आयी, सरकार ब्लैकमेल हुई। व्यापार समझौता हुआ। बाद में ट्रम्प ने उसका एलान पहले ही कर दिया, जबकि पड़ोसी बांग्लादेश उससे कहीं बेहतर डील लेने में कामयाब हुआ।

रूस से तेल न खरीदने सहित और कितनी शर्तें किस तरह मानी हैं, यह अब सब जानते हैं।

एक समय जो भारत दुनिया के 118 गुटनिरपेक्ष देशों  का सर्वमान्य नेता था, उसे इतना ज्यादा अमरीका अनुमति आश्रित बना दिया कि वह अपने हजारों वर्ष पुराने दोस्त देश के सर्वोच्च नेता की हत्या पर शोक भी नहीं जता पाया।

इतना ज्यादा झुकने के बाद भी अच्छा अभिनेता होने के कटाक्ष के सिवा कुछ नहीं मिला। यह मजाक उड़ाने वाली टिप्पणी सिर्फ जुबान फिसल जाने का मामला नहीं था : पहले ट्रम्प की सहयोगी और वित्त सलाहकार स्कॉट बेसेंट का कहना और उसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति भवन की प्रवक्ता और प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट द्वारा इसका दोहराया जाना साबित करता है कि यह एक सम्प्रभु देश को निशाना बनाकर, उसके योजनाबद्ध मानमर्दन के सिलसिले का हिस्सा है।

ये कुछ उदाहरण इसलिए गिनाये गए हैं, ताकि समझा जा सके कि इधर से झुकने में कोई कसर न छोड़ने के बाद भी उधर से हैसियत दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही है। जबकि उधर वाले जानते हैं कि ये बंदे जन्म-जन्म से वफादारी निबाहते रहे हैं। जब अमरीका नहीं था, तब इनके लिए अंग्रेज थे – भाई लोगों के लिए वे भी इतने ही दिल फरेब थे। अंग्रेज चले गए, मगर आदत नहीं छूटी। ट्रम्प की दोनों जीतों के लिए यज्ञ किये, हवन किये, पाठ किये, अनुष्ठान किये। ट्रम्प तो ट्रम्प, उसके जुड़वां बेंजामिन नेतन्याहू तक के लिए यही सब बार-बार किये। इतना सब कुछ करने के बाद भी ‘हे ब्रूटस तुम भी’ का दोहराया जाना बहुत बेइंसाफी है।

वह भी तब, जब आका के देश में अपनी अच्छे बच्चे की छवि बनाने और उनसे मेल-मुलाकात बढ़ाने के लिए आरएसएस ने  3 लाख 30 हजार डॉलर – आज की कीमत के हिसाब से कोई 3 करोड़ रूपये खर्च किये।  अमेरिकी लॉबिंग फर्म स्क्वायर पैटन बोग्स (एसपीबी) और एक अन्य लॉबिंग फर्म, स्टेट स्ट्रीट स्ट्रैटेजीज (एसएसएस), जो वन+ स्ट्रैटेजीज के नाम से कारोबार करती है, को तीन किश्तों में फीस देकर काम पर लगाया। हासिल क्या हुआ? प्रतिबन्ध की सिफारिश और सम्पत्ति जब्त करने की सलाह!! और जैसी कि इन दिनों चुप्प रहने की परम्परा बन गयी है, इस बार भी उसी का निर्वाह किया। 

धार्मिक स्वतन्त्रता पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग की इस रिपोर्ट पर – इन पंक्तियों के लिखे जाने तक – न  तो प्रधानमंत्री बोले, न किसी मंत्री ने मुंह खोला। और तो और, समालखा में अपनी सौंवी सालगिरह का जश्न मना रहे आरएसएस ने भी नहीं बोला है। एक अदने से अधिकारी भर ने बयान दिया है, वह भी इतना लिजलिजा है कि न लीपने का है न पोतने का। तू कौन, मैं खामखाँ कहकर अमेरिका को उसकी सीमा में रहने की हिदायत देने के बजाय अधिकारी ने अमेरिका में मंदिरों पर होने वाले हमलों, भारतीय समुदाय के लोगों पर हिंसा का हवाला दिया है। प्रतिक्रिया का यह तरीका एक तरह से अमरीकी आयोग के कहे को स्वीकार कर लेने जैसा है कि हम करते हैं तो क्या हुआ, आपके देश में भी तो ऐसा होता है। इस अधिकारी के जवाब में सिर्फ मंदिरों भर का उल्लेख भी तोहमत का कबूलनामा ही है। 

असली दुविधा उन भा भा भाओं – भारत से भागे भारतवासियों – की है, जो मोदी की सभाओं में अबकी बार ट्रम्प सरकार के जैकारे लगा-लगाकर गला बिठाए हुए थे, जो दुनिया भर में आरएसएस की शाखाएं खोले हुए हैं और भर भर झोली डॉलर और पोंड्स, येन और मार्क इकट्ठा करके नागपुर भेजते रहते हैं। संघ की इस वैश्विक भुजा के संयोजक इसी अमरीका में रहने वाले सौमित्र गोखले हैं, ये श्रीमान भी अभी तक कुछ नहीं बोले हैं। इस सहित दुनिया भर में और जितनी भी शाखाएं हैं, उनके संयोजकों सहित सब के सब आरएसएस के प्रचारक हैं।

हालांकि अमरीका में छवि बनाने और अमरीका के बड़े अधिकारियों तथा मंत्रियों आदि से भेंट मुलाक़ात करवाने के लिए तीन करोड़ रूपये दिए जाने के खुलासे के बाद संघ के आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर द्वारा यह सफाई दी गयी थी कि आरएसएस “केवल भारत में” काम करता है। उनका यह दावा रंगे हाथों पकड़े जाने पर मुकर जाने की संघ की स्थायी अदा के सिवा कुछ नहीं था। अम्बेकर की इस सफाई के कुल जमा छः सप्ताह बाद ही हैदराबाद में संघ की वैश्विक भुजा, जिसे आरएसएस के प्रचारक संघ का विश्व विभाग बताते हैं, का शिविर हुआ, जिसमें दुनिया भर के 79 देशों के 1,600 लोग शामिल हुए। स्वयं सरसंघचालक मोहन भागवत इसमें हिस्सा लेने पहुंचे थे।

यह कोई नया संगठन या उपक्रम नहीं है। साल 2006 में संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में छपी एक खबर के अनुसार, तब हर पांच साल में यह शिविर हुआ करता था, अब हर वर्ष होने लगा है, और उस वर्ष के शिविर के मुख्य अतिथि 2002 के नरसंहार से ख्याति पाए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। इससे पहले 1995 की प्रेस विज्ञप्ति ने बताया था कि वैश्विक संघ हिन्दू स्वयंसेवक संघ, सेवा इंटरनेशनल, विश्व हिन्दू परिषद्, हिन्दू स्टूडेंट्स कौंसिल और फ्रेंड्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी इंटरनेशनल आदि-आदि संगठन आरएसएस के अनुषंगी संगठन हैं।  मतलब यह कि इनकी सांगठनिक मौजूदगी है, जो बाकी जो हो सो हो, भारत के किसी काम की नहीं है। दुनिया के अलग-अलग देशों में बैठे इतने सारे संगठन भारत के लिए कुछ करते हैं या कभी रीगन, तो कभी ट्रम्प के लिए ही मंच सजाते रहते हैं?

यह जानना दिलचस्प होगा कि हाल में ट्रम्प द्वारा लगभग भारत विरोधी मुहिम छेड़े जाने के वक़्त संघ की अमरीकी शाखा ने क्या किया? कोई बयान तक देने का भी साहस जुटाया या नहीं। इन सब पर बोलने की उम्मीद करना तो दूर की बात है, अभी मार्च में जारी इस रिपोर्ट और उसमें की गयी सिफारिशों पर भी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो पायी है।

भारत और दुनिया के इतिहास ने बार-बार यही साबित किया है कि इस रंग के हों या उस रंग के, दक्षिणपंथी उन्मादपरस्त संगठनों के स्वभाव का अपरिवर्तनीय हिस्सा होता है साम्राज्यवाद की पालकी का कहार बनना। साम्राज्यवादी आकाओं की नजर टेढ़ी न हो, इसके लिए हर संभव कोशिश करना।

*(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*

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