सोशल मीडिया पर तुरंत वीडियो शेयरिंग से फेयर ट्रायल खतरे में: CJI सूर्यकांत की टिप्पणी नई दिल्ली। प्रदीप चौधरी। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को डिजिटल युग की एक गंभीर चुनौती पर गहरी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि आज मोबाइल फोन रखने वाला हर व्यक्ति मीडिया बन गया है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तुरंत वीडियो अपलोड करने की यह संक्रामक प्रवृत्ति आरोपियों की निष्पक्ष सुनवाई के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रही है।चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस गिरफ्तार आरोपियों के वीडियो और तस्वीरें अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर अपलोड करती है, जिससे जनमानस में पूर्वाग्रह पैदा होता है और बाद में सबूतों के अभाव में बरी होने पर न्यायपालिका को दोषी ठहराया जाता है।पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन की इस बात से पूरी सहमति जताई कि “मोबाइल फोन रखने वाला हर व्यक्ति मीडिया बन गया है”। अदालत ने टिप्पणी की कि दुर्घटना या किसी घटना के समय लोग सबसे पहले मोबाइल निकालकर कंटेंट बनाने में जुट जाते हैं, यहां तक कि जब कोई व्यक्ति सड़क पर खून बहा रहा हो तब भी।न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “पुलिस को अपनी ब्रीफिंग से आरोपियों के खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा नहीं करना चाहिए। पुलिस को एसओपी से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन मीडिया, खासकर सोशल मीडिया और आम जनता के बारे में क्या? क्या उन्हें रोका जा सकता है?” उन्होंने आगे कहा कि समस्या “परमाणुकृत (atomised) सोशल मीडिया” में है, जहां टैब्लॉयड स्टाइल के कई ब्लैकमेलर सक्रिय हैं।सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी सोशल मीडिया पर मौजूद “ब्लैकमेलर” जैसे तत्वों की ओर इशारा किया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इसे “डिजिटल गिरफ्तारी” का एक रूप या अलग पहलू बताया और कहा कि छोटे शहरों-कस्बों में लोग खुद को मीडियाकर्मी बताकर वाहनों पर स्टिकर लगाते हैं।अदालत ने पुलिस के लिए मीडिया ब्रीफिंग संबंधी एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसका अनुपालन सभी राज्यों में तीन महीने के भीतर सुनिश्चित किया जाए। यह एसओपी जांच में पारदर्शिता, सूचना के अधिकार और आरोपियों की निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को संतुलित करेगी।पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि चूंकि मुद्दा व्यापक है और केवल पुलिस तक सीमित नहीं, इसलिए याचिका वापस लेकर अप्रैल के बाद विस्तारित दायरे में दोबारा दायर की जाए, जब एसओपी लागू हो चुकी होगी।यह टिप्पणी डिजिटल युग में निष्पक्ष न्याय की चुनौतियों को उजागर करती है, जहां हर हाथ में कैमरा है और हर अपलोड संभावित पूर्वाग्रह का कारण बन सकता है। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन संघ और अमरीका : जिन पे तकिया था, वही पत्ते हवा देने लगे!! नागरिक परिक्रमा