– झूलेलाल जयंती पर विशेष

मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल, मप्र

यह हिन्दुस्तान की खूबसूरती ही है कि यहाँ सभी मजहबों के तीज-त्योहार उत्साह, सदभाव, आस्था के साथ मनाए जाते हैं। इन्हीं में से एक है झूलेलाल जयंती। भारत और पाकिस्तान के साथ ही दुनिया भर में जहां भी सिंधी समाज के लोग रहते हैं वो झूलेलाल जयंती पूरे उत्साह के साथ मनाते है। भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव चेटीचंड और सिंधीयत दिवस के रूप में मनाया जाता है। सिंधी समाज के ईष्टदेव, संत झूलेलाल को वरुण देवता का ही अवतार माना जाता है। भगवान झूलेलाल को उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसाँई, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, लालशाह, अमरलाल आदि नामों से भी पूजा जाता है। भगवान झूले लाल ने धर्म और समाज की रक्षा की और सदभावना को बढ़ावा दिया।

भगवान झूलेलाल ने समाज के सभी वर्गों को एक समान माना और हिंदू-मुस्लिम एकता को प्रमुखता दी। यही वजह है कि मुसलमान भी ख्वाजा खिज्र जिन्दह पीर के नाम से इन्हें पूजते हैं। पाकिस्तानी सिंधी इन्हें प्रभु लाल सांई के नाम से पुकारते हैं। भगवान झूले लाल ने संदेश दिया कि पूर्ण परमात्मा एक है और समाज के सभी वर्गों को मिलकर एक साथ रहना चाहिए। यही कारण है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय भगवान झूलेलाल की वंदना करते हैं। पाकिस्तान के ठट्टा शहर के नसरपुर गांव में झूलेलालजी ने जन्म लिया था। यहां झूलेलाल जी की अखंड ज्योति को आज भी कायम है। सिंधु नदी के किनारे जिंदपीर पर जहाँ झूलेलालजी ब्रम्हलीन हुए थे, वहाँ आज भी हर साल चालीस दिनों का मेला लगता है जिसे चालीहा कहा जाता है। इसी चालीहे के दौरान प्रत्येक सिंधी भाषी चाहे वह जहाँ भी हो, यथासंभव अपनी धार्मिक मर्यादाओं का पालन करता है। पाकिस्तान के नसरपुर में झूलेलाल जी समाधि स्थल है, यहां दुनियाभर के लोग आकर माथा टेकते हैं। भगवान झूलेलाल जी ने दरिया या दरियाही पंथ की स्थापना की थी।


हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को चेटीचंड और झूलेलाल जयंती मनाई जाती है। इस दिन से ही सिंधी समाज का नया साल शुरू होता है। चेटीचंड के दिन भगवान झूलेलाल की श्रद्धा भाव से पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि झूलेलाल जी वरुण देव के अवतार हैं। भगवान झूलेलाल सिन्धी हिन्दुओं के इष्ट देव हैं। वरुण देव को सागर के देवता, सत्य के रक्षक और दिव्य दृष्टि वाले देवता के रूप में सिंधी समाज भी पूजता है। जल-ज्योति, वरुणावतार, झूलेलाल सिंधियों के ईष्ट देव हैं। झूलेलालजी ने किसी भाषा या किसी धर्म की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि जग कल्याण के लिए जन्म लिया था। चैत्र मास को सिंधी में चेट कहा जाता है और चांद को चण्ड, इसलिए चेटीचंड का अर्थ हुआ चैत्र का चांद। चेटीचंड को भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भगवान झूलेलालजी को जल और ज्योति का अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में सिंधी समाज के लोग जल मार्ग से यात्रा करते थे। ऐसे में वे सकुशल यात्रा के लिए जल देवता झूलेलाल से प्रार्थना करते और यात्रा पूरी होने पर भगवान झूलेलाल का आभार जताते थे। चेटीचंड को इसी परंपरा के निर्वाह के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान झूलेलाल की पूजा से व्यक्ति की हर बाधा दूर होती है। साथ ही व्यापार-नौकरी में कामयाबी मिलती है और जिन्दगी खुशगवार होती है। चेटीचंड के अवसर पर लकड़ी का मंदिर बनाकर उसमें एक लोटे से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है जिसे बहिराणा साहब भी कहा जाता है। शाम को बहिराणा साहब का विसर्जन कर दिया जाता है। भक्तजन झूलेलाल भगवान की प्रतिमा को अपने शीश पर उठाकर परम्परागत छेज नृत्य करते हैं।


  सन 951 ईस्वी विक्रम संवत 1007 में पाकिस्तान में सिंध प्रांत के ठट्टा शहर के नसरपुर में झूलेलाल जी का जन्म हुआ था। तब सिंध में पहले हिन्दू राजा का शासन था। राजा धरार आखिरी हिन्दू राजा थे। उन्हें मोहम्मद बिन कासिम ने पराजित किया। इसके बाद मुस्लिम राजा सिंध की गद्दी पर बैठा। दसवी सदी के दूसरे भाग में सिंध के ‘थट्टा’में मकराब खान राज था, जिसे शाह सदाकत खान ने मारा और खुद को मिरख शाह नाम देकर गद्दी पर बैठा। मिरख शाह ने हिंदुओं पर जुल्म करना शुरू कर दिए। उसके आतंक से तंग आकर सभी ने सिंधू नदी के किनारे एकत्रित होकर भगवान का स्मरण किया। भक्तों की 40 दिन की कड़ी तपस्या के परिणाम स्वरूप नदी में मछली पर सवार एक अद्भुत आकृति नजर आई तभी आकाशवाणी हुई कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए मैं आज से ठीक सात दिन बाद श्रीरतनराय के घर में माता देवकी की कोख से जन्म लूंगा।

फिर ठीक सात दिन बाद चमत्कारी बालक ने श्रीरतनराय लोहाना के घर जन्म लिया, जिसका नाम उदयचंद रखा गया, यही भगवान झूलेलाल कहलाए। ये भी कहा जाता है कि भक्तों की चालीस दिनों की पूजा अर्चना के बाद झूलेलाल जी प्रकट हुए और भक्तों से वादा किया कि नसरपुर में एक दिव्य बालक जन्म लेगा और उन्हें शाह के अत्याचार से मुक्ति दिलाएगा। कहा जाता है कि मिरख शाह को जब इस बालक के जन्म के बारे में पता चला तो उसने बालक को मारने की कई बार कोशिश की लेकिन वो नाकाम रहा। मिरखशाह ने अपने एक मंत्री अहिरियो को जाकर उस बच्चे को देखने को कहा। अहिरियो गुलाब के फूल में जहर मिलाकर अपने साथ लेकर बच्चे से मिलने गया। जब अहिरियो ने बच्चे को देखा तो वह पूरी तरह चैक गया था। उसने झुलेलाल जी को जहर से भरा गुलाब का फूल दिया जिसे झूलेलाल जी ने रख लिया और फिर एक फूंक में गुलाब को उड़ा दिया। इसके बाद अहिरियो ने देखा कि एक बूढ़ा व्यक्ति उसके सामने था। फिर अचानक वह 16 वर्ष के किशोर में बदल गया। और इसके बाद अहिरियो ने झुलेलाल जी को नीले घोड़े पर बैठे और हाथ में धधकती तलवार के साथ देखा। उसके पीछे और योद्धा भी थे।

अगले ही पल वह बालक विशाल मछली पर सवार दिखाई दिया। मंत्री अहिरियो ने घबराकर उनसे माफी मांगी। बालक ने उस समय मंत्री को कहा कि वह अपने बादशाह को समझाए कि हिंदू-मुसलमान को एक ही समझे और अपनी प्रजा पर अत्याचार न करे, लेकिन मिरखशाह ने इसे मजाक समझा। मिरखशाह ने इसे सामान्य जादू की गई या आंखों में धोखा डाली गई वाली बात कही। लेकिन उसी रात मिरखशाह के सपने में कुछ देखा। मिरखशाह ने देखा कि एक बच्चा उसकी गर्दन पर बैठा हुआ है। फिर वह बूढ़ा बन गया। और इसके बाद तलवार पकड़ा हुआ एक योद्धा भी बन गया। अगली सुबह मिरखशाह ने अहिरियो को बुलाकर उस बच्चे से निपटने के आदेश दिए लेकिन अहिरियो ने मिरखशाह को जल्दबाजी नहीं करने को कहा।

अहिरियो, जो इस बीच में जलदेवता का भक्त बन गया था, सिंधु के तट पर गया और जल देवता से अपने बचाव में आने की विनती की। अहीरियो ने एक बूढ़े आदमी को देखा, जिसमें एक सफेद दाढ़ी थी, जो एक मछली पर तैर रहा था। अहिरियो का सिर आराधना में झुका और उन्होंने समझा कि जल देवता उदेरोलाल हैं। फिर अहिरियो ने एक घोड़े पर उदेरोलाल को छलांग लगाते हुए देखा और और उदेरोलाल एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में एक झंडा लिए हुए निकल गए। मिरखशाह जब उदेरोलाल जी के सामने आया तो उन्हें भगवान झूलेलाल (उदेरोलाल) ने ईश्वर का मतलब समझाया। लेकिन मिरखशाह उन सभी बातों को अनदेखा कर अपने सैनिकों को झूलेलाल जी गिरफ्तार करने का आदेश दिया। जैसे ही सैनिक आगे बढ़े वैसे ही आग ने पूरे महल को घेर लिया और सब कुछ जलना शुरू हो गया। सभी भागने के मार्ग बंद हो गए।

शाह के सेनापतियों ने देखा कि सिंहासन पर तो झूलेलाल जी बैठे हैं। ये देखकर मिरखशाह भी झूलेलाल जी के चरणों में गिर पड़ा। इसके बाद सारी जगह पानी की बौछार आई और आग बुझ गई। मिरखशाह ने झूलेलाल जी की दिव्य शक्ति से प्रभावित होकर शांति का रास्ता अपनाया और सभी मजहबों के कल्याण के लिए कार्य किया। मिरखशाह ने झूलेलाल जी या उदेरोलाल जी का परम शिष्य बनकर उनके संदेशों का प्रचार किया।


   सिरायकी (बहावलपुरी, मुलतानी, झांगी एवं सिंधी) समाज के पूज्य साईं झूलेलाल जी को वरुण देवता का अवतार भी माना जाता है। विक्रम संवत 1007 चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को शुक्रवार के दिन नसरपुर गांव के संत रतन राय जी और देवकी जी के घर एक बालक ने जन्म लिया। बालक का जन्म लगन निकाल कर उनका नाम उदयचंद (लाल उदयराज) रखा गया। नसरपुर के लोग बालक को प्रेम से अमरलाल भी कहते थे। जिस पालने में वह रहते थे वह अपने आप झूलने लगता था इस वजह से इन्हंे झूलेलाल कहा जाने लगा।

कुछ दिनों बाद उदयचंद ने दूध पीना छोड़ दिया। माता देवकी ने बुजुर्गों के साथ बात की तो उन्होंने सलाह दी कि थोड़े से चावल, गुड़ और आटा सिंध दरिया में डालें तथा उस दरिया का पानी बालक को पिलाएं। माता ने जब बालक को पानी पिलाने के लिए मुंह खोला तो देखा कि बालक उदयचंद के मुंह में सिंधु नदी बह रही थी। नदी में पालो नाम की एक विशाल मछली तैर रही थी, इसलिए झूलेलाल जी को पेल वारो भी कहा जाता है। मां ने सारा नजारा विद्वानों को सुनाया तो उन्होंने कहा, आपका पुत्र साक्षात वरुण (पानी) देवता का अवतार है। इस बालक को आज से उडेरो लाल के नाम से पुकारा करें।

संस्कृत में इसका मतलब है कि जो पानी के पास रहता है या पानी में तैरता है। डेढ़ वर्ष की आयु में उडेरो लाल का मुंडन संस्कार करवाया गया। 5 वर्ष की उम्र में पिता संत रतन राय ने पढ़ने के लिए पाठशाला में भेजना शुरू किया और आठवें वर्ष में झूलेलाल जी को गुरु गोरखनाथ जी से जनेऊ संस्कार करवा कर गुरु दीक्षा दिलाई गई। रीति-रिवाजों के अनुसार दूसरे दिन अपनी कमाई का कुछ हिस्सा परिवार की कमाई में डालने के लिए झूलेलाल जी को मां ने कुंवल (चने) उबाल कर एक थाल में डाल कर बेचने के लिए बाजार में भेजा। उन्होंने माता देवकी द्वारा दिए सारे के सारे कुंवलों का थाल सिंध दरिया में बहा दिया और खाली थाल को झोली में रख कर किनारे बैठ गए।

जब घर जाने की तैयारी करने लगे तो झोली में रखे खाली थाल को चांदी के सिक्कों से भरा हुआ पाया। मां चांदी भरे थाल को देख कर अति प्रसन्न हुईं। माता दो-तीन दिन ऐसे ही कुंवल उबाल कर झूलेलाल जी को देतीं और वापसी पर चांदी भरा थाल सहित बालक घर पहुंचता। एक दिन उनके पिता ने पीछा किया और जब दरिया में से भगवान वरुण जी को बाहर निकलते और थाल में चांदी के सिक्के डालते देखा तो वह हैरान रह गए। अपने पुत्र उडेरो लाल को साक्षात भगवान वरुण देवता का अवतार देख कर नमस्कार करने लगे। उसी दिन से उडेरो लाल जी अपने चचेरे भाई पुंगर राय को साथ लेकर जल और ज्योति की महिमा का प्रचार करने निकल पड़े। कुछेक स्थानों पर ये भी कहा जाता है कि उदेरोलाल की माँ उन्हें फल देकर बेचने भेजती थी।

उदेरोलाल बाजार जाने के बजाय सिंधु तट पर जाकर उन्हें बुजुर्गों, बच्चों, भिक्षा मांगने वालों और गरीबों को दे देते थे। वहीं उसी खाली बक्से को लेकर वह सिंधु में डुबकी लगाते और जब निकलते तो वह बक्सा उन्नत किस्म के चावल से भरा होता जिसे ले जाकर वह अपनी माँ को दे देते। रोज-रोज उन्नत किस्म के चाँवल को देखकर एक दिन उनकी मां ने उनके पिता को भी साथ भेजा। जब रतन चंद ने छुपकर उदेरोलाल (भगवान झूलेलाल) का यह चमत्कार देखा तो उन्होंने झुककर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें साक्षात ईश्वर के रूप में स्वीकार किया। जब यह समाचार सिंध के राजा मिरखशाह को मिला कि नसरपुर के उदय चंद, वरुण देवता के रूप में पैदा हो चुके हैं तो उसने अपने मंत्री को झूले लाल को मारने के लिए भेज दिया। मिरखशाह ने देखा कि लोगों का जल और ज्योति में विश्वास बढ़ता जा रहा है, ऐसा न हो कि लोग उसके खिलाफ हो जाएं।

तो उसने सिंध नदी के टापू बक्खर में उन्हें रहने के लिए जगह दे दी। इसी टापू पर एक बार सौदागर साई परमानंद की किश्ती को डूबते देख झूले लाल ने अपना कंधा देकर किनारे लगा दिया। परमानंद ने खुश होकर उसी टापू में साईं झूले लाल जी को जिंदा पीर का खिताब दिया और जल एवं ज्योति की महिमा को प्रचार करने के लिए जिन्दा पीर मंदिर बनवाकर दिया। यह मंदिर आज भी बक्खर (पाकिस्तान) में मौजूद है और हर वर्ष सावन के महीने वहां बहुत बड़ा मेला लगता है। समुद्र में आए ज्वार भाटा के कारण पानी की उछाल जब जिंदा पीर मंदिर की नींव को छूती है तो ज्वार भाटा शांत हो जाता है।

ये भी कहा जाता है कि उडेरो लाल जी ने हिंदुओं से कहा कि वे उन्हें प्रकाश और पानी का अवतार समझें। उन्होंने एक मंदिर बनाने के लिए भी कहा। उन्होंने कहा मंदिर में एक मोमबत्ती जलाओ और हमेशा पवित्र घूंट के लिए पानी उपलब्ध रखो। यहीं उदेरोलाल ने अपने चचेरे भाई पगड़ या पुंगर राय को दरियाई पंथ का महंत घोषित करते हुए मंदिर का पहला ठाकुर (पुजारी) नियुक्त किया। भगवान झूलेलाल ने पगड़ को सात सिंबॉलिक चीजें दी। भगवान झूलेलाल ने पगड़ को मंदिरों के निर्माण और पवित्र कार्य को जारी रखने का संदेश दिया। साईं झूलेलाल जी ने पुंगर राय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर उन्हें अपने दिव्य स्वरूप वरुण देवता के दर्शन कराए। विक्रम सम्वत् 1020 भाद्रपद की चतुर्दशी को गांव जीहेजन में अपना शरीर त्याग कर झूलेलाल जी ब्रम्हलीन हो गए।

-मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल, मप्र

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