“सिर्फ पीड़िता की गवाही पर भरोसा नहीं, सबूतों की कमी से निर्दोष साबित”नई दिल्ली/देहरादून, 18 मार्च 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के एक सामूहिक बलात्कार मामले में चार आरोपियों की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में असफल रहा। इस फैसले से दो जीवित आरोपियों को बरी कर दिया गया है, जबकि दो अन्य आरोपियों की मौत मुकदमे के दौरान हो चुकी थी।घटना 7 अप्रैल 1998 की बताई गई, जब पीड़िता महिला बाजार से घर लौट रही थीं। उन्होंने 31 जुलाई 1998 को देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को शिकायत दी कि राजेंद्र, पप्पू उर्फ हनुमान, सुशील कुमार और किशन नामक चार व्यक्तियों ने उन्हें जबरन एक प्लॉट पर ले जाकर सामूहिक बलात्कार किया। पीड़िता के अनुसार, आरोपियों ने उनके मुंह को बंद कर आंखों पर काला रुमाल बांध दिया था और बारी-बारी से अपराध किया।मामले में एफआईआर चार महीने बाद दर्ज हुई। ट्रायल कोर्ट ने 2000 में चारों आरोपियों को दोषी ठहराया और 10 साल की सजा सुनाई। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2012 में इस फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपील पर सुनवाई में कई कमजोरियां पाईं:– एफआईआर में देरी : घटना के चार महीने बाद शिकायत दर्ज होना संदेहास्पद माना गया।– कोई चश्मदीद गवाह नहीं : न कोई प्रत्यक्षदर्शी, न ही कोई अन्य स्वतंत्र गवाह।– मेडिकल या फॉरेंसिक सबूतों की कमी : कोई मेडिकल रिपोर्ट, डीएनए या अन्य वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे जो अपराध साबित करते।– पीड़िता के बयानों में विरोधाभास : घटनास्थल और अन्य विवरणों में असंगतियां पाई गईं। अदालत ने कहा कि इतने गंभीर अपराध के बारे में पीड़िता ने अपने पति को भी तुरंत नहीं बताया, जो विश्वसनीय नहीं लगता।– विवाद : पीड़िता और आरोपियों के बीच पानी को लेकर पहले से झगड़ा था, जिसे अदालत ने प्रासंगिक माना।सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बलात्कार के मामलों में पीड़िता की एकमात्र गवाही पर भी दोषसिद्धि हो सकती है, लेकिन वह बयान विश्वसनीय, सुसंगत और अदालत का भरोसा जीतने वाला होना चाहिए। इस केस में ऐसा नहीं पाया गया। अदालत ने निचली अदालतों के फैसलों को रद्द करते हुए आरोपियों को बरी कर दिया।यह फैसला 28 साल पुराने मुकदमे का अंत है, जिसमें दो आरोपियों की मौत जेल या लंबे मुकदमे के दौरान हो गई। सोशल मीडिया पर कई लोग इसे “न्याय में देरी” का उदाहरण बताते हुए टिप्पणी कर रहे हैं कि निर्दोषों को कितना लंबा इंतजार करना पड़ा। साथ ही, झूठे आरोपों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी उठ रही है।प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस फैसले से न्याय व्यवस्था में सबूतों की महत्ता दोबारा रेखांकित हुई है। रेप जैसे जघन्य अपराधों में पीड़िताओं का पक्ष मजबूत होना चाहिए, लेकिन झूठे आरोप भी समाज और न्याय के लिए उतने ही हानिकारक हैं। View this post on Instagram View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन मतदान की तारीखों का ऐलान : पर क्या चुनाव होगा भी! इंदौर: प्रीति नगर में भीषण आग, कार से फैली आग ने झुलसा दिया पूरा मकान – 5 लोगों की मौत