1. नरेन्दर भी गायब, सिलेंडर भी गायब, शर्म भी गायब! : विष्णु नागर

मैं हाथ जोड़कर आप सबसे निवेदन करना चाहता हूं कि ‘नरेन्दर भी गायब, सिलेंडर भी गायब’ का नारा मत लगाओ सांसद भाइयों-बहनों! नरेन्दर की सिलेंडर से तुक तो मिलती है, मगर इससे उसका कोई लेना-देना नहीं।उसका अपने आप के अलावा दुनिया के किसी बायोलाजिकल प्राणी से कोई लेना-देना नहीं। देश से लेना-देना नहीं! जिस धर्म की पुंगी बजाता वह घूमता रहता है, उससे भी उसका लेना-देना नहीं। दुनिया से भी उसका लेना-देना नहीं।

नरेन्दर को कितना ही पुकारो, कितना ही उसे ज़लील करो, उसने संसद में गायब रहने की भारत माता के सामने कसम खाई है, तो वह अपनी यह कसम निभाकर रहेगा। वह गायब था, गायब है और गायब ही रहेगा। इधर है, तो भी गायब रहेगा और कभी जनता ने उसे उधर पटक दिया, तो भी वह ग़ायब रहेगा!

वह अकेला ही गायब नहीं रहेगा, सिलेंडर को भी गायब करेगा। याद है न, कोरोना में उसने अपने साथ आक्सीजन सिलेंडर को भी गायब करवा दिया था और इसके बाद इसका जिक्र भी कोरोना के इतिहास से गायब करवा दिया था! उसने कालाधन खत्म करने के नाम पर घर की औरतों की छोटी-छोटी बचतें गायब करवा दी थीं और फिर जो किसी भी चौराहे पर कोई भी सज़ा भुगतने को तैयार था, वह शख्स भी गायब हो गया था! बस वह कालाधन गायब नहीं हुआ था, जिसे गायब करने की उसने सौगंध खाई थी!

कुछ दिनों की बात है देखना, वह सिलेंडर की तरह देश से कहीं खाद भी गायब न करवा दे! किसान खाद की बोरी के लिए रोएं और नरेंदर कहे कि विपक्ष अफवाह फैला रहा है। किसान के पास बीज होगा, पानी बरस चुका होगा, मगर खाद और नरेन्दर दोनों गायब होंगे!

किसी दिन पता चलेगा कि होर्मुज की खाड़ी से आयातित होनेवाला अनाज और मशीनरी गायब है और नरेन्दर भी गायब है। गायब होना नरेन्दर का धर्म है, कर्म है, व्यक्तित्व का असली मर्म है! उसके शरीर पर चढ़ा चर्म है। उसकी आंखों से गायब शर्म है।

नरेन्दर जब भी गायब होगा, तब वह कहीं चुपचाप खाली नहीं बैठा होगा। ट्रंप के सामने सरेंडर करने के लिए, ‘मे आई कम इन सर ‘की पुकार लगा रहा होगा। उसने अंदर आने की अनुमति दी, तो उसके आगे नतशिर होकर दिशा-निर्देश हासिल कर रहा होगा। वह भारत में आयोजित नौ सैन्य अभ्यास मिलन-26 में शामिल ईरानी जहाज हिंद महासागर में स्थिति की खबर बास को दे रहा होगा। वह इस्राइली प्रधानमंत्री के साथ हा हा ही ही शैली में ईरान की बर्बादी का जश्न मना रहा होगा! वह मुकेश अंबानी को अमेरिका की सबसे बड़ी आइल रिफाइनरी में जबरदस्त निवेश के लिए बधाई दे रहा होगा। ट्रंप ने अंबानी को इसकी बधाई दी है, इस खुशी में नाच-गा रहा होगा! वह अडानी को आश्वासन दे रहा होगा कि तू इतना घबराता क्यों है, ट्रंप से पहले‌ मैं अपनी फाइल सेट करवाऊंगा और फिर तेरा मामला भी सेट करवा दूंगा! तू क्या समझता है, नरेन्दर ने फोकट में सरेंडर किया है! जिसमें तेरा हित है, उसमें मेरा हित है, वही राष्ट्रहित है, वही हिंदू हित है। वही युद्ध है और वही शांति है! तू घबरा मत। तू मुझे अपना सारथी जान, अपना कृष्ण मान! मैं देश को धोखा दे सकता हूं, तुझे नहीं। इतनी जल्दी भूल गया क्या कि वह मैं ही था, जिसने ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या पर ट्रंप और नेतन्याहू को खुश करने के लिए तथा तेरे और मेरे हितों की रक्षा के लिए दुखी होने का नाटक तक नहीं किया था! एक शब्द तक इस पर खर्च नहीं किया था! ईरान के मिनाब गर्ल्स स्कूल की 165 मासूम बच्चियों की हत्या पर मुंह नहीं खोला था, वरना मेरे आंसू मेरे बस में हैं, जब चाहूं, जहां चाहूं, रो दूं! तू आदेश दे, तो बुक्का फाड़ कर हंसने की बात पर जार-जार आंसू बहाकर दिखा दूं!

बेशर्म हूं और इतना अधिक बेशर्म हूं कि भारत के मेहमान बनकर आए ईरान के सैन्य जहाज को नष्ट कर उसके 84 सैनिक अमेरिका ने मार डाले, तो भी मैं आंख-कान बंद किए रहा, हिला तक नहीं, ट्रंप की गोद में मस्त लेटा रहा।नींद का बहाना करता रहा। श्रीलंका की सरकार को शर्म आई, मगर मुझे नहीं आई, तो मैं क्या करता! शर्म ससुरी कहीं बाजार में मिलती भी तो नहीं, लाता कहां से? बजरंग दल वाले उधार देने को तैयार थे, मगर उनकी और मेरी नस्ल चूंकि एक है, तो बताओ मैं उनकी शर्म का क्या करता! अब डर है कि कहीं इस जंग में अमेरिका का वजन घट न जाए, ईरान का बढ़ न जाए, इसलिए बारह दिन बाद ईरान के राष्ट्रपति से कह दिया है कि भारत, ईरान का दोस्त है, मगर ईरान भी जानता है कि मेरे इस वाक्य का हकीकत से कोई लेना-देना नहीं!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)


2. ये बेइज़्ज़ती, बेइज़्ज़ती क्या है? : राजेंद्र शर्मा

एक बात हमारी समझ में तो नहीं आती। जब से ट्रंप साहब दोबारा अमेरिका की गद्दी पर आए हैं, तब से न जाने क्यों मोदी जी के विरोधियों ने एक नया राग ही छेड़ दिया है– राग बेइज़्ज़ती।

परदेस के मामले में मोदी जी कुछ भी करें, बल्कि नहीं भी करें, पर भाई लोग उसमें भारत की बेइज़्ज़ती ढूंढ निकालते हैं और फिर इसका शोर मचाने लगते हैं कि देश की बेइज़्ज़ती करा दी। बेचारे मोदी भक्तों ने तो इसी कांय-कांय के डर से दुनिया में मोदी जी के भारत का डंका बजवाने की चर्चा ही करनी बंद कर दी है। न डंका बजने का जिक्र निकलेगा और न बेइज़्ज़ती के डंकों के ताने सुनने पड़ेंगे। फिर भी विरोधी हैं कि मानते ही नहीं हैं।

अब बताइए, ईरान पर अमेरिका और इस्राइल ने हमला किया, पर मोदी जी ने कुछ कहा? हमले के ठीक पहले दौड़े-दौड़े इस्राइल तक गए, नेतन्याहू को गले भी लगाया, इस्राइलियों का हमेशा साथ देने का भरोसा भी दिलाया। होलोकॉस्ट म्युजियम में जाकर इमोशनल होकर भी दिखाया। पर क्या सिर पर मंडराते युद्ध के संबंध में एक शब्द तक कहा?

एक शब्द तक इस्राइल में नहीं कहा तो नहीं कहा, देश में लौट आने के बाद भी नहीं कहा। ईरान पर हमला हो जाने के बाद भी नहीं कहा। न पक्ष में, न विपक्ष में, एक शब्द तक नहीं कहा। किसलिए? इन्हीं विरोधियों के मुंह बंद रखने के लिए। मगर इनकी जुबान तो मोदी जी के एक शब्द तक न कहने के बावजूद चल ही रही है। उल्टे अब तो मोदी जी को कुछ नहीं कहने के लिए ही ताने दिए जा रहे हैं।

एक विदेशी अखबार ने लिख दिया कि — ‘नरेंद्र मोदी ईरान के खिलाफ युद्ध के मामले में चुप क्यों हैं। डोनाल्ड ट्रंप के डर से!’ बस भाई लोग डोनाल्ड ट्रंप के डर की बात ले उड़े और लगे शोर मचाने कि ट्रंप के डर से भारत की बेइज़्ज़ती करा दी! बेचारे मोदी जी ने मुंह तक नहीं खोला और भारत की बेइज़्ज़ती भी हो गयी?

और जब अपने देश वाले ही विदेशी जुबान के और विदेश के अखबारों की बातों में आएंगे और गुलामी के अवशेषों से मोदी जी की लड़ाई को कमजोर करने लग जाएंगे, तो बाहर वालों से तो मोदी जी उम्मीद ही क्या कर सकते हैं? बताइए, ईरान वाले भी तानाकशी पर उतर आए। अमेरिका-इस्राइल के हवाई हमलों ने अधमरा कर रखा है। सुप्रीम लीडर समेत, बीसियों बड़े नेता पहले ही झटके में दूसरी दुनिया में पहुंचाए जा चुके हैं। फिर भी अगले मोदी जी को ताना मारने से बाज नहीं आये। बारहवें दिन मोदी जी ने ईरान के राष्ट्रपति को खुद फोन किया, ये बताने के लिए कि भारत बुद्ध का देश है, इसलिए युद्ध नहीं चाहता है, तो विश्व गुरु से शांति की सीख लेना तो दूर रहा, अगले से इतना भी नहीं हुआ कि अपने हाथों से बंद की हुई हार्मुज की खाड़ी से भारत के तेल-गैस टैंकरों को निकलवा देता। उल्टे अपने विदेश मंत्री से जयशंकर को इसकी याद दिलवा दी कि ईरान पर हमले की भारत ने निंदा तक नहीं की। विश्व गुरु छोड़िए, इस साल ब्रिक्स का अध्यक्ष होकर भी, उसने निंदा तक नहीं की। यानी बुद्ध के देश से सौदेबाजी — हमले की निंदा करो, तेल लो! और विदेशी अखबार सुर्खियां लगा रहे हैं कि मोदी जी ट्रंप के डर से चुप हैं! और अपने वाले तो जैसे ट्रंप का नाम आने का इंतजार ही करते रहते हैं। उधर अखबार में छपा और इधर शोर मच गया — मोदी जी ने भारत की बेइज़्ज़ती करा दी।

अब मोदी जी भारत की बेइज़्ज़ती के शोर के डर से, ट्रंप और नेतन्याहू जैसे डियर फ्रेंडों की कारगुजारियों की निंदा तो नहीं ही कर देंगे। दोस्ती में, नो सॉरी, नो निंदा!

पर बात-बात में भारत की बेइज़्ज़ती खोजने वाले, मोदी जी की चुप्पी पर ही कहां रुकने वाले थे। इसी लड़ाई में ईरान ने दुनिया का तेल और गैस का बहाव रोक कर, तेल के दाम को मिसाइल बनाकर अमेरिका पर ही दाग दिया। ट्रंप को डियर फ्रैंड मोदी की याद आ गयी। बोले जा फ्रैंड, ले ले रूस से तेल, महीने भर तक। जा, तुझे इजाजत दी! मैंने ही रोका था, अब मैं ही इजाजत दे रहा हूं, जा ले ले रूसी तेल। पर जब तक राष्टभक्त रूस से सस्ता तेल भरवाने के लिए अपने पीपे, ड्रम वगैरह निकालते, तब तक विरोधियों ने ‘‘इजाज़त’’ पर ही हंगामा खड़ा कर दिया। कहने लगे कि ट्रंप होता कौन है, हमें इजाजत देने वाला कि हम किस से तेल लें और किस ने नहीं लें। यह तो भारत की बेइज़्ज़ती है। मोदी जी अपने दोस्तों से भारत की बेइज़्ज़ती क्यों करा रहे हैं?

और हद्द तो तब हो गयी जब इसके चार दिन बाद ही ट्रंप ने सारी दुनिया को खुली छूट दे दी — जाओ ले लो, रूसी तेल, जब तक मैं रुकने को न कहूं! अब विरोधियों को इसमें भी भारत की बेइज़्ज़ती दिखाई दे रही है। कह रहे हैं कि अब तो फ्रैंडशिप का धोखे का पर्दा भी हट गया। काहे का फ्रैंड और काहे की फ्रैंडशिप और काहे की इजाज़त!

सच पूछिए तो, ट्रंप-मोदी की दोस्ती के दुश्मनों ने, मोदी जी के इस दोस्ती के चक्कर में भारत को बेइज़्ज़त कराने का शोर मचाना तभी से शुरू कर दिया था, जब विदेश मंत्री के कई दिन अमेरिका में जाकर धरना देने के बाद भी, मोदी जी को ट्रंप के राज्याभिषेक का न्योता नहीं मिला। न्यौता न मिलने का मामला पूरी तरह से शांत भी नहीं हुआ था, तब तक मोदी जी के ऑपरेशन सिंदूर छेड़ने के चौथे ही दिन, जब ट्रंप ने लड़ाई रुकने का एलान कर दिया, मोदी जी के विरोधियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि ट्रंप कैसे भारत के लड़ाई रोकने का फैसला कर रहा है? फिर ट्रंप ने बार-बार यह दावा भी करना शुरू कर दिया कि भारत-पाकिस्तान की लड़ाई उसी ने रुकवायी थी, दोनों को व्यापार की गाजर और टैरिफ का डंडा दिखाकर लड़ाई रुकवायी थी और मोदी जी फ्रैंडशिप का ख्याल कर के चुप लगा गए, तभी से विपक्षी पीछे पड़ गए कि मोदी जी भारत की बेइज़्ज़ती करा रहे हैं।

फिर मोदी जी ने ट्रेड डील में ट्रंप की रूसी तेल खरीदना बंद करने की डिमांड मान ली, उसके बाद से भारत की बेइज़्ज़ती कराने का जो शोर शुरू हुआ, अब तक थमा नहीं था। अब ये ईरान के मामले में चुप रहने में भारत की बेइज़्ज़ती का शोर और।

पर मोदी जी और उनके अनुयायी सच्चे देशभक्त हैं, वे देश की इज़्ज़त को बहुत ऊंचे आसन पर रखते हैं, जहां उसे कुछ भी छू भी नहीं सकता है। इसीलिए, तो मोदी कुनबे को जगत गति नहीं व्यापती! वैसे भी इज़्ज़त-बेइज़्ज़ती सब मानने की बातें हैं। बेइज़्ज़ती उसकी होती है, जो इज़्ज़त बचाने की फिक्र में रहता है। कुनबा इन चक्करों में नहीं पड़ता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोक लहर’ के संंपादक हैं।)

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