(आलेख : एम ए बेबी, अनुवाद : संजय पराते)

नई दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 140-बिंदुओं का एक घोषणा पत्र तैयार किया गया, जो एक ही समय में वैश्विक दक्षिण की उम्मीदों पर जोर देता है और इसके साथ ही, इस समूह के विरोधाभासों को भी दिखाता है। वामपंथ का कार्यभार न तो इसकी तारीफ़ करना है और न ही उसे खारिज करना है, बल्कि दस्तावेज़ को आलोचनात्मक ढंग से पढ़ना है, यह पहचानना है कि यह अमेरिका के नेतृत्व वाली एकध्रुवीयता के खिलाफ संघर्ष को कहाँ तक आगे बढ़ाता है, कहाँ यह कमजोर पड़ता है, और कहाँ भारत सरकार का आचरण इस घोषणा पत्र की भावना के साथ दगाबाजी करता है।

साम्राज्यवाद-विरोधी मंच नहीं है ब्रिक्स

ब्रिक्स कोई साम्राज्यवाद-विरोधी मोर्चा नहीं है। यह एक ऐसा मंच है, जो अमेरिका के एकध्रुवीय परियोजना के खिलाफ बहुध्रुवीयता को मजबूत करता है। यह फर्क मायने रखता है। इस समूह में ऐसे देश शामिल हैं, जिनकी मूलगामी सामाजिक व्यवस्था बिल्कुल अलग हैं : चीन की समाजवाद-उन्मुख आर्थिक व्यवस्था है, रूस में अभिजात वर्गीय पूंजीवाद है, और भारत बड़े पूंजीपतियों के नेतृत्व वाला पूंजीपति-जमींदार राज्य है, जिस पर अब कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक, हिंदुत्व की ताकतों का राज है। बेशक, जब हम दूसरे राज्यों को देखते हैं, तो विविधता बढ़ जाती है। इसलिए, ये किसी साझा साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष में सहयोगी नहीं हैं। ये सभी राज्य एक गैर-लोकतांत्रिक, डॉलर के प्रभुत्व वाली, अमेरिका-केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

यह सीमा अंतर्निहित है। इससे पता चलता है कि घोषणा पत्र में अमेरिका का नाम लिए बिना, ज़बरदस्ती के एकतरफ़ा कदमों की निंदा क्यों की गई है। इससे पता चलता है कि इसमें इज़राइल को हमलावर के रूप में चिन्हित किए बिना, पश्चिम एशिया में ज़्यादा से ज़्यादा संयम बरतने की बात क्यों की गई है। घोषणा पत्र की चुप्पी कोई अचानक घटित दुर्घटना नहीं है ; यह अलग-अलग गठबंधनों और वर्गीय हितों वाले देशों के बीच आम सहमति की कीमत है।

राजनैतिक दबदबे के बिना आर्थिक ताकत

ब्रिक्स देश मिलकर दुनिया की आधी से ज़्यादा आबादी बनाते हैं और वैश्विक जीडीपी में उनका हिस्सा लगभग एक-तिहाई है। उनका आर्थिक दबदबा बहुत ज़्यादा है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में उनका उतना राजनीतिक दबदबा नहीं है। यह एक ऐसी कमजोरी है, जिसे घोषणा पत्र में संबोधित किया गया है।

घोषणा पत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में सुधार का आह्वान किया गया है, जिसमें ब्रिक्स समूह के सिर्फ़ चीन और रूस ही स्थाई सदस्य हैं। घोषणा पत्र की तारीफ़ करनी चाहिए कि इसमें यह नोट किया गया है कि अब तक कोई भी महिला संयुक्त राष्ट्र संघ की महासचिव नहीं चुनी गई है। जब जल्द ही नए महासचिव का चुनाव होना है, तो इस पर तुरंत ध्यान देना चाहिए। और हाँ, इस प्रकार चुनी गई महिला ऐसी होनी चाहिए, जो वैश्विक दक्षिण के हितों का प्रतिनिधित्व करे और उनके लिए खड़ी हो। यह महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि आज तक, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन से सिर्फ़ एक-एक और अफ्रीका और एशिया से दो-दो लोग ही इस पद पर रहे हैं।

घोषणा पत्र में उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्था के बदलते वज़न को बेहतर ढंग से दिखाने के लिए आईएमएफ और विश्व बैंक में सुधारों का आह्वान किया गया है, जिसमें ज़्यादा वोटिंग और कोटे का प्रतिनिधित्व और नेतृत्व चुनने की प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी बनाने का समर्थन किया गया है। यह घोषणापत्र विश्व व्यापार संगठन में सुधार का समर्थन करता है और एक खुले, पूर्व-निर्धारित और नियमों पर आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के लिए अपने समर्थन को फिर से दुहराता है। यह बढ़ते शुल्क, गैर-शुल्क बाधाओं और संरक्षणवादी उपायों पर गंभीर चिंता जताता है। यह एकतरफा दबाव वाले कदमों की निंदा करता है। ये कदम अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। ऐसे कदमों का गरीब और कमज़ोर लोगों पर बहुत ज़्यादा असर पड़ता है। यह क्यूबा के खिलाफ एकतरफा नाकाबंदी के प्रति चिंता जताता है। ये नाकेबंदी काफी कड़ी है और घोषणा पत्र इसे खत्म करने पर जोर देता है।

इन बातों का स्वगत हैं। लेकिन ये वैश्विक पूंजीवाद की संस्थाओं में सुधार करने के ढांचे में ही हैं, उनसे आगे निकलने के नहीं। यह घोषणा पत्र आरक्षित मुद्रा के रूप में डॉलर की स्थिति, आईएमएफ की संरचनात्मक समायोजन की शर्तें, या उस ऋण संरचना को चुनौती नहीं देता, जो वैश्विक दक्षिण को हमेशा अपनी गुलामी में रखता है। ब्रिक्स आकस्मिक आरक्षित प्रबंध और ब्रिक्स बहुपक्षीय गारंटी पहलकदमी वित्तीय लचीलेपन की ओर कदम हैं, लेकिन ये कदम बहुत मामूली हैं। प्रस्तावित ब्रिक्स खाद्यान्न विनिमय और कृषि-आदान, आनुवंशिक संसाधन और सूचना (एग्रिन) नेटवर्क जैसी पहलकदमियां खाद्यान्न सुरक्षा की समस्या को संबोधित तो करती है, लेकिन वैश्विक खाद्यान्न प्रणाली पर हावी कॉर्पोरेट कृषि-व्यापार एकाधिकार का सामना किए बिना ही।

वैश्विक दक्षिण के सामने चुनौतियाँ

गरीबी, स्वास्थ्य देखभाल, बेरोज़गारी, कर्ज़ और कृत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), ये सभी वैश्विक दक्षिण के सामने चुनौतियाँ हैं। ब्रिक्स देश भी इन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, सिवाय शायद चीन के, जिसने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है और स्वदेशी तकनीक की क्षमता विकसित की है। घोषणा पत्र इन चुनौतियों की पहचान करती है : यह 2030 एजेंडा (सतत विकास लक्ष्य) के लिए प्रतिबद्ध है, ज़्यादातर चुनौतियों की जड़ में असमानता को कारण मानता है, और असमानता पर एक अंतर्राष्ट्रीय पैनल के प्रस्तावों पर ध्यान देता है। यह घोषणा पत्र एआई गवर्नेंस, डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना, स्वास्थ्य सहयोग, तपेदिक (टीबी), खाद्यान्न सुरक्षा और आपदा तैयारी जैसे मुद्दों को संबोधित करता है।

लेकिन मुद्दों को पहचान लेना ही हल नहीं है। इन चुनौतियों का सामना सिर्फ़ अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके हमले के ख़िलाफ़ खड़े होकर और एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की शर्तों को मानने से इंकार करके ही किया जा सकता है, जो परिधि से अधिशेष (सरप्लस) निचोड़कर उसे केन्द्र में जमा करने के लिए बनाया गया है। वैश्विक दक्षिण के लिए एआई संसाधन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तक ज़्यादा पहुँच का आह्वान करने वाले घोषणा पत्र का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक अमेरिकी निगमों द्वारा नियंत्रित की जाने वाली बौद्धिक संपदा प्रणाली कायम रहती है। अगर बड़ी दवा कंपनियों के मूल्य-निर्धारण एकाधिकार को चुनौती नहीं दी जाती है, तो सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लिए इसका समर्थन खोखला है। अगर अमेरिका और यूरोपीय संघ में कृषि सब्सिडी वैश्विक बाजार को बिगाड़ती रहेगी, तो इसके खाद्यान्न सुरक्षा प्रावधान काफ़ी नहीं हैं।

जलवायु परिवर्तन : विकसित देशों को भुगतान करना होगा

ब्रिक्स के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चिंता का विषय है। नेपाल में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा और हमारे देश में एल-नीनो का असर, जिसके कारण एक तरफ़ बेमौसम बारिश और भयंकर बाढ़ और दूसरी तरफ़ सूखा है, हमारे देश पर जलवायु परिवर्तन के असर को दिखाते हैं। इस पृष्ठभूमि में, यह अच्छी बात है कि घोषणा पत्र में आपदा-जोखिम कम करने के लिए एक मज़बूत प्रणाली के निर्माण का आह्वान किया गया है और यह माना गया है कि खास तौर पर विकासशील अर्थव्यवस्था को जलवायु संबंधी वित्त-पोषण की गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें अनुकूलन के लिए वित्त-पोषण में बड़े भारी गैप भी शामिल हैं। लेकिन यहाँ भी, घोषणा पत्र में दोषियों का नाम लेने से बचा गया है।

जलवायु संकट कोई साझी ज़िम्मेदारी नहीं है। यह विकसित देशों द्वारा दो सदियों से बिना रोक-टोक के कार्बन उत्सर्जन का नतीजा है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन में शामिल, साझा, लेकिन अलग-अलग ज़िम्मेदारियों के सिद्धांत को बनाए रखना चाहिए। इसकी जिम्मेदारी विकसित देशों को उठानी चाहिए, वैश्विक दक्षिण को नहीं। विकसित देशों पर उन देशों की जलवायु कर्ज़ है, जिन्हें उन्होंने गुलाम बनाया था और जिनका उन्होंने शोषण किया था, और उन्हें इसे तकनीकी हस्तांतरण, रियायती वित्त, और अपने देश में सही मायने में उत्सर्जन में कमी करके चुकाना होगा। ब्रिक्स देशों को जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग करनी चाहिए, न कि सिर्फ़ अनुकूलन के लिए वित्त-पोषण की।

भारत : अमेरिकी साम्राज्यवाद का एक कनिष्ठ साझेदार

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में सबसे बड़ा विरोधाभास भारत सरकार के आचरण में दिखा। भाजपा की केंद्र सरकार ने ऐसी विदेश नीति अपनाई है, जो अमेरिका के साथ समझौता करती है और उसके कनिष्ठ साझेदार की तरह काम करती है। यह बहुध्रुवीयता की भावना के खिलाफ है।

चीन को रोकने के लिए बनाए गए क्वाड, औकुस, सैन्य और व्यापार प्रबंधन के ज़रिए भारत ने अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक भागीदारी को और गहरा किया है। यह इज़राइल के साथ रणनीतिक रिश्ता बनाए रखता है, जबकि घोषणा पत्र में 1967 की सीमाओं के अंदर फ़िलिस्तीनी आत्म-निर्णय की बात कही गई है, जिसकी राजधानी पूर्व-येरुशलम हो। ईरान, वेनेज़ुएला और क्यूबा के ख़िलाफ़ अमेरिकी हमले पर भारत चुप रहा है। इसने गाज़ा में इज़राइल द्वारा नरसंहार जैसी हिंसा की साफ़ तौर पर निंदा करने से मना कर दिया है।

यह बहुध्रुवीयता के लिए प्रतिबद्ध देश का आचरण नहीं है। यह एक ऐसे देश का आचरण है, जो अमेरिकी-प्रभुत्व के खिलाफ लड़े बिना और इसकी कीमत चुकाए बिना, ब्रिक्स की सदस्यता के फायदे उठाना चाहता है। मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अमेरिका के इशारों पर नाचते हुए वैश्विक दक्षिण की टेबल पर बैठना चाहती है।

भारत सरकार को अपनी विदेश नीति को फिर से संशोधित करना चाहिए और फिलिस्तीन, ईरान, क्यूबा, वेनेजुएला सहित अमेरिका द्वारा निशाना बनाए गए दूसरे देशों के साथ एकजुटता दिखानी चाहिए। सरकार को बाहरी और अंदरूनी, दोनों तरह की सच्चाई का सामना करना सीखना चाहिए। अरब सेंटर फॉर रिसर्च एंड पॉलिसी स्टडीज़ द्वारा पश्चिम एशिया के 15 देशों में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 44 प्रतिशत लोगों ने इज़राइल और 21 प्रतिशत लोगों ने अमेरिका को अरब सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। ईरान तीसरे स्थान पर रहा है, जिसे केवल 6 प्रतिशत लोगों ने ही खतरा बताया है। यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है : इज़राइल हमेशा सबसे बड़ा खतरा रहा है, और अमेरिका लगातार दूसरे स्थान पर रहा है। लगभग एकमत से 84 प्रतिशत लोगों का मानना है कि इज़राइली नीति अरब इलाके की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा हैं, जबकि 77 प्रतिशत लोगों ने अमेरिका की नीति के बारे में यही बात कही है। जब उनसे सामान्य रूप से अमेरिका के प्रति उनकी भावनाओं के बारे में पूछा गया, तो 56 प्रतिशत लोगों ने नकारात्मक भावनाओं को व्यक्त किया, जो एक दशक पहले के मुकाबले ज़्यादा थीं। यह सिर्फ अरब दुनिया का मूड नहीं है। प्यू रिसर्च सेंटर के स्प्रिंग 2026 ग्लोबल एटीट्यूड सर्वे में, जिसमें 36 देश शामिल थे, पाया गया कि अधिकांश देशों में ज़्यादातर लोग इज़राइल के बारे में नकारात्मक सोच रखते हैं। भारत सरकार को इस सच्चाई को समझने के लिए अपनी आंखें खुली रखनी चाहिए और अमेरिका और इज़राइल से दूरी बनानी चाहिए।

दूसरी सच्चाई अंदर की है। सरकार ने शिखर सम्मेलन से पहले झुग्गियों को ढककर और बेघर लोगों को शहर के केंद्रों से दूर धकेलकर गरीबी छिपाने की कोशिश की है। गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी और बेघर होने को आर्थिक सांख्यिकी और प्रचार अभियान के ज़रिए दबाया या छिपाया नहीं जा सकता।

आगे का रास्ता

नई दिल्ली घोषणा पत्र वैश्विक दक्षिण की शिकायतों के बारे में बताता है। यह एकतरफ़ा पाबंदियों को चुनौती देता है, फ़िलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन करता है, और संस्थागत सुधारों का आह्वान करता है। लेकिन घोषणाओं से लोगों को मुक्ति नहीं मिलती। उन्हें संघर्ष करना पड़ता है।

वामपंथ को बयानबाजी और असलियत के बीच के अंतर को सामने लाना होगा, सरकारों को जवाबदेह ठहराना होगा, और ऐसे आंदोलन का निर्माण करना होगा, जो असल में बदलाव ला सकें। ब्रिक्स कोई साम्राज्यवाद विरोधी मंच नहीं है। हमारा कार्यभार इसे छोड़ना नहीं है, बल्कि इसे बदलना है और इसे बहुध्रुवीयता के दायरे से आगे ले जाना है।

फ़िलिस्तीन, ईरान, क्यूबा और वेनेज़ुएला के लोगों को सिर्फ घोषणाओं की नहीं, उससे ज़्यादा की ज़रूरत है। उन्हें कार्यवाही की ज़रूरत है। और वह कार्यवाही संगठित मज़दूर वर्ग, किसानों, युवाओं और उन सभी लोगों से निर्मित होगी, जो अमेरिकी साम्राज्यवाद की व्यवस्था वाली दुनिया को मानने से इंकार करते हैं। संघर्ष जारी है।

(लेखक माकपा के महासचिव और पूर्व सांसद हैं। वे केरल के शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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