(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

नाटक के पहले अंक में, बिहार के मुख्य मंत्री पद पर बने रहते हुए, नीतीश कुमार ने राज्यसभा की सदस्यता के लिए चुनाव के लिए अपना पर्चा भरा। यह पर्चा भरे जाने के संंबंध में दो बातें खास तौर पर गौर करने वाली थीं। पहली, यह पर्चा नीतीश कुमार की अपनी पार्टी, जदयू के मंझले दर्जे के नेताओं और कार्यकर्ताओं के मुखर तथा काफी व्यापक विरोध के बावजूद भरा गया। इस विरोध की शुरूआत, राज्यसभा के रास्ते से नीतीश कुमार की बिहार से विदाई की खबरें आने के साथ ही हो गयी थी। वास्तव में इस मुखर विरोध को शांत करने के लिए और बिहार से अपनी विदाई के लिए, बिहार में गठजोड़ सरकार में अपनी सहयोगी, भाजपा को अपने समर्थकों का निशाना बनने से बचाने के लिए, नीतीश कुमार ने यह अजीबो-गरीब बयान भी दिया था कि उनकी ही इच्छा थी कि राज्यसभा के सदस्य के रूप में भी देश की सेवा करें। वैसे बिहार में सरकार और पार्टी को उनका मार्गदर्शन मिलता रहेगा। जाहिर है कि उनके इस बयान का कम-से-कम जदयू कार्यकर्ताओं की निराशा पर कोई असर नहीं पड़ा। हां! भाजपा को जरूर आलोचनाओं से अपने को बचाने के लिए कुछ सहारा मिल गया।


नीतीश कुमार के राज्यसभा का पर्चा भरने के संबंध में दूसरी खास बात थी, इस मौके पर देश के गृहमंत्री और भाजपा में मोदी के बाद नंबर दो माने जाने वाले, अमित शाह का नीतीश कुमार की बगल में खड़े रहना। इस मौके पर अमित शाह की उपस्थिति एक प्रकार से इसकी याद दिलाने के लिए भी थी कि बिहार की सत्ता में आम तौर पर तथा जदयू में खासतौर पर यह संक्रमण, उनके ही चाणक्य नीति लक्ष्यों के पूरे होने का इशारा कर रहा था। जाहिर है कि खुद अपने हाथों से फैसलों को लागू कराने में विश्वास करने वाले और नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े विश्वासपात्र, अमित शाह इस मौके पर खुद उपस्थित रहकर यह तो खैर सुनिश्चित कर ही रहे थे कि भाजपा के मनमाफिक कार्ययोजना बिना किसी दिक्कत के अमल में लाई जाए और उसे जमीन पर उतारने में आखिरी वक्त पर कोई अड़चन नहीं आने पाए।

इसी नाटक के दूसरे अंक में, जाहिर है कि पूर्व-योजना के अनुसार, पटना में जदयू कार्यालय में बड़ी धूम-धाम के साथ नीतीश कुमार के पुत्र, निशांत कुमार की राजनीतिक पारी की शुरूआत का ऐलान किया गया। नीतीश कुमार के बाद, जदयू के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाने वाले, पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री, ललन सिंह ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलायी। हालांकि, औपचारिक तौर पर यह मौका निशांत कुमार के पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने का था, लेकिन इसमें न तो निशांत कुमार को कोई शक था और न उन्हें पार्टी का सदस्य बनाने वालों को कि, वास्तव में यह उनके पार्टी का नेतृत्व संभालने का मौका था। इस मौके पर अपने संबोधन में निशांत कुमार ने जिस तरह, नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में ही काम करने का आश्वासन देने के बाद, पार्टी कार्यकर्ताओं की राय के अनुसार, पार्टी को मजबूत करने का भरोसा दिलाया, वह पार्टी का नेतृत्व संभालने के मौके के अनुरूप था। और जनता के दिल में घर बनाने की कोशिश करने का उनका आश्वासन तो, यह साफ ही कर देता था कि वह इस आयोजन को पार्टी की गद्दी ही सौंपे जाने के मौके की तरह देख रहे थे।

याद दिला दें कि बिहार में सत्ता परिवर्तन के, जाहिर है कि भाजपा अनुमोदित पैकेज के हिस्से के तौर पर, निशांत कुमार को बिहार सरकार में महत्वपूर्ण और जदयू की ओर से संभवत: सबसे महत्वपूर्ण पद सौंपे जाने की चर्चा, पहले ही चल रही थी। इन अनुमानों में आम तौर पर जानकारों की यह राय रही है कि उन्हें उप-मुख्यमंत्री पद सौंपा जा सकता है, क्योंकि मुख्यमंत्री पद भाजपा को दिलवाया जाना तो इस पूरी कसरत का असली मकसद ही है। प्रसंगवश इसका जिक्र भी कर दें कि निशांत कुमार के ‘राज्यारोहण’ के समय तक, जदयू कार्यकर्ताओं का असंतोष शांत नहीं हुआ था। इस मौके पर भी जदयू कार्यालय में, पार्टी कार्यकर्ताओं के एक हिस्से और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के समर्थकों में, बाकायदा मार-पीट हुई। याद रहे कि जदयू कार्यकर्ताओं का अच्छा-खासा हिस्सा इस सारे बदलाव को, नीतीश कुमार और जदयू के खिलाफ एक साजिश के रूप में देखता है, जिसे पर्दे के पीछे से केंद्र सरकार तथा भाजपा संचालित कर रही है। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की जदयू और नीतीश कुमार के प्रति वफादारी पर संदेह जताए जाते रहे हैं।

यह भी याद दिला दें कि बिहार में यह सत्ता संक्रमण किसी भी तरह से अप्रत्याशित नहीं है। वास्तव में, पिछले साल राज्य में विधानसभा चुनाव के मौके पर तो लगातार ही विपक्ष की ओर से यह सवाल उठाया जाता रहा था कि क्या भाजपा, चुनाव के बाद गठबंधन के कामयाब होने की सूरत में, अगले पांच साल के लिए मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का नेतृत्व स्वीकार करेगी? विपक्ष ही नहीं, अनेक टिप्पणीकारों के भी इस आशय के सवालों के बावजूद, भाजपा चुनाव प्रचार के दौरान काफी वक्त तक इस सवाल का स्पष्ट उत्तर देने से बचती ही रही थी। इसके बजाय भाजपा, नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़े जाने पर जोर देती रही थी, लेकिन इसे विशेष रूप से महाराष्ट्र के अनुभव की रौशनी में, चुनाव में जीत के बाद भी नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने पर, संदेह बनाए रखने का ही इशारा माना जा रहा था।

पाठकों को याद ही होगा कि महाराष्ट्र में गठजोड़ सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधानसभाई चुनाव लड़े जाने के बाद, विधानसभा में अपनी ताकत ज्यादा होने के तर्क से भाजपा ने, मुख्यमंत्री पद खुद अपने नाम कर लिया था और शिंदे को धकेल कर उप-मुख्यमंत्री पद पर पहुंचा दिया था। स्वाभाविक रूप से बिहार में पूछा जा रहा था कि यह मानने का क्या आधार है कि भाजपा, महाराष्ट्र के इस पैंतरे को बिहार में भी नहीं आजमाएगी। उल्टे नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर बढ़ते सवालों के बीच, इसकी अटकलों को और बल ही मिल रहा था कि चुनाव में जीत मिली तो भाजपा, अपना मुख्यमंत्री बनवाएगी।

वास्तव में ये आशंकाएं बिहार में 2020 के आखिर में हुए चुनाव के नतीजे में, सत्ताधारी जदयू-भाजपा गठजोड़ में ताकतों के संतुलन में हुए बदलाव की भी निरंतरता में थीं। यह बिहार में पहली गठजोड़ सरकार थी, जिसमें दो उप-मुख्यमंत्री थे, जो दोनों ही भाजपा से थे। और कार्यकाल के बीच में ही जब नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर, राजद के साथ गठबंधन सरकार बनाई, वह सरकार तो कुछ महीने ही चली और उसके बाद नीतीश कुमार एक बार फिर पल्टी मारकर भाजपा के साथ गठजोड़ में पहुंच भी गए, लेकिन उसके बाद सिर्फ नीतीश कुमार के प्रति भाजपा का अविश्वास ही नहीं बढ़ा था, गठजोड़ सरकार में ताकतों का संतुलन भाजपा ने अपने पक्ष में और भी झुका लिया था। इसके बावजूद, चार महीने पहले विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के फौरन बाद, बहुतेरे अनुमानों के विपरीत भाजपा ने मुख्यमंत्री पद पर अधिकार की मांग तो नहीं की, पर उसने सरकार में ताकत का संतुलन और ज्यादा अपने पक्ष में झुका लिया। इसमें विधानसभा के स्पीकर का पद हासिल करने का विशेष रूप से रणनीतिक महत्व था।
और अब चार महीने बाद ही भाजपा ने, मुख्यमंत्री पद हासिल करने के लिए अपना दांव चल दिया है। फिर भी यह सिर्फ नीतीश कुमार की बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में, बीस साल लंबी पारी के अंतत: खत्म होने का ही मामला नहीं है। यह इसका भी मामला नहीं है कि बिहार में मुख्यमंत्री पद जदयू के हाथ से निकलकर, अब भाजपा के हाथ में पहुंच गया है। यह उस दिलचस्प और मारक पैटर्न का हिस्सा है, जो हर जगह क्षेत्रीय पार्टियों के साथ भाजपा के रिश्तों में देखने को मिलता है। जिन राज्यों में मुख्य राजनीतिक विभाजन, कांग्रेस और उसके विरोध में सामने आयी क्षेत्रीय पार्टियों के बीच रहा है, उन राज्यों में पांव जमाने के लिए भाजपा, पहले जूनियर पार्टनर के तौर पर इन क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठजोड़ करती है। उसके बाद, ऐसे हरेक मामले में अरब और उसके ऊंट वाले किस्से को दोहराया गया है, जिसमें ऊंट सर्दी के बचने के लिए थोड़ा-थोड़ा कर के तंबू में घुसने की इजाजत मांगता है और होते-होते होता यह है कि ऊंट तंबू में और अरब तंबू के बाहर।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, असम में असम गण परिषद, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी, महाराष्ट्र में शिव सेना का यही अनुभव रहा है, जो अब बिहार में भी दोहराया जा रहा है। हां! यह खेल हमेशा समान रूप से कामयाब ही रहा हो, ऐसा भी नहीं है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु में, ये तजुर्बे संघ-भाजपा के लिए कहीं मुश्किल साबित हुए हैं। फिर भी कुल मिलाकर, पैटर्न यही है कि क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ कर के सत्ता तक पहुंच बनाने के बाद, संघ-भाजपा जोड़ी अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के ही आधार को हड़प कर जाती है और सहयोगी पार्टियों को निगल ही जाती है या उन्हें पूरी तरह सेे पंगु बनाकर छोड़ देती है। हैरानी की बात नहीं होगी कि नीतीश कुमार की विदाई बाद, संघ-भाजपा जोड़ी विभिन्न तरीकों से जदयू को भी इसी रास्ते पर लगा दे।

लेकिन, किसी एकाधिकारी प्रकृति की, वास्तव में फासीवादी प्रकृति की राजनीतिक पार्टी से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है, जहां गठबंधन का आधार ही किसी न किसी तरह सत्ता में हिस्सा हासिल करना होता है, न कि सहयोगी पार्टियों के साथ जनहित के किसी साझा कार्यक्रम को पूरा करना। इन तमाम वर्षों में हमारे देश में वामपंथी पार्टियों के नेतृत्व वाले गठबंधन ही बाद वाली प्रकृति के गठबंधन साबित हुए हैं, जो सहयोगियों के आधार की कीमत पर अपना विस्तार करने की नहीं, सहयोगियों के साथ मिलकर साझा आधार को बढ़ाने की रणनीति पर चलते हैं। इसीलिए, वामपंथी नेतृत्ववाले गठबंधन ज्यादा मजबूत तथा सदाबहार साबित होते हैं, जबकि भाजपा के गठबंधन ‘यूज एंड थ्रो’ और ‘यूज एंड डाइजेस्ट’ के ही उदाहरण साबित हुए हैं। नीतीश कुमार जिस सत्ता को अपने बेटे को उत्तराधिकार में सौंपने के लिए, शाह प्रायोजित संक्रमण योजना के साझीदार बने हैं, वह सत्ता पूरी तरह संघ-भाजपा के कब्जे में आने में अब शायद ज्यादा समय नहीं लगेगा।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया's avatar

By NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया

NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) / NNW TV NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) is a trusted digital media group and online Hindi news portal providing the latest breaking news and updates from India and around the world. Our coverage includes Politics, Crime, Public Issues, Sports, Entertainment, Bollywood, Business, Lifestyle, Art & Culture, Tourism, Social Affairs, and more. Our mission is to deliver accurate, reliable, and impactful journalism while keeping our audience informed about important developments at local, national, and international levels. "NEWS NATIONAL WORLD – Trusted Digital Media for Accurate News & Meaningful Stories." -- Management & Editorial Team -- Managing Director (MD) Ankul Pratap Singh Baghel Mobile: +91 85168 70370 // Editor Gaurav Jain (Indore) Mobile: +91 98276 74717 // Associate Editor Aamir Khan Mobile: +91 90099 11100 // Divisional Bureau Chief (Indore) Pradeep Chaudhary Mobile: +91 94250 52518 // Rewa Editor Kushmendra Singh Mobile: +91 94247 01399 // Join NEWS NATIONAL WORLD Share local news, public issues, social activities, events, sports updates, and important information from your area with us. For News Coverage, Advertising & Business Inquiries: Mobile: +91 85168 70370 Email: allindiamedia12340@gmail.com Follow and join the NEWS NATIONAL WORLD (PVT. LTD.) WhatsApp Channel for fast, reliable, and authentic news updates. NNW TV | NNW NEWS

प्रातिक्रिया दे

You missed

Translate »

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading