1. भागवत महान और उनका हिंदुत्व महान : विष्णु नागर

आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में सवर्ण, पिछड़ा तथा दलित समाज के प्रतिनिधियों के साथ गोरखपुर में सामूहिक भोज किया। बहुत बड़ा पुण्य कार्य किया! आजकल इतना बड़ा और इतना साहसिक कदम इस देश में कौन उठाता है! मगर उनकी हिम्मत देखिए, उन्होंने यह  कर दिखाया!! इस बात पर तालियां बजनी चाहिए!!!

तालियां अगर बज चुकी हों, तो हम आगे बढ़ें। भागवत जी ने सब आमंत्रितों की सबसे पहले उनकी जाति से उनकी पहचान की होगी! उन्हें किसी का धर्म जानने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि सब उनकी तरह के ‘हिंदू ‘ थे! यूं तो वे मुसलमानों को भी अपने भाषणों में ‘हिंदू’ बताते हैं।उनके अनुसार भारत भूमि में जन्मा हर व्यक्ति हिंदू है।सबका डीएनए एक है, मगर उन्होंने इन वाले ‘हिंदुओं’ को भोज पर नहीं बुलाया! उन्होंने सिखों और बौद्धों को भी नहीं बुलाया! जब मुसलमान उनके लिए हिंदू हो सकते हैं, तो ये तो उनसे डबल-ट्रिपल हिंदू हैं, मगर ये सब भाषण करने और इंटरव्यू देने के लिए ‘हिंदू’ हैं, बाकी क्या हैं, आप समझते हैं!

भोजन से पहले भागवत जी को बताया गया होगा कि ये शर्मा जी या मिश्रा जी हैं, ये अग्रवाल साहब हैं या गुप्ता जी हैं, ये सिंह साहब हैं या राजपूत साहब हैं। ये सब सवर्ण हैं, इतना तो भागवत जी जानते ही हैं! जहां तक दलितों की बात है, महामानव जी ने एक बार मुसलमानों के बारे में ज्ञान दिया था कि उन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है, उसी फार्मूले से दलितों को भागवत जी ने उनके कपड़ों से ही पहचान लिया होगा! महामानव जी का यह फार्मूला इतना सीधा और सरल है कि चार साल के बच्चे को भी इसका ज्ञान करवा दिया जाए, तो वह सड़क चलते दलितों और मुसलमानों को भी ‘पहचान’ लेगा! वैसे  महामानव जी की भी असली पहचान उनके पल-पल बदलते कपड़े हैं!

यह तो नहीं पता कि भोजन के लिए किस-किस जाति के कितने-कितने प्रतिनिधि बुलाए गये थे और किसे, कहां बैठाया गया था! हो सकता है कि सारे सवर्ण एक साथ बैठाए गए हों। संभव यह भी है कि सवर्णों को भी वर्ण व्यवस्था के क्रम से बैठाया गया हो, ताकि सबकी पहचान सुरक्षित रहे, किसी तरह का उनमें घालमेल न हो! आजकल ऐसी गड़बड़ियां काफी होने लगी हैं।अंत:धार्मिक ही नहीं, अंतर्जातीय विवाह भी अब बहुत होने लगे हैं। इस कारण हिंदू वर्ण-व्यवस्था खतरे में पड़ गई है! ऐसे लड़के-लड़कियों की कभी-कभार हत्या कर दी जाती है और कभी-कभी उन्हें आत्महत्या करने को मजबूर कर दिया जाता है, फिर भी यह सिलसिला थमता नहीं!

भोजन की इस व्यवस्था के कारण भागवत जी के लिए हरेक की जाति पहचानना आसान रहा होगा! शर्मा जी को सिंह साहब समझने की गलती उनसे नहीं हुई होगी!इस तरह इन जातिवीरों की ‘भावनाएं ‘सुरक्षित रही होंगी ! आजकल हिंदुओं का एक वर्ग बेहद ‘भावना-प्रधान’ हो चुका है! और इन भावनाओं का एकमात्र काम भड़कना है। इन भावनाओं की भड़कने से रक्षा करना इक्कीसवीं सदी के चौथाई  भाग में इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि लोग अपनी बेटी तक की जान ले लेते हैं!

भोजन के दौरान संभव है कि भागवत जी ने यह पूछा हो कि कहिए, शर्मा जी, भोजन तो आपको ठीक लगा न! आप ब्राह्मणों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण शाकाहारी भोजन बनवाया गया है। रसोइया भी ब्राह्मण ही है, ताकि आपका धर्म भ्रष्ट न हो! प्याज़-लहसुन को हमारे यहां तामसिक माना गया है, इसलिए उनका भी उपयोग नहीं किया गया है।

और गुप्ता जी, आपको तो यह सादा भोजन शायद ही रुचा हो! इसमें केवल दो ही मिठाइयां हैं! इससे आपको कहां संतोष होनेवाला! और सिंह साहब, शाकाहारी भोजन तो आपको क्या ही पसंद आया होगा, इसके लिए मैं आपसे अब क्षमा ही मांग सकता हूं। फिर हंसकर कहा होगा कि सच्चे हिंदुओं की संगत में आदमी कष्ट भी आराम से झेल लेता है! फिर उन्होंने शायद यह भी बताया हो कि ‘हिंदू एकता’ के लिए उनके स्वयंसेवकों ने पिछले सौ वर्षों में न जाने कितनी तरह के कितने कष्ट भोगे हैं! परिस्थिति को देखते हुए उन्होंने यह नहीं कहा होगा कि इन कष्टों में वैसे एक कष्ट दलितों के साथ भोजन करना भी है!

उन्होंने वाल्मीकि जी से भी पूछा होगा कि भोजन तो रुचिकर है न! इसके आगे यह कहने से उन्होंने स्वयं को रोका होगा कि आप लोगों को ऐसा भोजन तो यदा- कदा ही मिलता होगा!आप संघ से जुड़े रहिए, जब कभी हम समरसता भोज का आयोजन करेंगे, आपको अवश्य आमंत्रित करेंगे!

मित्रों, उस भोज का यह विवरण काल्पनिक है, मगर उतना काल्पनिक भी नहीं है! कुछ वास्तविक आधार है इसका! संघ और भाजपा के नेता दलितों के घर भोजन करने का ड्रामा बहुत समय से कर रहे हैं। एक बार कर्नाटक के इनके एक बड़े नेता ने किसी आला होटल से अपने और अपने भक्तों के लिए बढ़िया-सा नाश्ता मंगवाया और उसे दलित की झोपड़ी में ग्रहण किया, क्योंकि उस समय दलित-दलित खेलने का भाजपा-संघ का कार्यक्रम जोरों से चल रहा था!

दलित पति-पत्नी इनके चरणों में बैठे इन्हें मुग्धभाव से इन्हें खाते हुए देखते रहे और ये गपागप खाते रहे! संघ की समरसता इससे आगे जा भी नहीं सकती! नाश्ता चूंकि किसी ऊंची होटल से आया था, तो इसे दलित परिवार के सदस्यों के साथ साझा करना अनुचित होता, क्योंकि इससे उनकी आदत बिगड़ जाती! इससे ‘सामाजिक समरसता’ अभियान खतरे में पड़ जाता!

नेता जी ने भक्षण किया, फोटो खिंचवाया और बड़ी-सी गाड़ी में फुर्र हो गए! खाने के बाद की लंबी डकार भी नेताजी ने शायद वहीं ली होगी और इतनी जोरदार रही होगी कि पूरा झोपड़ा हिल गया होगा। मगर टीवी के न्यूज़ चैनल वाले और अखबार वाले इस तरह की जरूरी बातें नहीं बताते! बताते तो यह खबर इतनी धांसू बन सकती थी कि किसी-किसी कन्नड़ अखबार में तो यह उस दिन की पहली खबर होती!

इसी तरह भाजपा के दिल्लीवासी एक उड़िया सांसद जी का मन भी एक आदिवासी के यहां भोजन करने का हुआ! चुनाव के समय नेताओं के मन में अकसर क्रांतिकारी भाव पैदा हो जाते हैं! उन्होंने बढ़िया सी लिपी-पुती झोपड़ी में जमीन पर बैठकर पांच-छह तरह के सुस्वादु व्यंजनों का अकेले-अकेले स्वाद लिया। जिस आदिवासी के यहां वह भोजन कर रहे थे, उसके परिवार के लोगों की तरफ उनकी पीठ थी! उस आदिवासी परिवार की तीन बच्चियां और दो बूढ़ी औरतें बड़ी हसरत से उस भोजन और उस सांसद का भकोसन कार्यक्रम देखती रहीं, मगर सांसद जी को इससे अंतर नहीं पड़ा!उनकी भूख, सुस्वादु भोजन की उनकी लालसा को जानने-समझने की उन्हें न फुरसत थी, न इच्छा! उन्हें तो राजनीतिक पाइंट स्कोर करना था! उन्होंने फोटो खिंचवा लिया था, उसे वायरल करवा दिया था। बन चुका था उनका काम! जीहो गया था, जयश्री राम!

तो दलित या आदिवासी के घर खाने का नाटक तो ये बढ़िया ढंग से कर लेते हैं, उसकी खबर भी ढंग से छपवा लेते हैं, टीवी पर दिखवा भी लेते हैं, मगर जब किसी दलित लड़की को किसी आंगनबाड़ी में रसोईये का काम मिल जाता है, तो छूआछूत के मारे इस समाज के लोग तीन महीने तक अपने बच्चों को वहां नहीं भेजते, ताकि इस भोजन से उनकी जाति भ्रष्ट न हो ! ऐसे समय सामाजिक समरसता के ये सिपाही न जाने कहां छूमंतर हो जाते हैं! जब कहीं दलित लड़के से थूक चटवाया जाता है, उसके कपड़े उतारकर उसके साथ कुकर्म करने की कोशिश की जाती है, वहां भी समरसतावादी दूर-दूर तक नज़र नहीं आते! कोई दलित लड़का ग़लती से तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के घर में चला जाता है और उसे इतना प्रताड़ित दी जाती है कि वह आत्महत्या कर लेता है, तब भी हिंदू एकता के हिमायती किसी बिल में घुसे पाए जाते हैं! दलितों में इन्हें हिंदू के दर्शन नहीं होते! उस समय वे किसी मस्जिद के आगे डीजे बजा रहे होते हैं या भगवा फहरा रहे होते हैं या हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे होते हैं! जब किसी दलित लड़के को मूत पिलाया जाता है, तो ये गली-गली में हिंदू सम्मेलन करने में व्यस्त रहते हैं। सड़कों पर गुंडागर्दी करने के लिए हर मोड़ पर बजरंग दल वाले मिल जाएंगे, मगर जहां कोई दलित-आदिवासी पिट रहा होगा, उसे घसीटा जा रहा होगा, मार खिलाई जा रही होगी, उसका घर तोड़ा जा रहा होगा या उसके जंगल कटवाए जा रहे होंगे, वहां हिंदुत्व के ये ‘वीर सपूत’ महाराणा प्रताप और शिवाजी के वंशज न जाने कहां छुपे होते हैं कि अंतरिक्ष में लगी दूरबीन से भी दिखाई नहीं देते! जब दिल्ली में एक लड़की दलितों का मज़ाक़ बनाते हुए उनसे कह रही थी कि पांच हजार साल से तुमने पानी नहीं पिया होगा, आओ मैं तुम्हें पानी पिला दूं तो एक भगवा भी उस मुंहजोर को जवाब देने आगे नहीं आया! ऐसा ‘महान’ है यह हिंदुत्व, जिसके सौ साल का उत्सव आजकल जोर और शोर से मनाया जा रहा है!

*(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
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आई गुरु का नाम बदनाम ना करो! : राजेंद्र शर्मा

देखी, देखी, इन मोदी विरोधियों की करतूत देखी। मोदी जी की छवि खराब करने के चक्कर में, देश को ही बदनाम कर दिया और वह भी अमृतकाल में। बताइए, बनियान पहन कर प्रदर्शन करने पहुंच गए। और प्रदर्शन भी कहां? जहां मोदी जी ने इतनी मेहनत से इतना बड़ा मेला लगाया था और सारी दुनिया के एआई उर्फ कृत्रिम मेधा वालों को जुटाया था कि आएं और विश्व गुरु की एआई का जलवा देखें। पर विरोधियों ने बना-बनाया खेल बिगाड़ दिया, बल्कि देश को ही बदनाम कर दिया।

देखना था, विश्व गुरु का एआई का जलवा, जहां बच्चा पहला शब्द ही आई बोलता है या एआई बोलता है और दुनिया ने देखे अधनंगे नौजवान ; बदन के ऊपर के हिस्से पर सिर्फ बनियान या टी शर्ट पहने हुए और कई तो नंगे बदन हाथों में झंडे की तरह टी शर्ट उठाए हुए। और बनियान भी साफ-सफेद नहीं, उन पर भी नारे लिखे हुए। और तो और मोदी जी की तस्वीर तक टेढ़ी-आड़ी, उस पर से कंप्रोमाइज्ड का नारा भी। करा दी ना सारी दुनिया में थू-थू। दुनिया को दिखाना था आई का विश्व गुरु और दीख गया अधनंगा भारत!

जिसे बाकी दुनिया की नजरों से छुपाने के लिए मोदी जी की सरकार अठारह-अठारह घंटे मेहनत करती है। जिसे सारी दुनिया की नजरों से छुपाने के लिए ऐसे मेलों-ठेलों से हफ्तों पहले से तमाम रेहड़ी-पटरी वालों को, ‘‘अदृश्य’’ कर देती है। दृश्य खराब करने वाली झुग्गी-झोंपडिय़ों से लेकर मोहल्लों तक को, कपड़े की दीवारों के पीछे गायब कर देती है। गोदी मीडिया को अतिरिक्त रोटियां डालकर चौबीसो घंटे सिर्फ मेला-मेला कराने के जरिए आंख ओट, पहाड़ ओट का इंतजाम करती है। उस सरकारी राज को देश के दुश्मनों ने सारी दुनिया को दिखा दिया और जहां सिर्फ मोदी जी की सोणी-सी तस्वीर दीखनी थी, वहां उघड़े पेटों का मंजर दिखा दिया।

अदालत ने एकदम सही किया, जो इन देश को बदनाम करने वालों को फौरन पांच-पांच दिन के लिए पुलिस की हिरासत में भेज दिया। बल्कि हम तो कहेंगे कि पांच दिन तो बहुत कम हैं, इनके गुनाह को देखते हुए। इन्हें तो जिंदगी भर के लिए जेल में डाला जाना चाहिए। ऐसे देशद्रोहियों के साथ कोई नरमी बरतना ठीक है क्या? यूएपीए का न सही, इन पर सरकारी राज विदेशियों पर जाहिर करने का मामला तो बनता ही है। एआई के मेले में, पेट का मुद्दा याद दिलाया है! इन्हें विश्व गुरु कभी माफ नहीं कर सकते। और यह सिर्फ दिल से माफ नहीं करने की बात नहीं है कि, दिल से माफी के बिना भी बंदा बाकी सब मौज-मजा करता रहे! इन्हें जेल से बाहर नहीं निकलने देना चाहिए। ऐसी दुर्गति की जानी चाहिए कि मोदी जी के मेले-ठेले में, सरकारी राज पर से पर्दा हटाने की फिर किसी की हिम्मत न हो।

वैसे शाह जी की पुलिस सही लाइन पर है। भारत को बदनाम करने की इस करतूत के पीछे जरूर गहरा षडयंत्र है। जो इसे जनतंत्र, जनतंत्र में प्रदर्शन के बुनियादी अधिकार, वगैरह से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वे या तो बहुत भोले हैं या राष्ट्र विरोधी हैं। जिस मेले में दुनिया भर के लोगों को न्यौता गया हो, वहां प्रदर्शन-वदर्शन का अधिकार कैसा? और पेट दिखाने का अधिकार तो हर्गिज नहीं। दुनिया के मेले में तो सिर्फ देश का नाम होता है या बदनामी होती है। सिंपल है, मोदी जी नाम कर रहे थे, प्रदर्शन करने वाले बदनाम कर रहे थे! रही बात दूसरे देशों में ऐसे मेलों में विरोध प्रदर्शनों की जगह रहने की, तो ऐसा करने वाले देश नौसिखिया हैं, अभी जनतंत्र की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। उनसे हमारे देश की क्या तुलना — हम डेमोक्रेसी की मम्मी वाले हैं!

फिर षडयंत्र रचने वालों के लिए कैसा जनतंत्र और कैसे जनतंत्र वाले अधिकार? और यह मामला तो विदेशी षडयंत्र का है। मोदी-शाह के राज में बाकी सब चीजों में तो आत्मनिर्भरता है, पर षडयंत्र सिर्फ विदेशी ही मंजूर हैं। खैर! यहां तो सीधे चीन का हाथ है। यह नहीं भूलें यह पेट-दिखाऊ प्रदर्शन, विश्व गुरु को बदनाम करने की पहली या अकेली कोशिश नहीं थी। इसी एआई मेले में इससे पहले भी कोशिशें हुई थीं। गलगोटिया यूनिवर्सिटी का रोबो-कुकुर प्रकरण कौन भूल सकता है? उसके पीछे चीनी हाथ निकला था या नहीं? चीनियों ने पहले रोबो-कुकुर दिखाकर, भोले-भाले भारतीय विश्वविद्यालय को फंसाया। उन्हें यह कहकर भरमाया कि कुछ हजार डालर में कुकुर उनका। और तो और वे चाहें तो उसका अपने मन से नाम तक रख सकते हैं।

गलगोटिया वालों ने भी बड़ा दिल दिखाया और कुकुर को नया नाम भी दिया — ओरियोन। अपने ओरियोन को उन्होंने पूरे दिल से मेले में सब को दिखाया भी। और तो और, आईटी मंत्री जी की रील के जरिए, सारी दुनिया को उसका जलवा दिखाया भी। हम भारतीयों ने चीनी कुकुर को इतना अपनापन दिया, इतना प्यार दिया। और बदले में चीनियों ने क्या किया? विश्वासघात! ऐन मेले के बीच सारी दुनिया को बता दिया कि भारतीय विश्वविद्यालय ने तो सिर्फ रोबो-कुकुर को नया नाम दिया है, उसे बनाया तो चीनी कंपनी ने है। जाहिर है कि यह सब विश्व गुरु को बदनाम करने का षडयंत्र था।

और यह षडयंत्र इतने पर ही खत्म नहीं हो गया। पर्ल्स चाइना नाम के जिस ट्विटर हैंडल ने रोबो कुकुर के चीनी मूल होने का शोर मचाकर, भारत को बदनाम करने की कोशिश की थी, उसी ने बाद में गलगोटिया के ही स्टाल पर प्रदर्शित एक ड्रोन के कोरियाई मूल का भी मुद्दा उठा दिया। पर मोदी जी के होते हुए कोई साजिश सफल कैसे हो जाती? मोदी जी ने निर्णायक कार्रवाई की। भरे दिल से उन्हें गलगोटिया विश्वविद्यालय को मेले से रुखसत जरूर करना पड़ा, पर उन्होंने षडयंत्र की जड़ पर फौरन आघात किया। मोदी जी ने पर्ल्स चाइना का ट्विटर हैंडल ही भारत में ब्लाक करा दिया। न रहेगा यह ट्विटर हैंडल और न उठेगा दिखायी गयी चीजों के, असली बनाने वाले का मुद्दा।

और हां! क्रोनोलॉजी समझिए। मोदी जी ने जब रोबो-कुकुर और ड्रोन की पैतृकता का शोर मचाकर, भारत के एआई में भी विश्व गुरु होने के दावों को नुकसान पहुंचाने की इन कोशिशों को विफल कर दिया और एआई में विश्व गुरु होने के भारत के दावे पर कोई आंच नहीं आयी, उनके बाद ही आया यह पेट दिखाऊ प्रदर्शन! और इसमें भी अमरीका के साथ ट्रेड डील के खिलाफ नारेबाजी। चीनी कनेक्शन के लिए, इससे बढ़कर दूसरा कोई सबूत क्या होगा? 

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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