1. योजनाएं आदिवासियों के नाम पर और कल्याण कॉरपोरेटों का!

यह सरकार आदिवासी हितों की लंबी चौड़ी बातें करती हैं, लेकिन विकास के जिस रास्ते पर वह चल रही है, वह मात्र कॉरपोरेटों के विकास का ही रास्ता है। संसद में पेश बजट के छिलके जैसे-जैसे उतर रहे हैं, वैसे-वैसे इस सरकार का आदिवासी विरोधी चेहरा साफ नजर आता है।

योजना आयोग ने सरकार को बजट में कुल खर्च का 8.6 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों पर खर्च करने का निर्देश दिया है, जो आबादी में उनके हिस्से के बराबर है। मोदी सरकार बजट पेपर्स के हिस्से के तौर पर “अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए आबंटन” नाम से एक अलग स्टेटमेंट नंबर 10ब प्रकाशित करती है, जिसमें हर  मंत्रालय से आदिवासी जनजातियों के लिए अपने आबंटन की एक राशि खर्च करने की उम्मीद की जाती है।  2025-2026 आबंटित की गई राशि कुल बजट का सिर्फ 2.58 प्रतिशत थी। लेकिन यह भी खर्च नहीं हुआ। कुल आबंटन 1.3 लाख करोड़ रखा गया था, लेकिन इसमें से 7000 करोड़ से ज़्यादा खर्च नहीं हुए।

लेकिन स्टेटमेंट नंबर 10ब में दिखाए गए तथाकथित खर्च का भी असल में आदिवासी कल्याण से कोई लेना-देना नहीं है। उदाहरण के लिए, आईआईटी में अनुसूचित जनजातियों के लिए 700 करोड़ रूपयों से ज़्यादा खर्च होना बताया गया हैं। लेकिन, आरटीआई के जवाबों से पता चलता है कि कई आईआईटी में अनुसूचित जनजाति के सिर्फ़ 2 प्रतिशत छात्र ही पढ़ रहे थे, जो उनके लिए निर्धारित 7.5 प्रतिशत के आरक्षण से बहुत कम है, और कई विभागों में तो अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या शून्य थी। तो ऐसे आईआईटी पर खर्च किए गए 700 करोड़ को अनुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए खर्च के तौर पर कैसे बताया जा सकता है? एक और धोखा यह है कि “सेमी-कंडक्टर इकाईयां” बनाने में 561 करोड़ रुपये अनुसूचित जनजाति के लिए कल्याण के तौर पर डाले गए हैं। इनमें से ज़्यादातर इकाईयां निजी क्षेत्र में हैं। वैसे भी इसका अनुसूचित जनजाति के कल्याण से क्या लेना-देना है? ऐसे कई उदाहरण हैं।

प्रधानमंत्री ने झारखंड विधान सभा चुनाव से पहले, खास तौर पर कमजोर आदिवासी समूह (पीवीटीजी) के लिए बनाए गए एक नए कार्यक्रम, जनमन योजना की घोषणा की थी। यह लगभग नौ मंत्रालयों का एक कन्वर्जेंस कार्यक्रम था। स्टेटमेंट 10बब के अनुसार, 2025-2026 में इस योजना के तहत सभी मंत्रालयों पर 6351.99 करोड़ रूपये खर्च किए जाने थे। लेकिन सिर्फ 3997 करोड़ रूपये ही खर्च हुए। इस वर्ष 2026-2027 के लिए आबंटित की गई रकम इससे भी कम है। साफ है कि पीवीटीजी की भलाई प्राथमिकता में नहीं है। इसी प्रकार, एक और फ्लैगशिप योजना का नाम धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान है। इसमें 17 मंत्रालयों को शामिल किया जाना था। इस योजना के तहत भी, 2025-26 में दिए गए 6105 करोड़ रूपये में से असल में सिर्फ़ 2186 करोड़ रूपये ही खर्च हुए। 

एकलव्य स्कूलों का भी हाल देखिए। दो साल पहले वित्त मंत्री का भाषण मोदी सरकार के अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए बेहतरीन स्कूल देने के वादे की तारीफ़ से भरा था। लेकिन हुआ क्या? पिछले साल 7088.60 करोड़ रुपये आबंटित किए गए थे, लेकिन इस साल के बजट के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ़ 4900 करोड़ रूपये ही खर्च किए गए। यह बहुत बुरी हालत है। ऐसे 728 स्कूलों के लक्ष्य में से 245 अभी तक नहीं बने हैं। लगभग 476 स्कूल, जो चालू बताए जा रहे हैं, उनमें से कई में ज़रूरी शिक्षक नहीं हैं। और फिर भी, जो पैसा दिया गया था, वह खर्च नहीं हुआ। आदिवासी इलाकों के स्कूलों के लिए कोई अलग से फंडिंग नहीं है। इनमें से बहुत सारे स्कूल “विलय” के नाम पर बंद कर दिए गए हैं। प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए मिलने वाली राशि का एक तिहाई रकम भी खर्च नहीं हुआ है।

सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आदिवासी मामलों का मंत्रालय, जो आदिवासी कल्याण के लिए नोडल एजेंसी है, का भी आदिवासी कल्याण के लिए खर्च न करने का रिकॉर्ड सबसे खराब है। याद कीजिए कि पिछले साल कैसे सरकार ने डींगें हांकी थीं कि उसने अनुसूचित जनजातियों के लिए रकम में भारी बढ़ोतरी की है। लेकिन अब यह साफ़ है कि आबंटित 14861.96 करोड़ रुपये में से असल में सिर्फ़ 10745.16 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। दूसरे शब्दों में, इस मंत्रालय ने 4116.80 करोड़ रूपये या आबंटित राशि  का लगभग 35 प्रतिशत खर्च नहीं किया। यह आदिवासी हितों के साथ बहुत बड़ा धोखा है।

असल में, इस बात का कोई सही ऑडिट नहीं होता कि मंत्रालय उनको आबंटित सारा पैसा क्यों नहीं खर्च कर रहे हैं? यह ऐसे समय में हो रहा है, जब लाखों आदिवासी तथाकथित विकास परियोजनाओं जैसे खनन, निजी क्षेत्र  की बिजली और सिंचाई परियोजनाओं आदि की वजह से बेघर हो रहे हैं। सरकार ने अपनी निजीकरण की नीतियों के चलते सार्वजनिक संपत्ति को कॉर्पोरेटों को सौंपकर  विनिवेश से करीब 90,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य  रखा है। इसका आदिवासियों के जल, ज़मीन और जंगल के अधिकारों पर सीधे-सीधे नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इसी प्रकार, इस बजट में लोगों से सीधे जुड़े सबसे ज़रूरी मुद्दों, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, श्रम, महिला और बाल कल्याण पर मोदी सरकार ने अपने खर्च में 1.20 लाख करोड़ रुपये की भारी कटौती की है, जो पहले कभी नहीं हुई थी। इसका ग्रामीण जन जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, लेकिन सामाजिक संकेतकों में आदिवासियों और दूसरे  तबकों के बीच ज्यादा अंतर के कारण ज्यादातर आदिवासी ही सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे। मनरेगा को खत्म किए जाने का सबसे ज्यादा प्रभाव भी इसी तबके पर पड़ेगा, क्योंकि अपनी आबादी से दुगुने से भी ज्यादा और कुल मनरेगा मजदूरों का लगभग 20 प्रतिशत रोजगार की गारंटी देने वाली इसी योजना में काम करता था। राम के नाम पर अब यह गारंटी भी उनसे छीन ली गई है।
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*2. देश में बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था*

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने 1 फरवरी, 2026 को चंडीगढ़ से एक रिपोर्ट छापी, जिसमें फरीदाबाद के एक मज़दूर की दुर्दशा पर ध्यान दिलाया गया था, जिसे अपनी मृत पत्नी का शव एक सब्जी की गाड़ी पर घर ले जाना पड़ा, क्योंकि परिवार का सारा पैसा इलाज पर खर्च हो गया था और वे निजी एम्बुलेंस का खर्च नहीं उठा सकते थे। उसी अखबार में तीन दिन बाद एक और खबर छपी कि नोएडा में एक परिवार ने दावा किया कि उन्हें अपने 24 साल के मृत व्यक्ति के लिए कफ़न और मदद देने से मना कर दिया गया, जब तक कि वे पोस्टमार्टम केंद्र में 3,000 रुपये अतिरिक्त नहीं पटाते। कुछ दिन पहले, दिल्ली के बीएलके मैक्स अस्पताल पर आरोप लगा कि उसने एक मृत मरीज़ का शव तब तक नहीं छोड़ा, जब तक कि 1 लाख रुपये अतिरिक्त नहीं दिए गए, जबकि पहले की अदायगी की जा चुकी थी। ये उन परेशान करने वाली कई कहानियों में से सिर्फ़ तीन हैं, जो मीडिया में नियमित रूप से रिपोर्ट की जाती हैं। अगर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यह स्थिति है, तो देश के ज़्यादातर दूसरे हिस्सों में आम लोगों के स्वास्थ्य की हालत के बारे में सोचना भी डरावना लगता है। बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं की कहानियां तो राजधानी दिल्ली के मामलों को पीछे छोड़ देती हैं, लेकिन ये कहानियां कभी राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां नहीं बनतीं।

ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ दिखाती हैं कि दशकों के नवउदारवादी सुधारों और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश में गिरावट के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य अधोसंरचना के कमजोर होने और निजी प्रदाताओं पर बढ़ती निर्भरता की वजह से आबादी का एक बड़ा हिस्सा कैसे वंचित और परेशान है। सरकार अपनी जीडीपी का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करती है, जिसकी वजह से लाखों लोग अपनी जेब से खर्च करने पर मजबूर हैं। दरअसल, सार्वजनिक स्वास्थ्य का धीरे-धीरे लाभ से संचालित माल के रूप में रूपांतरण हो रहा है। इसके कारण हर साल 5.5 करोड़ से ज़्यादा लोग गरीबी की दलदल में धकेले जा रहे हैं। इसके साथ ही, पारंपरिक दवा के नाम पर अवैज्ञानिक तरीकों और उपचार को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

पिछले एक दशक से मोदी सरकार जिन नवउदारवादी नीतियों को लागू कर रही है, उस ने स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सार्वभौमिकता, समानता और पहुंच के सिद्धांतों को कमज़ोर किया है, जबकि कॉर्पोरेट अस्पतालों की श्रृंखला, बीमा-आधारित मॉडल और निजी निवेश हिस्सेदारी के एकीकरण को तेज़ किया है। इसका नतीजा है कि अब स्वास्थ्य देखभाल की लगभग 80 प्रतिशत सेवाएं निजी क्षेत्र द्वारा दी जाती हैं, जिसके पास 60 प्रतिशत से ज़्यादा हॉस्पिटल और बिस्तर हैं। पिछले एक दशक में, निजी स्वास्थ्य देखभाल का क्षेत्र 25 प्रतिशत से ज़्यादा की सालाना दर से बढ़ा है, जिससे दो स्तरीय व्यवस्था मज़बूत हुई है, जिसमें अमीर लोगों को आधुनिक चिकित्सा देखभाल मिलती है, जबकि ज़्यादातर लोगों को वंचना तथा अपर्याप्त और अवहनीय सेवाओं का सामना करना पड़ता है। घर-परिवारों का स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का लगभग 70 प्रतिशत खर्च दवाओं पर होता है और आम जनता की कम आय और गिरती क्रयशक्ति के कारण जीवन रक्षक दवाओं तक उसकी पहुंच लगातार मुश्किल होती जा रही है। 

एक और बड़ी चिंता की बात है कि आयुष्मान भारत जैसी केंद्र द्वारा लागू की गई योजनाएं राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करती हैं और अलग-अलग स्थानीय स्वास्थ्य ज़रूरतों का ध्यान रखने में नाकाम रहती हैं। केंद्र सरकार का यह रुख केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के प्रयासों को कमजोर करता है, जहाँ लगातार बढ़ते सार्वजनिक निवेश से बेहतर स्वास्थ्य नतीजे मिले हैं।

यह भी ध्यान देने की बात है कि स्वास्थ्य के नतीजे पोषण, रोज़गार, आवास, साफ़-सफ़ाई, पर्यावरण और भेदभाव से आज़ादी जैसे बड़े सामाजिक कारकों से अलग नहीं किए जा सकते। देश के विभिन्न हिस्सों और तबकों में भारी आर्थिक असमानता का सबसे ज्यादा स्वास्थ्यगत प्रभाव सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों विशेषकर आदिवासियों और दलितों पर पड़ता है।

इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए नीतियों में बदलाव की जरूरत है, जिसके तहत स्वास्थ्य देखभाल को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने और जीडीपी  का कम से कम 5 प्रतिशत सार्वजनिक खर्च करने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए और सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित और सार्वजनिक रूप से चलाई जाने वाली स्वास्थ्य प्रणाली  को मजबूत करना, सार्वजनिक क्षेत्र में दवाओं के उत्पादन को फिर से शुरू करना, निजी अस्पतालों को विनियमित करना और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की आड़ में किए जा रहे निजीकरण को खत्म करना, सस्ती दवाएं सुनिश्चित करना, खाद्य सुरक्षा और पोषण को मजबूत करना जरूरी है।

स्वास्थ्य को हमारी राजनीति का एक बड़ा और प्रमुख मुद्दा बनाया जाना चाहिए, ताकि एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जनोन्मुख सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को हासिल किया जा सके।

*(टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

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