अस्तित्व ‘संकट’ के बीच पारिवारिक एकता,अपनी सत्ता सदा बनी रहें यहीं नेता देखता।यहां कोई न स्थायी दोस्त ना ही कोई दुश्मन, इस कुर्सी के लिए होते रहते बेमेल गठबंधन।संभावना, चुनौतियों में अवसरों की बुनियाद,ये एक और एक ग्यारह होंगे करते फरियाद।अभी-भी दो परिवारों का हो रहा यह मिलन,भई, बिना बरसात के इसमें आई थी सीलन।कुनबों में बिखराव कहानी अलग-अलग रही,क्योंकि, रिश्तों में भी खूब जम गया था दही।दिल भले मिले ना मिले ‘दल से बल’ ही मिले,अद्भुत संभावनाओं से ‘चेहरे’ ज़रूर हैं खिलें।(संदर्भ-महाराष्ट्र चुनाव में पारिवारिक एकता का राग)संजय एम तराणेकर(कवि, लेखक व समीक्षक)इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)मो. 98260 25986(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित) View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन MP के राजगढ़ में 8 साल की ‘छोटी शेरनी’ बनी भाई की ढाल, आवारा कुत्ते से भिड़कर मासूम की बचाई जान इंदौर पुलिस ने चाइनीज मांझे पर कसा शिकंजा: तीन दिन में तीन आरोपी गिरफ्तार, प्रतिबंधित डोर जब्त