(आलेख : सवेरा, अनुवाद : संजय पराते)

संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत एक अजीब, लेकिन हैरान न करने वाले संयोग से हुई। मोदी सरकार ने ‘वंदे मातरम’ पर लंबी चर्चा करने का फैसला किया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और सरकार के दूसरे लोगों ने राष्ट्रीय गीत से प्रेरित स्वतंत्रता सेनानियों के राष्ट्रवाद और बलिदान की खूब तारीफ की। इसके कुछ दिनों बाद ही, मोदी मंत्रिमंडल ने घोषणा की कि बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी जाएगी, जो अभी 74 प्रतिशत है। देशभक्ति पर लंबे-लंबे भाषण देने से ज़्यादा पाखंड और कुछ नहीं हो सकता, यदि आप एक के बाद एक मुनाफ़ा कमाने वाले क्षेत्र को विदेशी कंपनियों को सौंपकर देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहे हैं। लेकिन फिर भी, मोदी सरकार बहुराष्ट्रीय पूंजी की सेवा करने में कोई शर्म महसूस नहीं करती। अपने 11 साल से ज़्यादा के शासन में, मोदी ने पेंशन, संपत्ति पुनर्निर्माण, प्रसारण, फार्मास्यूटिकल्स, एकल ब्रांड खुदरा व्यापार, निर्माण और विकास, ऊर्जा, ई-व्यापार, वाणिज्य, कोयला खनन, डिजिटल मीडिया, नागरिक उड्डयन, रक्षा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, दूरसंचार और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए ज़्यादा से ज़्यादा खोल दिया है। फिर भी, 8 दिसंबर को, मोदी और शाह गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम (जिसमें उनके गुरु संगठन आरएसएस ने हिस्सा नहीं लिया था) की बात कर रहे थे और उसमें जिस तरह से वंदे मातरम देशभक्ति की भावना का प्रतीक बन गया था, उसकी प्रशस्ति गा रहे थे। इस दौरान, वे दोनों अपने पसंदीदा विषय पर आ गए — कांग्रेस को दोष देना — खासकर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को। दस्तावेजों में अच्छी तरह से दर्ज तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए, मोदी ने आरोप लगाया कि नेहरू ने मुसलमानों को खुश करने के लिए पूरे गीत के सिर्फ़ दो छंद रखने का फैसला किया, जिससे एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हुई, जो देश के बंटवारे का कारण बनी।

भाजपा आखिर राष्ट्रीय गीत पर चर्चा क्यों करना चाहती थी? और, इसका इस्तेमाल नेहरू को दोष देने के लिए क्यों किया गया? इन सवालों के जवाब के लिए, आइए थोड़ा और गहराई में जाते हैं।

वंदे मातरम का संक्षिप्त इतिहास

असल में, बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 के आस-पास सिर्फ़ दो छंद लिखे थे। यह अप्रकाशित रहा और इसके बारे में शायद ही कोई जानता था। बंकिम चंद्र ने इस गीत को और बढ़ाया और इसे अपने मशहूर उपन्यास आनंद मठ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ था। अपने विस्तारित रूप में इस गीत में एक नई हिंदू छवि आ गई थी और इसमें भारत माता को कई हाथों वाली देवी के रूप में दिखाया गया था, जिनके हाथों में हथियार वगैरह थे। इसे सबसे पहले रवींद्रनाथ टैगोर ने लोकप्रिय बनाया, जिन्होंने इसे इसका मौजूदा संगीत रूप दिया। टैगोर ने लिखा है कि उन्होंने इसे पहली बार 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से गाया था।

1905 में बंगाल के विभाजन के बाद 1907-08 के स्वदेशी आंदोलन में, इस गीत का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया, जिसमें टैगोर ने एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए इसे गाया था। इसके बाद, यह कई राज्यों में फैल गया, सभी भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया, और यह आज़ादी की लड़ाई का एक अहम हिस्सा बन गया। सभी के अनुसार, इसके पहले दो छंद ही लोकप्रिय रूप से गाए जाते थे, और “वंदे मातरम!” का नारा एक युद्धघोष या अभिवादन, या यहां तक कि अंग्रेजों पर एक ताना तक बन गया था। जहाँ कांग्रेस इसका नियमित रूप से इस्तेमाल करती थी, वहीं बाद के वर्षों में हिंदू महासभा के नेतृत्व वाली हिंदुत्व लॉबी ने इसकी हिंदू व्याख्या को महत्व दिया — सुंदर, हथियारों से लैस देवी, जो भारत माता थीं।

आनंद मठ 1770 के संन्यासी विद्रोह पर आधारित एक कहानी थी, जिसमें बंकिम चंद्र ने हिंदू उग्रवादी भावना भरी थी। उसी के अनुसार उन्होंने विस्तारित गाने को भी ढाला था। जहाँ पहले दो छंद उदार भूमि, फूलों, बहते पानी, ठंडी हवाओं और फसलों का वर्णन करते हैं, वहीं बाद के छंद माँ को दुर्गा, देवी के रूप में, युद्ध के दस हथियार पकड़े हुए, आदि के रूप में पूजते हैं। इसकी लोकप्रियता हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथी तत्वों के बीच बढ़ती दुश्मनी और तनाव के साथ बढ़ी, जहां दोनों ही समुदाय अपने-अपने तरीकों से स्वतंत्रता संग्राम को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। और जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम गीत को विवाद का मुद्दा बना लिया, और बार-बार यह बताया कि यह मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इसमें मूर्ति पूजा की छवि है। यह विचार मुसलमानों के बीच व्यापक रूप से फैल गया। हैरानी की बात नहीं है कि अंग्रेज इस बात से खुश थे कि दोनों समुदायों के बीच कड़वाहट बढ़ रही है और उन्होंने अपने अधिकारियों को यहां तक सलाह दी कि वे वंदे मातरम गाने के साथ जुड़े विवादों में दखल न दें।

संसद में अपने भाषण में मोदी ने यह कहते हुए गलत जानकारी दी कि जिन्ना ने 15 अक्टूबर, 1937 को इस गीत के विरोध में एक पत्र लिखा था और नेहरू ने “पांच दिनों के अंदर” नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखा कि वे जिन्ना से सहमत हैं कि मुसलमान इस गीत से विचलित हैं। इसके बाद, मोदी के अनुसार, 26 अक्टूबर को कोलकाता में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में पहले दो छंदों को छोड़कर बाकी सभी को हटाने का फैसला किया गया। यह सच से बहुत दूर है, जैसा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों में विस्तार से दर्ज है।

अक्टूबर 1937 में, नेहरू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘वंदे मातरम के खिलाफ मौजूदा चिल्ल-पों’ के बारे में लिखा, जिसमें कहा गया था कि यह ‘काफी हद तक सांप्रदायिक लोगों द्वारा गढ़ा गया है। साथ ही, इसमें कुछ सच्चाई भी लगती है और जो लोग सांप्रदायिक सोच वाले थे, वे इससे प्रभावित हुए हैं। हम जो कुछ भी करें, वह सांप्रदायिक भावनाओं को बढ़ावा देने के लिए नहीं होना चाहिए, बल्कि जहां असली शिकायतें हैं, उन्हें दूर करने के लिए होना चाहिए।’ (इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य की किताब “वंदे मातरम – द बायोग्राफी ऑफ ए सॉन्ग” में उद्धृत ; पेंगुइन ; 2003 ; पृष्ठ 31) राजेंद्र प्रसाद ने भी सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में इस बात का जिक्र किया था। सुभाष चंद्र बोस इस मुद्दे पर चिंतित थे और उन्होंने नेहरू को लिखा, जिसका जवाब नेहरू ने 20 अक्टूबर, 1937 को देते हुए कहा कि आनंदमठ पढ़ने के बाद “ऐसा लगता है कि यह पृष्ठभूमि मुस्लिमों को उत्तेजित करती लगती है।” उन्होंने यह भी कहा कि गीत के बोल समझना बहुत मुश्किल है। आखिरकार नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस से कहा कि वह इस मामले पर रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह लें।

टैगोर ने नेहरू को जवाब में लिखा कि पहले दो छंद तो स्वीकार्य हैं, लेकिन बाकी नहीं। वह लिखते हैं : “मैं यह मानता हूँ कि बंकिम की ‘वंदे मातरम’ कविता, जब उसके संदर्भ के साथ पढ़ी जाती है, तो उसकी ऐसी व्याख्या की जा सकती है, जिससे मुस्लिमों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती है। लेकिन एक राष्ट्रीय गीत, भले ही वह उससे लिया गया हो, जो अपने आप मूल कविता के पहले दो छंदों तक सीमित हो गया है, उसे हर बार पूरी कविता की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है, और न ही उस कहानी की, जिससे वह गलती से जुड़ गया था। इसने अपनी एक अलग पहचान और प्रेरणादायक महत्व हासिल कर लिया है, जिसमें मुझे किसी भी पंथ या समुदाय को ठेस पहुँचाने वाली कोई बात नज़र नहीं आती।” (वही, पृष्ठ 34)

सबसे बड़ी अथॉरिटी – गुरुदेव टैगोर – की इस सलाह के आधार पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने फैसला किया कि पहले दो छंद ‘राष्ट्रीय सभाओं’ में गाए जाएंगे। इसने प्रस्तुत की गई रचनाओं में से विकल्प चुनने के लिए एक उप समिति भी बनाई, जिसमें अबुल कलाम आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष बोस और नरेंद्र देव शामिल थे, और साथ ही यह शर्त भी रखी गई कि यह समिति रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह लेगी।

इस तरह, यह आरोप कि नेहरू ने जिन्ना के दबाव में बाकी छंदों को हटा दिया था, आरएसएस और मोदी की मनगढ़ंत कहानी है। यह आज़ादी की लड़ाई के दिग्गजों की सोची-समझी राय थी, और इसका मकसद आज़ादी की लड़ाई के नाज़ुक मोड़ पर लोगों के बीच अधिकतम संभव एकता बनाना था। बाद में, जैसा कि हम सब जानते हैं, संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया।

आरएसएस/भाजपा की षड्यंत्रकारी योजना

मोदी सरकार के संसद में वंदे मातरम पर बहस कराने के फैसले के पीछे तीन मुख्य कारण थे, ऊपरी तौर पर इसकी 150वीं सालगिरह मनाने के लिए, हालांकि किसी को यह अधिकृत जानकारी नहीं है कि यह कब लिखा गया था। पहला, बंगाल, जहां चुनाव होने वाले हैं, में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भड़काने के लिए बंकिम चंद्र और वंदे मातरम का इस्तेमाल करना और लेखक और उनके मशहूर गीत को सनातनी-राष्ट्रवादी सोच के प्रतीक के तौर पर पेश करना ; दूसरा, पूरे देश में आरएसएस की जहरीली विचारधारा फैलाने के लिए और खुद को आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा दिखाने के लिए भी ऐसा ही करना ; और तीसरा, लोगों का ध्यान उस आर्थिक संकट और सरकार की नाकामियों से हटाना, जिनमें सरकार फंसी हुई है।

बहरहाल, संसद की बहस में कई सदस्यों और मीडिया की टिप्पणियों में भी जो बातें सामने आईं, उनसे साफ पता चलता है कि प्रधानमंत्री खुद “सच को छिपाने” के दोषी थे, जैसा कि इतिहासकार मृदुला मुखर्जी ने ‘द वायर’ को दिए एक इंटरव्यू में विनम्रता से कहा है। यह बेतुका दावा कि दो छंदों को हटाने से तुष्टीकरण की नीति शुरू हुई, जिससे बंटवारा हुआ, इसे सभी लोग हास्यास्पद मानते हैं। असल में, मोदी-शाह द्वारा गढ़ी गई पूरी कहानी आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े नेताओं और इस तरह आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले लाखों लोगों का अपमान है। एक ऐसे संगठन के सदस्यों द्वारा, जिसने कभी आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया, और सच तो यह है कि जानबूझकर मुख्यधारा से दूर रहा, और जिसे आखिरकार महात्मा गांधी की हत्या में संदिग्ध भूमिका के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया था, स्वतंत्रता सेनानियों और भारत के लोगों के अनगिनत बलिदानों का ज़िक्र करना, यह सरासर धोखा है — और ज़्यादातर लोग इसे इसी तरह देखते हैं।

बंगाल विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा की बेचैनी पिछले कई सालों से साफ़ दिख रही है, खासकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ नफ़रत फैलाने की उसकी घटिया कोशिशों में, धार्मिक त्योहारों पर कब्ज़ा करने में, और एक ऐसी भूमि पर सनातनी ‘संस्कृति’ थोपने की उसकी बेवकूफी भरी कोशिशों में, जिसकी अपनी एक बहुत ज़्यादा समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक समझ है। बंकिम चंद्र – मोदी के लिए ‘बंकिम दा’ और उनके चेलों के लिए बंकिम दास! – का इस्तेमाल अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए करना, और इस प्रक्रिया में खुद गुरुदेव टैगोर को चुनौती देना, उसी बेचैनी की निशानी है, साथ ही उनकी पूरी तरह से नाकामी की भी निशानी है।

इसमें कोई शक नहीं कि देश का ध्यान अपनी विनाशकारी आर्थिक नीतियों से हटाने की खतरनाक कोशिश के बारे में, यह बुरी तरह नाकाम रही है। कोई भी भारतीय, आरएसएस सदस्यों और व्हाट्सएप की शिक्षाओं से पाले-पोसे गए अंधभक्तों को छोड़कर, देश की संप्रभुता को बहुराष्ट्रीय पूंजी के हाथों धीरे-धीरे गिरवी रखने, रक्षा सौदों में अमेरिका और इज़राइल के साथ बढ़ते रिश्तों, सार्वजनिक क्षेत्र को खोखला करने, भारत के मज़दूरों को, जितना हो सके, सस्ते में बेचने के लिए बनाई गई नई श्रम संहिताओं से मज़दूर वर्ग को कुचलने, लाखों युवाओं के लिए हज़ार टुकड़ों में मौत की तरह काम कर रही बढ़ती बेरोज़गारी, मनरेगा की जगह प्रस्तावित विकसित भारत — जी राम जी बिल, और निजीकरण के कारण आम आदमी की पहुंच से बाहर होती शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की लगातार बदहाली को स्वीकार नहीं कर सकता।

केंद्र में भाजपा सरकार और उसकी राज्य सरकारें देश के सभी हिस्सों में और सभी तबकों के लोगों में बढ़ते असंतोष का सामना कर रही हैं। इवेंट मैनेजमेंट की कितनी भी काबिलियत या वैचारिक चालबाजियां आने वाले सालों में उन्हें बचा नहीं पाएंगी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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