कर्मयोगी लेखक, वरिष्ठ पत्रकार…. इंदौर से प्रदीप चौधरी। ऋषिकेश से करीब 40 किलोमीटर दूर, टिहरी गढ़वाल की तलहटी में बसा छोटा-सा गाँव सिंगथाली। यहाँ गंगा की लहरें जैसे कोई प्राचीन मंत्र गुनगुनाती हैं। पिछले दिनों यही लहरें सैकड़ों विदेशी साधकों को अपनी ओर खींच लाईं। ब्रिटेन, अमेरिका, इंडोनेशिया, ईरान, ताइवान, चीन और हैरानी की बात—पाकिस्तान तक से आए योग जिज्ञासु यहाँ डेरा डाले हुए थे। सुबह सूर्योदय से पहले ही ताँबे-चाँदी के लोटों में गंगाजल भरकर सूर्य को अर्घ्य देने का क्रम शुरू हो जाता और घंटों चलता। कोई एकाग्रता की साधना कर रहा था, तो कोई जल-ध्यान में डूबा था। गंगा के बीच धारा में खड़े एक दिव्य योगी को देखकर सभी साधक स्तब्ध रह जाते। उनके साथ हमेशा परछाईं की तरह मौजूद रहते हैं एक ब्रिटिश साधक। ये हैं बेंगलुरु स्थित अक्षर योग केंद्र के संस्थापक और विश्व प्रसिद्ध योग गुरु हिमालय सिद्ध अक्षर। पिछले कुछ वर्षों में आधा दर्जन से ज्यादा विश्व रिकॉर्ड (गिनीज व लिम्का दोनों) अपने नाम कर चुके इस कर्मयोगी के अनुयायी अब दुनिया भर में फैल रहे हैं। View this post on Instagram साम्यवादी चीन का युवा, लोकतांत्रिक ताइवान की युवती, कट्टर इस्लामी पृष्ठभूमि से आए ईरानी और पाकिस्तानी साधक—सब एक ही पंक्ति में सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे। यह दृश्य देखकर लगता है कि योग वह एकमात्र भाषा है जो सीमाएँ, धर्म और विचारधाराएँ नहीं देखती। इस 15 दिन के रिट्रीट में शामिल लोगों में हर उम्र और हर पृष्ठभूमि के साधक थे—नवविवाहित जोड़े, पूरा परिवार लेकर आए लोग, प्रेमी युगल, तलाक के बाद खुद को फिर से खोजती युवतियाँ और सबसे हैरान करने वाली—70 साल की एक चीनी महिला, जो हर सुबह सबसे पहले गंगा में उतरती थीं। ये लोग सिर्फ़ आसन-प्राणायाम ही नहीं सीख रहे थे। ये उत्तराखंड की लोक-संस्कृति में भी रम गए। मंडुए का डोसा, अरसे, स्वाले, आलू-मूली की थिचौड़ी और गुड़ की मिठास—इन स्वादों ने इटैलियन पास्ता और चाइनीज डिमसम को भुला दिया। शाम को गंगा घाट पर होने वाली आरती इनके लिए त्योहार बन जाती। पहाड़ों के बीच जल्दी डूबते सूरज के बाद जब सैकड़ों दीपों की माला जलती, तो ये विदेशी मेहमान मंत्रमुग्ध होकर तालियाँ बजाते और फिर अपनी साधना में डूब जाते। हिमालय सिद्ध अक्षर कहते हैं—“संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलने के बाद योग की स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन असल कारण है आज का इंसान। वह मशीनी जीवन से थक चुका है। वह जान गया है कि दवाइयों से शरीर ठीक हो सकता है, पर मन का प्रदूषण सिर्फ़ योग धो सकता है।” इन साधकों ने देवप्रयाग भी जाकर पूरे दिन संगम पर जल-साधना की। वापस लौटते वक्त उनके चेहरे पर वही भाव थे जो किसी तीर्थयात्री के लौटते वक्त होते हैं—शांति, कृतज्ञता और एक अजीब-सी चमक। वह विडंबना भी साफ़ दिखी—जिस भौतिकता को ये विदेशी छोड़कर भारत आ रहे हैं, उसी के पीछे हम भारतीय भाग रहे हैं। शायद यही वजह है कि गंगा का यह छोटा-सा गाँव आज दुनिया को बता रहा है कि सच्चा सुख बाहर नहीं, भीतर छिपा है। और जब ये साधक अपने-अपने देश लौटेंगे, तो साथ ले जाएँगे गंगा का एक कण, हिमालय की एक साँस और भारत की उस प्राचीन संस्कृति का एक टुकड़ा—जो कभी सीमाओं में नहीं बँधी। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन जो अमेरिका से करें प्यार, वे डॉलर से कैसे करें इंकार! उज्जैन : खेत से 12 बबूल के हरे पेड़ काटकर ट्रैक्टर में भर ले जाने वाले चार शातिर चोर पुलिस के हत्थे चढ़े, ६.८० लाख का माल जप्त, सभी आरोपी जेल रवाना