1. राजनाथ से माफ़ी की मांग, ये तो नाइंसाफ़ी है यारो! : राजेंद्र शर्मा देखा-देखा, विपक्ष वालों का नकलचीपन देखा! कह रहे हैं कि राजनाथ सिंह को देश के पहले प्रधानमंत्री, नेहरू जी के बारे में झूठ बोलने के लिए माफी मांगनी चाहिए। अब बताइए, अपने विरोधियों से माफी मांगने की मांग करना, भगवा पार्टी की खास निशानी है या नहीं? विपक्ष वाले मुंंह बाद में खोलते हैं, मामला चाहे अडानी हो या चुनाव आयोग का हो, आरएसएस का हो या सावरकर का हो और अगर मोदी का हो तब तो कहना ही क्या, कोई संबित पात्रा या कोई किरण रिजिजू या कोई रविशंकर प्रसाद, राहुल गांधी माफी मांगो की मांग करने पहले सामने आ जाता है। विपक्ष वाले इतनी बेशर्मी से कैसे भगवा पार्टी का ट्रेड मार्क चुरा सकते हैं और भगवा पार्टी की मांग का तीर, उसी पर चला सकते हैं? माना कि भगवा पार्टी वालों ने विरोधियों से माफी की मांग करने के दांव का पेटेंट अपने नाम नहीं कराया था। कराना चाहिए था। अपने इस नायाब आविष्कार को उन्हें पेटेंट कराना चाहिए था। आपका दांव कोई दूसरा आप पर ही नहीं आजमा सके, इसी के लिए तो पेटेंट कराना जरूरी था। लेकिन, क्या पेटेंट ही सब कुछ है? नैतिकता कोई चीज नहीं है? सारी दुनिया को पता है कि विरोधियों से माफी मांगने की मांग करना, किस का आविष्कार है। सब जानते हैं कि भगवा पार्टी वाले अपने इस आविष्कार का किस तरह रोज-रोज इस्तेमाल करते रहे हैं। सब जानते हैं कि भगवा पार्टी वाले अपने जिंदा विरोधियों पर ही नहीं, दिवंगत विरोधियों तक पर यह हथियार चलाते आए हैं, जैसे सबसे ज्यादा मौकों पर जवाहरलाल नेहरू पर और उससे थोड़ा कम इंदिरा गांधी, राजीव गांधी वगैरह पर भी। पेटेंट उनके नाम हो न हो, पर परंपरा से इस्तेमाल करते आने से तो माफी मंगवाने पर भगवा पार्टी का अधिकार बनता ही है। फिर विरोधी किस मुंह से राजनाथ सिंह से माफी की मांग कर रहे हैं? सच पूछिए तो राजनाथ सिंह से विरोधियों का माफी की मांग करना तो और भी गलत है। कहने वाले कहते हैं कि वह नाम के ही रक्षा मंत्री हैं। वर्ना रक्षा तो वह खुद अपनी नहीं कर पा रहे हैं और हर रोज मार्गदर्शक मंडल की ओर एकाध-कदम खिसक ही जाते हैं। इससे बचने के चक्कर में वह पार्टी और सरकार में किसी के मांगे बिना भी, परमानेंटली माफी मांगने की मुद्रा में ही रहते हैं। पर कोई पैंतरा काम नहीं कर रहा ; नेहरू के लिए माफी मांगने की मांग करना भी। लेकिन, क्या इसीलिए विरोधियों को राजनाथ सिंह के प्रति थोड़ा ज्यादा उदार नहीं होना चाहिए? जब घर में ही उनकी स्थायी मुद्रा माफी मांगने की है, तो क्या विरोधियों को इससे कुछ अलग नहीं करना चाहिए? अन्याय कहीं भी हो, विरोधियों का उसका विरोध करना तो बनता है। विरोधी, इस मामले में विरोध का अपना धर्म कैसे भूल सकते हैं? फिर राजनाथ सिंह से विरोधी माफी की मांग किसलिए रहे हैं? कह रहे हैं कि राजनाथ सिंह ने यह झूठ बोला है कि जवाहरलाल नेहरू, सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे। सरदार पटेल ने ऐसा नहीं होने दिया। इससे खिसियाकर नेहरू जी ने सोमनाथ के मंदिर के निर्माण के लिए पैसा देने से मना कर दिया, वगैरह। यह सरासर गलत है, बल्कि झूठ है। और तो और विरोधी, सरदार की बेटी मणिबेन डायरी के पन्ने निकाल लाए हैं और उसे राजनाथ सिंह की बात के झूठ होने का सबूत बता रहे हैं। बेशक, मणिबेन ने अपनी डायरी में जो लिखा है, वह झूठ क्यों होने लगा? जरूर तब वही हुआ होगा, जो मणिबेन ने डायरी में लिखा है। न नेहरू जी ने सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद बनाने चाही होगी और न सरदार पटेल ने उसका विरोध किया होगा। माना कि सरदार पटेल बहुत बार नेहरू जी का विरोध करते थे, पर सरदार भी विरोध तो तभी कर सकते थे, जब नेहरू जी बाबरी मस्जिद बनाना चाहते होते। लेकिन, इतने भर के लिए राजनाथ सिंह की बात को झूठा कहना, सही है क्या? असल में ऐसे मामलों को झूठ और सच के खानों में बांटकर देखना ही गलत है। और इस तरह की भौतिकवादी दलीलों के पीछे भागना तो और भी गलत है कि सरदार ने अपने जीते-जी तो किसी को बाबरी मस्जिद गिराने नहीं दी थी। और जब मस्जिद साबुत खड़ी थी, तो नेहरू जी सरकारी पैसे से उसे बनवाने की सोचते भी तो कैसे? सरदार पटेल 1950 में परलोक सिधार गए और नेहरू जी 1964 में। उनका सच उनके साथ चला गया। अब हम क्या 1950 के सच पर ही अटके रहेंगे या मणिबेन ने जो सच बताया उस पर? पचहत्तर साल में गंगा-जमुना में बहुत पानी बह चुका है। इस दौरान बहुत कुछ हो चुका है। आडवाणी की रथयात्रा भी हो चुकी है और मस्जिद को भीड़ जुटाकर गिराया भी चुका है। अदालत के फैसले के नाम पर, मंदिर वहीं बनाया भी जा चुका है और अभी पिछले ही दिनों, मंदिर पर मोदी द्वारा झंडा भी फहराया जा चुका है। 1950 का सच अलग था, 2025 का सच अलग है! 1950 में जहां मस्जिद थी, 2025 में वहीं मंदिर है, इससे अलग और नया सच क्या होगा? और जब सब नया है, तो नेहरू और पटेल के बीच बहस का सच, नया और मणिबेन की डायरी वाले सच से डिफरेंट क्यों नहीं हो सकता? तब का सच जो था सो था, आज का सच यही है कि जवाहरलाल नेहरू सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे और सरदार पटेल ने उन्हें ऐसा करने से रोका था! और अगर वाकई विरोधी इसे झूठ मानते हैं तो एफीडेविट देकर कहें कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद, जवाहरलाल नेहरू सरकारी पैसे से मस्जिद दोबारा नहीं बनवाते या सरदार पटेल उन्हें ऐसा करने से नहीं रोकते! राजनाथ सिंह ने जो कहा है, उसमें झूठ नहीं है, बस अपनी कल्पना के सहारे उन्होंने सच की जरा सी अपडेटिंग की है; सच को अमृतकालीकरण किया है। राजनाथ सिंह सच का अमृतकालीकरण नहीं करते थे, तो 6 दिसंबर को शौर्य दिवस कैसे मनाते? राजस्थान के शिक्षा मंत्री को 2025 में भी स्कूलों में बच्चों से शौर्य दिवस नहीं मनवाने दिया, तो इसका मतलब यह थोड़े ही है कि राजनाथ सिंह भी शौर्य दिवस नहीं मनाएंगे। आखिर, अपने झंडारोहण वाले भाषण में 6 दिसंबर के शौर्य का यशोगान तो मोदी जी ने भी किया हीथा। राजनाथ सिंह ने तो उनका अनुसरण ही किया है, बस शौर्य दिवस में जरा सा नेहरू जी के मस्जिद-समर्थन का तड़का लगाया है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।) यह बात सिरे से ग़लत है कि डालर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक रूप से गिरा है। बिलकुल नहीं गिरा है। मुझे कोई बताए कि 2014 के बाद रुपया चढ़ा कब था, जो गिरता? जो चढ़ेगा, चढ़ने की कोशिश करेगा, वही तो गिरेगा। जिसने ऐसी बदतमीजी की ही नहीं, वह गिरेगा कैसे? बैठे-बैठे, लेटे-लेटे गिर जाएगा? थोड़ा दिमाग लगाया करो भाईयों-बहनों। मोदी जी का मज़ाक़ उड़ाने के लिए बात को ठीक से समझे बगैर ले उड़ते हो! जो रुपया, गिरने का आनंद पिछले ग्यारह साल से मुसलसल उठा रहा है, वह गिरेगा कहां! जमीन पर ही न! इससे नीचे तो वह गिर नहीं सकता। वह रुपया है। गिरने के बाद भी उसकी इतनी इज्ज़त है कि उसके गिरने की चर्चा होती है। हिंदुस्तानी आदमी का दिल दुखता है। रुपया मोदी जी, शाह जी, राजनाथ जी, आदित्यनाथ जी नहीं है, जिनके लिए गिरना दैनिक कर्म का दर्जा हासिल कर चुका है। ये तो नई से नई , अनजानी से अनजानी निचाई तक गिरने के लिए सदा तैयार रहते हैं। मौका न हो, तो भी आपदा को अवसर बनाकर गिरने का मौका ढूंढ लेते हैं। कीचड़ में गिर पड़ते हैं।चुल्लू भर पानी में गिर जाते हैं।नाली में गिरने से मन नहीं भरता, तो नाले में गिर पड़ते हैं।गड्ढा खोदकर, कुआं खोदकर उसमें गिर जाते हैं। गिरने का इन्हें इतना शौक है कि ये पाताल में गिर जाते हैं और फिर पाताल के भी पाताल में गिरने की कोशिश करते हैं। रुपए की अपनी हैसियत है, मगर इन जैसी नहीं कि गिरने के लिए गंदी से गंदी जगह ढूंढे। वह जमीन पर गिरता है और अगर जमीन ही धंस जाए, तो रुपया भी क्या करे!यही हुआ है। रुपया बेबस है। और किसी की बेबसी का मज़ाक़ उड़ाना भारतीय संस्कृति में मना है! जब डालर के मुकाबले रुपया 90 से भी कम गिरा था, तब कहा गया था कि गिरावट ऐतिहासिक है, अब 90 से भी ज्यादा ऊंचाई से गिरा है, तो भी कहा जा रहा है कि गिरावट ऐतिहासिक है। इस काल में जो भी गिरता है, ऐतिहासिक रूप से गिरता है। इससे कम में गिरना किसी को पसंद ही नहीं ! नान बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री की गिरावट हमेशा ऐतिहासिक होती है। उनके भाषणों, उनकी विदेश यात्राओं, उनके उद्घाटनों में यह गिरावट साफ पानी की तरह नज़र आती है। अब तो भक्तों को भी उनके नाक, कान, मुंह, दांत, आंत में ऐतिहासिक गिरावट दिखाई देने लगी है। उन्होंने नोटबंदी की, वह ऐतिहासिक थी। कोराना काल ऐतिहासिक था। करोड़ों लोगों का आजादी के बाद पहली बार पुलिस की मार खाते हुए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना, ऐतिहासिक था। आक्सीजन के अभाव में कोरोना के दौरान मरीजों का मरते चले जाना ऐतिहासिक था।उनके शवों के अंतिम संस्कार के लिए धन के अभाव में गंगा किनारे दफ्न कर आना, ऐतिहासिक था। मोदी युग में इतिहास ही वर्तमान है। इनका हर मंत्री, हर सांसद, हर विधायक और हर कार्यकर्ता स्वत:स्फूर्त इतिहासकार है।व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से एंटायर हिस्टारिकल साइंस में एम ए, पीएचडी है। कुछ तो डी लिट हैं। ये उस इतिहास की बातें करते हैं, जो इतिहास की किताबों में नहीं मिलता। इनकी पाठ्य-पुस्तकों में भी कभी मिलता है, तो कभी नहीं मिलता! रुपए ने भी इनकी देखा-देखी इतिहास से अपना रिश्ता जोड़ लिया है। भारत के मौद्रिक इतिहास में रुपया गिरावट के कारण विशिष्ट जगह बना चुका है। रास्ते दोनों के अलग हैं, मगर लक्ष्य एक है — भारत की जितनी और जिस तरह भी हो सके, ऐसी-तैसी करना और देशभक्ति का तमगा गले में धारण करना, ताकि सबको साफ-साफ दिखाई दे! फिर भी न दिखे, तो इसे उसी तरह दिखाना, जिस तरह मुसलमानों से जयश्री राम बुलवाया जाता है! रुपए को इस बीच उठाने की कोशिश किसी ने नहीं की और उसकी भी इच्छा उठने की नहीं हुई। उसे मालूम है कि इस समय मनुष्य हो या रुपया, गिरने में ही उसका भविष्य है। उठने में खतरा है। हिंदू धर्म पर खतरा है, मोदी सरकार के भविष्य पर खतरा है। ट्रंप या अमेरिकी प्रशासन का कोई ऐरा-गैरा अधिकारी भी यह कह सकता है कि रुपये को उठाया नहीं जा रहा, डालर को गिराया जा रहा है। अतः इसका सिर कलम कर दिया जाना चाहिए। और वाशिंगटन में ट्रंप साहब के अगले दिन जागने और ब्रश करने से पहले रुपए का सिर कलम कर दिया जाता है। रुपया मोदी जी के लिए संकट पैदा करना नहीं चाहता। ट्रंप-मोदी संबंधों में दरार पैदा करना नहीं चाहता। वह मोदी जी के प्रति प्रतिबद्ध है, संबंद्ध है, आबद्ध है। रुपया होशियार है। वह दो कदम आगे चलता है। उसने भांप लिया है कि कल ये प्रधानमंत्री ब्रिटेन के सामने भी गिरा पड़ा मिल सकता है, तो वह पौंड के आगे भी झुक गया। यूरो के सामने भी नतमस्तक हो गया। जापान के येन के सामने भी झुका हुआ है। फिर उसने सोचा कि जरूरी है कि प्रधानमंत्री जहां झुकें या जहां झुक सकते हैं, केवल वहीं वह झुके! वह एशिया की मुद्राओं के आगे भी झुक गया है। गर्व का विषय यह है कि अभी तक वह पाकिस्तानी रुपए के आगे नहीं झुका है। इस पर ताली-थाली बजाना चाहिए, वरना मोदी जी को इसके लिए आह्वान करना पड़ जाएगा! (कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।) View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन बुंदेलखंड धरा है हीरों और महावीरों की : मुख्यमंत्री पुलिस द्वारा रास्ता रोककर टैक्स माँगने वाले फरार आरोपियों को किया गया गिरफ्तार।