बिहार सहित १२ राज्यों की मतदाता सूची पर संकट

नई दिल्ली | २१ नवंबर २०२५

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) अभियान पर कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि इस प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी या अवैधता पाई गई तो पूरा अभियान रद्द कर दिया जाएगा। कोर्ट का यह आदेश सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के १२ राज्यों में चल रहे SIR पर लागू होगा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रतिनिधित्व ऑफ द पीपल एक्ट-१९५० में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ का कोई प्रावधान ही नहीं है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि बिहार में ६.५ करोड़ मतदाताओं में से ६५ लाख नाम बिना ठोस आधार के हटाए गए हैं, जबकि १.३२ करोड़ नए नाम संदिग्ध तरीके से जोड़े गए हैं। कई जीवित लोगों को ‘मृत’ दिखाया गया और लाखों डुप्लीकेट वोटर अभी भी सूची में मौजूद हैं।

कोर्ट के प्रमुख आदेश

  • आधार कार्ड, राशन कार्ड और पुराना वोटर आईडी मान्य दस्तावेज रहेंगे
  • हटाए गए ६५ लाख नामों की बूथ-वार, जिला-वार खोज योग्य सूची सार्वजनिक की जाए
  • आपत्ति दर्ज करने की अंतिम तारीख बढ़ाई गई
  • राजनीतिक दलों के बूथ एजेंटों को सहायता का अधिकार
  • अगर प्रक्रिया असंवैधानिक पाई गई तो पूरा SIR रद्द

जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉय माल्या बागची की पीठ ने कहा, “चुनाव आयोग कानून से ऊपर नहीं है।” कोर्ट ने १९७७ के एम.एस. गिल केस और १९९५ के लाल बाबू हुसैन केस का हवाला देते हुए नागरिकता साबित करने का बोझ आयोग पर डाला।

विपक्ष का हमला, सत्ता पक्ष का बचाव

राजद नेता तेजस्वी यादव ने इसे “लोकतंत्र की हत्या” करार दिया। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने करोड़ों गरीब-वंचित मतदाताओं को बचाया।” तमिलनाडु में डीएमके और केरल में वाम मोर्चा ने भी SIR को “नागरिकता जांच का बहाना” बताया। दूसरी ओर बीजेपी ने कहा कि कोर्ट ने प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई, सिर्फ पारदर्शिता बढ़ाने को कहा है।

अब तक का हाल

  • बिहार में ४५% से ज्यादा पुनरीक्षण पूरा
  • १२ राज्यों में अभियान चल रहा है
  • तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल की याचिकाएं भी कोर्ट में जुड़ीं
  • अगली सुनवाई: २६ नवंबर

मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन ५ जनवरी २०२६ को होना है। यदि कोर्ट ने SIR रद्द किया तो बिहार विधानसभा चुनाव सहित कई राज्यों के स्थानीय निकाय चुनाव प्रभावित हो सकते हैं।

चुनाव आयोग ने दावा किया है कि यह २००३ के बाद पहला व्यापक शुद्धिकरण है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिना कानूनी आधार के इतने बड़े स्तर पर मतदाता सूची में बदलाव अपने आप में संवैधानिक संकट पैदा कर रहा है।

मतदाताओं से अपील: अभी भी समय है। अपने नाम की स्थिति https://voters.eci.gov.in पर चेक करें और जरूरी दस्तावेजों के साथ आपत्ति दर्ज कराएं।

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