(नवंबर क्रांति की याद में विशेष आलेख :नीलोत्पल बसु, अनुवाद : संजय पराते) न्यूयॉर्क शहर के मेयर चुनाव के अंतिम क्षणों में, जब यह स्पष्ट होता जा रहा था कि ज़ोहरान ममदानी जीत रहे हैं, खुद डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने अनोखे अंदाज़ में इस बात की पुष्टि कर दी थी कि क्या होने वाला है। संयुक्त राज्य अमेरिका की राजनीतिक प्रक्रिया में एक बाहरी व्यक्ति होने के बावजूद, ममदानी बाकी सभी उम्मीदवारों से आगे चल रहे थे। ‘ट्रुथ सोशल’ पर उन्होंने अचानक पोस्ट किया — “यदि कम्युनिस्ट उम्मीदवार ज़ोहरान ममदानी न्यूयॉर्क शहर का चुनाव जीतते हैं, तो मेरे लिए यह बेहद असंभव होगा कि मेरे प्यारे पहले घर के लिए आवश्यक न्यूनतम राशि के अलावा, मैं संघीय निधियों का योगदान दूँ, क्योंकि एक कम्युनिस्ट होने के नाते, इस महान शहर के सफल होने या यहाँ तक कि अस्तित्व में बने रहने की कोई संभावना नहीं है। एक कम्युनिस्ट के सत्ता में आने से यह और भी बदतर हो सकता है, और मैं राष्ट्रपति के रूप में उसके बाद अच्छा-खासा पैसा नहीं भेजना चाहता। देश चलाना मेरी जिम्मेदारी है, और यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि अगर ममदानी जीत गए, तो न्यूयॉर्क शहर पूरी तरह से आर्थिक और सामाजिक रूप से तबाह हो जाएगा। उनके सिद्धांतों का हज़ार सालों से परीक्षण किया जा रहा है और वे एक बार भी सफल नहीं हुए हैं। मैं एक ऐसे डेमोक्रेट को देखना ज़्यादा पसंद करूँगा, जिसके पास सफलता का रिकॉर्ड हो।” आसन्न हार का इससे ज़्यादा ज़ोरदार प्रमाण और क्या हो सकता था। हार, चाहे कितनी भी क्षणिक क्यों न हो, ट्रंप की रंगीन कल्पनाशीलता के लिए साफ़ तौर पर ख़तरा थी। उनकी कार्ययोजना में, यह वास्तविक व्यवधान न सही, एक विराम ज़रूर था। यह पूर्वाभास मतगणना के संभावित परिणाम का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का था जिसके कारण यह परिणाम सामने आया। शायद अनिश्चितता का एकमात्र तत्व ममदानी की जीत का पैमाना था। ज़ाहिर है, अपने सबसे बुरे पूर्वाभास में भी उन्होंने इस पैमाने का अंदाज़ा नहीं लगाया था कि डाले गए मतों में से आधे से ज़्यादा वोट ममदानी को मिलेंगे। लेकिन फिर भी, अभी तक दुनिया के सबसे शक्तिशाली राज्य की स्थापना पर अपने संस्थागत प्रभाव के साथ, ट्रम्प इस उभरती प्रवृत्ति के निहितार्थ को भांप रहे थे। न केवल रिपब्लिकन पार्टी, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं और जिसने अति-दक्षिणपंथ के पुनरोदय का नेतृत्व किया था, और न केवल अमेरिका में, बल्कि संपूर्ण पूंजीवादी दुनिया एक अपमानजनक हार के कगार पर थी। लेकिन इसकी जगह डेमोक्रेटिक पार्टी नहीं ले रही थी। लेकिन यह एक ऐसा बाहरी व्यक्ति था, जिसके पास एक साल पहले केवल एक प्रतिशत लोकप्रिय समर्थन था और जो पिछले सौ वर्षों या शायद उससे भी अधिक समय से चली आ रही द्वि-आधारी व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा कर रहा था। लोग समग्र रूप से, पूंजीवाद द्वारा उनके सामने परोसे जाने वाले खास फर्जी विकल्पों से परे, विकल्पों की तलाश कर रहे थे। नवंबर क्रांति और वर्तमान संदर्भ सोवियत संघ और अन्य पूर्वी यूरोपीय समाजवादी सरकारों को मिले झटकों के बाद के घटनाक्रमों ने ट्रम्प की इस भावना को और पुष्ट किया। ट्रम्प, उनके पूर्ववर्तियों और अन्य आलोचकों के लिए, यह अंतिम विजय का क्षण था। ‘पूंजीवाद इतिहास का अंत है’ और अब यह पृथ्वी की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पूर्ण आधिपत्य के लिए केवल एकतरफा रास्ता था। इतिहास में पीछे जाकर देखें, तो पूरे यूरोप में मज़दूर वर्ग को एकजुट करने की चुनौती से निपटते हुए, लेनिन इस अपरिहार्य निष्कर्ष पर पहुँचे कि राष्ट्र-विशिष्ट वित्तीय पूँजी प्रतिद्वंद्विता और संघर्षों की ओर अग्रसर थी, जो अंततः युद्धों की ओर ले जा रही थी। राष्ट्र-राज्य से जुड़ी विशेष वित्तीय पूँजी बड़े बाज़ार, प्राकृतिक संसाधन और सस्ता श्रम हासिल करने की खोज में थी। यह प्रथम विश्व युद्ध की तैयारी थी। यही वह स्थिति थी, जहाँ राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी साम्राज्यवाद की अवस्था में पहुंच रही थी। यह स्पष्ट था कि युद्ध अनिवार्य रूप से साम्राज्यवाद से जुड़ा था। इससे साम्राज्यवादी युद्ध के विरुद्ध मज़दूर वर्ग को एकजुट करने में मदद मिली। इस विश्लेषण से साम्राज्यवाद की समझ विकसित हुई ; समाजवाद की स्थापना के लिए शोषण के विरुद्ध मज़दूर वर्ग की विजय हेतु साम्राज्यवाद का मुकाबला आवश्यक था। लेनिन ने जो प्रमुख सैद्धांतिक प्रश्न प्रस्तुत किया और जिसका समाधान किया, वह था मार्क्स द्वारा प्रस्तुत कम्युनिस्ट घोषणापत्र में पिछड़े ज़ार शासित रूसी क्षेत्र के संदर्भ में पूंजीवाद के नियमों को उजागर करना। मार्क्स का यह दावा कि पूंजी को अपने प्रमुख साधन के रूप में वित्त में बदलना ही होगा, बाद में साम्राज्यवाद के उदय को समझने की कुंजी भी था। इस दृष्टि से यह निष्कर्ष निकला कि पिछड़ा रूस ‘साम्राज्यवादी श्रृंखला की सबसे कमज़ोर कड़ी’ था और इसका अर्थ था उसकी पराजय की संभावना। पूंजीवाद का संकेंद्रण और केंद्रीकरण पूंजीवादी गतिशीलता की कुंजी है, यह मार्क्स की दृष्टि का हिस्सा था। इसलिए, उसकी अवधारणात्मक संरचना को खोलने वाला यह भविष्यसूचक कथन था — “यूरोप को एक भूत सता रहा है — साम्यवाद का भूत।” यहीं लेनिन और बोल्शेविकों ने नवंबर क्रांति की सफलता की नींव रखी थी। आज, यह वाकई अविश्वसनीय है कि ट्रंप की ताज़ा टिप्पणी में भी उसी डर का स्वर गूंज रहा है। वित्त-संचालित पूँजीवादी व्यवस्था पूँजीवाद का संकेन्द्रण और केंद्रीकरण पूँजीवादी गतिशीलता की कुंजी था, यह मार्क्स की दृष्टि का एक हिस्सा था। मुख्य प्रश्न पूँजी और श्रम के बीच संघर्ष का है। इतिहास के किसी भी दौर में किसी समय पूँजी चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, वह श्रम का स्थान नहीं ले सकती, उसे पराजित करना तो दूर की बात है। इस प्रकार, पूँजीवाद ‘अपनी कब्र खोदने वालों को जन्म देता है।’ शोषण और लाभ की चाह अंततः इतिहास की वास्तविक दिशा नहीं बदल सकती। अमेरिका के वैश्विक आधिपत्य के समकालीन संदर्भ में, साम्राज्यवाद और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी के उद्गम स्रोत, समान रूप से असहाय प्रतीत हो रहे हैं। सोवियत संघ के बाद की दुनिया के लगभग चार दशकों के दौरान, यह मूल दिशा जीवित और सक्रिय रही है। हालांकि कभी-कभी प्रचार के बुनियादी ढांचे के माध्यम से विचारधारा के प्रसार पर पूर्ण और निरपेक्ष नियंत्रण का पूर्वाभास होता है। इसलिए, ट्रम्प और आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के स्प्रिंग बोर्ड वॉल स्ट्रीट को ममदानी को जीत की ओर बढ़ते देखना पड़ा। ममदानी का अभियान मंच, अधिक किफायती जीवन के लिए नगर निगम के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के साथ किराए को स्थिर करके, स्वास्थ्य और शिक्षा को अधिकार के रूप में, सस्ते किराने की आपूर्ति आदि के माध्यम से वोटों की वकालत करता था, जिसमें कर से प्राप्त धन का पुनर्वितरण होता था। ममदानी और उनका समाजवादी लोकतांत्रिक घोषणापत्र उन प्रमुख चुनौतियों का जवाब दे रहा था जो समकालीन वित्तीय पूंजी पेश कर रही थी — बढ़ती असमानता और आसमान छूती बेरोजगारी। हालांकि यह उतना स्पष्ट नहीं था, लेकिन फिर भी इसमें समाजवादी विकल्प का संकेत निहित था। और इसके कारण यह आरोप लगा कि ममदानी एक कम्युनिस्ट थे, जिसका उन्होंने स्वयं विरोध किया था। लेकिन इसके बावजूद, ट्रम्प ने खुद बहुत स्पष्ट रूप से यह दावा किया था। कौन जानता था कि मार्क्स ज़िंदा हो जाएँगे और लेनिन की आलोचना और साम्राज्यवाद के विकल्प का उनका प्रस्ताव 2025 के समकालीन पूंजीवाद के संदर्भ में सही साबित होगा! यही कारण है कि एंड्रयू कुओमो और एरिक एडम्स जैसे बदनाम उम्मीदवारों का अभियान, एलन मस्क जैसे लोगों द्वारा अरबों डॉलर खर्च किए जाने के बावजूद, धराशायी हो गया! फ़िलिस्तीन : साम्राज्यवादी-यहूदीवादी गठबंधन के खिलाफ अविश्वसनीय प्रतिरोध दुनिया ने गाज़ा में फ़िलिस्तीनियों के भीषण जनसंहार को देखा, जो भयानक फ़ासीवादी जनसंहार को पुनः दुहराया जाना था। यह स्पष्ट रूप से पूर्ण नियंत्रण के लिए जातीय सफ़ाई और विनाश का अभियान था। फिलिस्तीन विरोध के बेतुके तर्क के आधार पर, साम्राज्यवाद की सहायता और प्रोत्साहन प्राप्त यहूदीवाद और उसकी निरंकुशता को न छिपाया जा सकता है और न उचित ठहराया जा सकता है। यह आधिपत्य कायम करने का एक निरंकुश खेल था, जो खेला जा रहा था। लेनिन एक बार फिर प्रासंगिक हो गए — ‘साम्राज्यवाद और युद्ध जुड़वां भाई हैं’ — जो इतिहास की दिशा को आगे बढ़ाने और जीवित रहने के लिए एक-दूसरे को परस्पर सुदृढ़ करते हैं। एक बार फिर, जो कभी-कभी असंभव लगता था, जनता ने उसे हासिल कर लिया है। फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध संघर्ष के साथ व्यापक एकजुटता ने अंततः, कम से कम कुछ समय के लिए ही सही, हमलावर को पीछे धकेल दिया है। गाजा ने मार्क्स और लेनिन की भविष्यवाणी के ऐतिहासिक सार को भी सही साबित किया है। पूँजी का संकेंद्रण और केंद्रीकरण, शायद पहले कभी इतना नहीं हुआ, जितना कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी की सहायता से हुआ है, जिसने असमान विकास को जन्म दिया है। क्षेत्र, जनसांख्यिकी, लिंग, पहचान, सभी इसके शिकार होंगे और मुनाफा-अधिकतम करने की इस मुहिम का शिकार होंगे। इसलिए, यह कोई संयोग नहीं है कि एकजुटता आंदोलन, जिसने व्यापक लोकतांत्रिक समर्थन हासिल किया, शुरू में दुनिया भर के प्रवासियों द्वारा संचालित था। ममदानी का फिलिस्तीनी हितों के लिए स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया दावा, गाजा में हुए जघन्य अपराधों के बारे में अमेरिकी जनता की बदलती सोच का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। न्यूयॉर्क की यहूदी आबादी 30 प्रतिशत है। इतनी बड़ी यहूदी आबादी तेल अवीव के अलावा किसी भी अन्य शहर की नहीं है। इसके बावजूद, वे इस आंदोलन के पीछे लामबंद हुए हैं और उन्होंने ममदानी के समर्थन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ममदानी ने यहूदियों और यहूदीवादियों के बीच अंतर करने का साहस दिखाया और नेतन्याहू को स्पष्ट रूप से अपराधी ठहराया! आज का भारत आज भारत में अति-दक्षिणपंथ का उदय पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की गतिशीलता का समान रूप से प्रमाण है। यह पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है कि ये दोनों प्रमुख तत्व एक आक्रामक वित्त-संचालित प्रतिमान को अपनाते हैं जो अंततः निर्लज्ज भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देता है। लेकिन जैसे-जैसे पूँजी का संकेन्द्रण होता है, बेरोज़गारी और असमानता में भारी वृद्धि होती है, जिससे आम जनता को विभाजित करने की तात्कालिकता बढ़ती है और नफरत-भरा अलगाव इसका एक अपरिहार्य परिणाम है। वर्तमान व्यवस्था को संचालित करने वाले कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक गठजोड़ में, यह मध्यम अवधि के लिए भी असहनीय है, और यह भारत के वर्तमान लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत स्वीकृत लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली के औपचारिक तरीकों के हनन से भी स्पष्ट है। यह एक ओर पहचान-आधारित ध्रुवीकरण को बढ़ावा देकर और दूसरी ओर एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावी लोकतंत्र का अपहरण करके डेढ़ अरब से अधिक लोगों को लुभाने और डराने के नव-फासीवादी तरीकों में पतित हो जाता है। विकल्प इसलिए, अब समय आ गया है कि एक स्पष्ट विकल्प हो। जबकि मेहनतकश जनता के सभी तबकों और लोकतंत्र के समर्थक सभी लोगों को एकजुट करने की आवश्यकता सर्वोपरि है ; एकीकृत लामबंदी की इस प्रक्रिया को एक स्पष्ट विकल्प के साथ जोड़ना होगा, जो न केवल संविधान में निहित राजनीतिक और सामाजिक लोकतंत्र की रक्षा करे, बल्कि उससे भी आगे जाए। इसे आर्थिक और सामाजिक समानता, युवाओं के नेतृत्व वाली जनसांख्यिकी, लिंग और पहचान के लिए समानता और अवसर की वकालत पर जोर देना होगा। दिशा तय है। भविष्य समाजवाद का है — जनता के हितों को मुनाफे से ऊपर रखना होगा। नवंबर क्रांति का स्मरण यही स्पष्ट संदेश देता है। (लेखक माकपा पोलिट ब्यूरो के सदस्य और पूर्व सांसद हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike 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