अंकुल प्रताप सिंह, बघेल।। इंदौर, मध्य प्रदेश का चमकता शहर – स्वच्छता सर्वेक्षण में नंबर वन, लेकिन मानवता के पैमाने पर शून्य। एक हादसा, तीन जिंदगियां, और अस्पतालों की ठंडी दीवारें। यह कहानी नहीं, एक काला सच है जो शहर की चकाचौंध के पीछे छिपा है। हादसे का मंजर: आधे घंटे का इंतजार, मौत का स्वागत बताया जा रहा है कि दुर्घटना के तुरंत बाद तीन युवक सड़क पर गिरे। खून की नदियां बह रही थीं, दर्द की चीखें गूंज रही थीं। राहगीरों की भीड़ जमा हो गई – लोग फोन निकालकर वीडियो बना रहे थे, लेकिन मदद के लिए आगे नहीं बढ़े। भीड़ ने लाइफ केयर अस्पताल के स्टाफ को पुकारा: “इन्हें अंदर ले लो, इलाज करो!” लेकिन अस्पताल वाले पुलिस की गश्ती गाड़ी का इंतजार करते रहे। कानून का डर, मानवता का भय? पुलिस आई, लताड़ लगाई, तब जाकर दरवाजे खुले। लेकिन तब तक दो युवकों की सांसें थम चुकी थीं। आधा घंटा – सिर्फ 30 मिनट, जो जिंदगी और मौत के बीच की रेखा बन गए। अस्पतालों की ‘पॉलिसी’: कानून पहले, इंसान बाद में सरकार कितने ही प्रलोभन दे – एक्सीडेंट केस में मुफ्त इलाज, मेडिको-लीगल केस की छूट – लेकिन इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती। क्यों? क्योंकि पुलिस केस का डर, कोर्ट-कचहरी की झंझट, और अस्पताल की ‘साख’। लेकिन सवाल यह है: क्या मानवता भी कोई पॉलिसी है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश हैं – एक्सीडेंट विक्टिम को तुरंत इलाज दो, बिना पुलिस के। फिर भी, इंदौर के अस्पताल क्यों अंधे हो जाते हैं? यह पहला मामला नहीं। इंदौर में पहले भी ऐसे किस्से सुनाई देते हैं जहां अस्पतालों ने मरीजों को बाहर रखा, क्योंकि “पेमेंट गारंटी” नहीं थी या “पुलिस रिपोर्ट” लंबित थी। लाइफ केयर जैसे नामी अस्पताल, जहां मशीनें चमकती हैं, लेकिन दिल ठंडे पड़े हैं। समाज की भूमिका: भीड़ क्यों खामोश? राहगीरों की भीड़ – सैकड़ों लोग, लेकिन कोई एम्बुलेंस नहीं बुलाई, कोई उठाकर अस्पताल नहीं ले गया। हम सब दोषी हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते हैं, लेकिन मदद की अपील नहीं। क्या हमारी संवेदना भी ट्रैफिक जाम की तरह अटक गई है? बदलाव की पुकार: अब बस बहुत हुआ! अस्पतालों को: मानवता को पॉलिसी बनाओ। ट्रेनिंग दो, जहां डॉक्टर पहले इंसान बचाएं, बाद में कागज। सरकार को: सख्त कानून लागू करो। ऐसे अस्पतालों की लाइसेंस रद्द करो, जुर्माना लगाओ। हम सबको: अगली बार सड़क पर कोई पड़ा हो, तो उठाओ, ले जाओ। फोन मत निकालो, हाथ बढ़ाओ। इंदौर की सड़कें साफ हैं, लेकिन दिल गंदे हो गए हैं। दो जिंदगियां चली गईं – क्या हमारी अंतरात्मा नहीं जगती? यह लेख नहीं, एक चेतावनी है। अगला शिकार कोई अपना न हो। मानवता बचाओ, वरना शहर सिर्फ इमारतों का ढांचा रह जाएगा। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन मेडिकल कर्मी की संदिग्ध मौत… बाइक से गिरते ही तोड़ा दम… हार्ट अटैक की आशंका युवा कांग्रेस चुनाव में जीत: रतनगढ़ में कमल छपरीबंद व अंकित शर्मा का वरिष्ठ नेताओं ने किया स्वागत