भारत।।लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए आंदोलन से सोनम वांगचुक चर्चा में हैं लेकिन इससे पहले वह पहली बार थ्री इडियट्स फिल्म के बाद चर्चा में आए थे। यह दावा किया गया कि इस फिल्म का किरदार रेंचो उनसे प्रेरित था। हालांकि उन्होंने इस बात को एक इंटरव्यू में खारिज किया था। साल 2018 में सोनम को शिक्षा के क्षेत्र में में योगदान के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इंजीनियर, इनोवेटर, शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को हिरासत में ले लिया गया है। उन पर आरोप है कि लेह में हुए हिंसक प्रदर्शनों के पीछे उनकी भूमिका है। वांगचुक को उनके गांव उलेटोक्पो से गिरफ्तार किया गया। वे बीते साल से अलग-अलग मौकों पर लद्दाख को संविधान की छठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए आमरण अनशन और दिल्ली तक मार्च कर चुके हैं। पिछले साल मार्च में उन्होंने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और इसे छठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए 21 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। वहीं अक्तूबर 2024 में ही इसी मांग को लेकर उन्होंने लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाला था। हालांकि दिल्ली पुलिस ने सिंघु बॉर्डर से उन्हें हिरासत में ले लिया था। हाल ही में 35 दिन की उनकी भूख हड़ताल के 15वें दिन 24 सितंबर को लेह में आंदोलन हिंसक हो गया जिसमें चार लोगों की मौत हुई और तकरीबन आधा सैकड़ा लोग घायल हो गए। साल 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म करके जम्मू-कश्मीर राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों.. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था। लद्दाख की अधिकतर जनता ने इस फैसले का स्वागत किया था क्योंकि जम्मू-कश्मीर से अलग होने की उनकी काफी पुरानी मांग थी। सोनम वांगचुक ने भी सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कार्यालय को इस फैसले के लिए धन्यवाद भी दिया था।
यहां बता दें कि तीस बरस पहले अगस्त 1989 में केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे को लेकर लद्दाखी नेताओं ने आंदोलन की शुरुआत की थी। वहीं बीते साल छठवीं अनुसूची की मांग को लेकर भूख हड़ताल के दौरान सोनम वांगचुक ने कहा था कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। वह कई मौकों पर देशभक्ति की भावना और भारतीय सेना को लेकर अपने प्यार को दिखाते रहे हैं।
लेकिन लेह में हिंसक प्रदर्शनों के बाद सोशल मीडिया पर उनकी आलोचनाएं हो रही हैं। कोई उनकी देशभक्ति पर सवाल उठा रहा है तो किसी ने उन्हें चीनी एजेंट तक कह दिया। उनके इस साल फरवरी में पाकिस्तान जाने की खबर और बांग्लादेश के अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस के साथ गले मिलने की पुरानी तस्वीर शेयर की जा रही है।
59 वर्षीय सोनम का जन्म साल 1966 में लेह के दुर्गम गांव उलेटोक्पो में हुआ था। नौ साल की उम्र तक तो वो स्कूल के बारे जानते ही नहीं थे। वे कहते हैं कि 12 साल की उम्र में उनका स्कूल में दाखिला कराया गया था। शिक्षाविद, इनोवेटर और पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर पहचाने जाने वाले सोनम वांगचुक को स्कूल न जाने की वजह से उनकी मां ने उन्हें घर पर ही स्थानीय भाषा में पढ़ाया। सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल राजनेता थे और नौ साल की उम्र के बाद सोनम वांगचुक को श्रीनगर के स्थानीय स्कूल में भेज दिया गया। स्कूल में उन्हें अंग्रेजी की किताबें पकड़ा दी गईं। उन्होंने बताया कि स्कूल के शिक्षक उन्हें पीछे की सीट पर बैठा देते थे या क्लास के बाहर खड़ा कर दिया करते थे। तंग आकर 12 साल की उम्र में वो लद्दाख के छात्रों के लिए विशेष केंद्रीय विद्यालय में एडमिशन लेने के लिए अकेले बस से दिल्ली भाग आए। वो कहते हैं कि वहां पर बच्चों की बहुत भीड़ थी और उन्हें कई दिनों से कैंप में इंतजार करना पड़ रहा था।

आखिरकार वो सीधे स्कूल में प्रिंसिपल के रूम में चले गए और उनसे एडमिशन देने को कहा। प्रिंसिपल उनके इस जुझारूपन से खुश हुए और उन्हें एडमिशन दे दिया। इसके बाद सोनम वांगचुक ने इंजीनियरिंग की तैयारी की और श्रीनगर के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (वर्तमान में एनआईटी) में लिखित परीक्षा पास करके इंटरव्यू देने गए। इंटरव्यू के दौरान प्रिंसिपल ने जब उनके पिता का नाम देखा तो उनसे पूछा कि उनके पिता क्या करते हैं तो उन्होंने कहा कि वो पेशे से किसान हैं। हालांकि उस समय सोनम के पिता जम्मू-कश्मीर में मंत्री थे। सोनम का कहना था कि उन्होंने जब बीटेक का एक साल पूरा कर लिया तो वो मैकेनिकल इंजीनियरिंग करना चाहते थे क्योंकि उनकी ऑप्टिक्स में दिलचस्पी थी। वहीं उनके पिता उन्हें सिविल इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए कह रहे थे। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई को चुना तो उनके पिता ने उन्हें पढ़ाई का खर्चा देने से मना कर दिया जिसके बाद अपने खर्चे पूरे करने के लिए उन्होंने स्कूली बच्चों के लिए कोचिंग की शुरुआत की। 19 साल की उम्र में उन्होंने एक होटल के कमरे को किराए पर लेकर जब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो दो महीने में ही तीन साल की इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फीस जुटा ली।


सोनम वांगचुक कहते हैं कि यही वह मौका था जिसने उन्हें शिक्षा के लिए काम करने को प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने कॉलेज से निकलते ही साल 1988 में स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (एसईसीएमओएल) की शुरुआत की। शुरुआत में कई सालों तक सरकारी स्कूल सिस्टम में बदलाव को लेकर काम किया। उसी के साथ ही कैंपस में ऐसे अधिकतर बच्चों को पढ़ाया जा रहा था जो स्कूली शिक्षा में फेल हो गए थे। एसईसीएमओएल में पारंपरिक स्कूली शिक्षा से हटकर पढ़ाई कराई जाती है जहां पर प्रकृति में रहकर और प्रैक्टिकल पढ़ाई होती है। सन 1994 में वांगचुक ने ऑपरेशन न्यू हॉप (ओएनएच) की शुरुआत की। यह अब तक करीब सात सौ शिक्षकों और करीब एक हजार ग्राम शिक्षा समितियों को ट्रेनिंग दे चुका है। इस दौरान लद्दाख में भी स्कूली शिक्षा में बदलाव देखा गया। जहां साल 1996 तक दसवीं कक्षा में सिर्फ पांच फीसदी बच्चे पास होते थे वो दर बढ़कर साल 2015 में 75 फीसदी हो गई। स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सुधार और वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था के मिशन को वांगचुक ने विश्वविद्यालय स्तर पर ले जाना चाहा। इसी कोशिश के तहत तकरीबन सात साल पहले उन्होंने हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टर्नेटिव्स लद्दाख (एचआईएएल) की शुरुआत की।

उनका कहना है कि एसईसीएमओएल में किए गए शोध को एचआईएएल में दूसरे स्तर पर ले जाया जाता है। वो बताते हैं कि सौर ऊर्जा से कमरों को गर्म करने का एक आविष्कार एसईसीएमओएल में शुरू किया गया था। वांगचुक कहते हैं कि भारतीय सेना के साथ पार्टनरशिप में चीन से लगी सीमा पर सेना के कैंपों के लिए इस आविष्कार पर काम किया गया और इसे अफगानिस्तान में भी ले जाया गया है। कुल मिलाकर, सोनम की मांग क्या वाजिब नहीं है। हां, यदि सूबे में हिंसा फैली है तो उसकी जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जरूर होना चाहिए। लेकिन, कार्रवाई की आड़ में सोनम वांगचुक जैसे शिक्षाविद को हिरासत में लिया जाना शक पैदा करता है।  

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