(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

संसद के मानसून सत्र की अपेक्षाकृत छोटी अवधि के दौरान ही, अनेक राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार, जहां देश के मूड में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, वहीं इसी दौरान देश को दो बड़े सरप्राइज भी देखने को मिले हैं। देश के मूड में बदलाव का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि संसद के इस सत्र की शुरूआत प्रधानमंत्री के संसद पहुंचने पर, सत्तापक्ष के सांसदों की तरफ से ही सही, उनका जोशीले नारों के साथ स्वागत किए जाने से हुई थी और प्रधानमंत्री ने भी कम से कम लोकसभा को, आपरेशन सिंदूर पर हुई विस्तृत चर्चा के अपने अति-विस्तृत उत्तर का सम्मान दिया था, जो सम्मान प्रधानमंत्री मोदी के राज के ग्यारह साल में दुर्लभ ही होता गया है। उसी सत्र का अंत विपक्षी सांसदों द्वारा ही सही, प्रधानमंत्री को संबोधित कर ‘‘वोट चोर, गद्दी छोड़’’ के नारे लगाए जाने के साथ हुआ। और बिहार में जन-विरोधी एसआइआर प्रक्रिया पर, संसद में बहस कराने विशेष संदर्भ में लगे, इन नारों के लगाए जाने से बड़ी खासियत, विपक्ष के इन नारों पर सत्ताधारी पार्टी के सांसदों की जैसे हथियार ही डाल देने की प्रतिक्रिया थी। सामान्यत: जो होता आया है, उसके विपरीत, सत्ताधारी सांसदों की ओर से विपक्ष के नारों को अपने कंठबल से दबाने का, शायद ही कोई वास्तविक प्रयास किया जा रहा था।

और जहां तक इसी सत्र के दौरान हुई दो बड़ी हैरान करने वाली घटनाओं का सवाल है, पहली घटना जो सत्र के शुरू में ही हुई, राज्यसभा के सभापति तथा उपराष्ट्रपति के अचानक इस्तीफा देने की ही रही। यह घटना इस कदर अचानक हुई कि उपराष्ट्रपति के पद से जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के महीने भर बाद भी, जबकि उनकी जगह लेने के लिए नये उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सत्तापक्ष और एकजुट विपक्ष, दोनों के उम्मीदवारों का चुनाव प्रचार जोर-शोर से चल पड़ा है, अब तक प्रेक्षकों द्वारा इस पर हैरानी ही जतायी जा रही है कि उपराष्ट्रपति को अचानक इस्तीफा क्यों देना पड़ा। बेशक, इस संबंध में पहले दिन से ही तरह-तरह की अटकलें लगायी जा रही हैं और बहुत सी अटकलें निराधार भी नहीं हैं। कम से कम इतना तो साफ ही है कि वर्तमान सत्ता के शीर्ष पर बैठे सत्ताधीशों की धनखड़ से नाराजगी इस त्यागपत्र प्रकरण के पीछे थी। फिर भी इस प्रकरण के पीछे एक रहस्यकथा तो अब भी बनी ही हुई है। और इस रहस्यकथा को इस्तीफा देने के बाद से धनखड़ के सार्वजनिक परिदृश्य से पूरी तरह से अदृश्य ही हो जाने ने और भी गाढ़ा रंग दे दिया है।

दूसरा हैरान करने वाला प्रकरण, सत्र के ऐन आखिर में सामने आया। लोकसभा की कार्य मंत्रणा समिति की सारी प्रक्रिया को धता बता हुए और विपक्ष ही नहीं, सत्तापक्ष को भी हैरान करते हुए, लोकसभा में अचानक 130वां संविधान संशोधन प्रस्ताव पेश कर दिया गया। यह प्रस्ताव संविधान में संक्षेप में इस आशय के संशोधन का है कि पांच साल या उससे अधिक सजा वाले अपराध के आरोपी, प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय या राज्य मंत्री तक को, अगर बिना जमानत के एक महीना कैद में गुजारना पड़े तो, एक महीना पूरा होते ही उसका उक्त पद खुद-ब-खुद छिन जाएगा। इस संविधान संशोधन प्रस्ताव को विपक्ष के कड़े विरोध के बाद भी लोकसभा में पेश किया गया और उसके तुरंत बाद ही संयुक्त संसदीय समिति द्वारा छानबीन के लिए भेज दिया गया। इस मामले में संयुक्त संसदीय समिति का गठन खुद विवादों के घेरे में आता जा रहा है, क्योंकि एक-एक कर विपक्षी पार्टियों के प्रस्तावित समिति से दूर रहने का एलान करने का सिलसिला शुरू हो चुका है।

जैसाकि आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था, सत्ताधारी भाजपा और किसी हद तक उसका गठबंधन भी, इस संशोधन को राजनीति में ‘‘शुचिता’’ लाने की अपनी कोशिश के रूप में पेश करना चाहता है। गृहमंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में इस संशोधन प्रस्ताव को पेश करते हुए दी गयी दलीलों से यह कोशिश पूरी तरह से स्पष्ट थी। इसके बाद यदि अगर कोई कसर रह गयी थी, तो वह मानसून सत्र के फौरन बाद, बिहार, बंगाल तथा अन्य राज्यों के प्रधानमंत्री के चुनावी तथा चुनाव-पूर्व दौरे पर दिए गए भाषणों से साफ हो गयी। इन भाषणों में प्रधानमंत्री ने विपक्षी पार्टियों के उक्त संविधान संशोधन के विरोध को, उनके नेताओं के भ्रष्ट होने और भ्रष्टाचारियों को बचाने का सबूत बनाकर पेश करने की कोशिश की। इसी सिलसिले में प्रधानमंंत्री मोदी ने एक बार फिर अपना पुराना दावा दोहराया कि उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी दाग नहीं लगा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि उक्त संविधान संशोधन प्रस्ताव के पीछे मोदी सरकार की राजनीति में शुचिता लाने की चिंता होने के दावे को, नरेंद्र मोदी के अंधभक्तों के सिवा शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया होगा। इस संशोधन प्रस्ताव के दायरे में प्रधानमंत्री तथा केंद्रीय मंत्रियों के भी शामिल किए जाने के बावजूद, यह सचाई किसी से छुपी नहीं रही है कि ये पद सिर्फ दिखावे के लिए शामिल किए गए हैं ; यह दिखाने के लिए कि यह कानून विपक्ष ही नहीं, सत्तापक्ष पर भी लागू होगा। लेकिन, यह दिखावा एक ऐसी सरकार द्वारा किया जा रहा है, जिससे उसके पक्के से पक्के समर्थक भी, सत्तापक्ष और विपक्ष में भेदभाव न करने का दिखावा तक करने की उम्मीद नहीं करते हैं, फिर आम लोगों के इस दिखावे पर विश्वास करने का तो सवाल ही कहां उठता है। उल्टे आम देशवासी किसी न किसी हद तक विपक्ष की इस दलील से प्रभावित है कि यह संविधान संशोधन, सिर्फ और सिर्फ विपक्षी सरकारों को निशाना बनाने और अस्थिर करने के लिए लाया गया है। वास्तव में प्रधानमंत्री समेत खुद सत्ताधारी पार्टी द्वारा इस संविधान संशोधन विधेयक के बहाने से, विपक्ष को निशाना बनाए जाने की कोशिशों से, इस आशंका की पुष्टि ही हुई है।

‘‘जेल से सरकार नहीं चल सकती’’ की सत्तापक्ष की दलीलों का इशारा भी, मोदी राज द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर रहते केजरीवाल को और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को, सीआइडी और ईडी के बनाए मामलों में जेल में डाले जाने की ओर ही है। वास्तव में हेमंत सोरेन ने तो राजभवन से अपनी गिरफ्तारी से ऐन पहले इस्तीफा देकर और अपनी पार्टी का वैकल्पिक मुख्यमंत्री बनवा कर, झारखंड में विपक्षी सरकार को इस हथकंडे से गिराने की कोशिश को, विफल भी कर दिया था। केजरीवाल ने ही गिरफ़्तारी के बाद और अंतत: जमानत के बाद भी, इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था और इस तरह, केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर सरकार को हटाए जाने की कोशिश को विफल किया था। अब इस संशोधन के जरिए, इस हथकंडे के सहारे असुविधाजनक विपक्षी सरकारों को हटाने का ही रास्ता तैयार किया जा रहा है। और इस हथकंडे का इस्तेमाल कोई अतिरंजित आशंका नहीं है। तमिलनाडु तथा केरल समेत, ऐसा कोई विपक्ष-शासित राज्य नहीं है, जहां ईडी-सीबीआइ आदि केंद्रीय एजेंसियों ने, मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्री तक के खिलाफ किसी न किसी प्रकार की जांच नहीं छेड़ रखी है। दिल्ली और झारखंड के मामले इसके गवाह हैं कि ऐसी जांचों को मुख्यमंत्रियों तक की हिरासत की मांग तक पहुंचने में और फिर उनकी जमानत की राह मुश्किल से मुश्किल बनाए जाने में, ज्यादा समय नहीं लगता है। यही वह प्रशासनिक संस्कृति है, जो मोदी राज के ग्यारह साल की पहचान ही बन गयी है।

वास्तव में इस संशोधन के बाद, इन केंद्रीय एजेंसियों को, केंद्रीय सत्ताधारी दल के पक्ष में दलबदल का हथियार बनाना और भी आसान हो जाएगा, क्योंकि मंत्री-मुख्यमंत्री सभी के सिर पर यह तलवार लटकती रहेगी कि महीने भर उन्हें जमानत न मिलना सुनिश्चित किए जाने भर की जरूरत है, उनका कैरियर आसानी से चौपट किया जा सकता है। सभी जानते हैं कि हिमंता बिश्वशर्मा से लेकर अजीत पवार तक, दर्जनों बड़े-बड़े विपक्षी नेताओं को इन्हीं एजेंसियों के ब्लैकमेल के जरिए, सत्तापक्ष के पाले में पहुंचाया गया है। प्रस्तावित संशोधन इन एजेंसियों को और घातक बना देंगे। याद रहे कि यह तलवार सिर्फ विपक्ष के ही सिर पर नहीं लटक रही होगी, सत्तापक्ष के अपने मंत्रियों से लेकर, उसके सहयोगियों के भी सिर पर लटक रही होगी। तेलुगू देशम तथा जनता दल यूनाइटेड में, इस संविधान संशोधन पर बेचैनी की खबरें, सिर्फ अटकलें ही नहीं हैं।

बेशक, ये तमाम आशंकाएं तब कुछ अपरिपक्व लग सकती हैं, जब हम इस बात को हिसाब में लेते हैं कि इस तरह के संविधान संशोधन का प्रस्ताव रखने की शक्ति तो मोदी सरकार के पास है, लेकिन ऐसे किसी संशोधन को पारित कराने की शक्ति उसके पास नहीं है। तब तो बिल्कुल ही नहीं, जब पूरा विपक्ष प्रस्तावित संशोधन के खिलाफ पूरी तरह से एकजुट है, जबकि खुद सत्ताधारी गठजोड़ इतना एकजुट नजर नहीं आता है। कम से कम फौरन सत्तापक्ष की यह मंशा पूरी होती नहीं लगती है और फौरन तो उसका मकसद, संसद में विपक्ष की ओर से उठायी गयी, बिहार में एसआइआर प्रक्रिया पर बहस की मांग से ध्यान बंटाना ही ज्यादा लगता है। यह दूसरी बात है कि इस पैंतरे के बाद से, विपक्ष की ‘‘वोट बचाओ यात्रा’’ के माध्यम से, बिहार में वोट चोरी का मुद्दा और भी बड़ा हो गया है।

लेकिन, वोट चोरी के मुद्दे से ध्यान बंटाने के साधन के रूप प्रस्तावित संविधान संशोधन के इस तात्कालिक उपयोग से अलग, संविधान के बुनियादी जनतांत्रिक सिद्घांतों तथा प्रावधानों से छेड़छाड़ करने वाले ऐसे संविधान संशोधनों के उछाले जाने का, एक और गहरा उद्देश्य भी है। यह एक के बाद एक, इस प्रकार के संशोधनों को उछालने के जरिए, संविधान को ही बदलने के लिए माहौल बनाना है। सत्ताधारी भाजपा और उसके प्रधानमंत्री दिखाने के लिए भले संविधान नहीं बदलने देने की कसमें खाते हैं, वास्तव में वे किस्तों में संविधान बदलने की ही कोशिश कर रहे हैं। एक देश, एक चुनाव के प्रस्ताव से संबंधित संविधान संशोधनों का निपटारा अभी हुआ भी नहीं है, तब तक एक और बड़े संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया जा चुका है। और यह सब संविधान की प्रस्तावना में से समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष आदि को निकालने के लिए संशोधनों की, आए दिन उन्हीं की कतारों के बीच से उठती रहने वाली मांगों के ऊपर से है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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